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जब शब्दाभिव्यक्ति सामने हो मगर अहसासो का दर बदला सा लगे एक पराये घर में भला कौन सुकून पाता है! - Ruchi Dixit
उसे पता नहीं है शायद! वह खुद ही मुझे खुद से दूर कर रहा है..... - Ruchi Dixit
अनगिनत ख्वाहिशें हो सकती हैं मुझमें मगर! मैं ख्वाहिश में नहीं हूँ! है अंतर में कुछ सूखा कुछ बिखरा सा बिखरी हूँ मैं भी सिमटू तो ही देखूँ खुद का प्रतिबिंब देखूँ तब अपने नैन- नक्श कुछ पढ़ पाऊँ मैं खुद को भी जानूँ फिर है क्या माँग मेरी थी तरस कहाँ क्यों कहीं छिपी,,,,, - Ruchi Dixit
जिसने समय बनाया वह भला समय के आधीन कैसे हो सकता है संतान के पुकारने पर अवसर उसे कैसे बाँध सकता है ? वह निरंतर , निर्बाध,एकसार है बस आर्द हमें होना है भीगना हैं एक क्षण को है वही चाहे स्वांस का अंतिम प्रयास ही क्यों न हो । - Ruchi Dixit
खो दिया है सब खत्म हो चुका है इस बात की अंत: स्वीकृति व्यक्ति के नष्ट और निर्माण दोनों में सक्षम है। - Ruchi Dixit
अभिलाषा ही दु:आ है इच्छा ही पीड़ा है उम्मीद ही कष्ट है इन सबका पोषण ही आसक्ति - Ruchi Dixit
राम नाम सर्वव्यापी सर्वविदित है फिर भी गुप्त आखिर यह गुप्त है क्या?? - Ruchi Dixit
जीना इसी का नाम है
निर्णय परमात्मा पर छोड़ने पर यदि प्रगाढ़ दिखने वाला संबन्ध पोषित नहीं हो पाता अथवा टूट जाता तो यही उस संबन्ध की वास्तविकता होती है,,,,, - Ruchi Dixit
प्रेम कभी किया नही जा सकता और न ही छोड़ा न परिवर्तित प्रेम केवल स्पष्ट होता है धीरे-धीरे और रहता अपने विस्तार तक.... - Ruchi Dixit
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