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Ruchi Dixit

Ruchi Dixit Matrubharti Verified

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जब शब्दाभिव्यक्ति सामने हो मगर
अहसासो का दर बदला सा लगे
एक पराये घर में भला कौन सुकून
पाता है! - Ruchi Dixit

उसे पता नहीं है शायद!
वह खुद ही मुझे खुद से दूर कर रहा है.....
- Ruchi Dixit

अनगिनत ख्वाहिशें हो सकती हैं मुझमें
मगर! मैं ख्वाहिश में नहीं हूँ!
है अंतर में कुछ सूखा
कुछ बिखरा सा
बिखरी हूँ मैं भी
सिमटू तो ही देखूँ
खुद का प्रतिबिंब
देखूँ तब अपने नैन-
नक्श कुछ पढ़ पाऊँ मैं खुद को भी
जानूँ फिर है क्या माँग मेरी
थी तरस कहाँ क्यों कहीं छिपी,,,,,
- Ruchi Dixit

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जिसने समय बनाया वह भला समय के आधीन कैसे हो सकता है
संतान के पुकारने पर अवसर उसे कैसे बाँध
सकता है ?
वह निरंतर , निर्बाध,एकसार है
बस आर्द हमें होना है
भीगना हैं एक क्षण को है वही
चाहे स्वांस का अंतिम प्रयास ही क्यों न हो ।

- Ruchi Dixit

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खो दिया है
सब खत्म हो चुका है
इस बात की अंत: स्वीकृति व्यक्ति के
नष्ट और निर्माण दोनों में सक्षम है।
- Ruchi Dixit

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अभिलाषा ही दु:आ है
इच्छा ही पीड़ा है
उम्मीद ही कष्ट है
इन सबका पोषण ही आसक्ति
- Ruchi Dixit

राम नाम सर्वव्यापी सर्वविदित है
फिर भी गुप्त आखिर यह गुप्त है क्या??
- Ruchi Dixit

जीना इसी का नाम है

निर्णय परमात्मा पर छोड़ने पर
यदि प्रगाढ़ दिखने वाला संबन्ध
पोषित नहीं हो पाता अथवा
टूट जाता तो यही उस संबन्ध
की वास्तविकता होती है,,,,,
- Ruchi Dixit

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प्रेम कभी किया नही जा सकता
और न ही छोड़ा न परिवर्तित प्रेम केवल
स्पष्ट होता है धीरे-धीरे
और रहता अपने विस्तार तक....
- Ruchi Dixit

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