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Ashish jain

Ashish jain

@jainashish0014
(233)

*॥ करुणा के कल्पतरु: महावीर ॥*

कुण्डलपुर के राजमहल में, करुणा का केतु लहराया,
सिद्धार्थ-त्रिशला के आँगन, अमृत-अंशु उतर आया।
त्याग दिया कंचन-काया को, कनक-मुकुट भी बिसराया,
अरिहंत हुए वे धीर वीर, जिसने निज आतम को पाया।

*अहिंसा का अलौकिक रूप*

अहिंसा उनकी ऐसी थी, ज्यों शशि की शीतल छाया हो,
प्राणी मात्र के प्रति मन में, बस ममतामयी माया हो।
पदचाप पड़े जिस धरती पर, वह भूमि भी पुलकित होती थी,
हिंसक पशुओं के नेत्रों में, अश्रु-माल पिरोती थी।
तप की ज्वाला में जलकर वे, कुंदन-सम चमक उठे ऐसे,
अंधियारे जग के जीवन में, सूरज संभल उठे जैसे।

*वाणी का सौंदर्य*

उनकी वाणी हितकारी थी, शहद-धार से मीठी थी,मित-भाषण का वह मर्म अनूठा, जीवन-कला की चिट्ठी थी।
बोल वही जो प्रिय लागे, और पीर पराई हर लेवे,
शब्द-बाण न चला कभी, जो अंतर-मन को जर देवे।वाणी में वीणा बजती थी, सत्य-सुधा झड़ती जिससे,
भटके हुए राही को भी, मंजिल मिल जाती तिससे।

*अंतिम संदेश और वंदना*

"जियो और जीने दो" का, मंत्र गूँजता अंबर में,
शांति-दूध की धार बही है, आज विश्व के अंतर में।
पंच महाव्रत के पथ पर, जो पग अपने धर देता है,
वह बाह्य जगत को छोड़, स्वयं को ईश्वर कर देता है।
नमन करे 'आशीष' उन्हें, जो ज्ञान-सिंधु के स्वामी हैं,
अहिंसा के उस महाप्रतीक को, जो अंतर्यामी हैं।
नमन करे 'आशीष' उन्हें...



एड.आशीष जैन

7055301422

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॥ बाहुबली महाबली ॥

रणभेरी बजी, धरा कांपी, अंबर में घोर निनाद हुआ,
दो वीरों का, दो भाइयों का, रण-मद में महाविवाद हुआ।
इक ओर चक्रवर्ती भरत, सेना का पारावार लिए,
दूजी ओर बाहुबली खड़े, निज भुजदंडों का सार लिए।

अरिहंत-पुत्र, समरांगण में, ज्यों महाकाल अवतारे थे,
सौ योजन चौड़ी छाती थी, या पर्वत के कगार थे?
जब उठी मुष्टिका अंबर को, थर-थर बुजदंड कपांयमान,
सुर-असुर, देव-गंधर्व सभी, रह गए देखकर हक्का-बक।

दृष्टि-युद्ध में तेजपुंज, ज्यों रवि ने रश्मि त्यागी हो,
जल-युद्ध में वेग प्रचंड, मानो सागर ने मर्यादा लांघी हो।
मल्ल-युद्ध में जब भिड़े वीर, सिंहों का जैसा नाद हुआ,
भरत का चक्र भी कुंठित था, यह अचरज भरा संवाद हुआ।

थी शक्ति अपार, विजय द्वार, बस एक प्रहार की दूरी थी,
अहंकार शीश पर चढ़ा हुआ, प्रतिशोध की ज्वाला पूरी थी।
पर तभी, तभी इक क्षण को, चेतना जगी, अंतर्मन जागा,
यह राज-पाट, यह मोह-जाल, क्षणभंगुर सब, मिथ्या भागा।

"धिक्कार! विजय यह कैसी है? अपनों के लोहित तर्पण पर?
क्या यही अंत है जीवन का? मिट जाना सिंहासन पर?"
उठी मुष्टिका जो वध को, वह लोच-मुंड को मुड़ गयी,
क्षणभर में चक्रवर्ती की सत्ता, धूलि में उड़ गयी।

महाबली ने त्यागा पल में, वह सब जो जग को प्यारा है,
साम्राज्य, कोष, वैभव सारा, तिनके सम वारा है।
खड़े हुए गोमट्टेश्वर, निश्चल, ज्यों अचल हिमालय हों,
भुजदंडों पर बेलें लिपटीं, सर्पों के ज्यों आलय हों।

एक वर्ष तक अडिग खड़े, नयन बंद, तप में लीन रहे,
शीत-घाम, दंश-विष, सब सहे, पर निज आत्म-लीन रहे।
जीता न कोई बाहुबली को, पर वे स्वयं से जीत गए,
अहंकार का मस्तक मर्दन कर, वे सिद्ध-लोक को रीत गए।

वह वीर नहीं जो रण जीते, वह वीर जो मन को जीत सके,
बाहुबली! तुम वो महाबली, जो हर युग की प्रीत बने।
त्याग और वैराग्य के स्वामी, नमन तुम्हें शत-शत बार,
तुम सा न कोई हुआ वीर, न होगा यह जग-संसार।



Adv. आशीष जैन

7055301422

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मुझे लगता है यह प्लेटफॉर्म केवल मराठी और पूरा फेमस राइटर के लिए है,नया व्यक्ति यहां जगह नहीं बना सकता एक कविता जो ठीक ठीक लिखी गई है उसको आज तक ट्रेडिंग में ऊपर रखा हुआ है,लगता है लोगो की समझ शब्दों से कम कुतर्क पर ज्यादा है आज अश्लीलता का युग है फूहड़ता ही लोगों को अधिक भाती है।

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*पुरुषार्थ का उद्घोष*

तंद्रा तज कर जो जाग उठा, वह अभ्युत्थान का राही है,
भाग्य-लेख को जो मिटा सके, वही कर्म का साक्षी है।
मृग-मरीचिका के पीछे वह, कभी न अपना समय गँवाता,
श्रम-सीकर से अपनी वह, अमिट नियति लिख जाता।

बाधाओं का संवर्तक बन, जो गिरिवर को भी झुकाता है,
शून्य से जो सृजन करे, वही विश्वकर्मा कहलाता है।
कर्मठता की उस वेदी पर, जब 'आशीष' का दीप जलता है,
तब भाग्य का वह मौन पत्थर भी, संकल्प-ताप से पिघलता है।

न थकता है वह काल-चक्र से, न प्रारब्ध का रोना रोता,
अथक साधना के बीजों को, वह मरुथल में भी है बोता।
अतुलित बल का वह पुंज है, संकल्प जिसका अविचल है,
तपस्या की उस पावन भट्टी में, तपकर बनता वह कुंदन है।

Adv. आशीष जैन
7055301422

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*सोच की गरीबी*

धन का निर्धन संघर्ष चुनता, भाग्य को भी मोड़ देता है,
हाथों की मेहनत से अपनी, वह बरकत जोड़ लेता है।
कोई दिखाए रास्ता तो, वह सुनता और करता है,
छोटा ही सही पर आगे बढ़ने का, वह साहस हरदम भरता है।

पर जिसका मन ही निर्धन है, वह कभी न आगे बढ़ता है,
अहंकार की संकरी गलियों में, वह हर पल खुद से लड़ता है।
जैसे कुएँ का मेंढक समझे, बस यही जगत की सीमा है,
बाहर का सूरज क्या जाने? उसकी सोच का दीया धीमा है।

वह दूसरों को मानसिक सुख, कभी न दे पाता है,
कड़वे बोल और रूखी बातों से, बस दिल ही दुखाता है।
मनमानी उसकी ऐसी जैसे, जग का भार उसी पर हो,
दिखावा ऐसा करता जैसे, सबसे बड़ा वही घर हो।

धन की गरीबी मिट जाती है, कोशिश के पैमानों से,
पर सोच की गरीबी हारती है, केवल अपने अभिमानों से।
जो झुकता है वह पाता है, जो अकड़ा है वह ढहता है,
कुएँ का वासी अंत समय तक, बस कुएँ में ही रहता है।

Adv. आशीष जैन
7055301422

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शीर्षक: वतन का रखवाला


"वतन की गोद में हम सब ने पायी एक जन्नत है,
शहादत और इबादत की ये पावन सी विरासत है।
लहू देकर जो सींचें गुलसिताँ को वो ही 'आशीष' हैं,
तिरंगे की बुलंदी ही हमारी सबसे बड़ी चाहत है।"


"जहाँ की गोद में हमने सुनहरी शाम देखी है,
जहाँ की मिट्टी में अपनी सुबह की शान देखी है।
वो जिसके ज़र्रे-ज़र्रे में वफ़ा का नूर बहता है,
उसी आग़ोश में हमने अपनी पहचान देखी है।
हिमालय सर उठा कर जिसके पहरे को खड़ा रहता,
समंदर पाँव धोने को जिसे बेताब है रहता।
जहाँ की सरज़मीं हर हाल में सरसब्ज़ रहती है,
वहाँ का बच्चा-बच्चा बस यही पैगाम है कहता।
लहू का आख़िरी कतरा वतन के नाम कर देंगे,
सजा कर सर पे खुशियों का नया ईनाम कर देंगे।
खड़ा हूँ सरहदों पर मैं दुआ का एक 'आशीष' बनकर,
तिरंगे की हिफाज़त में हम अपनी जान कर देंगे।"
क्या आप इस नज़्म में शहीदों की गाथा जोड़ना चाहेंगे या इसे नौजवानों के जोश पर ही केंद्रित रखना चाहेंगे?


"शहीदों की इबादत से ये हिंदुस्तान ज़िंदा है,
हवाओं में वफ़ा का आज भी अरमान ज़िंदा है।
गए जो खेल कर जानों पे वो लौटे नहीं लेकिन,
उन्हीं के दम से अपनी कौम का सम्मान ज़िंदा है।
वो जब निकले थे घर से, सर पे बांधा था कफ़न अपना,
वतन की आबरू पर वार दिया खिलता चमन अपना।
किसी की मांग का सिंदूर, किसी की गोद सूनी थी,
मगर आँच आने न दी, माँ का बचा रखा बदन अपना।
लिखा इतिहास को जिसने अपने सुर्ख लहू से ही,
बचाया मुल्क को जिसने हर एक दुश्मन और डूह से ही।
खड़ा है आज भी सरहद पे जो इक 'आशीष' बनकर,
निकाली जां है जिसने आज़ादी की रूह से ही।
सलामत है अगर ये मुल्क तो उन जांबाज़ वीरों से,
जिन्होंने जंग जीती मौत की तीखी लकीरों से।
झुकेंगे हम न तब तक, जब तलक है जोश बाक़ी,
आज़ाद हैं हम और रहेंगे आज़ाद जंजीरों से।"


उबलता खून रग में हो, तो फिर तूफ़ान आता है,
वतन के वास्ते मरना, बड़ा अहसान आता है।
न पूछो हाल वीरों का, कि जब वो जंग लड़ते हैं,
तो काँपे थर-थर दुश्मन, मौत का सामान आता है।
हिमालय की बुलंदी सा, इरादा ठोस रखते हैं,
उजाले के लिए हम, जुगनुओं का रोष रखते हैं।
सियाचीन की बर्फ़ों में, जहाँ सांसें भी जम जाएं,
वहाँ भी हम वतन की भक्ति का मदहोश रखते हैं।
ललकारें जब गूँजती हैं, गगन भी काँप जाता है,
शहीदों के लहू से ही, चमन ये मुस्कुराता है।
खड़ा है सरहदों पर जो बन कर एक 'आशीष',
उसी की जाँ-निसारी से तिरंगा जगमगाता है।
चढ़ा दो शीश चरणों में, ये मिट्टी मान माँगती है,
पिला दो खून दुश्मन को, ये धरती दान माँगती है।
उठा लो हाथ में परचम, दिखा दो अपनी ताक़त को,
हुकूमत हिन्द की अब, विश्व में पहचान माँगती है।

Adv. आशीष जैन
7055301422

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शनि निंदा स्तुति

रे निर्दयी, रे क्रूर दृष्टि, तू न्याय का कैसा ढोंग रचाए?

दीन-हीन को कुचल रहा, और पापियों को मौज दिखाए।

कौए जैसा रूप तेरा, और मन में कालिख छाई है,

मेरी हँसती-खेलती दुनिया, तूने नरक बनाई है।



चलता तू कछुए की चाल, पर दुख देने में बड़ा तेज है,

मेरे पसीने की कमाई पर, बिछाता काँटों की सेज है।

क्या बिगाड़ा था तेरा मैंने, जो इतनी कठोर सजा दी?

मेरे सपनों की अर्थी तूने, अपनों के हाथों सजवा दी।



ले दे ले भर-भर गालियाँ, जो तेरे मुख पर मैं मारूँ,

तेरी टेढ़ी नज़र के आगे, अब मैं कभी न हारूँ।

उच्च का होकर बैठा है, पर कर्म तेरे सब नीच हैं,

इंसानियत और पत्थर में, बस तू ही खड़ा बीच है।



अब छोड़ पीछा मेरा, या फिर काल बनकर आ जा,

या तो मेरा भाग्य बदल, या मेरा अस्तित्व खा जा।

थक गया हूँ मैं लड़ते-लड़ते, अब धैर्य मेरा टूटा है,

तुझ जैसे निर्दयी देव से, अब मेरा नाता छूटा है।


Adv. आशीष जैन
7055301422
इसके लाभ बहुत है शनि की निंदा जरूर करें जब शनि आपको परेशान करता है तब

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॥ भगवान बाहुबली स्तुति ॥
दोहा
प्रथम तीर्थंकर आदिप्रभु, ऋषभदेव के लाल।
त्याग मूर्ति बाहुबली, नमो-नमो हर काल॥
अडिग खड़े गोमटेश्वर, पर्वत शिखर विशाल।
शांत सौम्य मुखमुद्रा, आशीष झुकाए भाल॥

स्तुति (लयबद्ध गायन हेतु)
अचल खड़े तुम वन के भीतर, वर्ष बीत गए भारी,
तन पर लिपटी बेलें अद्भुत, महिमा तुम्हारी न्यारी।
पैर जमे हैं पृथ्वी के भीतर, मन है अम्बर पार,
वंदन बारम्बार प्रभुवर, वंदन बारम्बार ॥ १ ॥
काम-क्रोध और मान-मोह को, क्षण में तुमने त्यागा,
चक्रवर्ती का सुख तज करके, संयम पथ पर जागा।
भरत चक्र के द्वंद्व को जीता, फिर भी मन वैराग्य,
धन्य हुआ वह स्वर्ण-कलश, और धन्य हुआ सौभाग्य ॥ २ ॥
सर्प लपेटे देह खड़ी है, पक्षी नीड़ बनाते,
मौन तपस्या देख तुम्हारी, देव सुमन बरसाते।
ना हिलते ना डुलते स्वामी, योग-अग्नि उजियारी,
बाहुबली तुम संकट-भंजन, मंगल-रूप अविकारी ॥ ३ ॥
केवलज्ञान की ज्योति जली जब, मिटा तिमिर का साया,
सिद्ध-शिला पर जा विराजे, छोड़ मोह की माया।
हम भी आए शरण तुम्हारी, दे दो विमल स्वभाव,आशीष मांगे मुक्ति पद, कर दो प्रभु निस्तार ॥ ४ ॥

दोहा
विंध्यगिरि की गोद में, खड्गासन भगवान।
बाहुबली के चरणों में, आशीष करे प्रणाम॥

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॥ अकेले योद्धा का संकल्प ॥
एक ही संभालता संस्कार को,
एक ही बचाया करता धर्म को।
बाकी सब तो मोह की नींद में,
गहरी चादर तान सोया करते।

जब-जब उठीं उंगलियाँ रक्षक की नीयत पर,
जब-जब लगे लांछन पवित्र सी सीरत पर।
दुनिया की भीड़ बस शोर मचाया करती है,
बस उसके बारे में यही सब कहा करते।

कहते— "कब्जा लिया मंदिर है क्या?"
कैसी विडंबना, कैसा ये झमेला है।
जो बचा रहा है नींव को ढहने से हर पल,
वो अपनी ही दुनिया में आज कतई अकेला है।

क्या भूल है उसकी जो बचा रहा हर धूल है?
जो कांटों के बीच खिला रहा आस्था का फूल है।
पर समाज तो बस तमाशा देखने का शौकीन है,
उसे रक्षक की मेहनत भी लगती कतई फिजूल है।

वो मंदिर को ईंट नहीं, सम्मान मानता है,
वो हर गिरते पत्थर का दर्द पहचानता है।
बाकी सब तो बस अपनी ढपली बजाया करते,
पर वो अकेला ही धर्म की लाज बचाना जानता है।

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शीर्षक: "श्रमण चर्या का बदलता चोला"

ब्रह्म मुहूर्त में जो उठकर, आत्म-ध्यान में लीन थे,
जैन आगम के वे साधक, संयम में प्रवीण थे।
पर आज देख कर ये दृश्य, मन भारी हो जाता है,
जब साधु वेश में कोई, सुबह नाश्ता चबाता है।

कहाँ गई वह 'नवकारसी', कहाँ गया वह त्याग?
चाय की चुस्की में अब, जाग रहा अनुराग।
दोपहर की गोचरी तो बस, एक रस्म बन गई है,
साधु की वो तप-तपस्या, अब तो कहीं खो गई है।

सूरज कहता - "सावधान! अब विदा मुझे तुम होने दो",
चौ विहार का समय हुआ, अब जठराग्नि को सोने दो।
मगर शाम के पाँच बजे भी, जो भोजन की आस रखे,
वो क्या खाक मुमुक्षु होगा, जो जीभ पर ना लगाम रखे।

चामुंडराय ने क्या सोचा था, क्या ऐसे होंगे निर्ग्रंथ?
क्या भोग-विलास की राह चलेगा, ये पावन जैन पंथ?
श्वेत वस्त्र तो धारण किए, पर मन में भारी लालसा है,
ये श्रमण धर्म है या बस, सुविधानुसार एक तमाशा है?

तप की अग्नि ठंडी पड़ी, इंद्रियों का जोर बढ़ा,
साधुता की बलि चढ़ाकर, स्वाद का चस्का खूब बढ़ा।
आशीष! देख ये विडंबना, रक्षक ही भक्षक बनता है,
शास्त्रों का शासन रोता है, जब संयम रोज मरता है।

Adv.आशीष जैन
7055301422

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