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जिस्म से शुरू होने वाला इश्क़, अक्सर जिस्म पर ही ख़त्म हो जाता है। सच्ची मोहब्बत तो वो है, जो रूह से हो और उम्रभर साथ निभाए। 🥀 _ A singh 🌹
गैर तो बस हाथ छुड़ाकर चले गए, तकलीफ़ तो तब हुई जब अपनों ने ही पराया कर दिया। _ A singh 🌹
रात की ख़ामोशी में, छत पर बैठकर पूछती हूँ तारों से, क्या अपनों के बीच रहकर भी, कोई इस कदर अकेला होता है? दिन भर सबके चेहरे पर, खुशियाँ बाँटती फिरती हूँ मैं, पर ढलती शाम को जब आईना देखता है, तो तड़पकर पूछ बैठता है— "सबकी परवाह करने वाली, बता तेरे लिए यहाँ कौन रोता है?" जवाब में बस, एक चीखता हुआ सन्नाटा उभरता है, और उस बेबस ख़ामोशी में, मेरा गला रुँध जाता है। एक ही छत के नीचे रहते हैं सब, मगर दूरियाँ इतनी हैं, कि पास होकर भी, पास होने का कोई एहसास नहीं होता। शायद मैं ही बहुत बेगानी हो गई हूँ, अपनों के मेले में, जो भरी दुनिया में भी, बस तड़पती हूँ अकेले में... ~ A. Singh 🌹
"वो मैं नहीं रही" पहले चाँद देख कर मुस्कुरा लेती थी, अब रातों को छत पर रो लेती हूं। पहले छोटी-छोटी बात पर खुश हो जाती थी, अब बड़ी-बड़ी खुशियां भी सूनी लगती हैं। पहले दिल में सबके लिए जगह थी, अब अपने लिए भी जगह कम है। पहले दर्द बाँटने से हल्का हो जाता था, अब दर्द छुपाते-छुपाते मैं ही भारी हो गई हूं। वो मैं नहीं रही... वो मैं कहीं खो गई। पहले माँ कहती थीं, "बेटी सबसे अलग है", आज वही कहती हैं, "तू बदल गई है।" पहले दोस्त कहते थे, "तेरे बिना मज़ा नहीं", आज वही कहते हैं, "तू बोर हो गई है।" पहले गलती पर माफी मिल जाती थी, अब सफाई देने पर भी इल्ज़ाम लगता है। पहले मैं रिश्ते निभाती थी दिल से, अब रिश्ते मुझे निभाते हैं मजबूरी से। आईना देखती हूं तो डर जाती हूं, ये आँखों के नीचे काले घेरे किसके हैं? ये चुप्पी, ये खामोशी, ये बुझा हुआ चेहरा... ये मेरी तस्वीर तो नहीं लगती। कभी खुद से मिलती हूं, तो लगता है जैसे कोई अजनबी सामने खड़ा है। जिस लड़की की हँसी पूरे घर में गूंजती थी, आज उसकी आवाज़ भी उसी से रूठी हुई है। पहले की मैं कहीं रह गई, अब की मैं बस सांसें गिन रही हूं। शायद वक्त ने मुझे नहीं बदला, बस लोगों ने मुझसे मेरी मुस्कान छीन ली। वो मैं नहीं रही... वो मैं कहीं खो गई... और जो बची हूं, वो सिर्फ़ यादों का एक साया हूं। _ A singh 🌹🌹🌹🌹
"मैंने दर्द को अल्फ़ाज़ देना चाहा, मगर कागज़ भी खामोश रहा। जिसे सुनानी थी दिल की बात, वो मेरे हिस्से का वक़्त कहीं और दे आया।" 🖤
ज़ख्म गैरों ने दिए तो सह लिए हमने, दर्द तब हुआ जब अपनों ने निशाना बनाया।
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