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Aachaarya Deepak Sikka

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ॐ नमः शिवाय



शिव का स्वरूप:-



√•शिव परम वैष्णव हैं, सबके गुरु हैं, ज्ञानदाता हैं। शिव की जय हो। ज्ञान गंगा का प्रवाह शिव-पार्वती के संवाद के रूप में अनादि काल से चला आ रहा है। ज्ञान की इस गंगा में स्नान करने वालों की जय हो। इस गंगा के तट पर मैं रह रहा हूँ। यह गंगा पाखण्डियों पापियों के स्पर्श से दूषित होती रहती है। साधु-सन्तों के मज्जन करने से यह शुद्ध होती रहती है। इस शुद्ध गंगा के जल का पान करने वालों को मैं प्रणाम करता हूँ। जिसके भीतर यह गंगा है, वह गुरु है। जिसके सिर पर यह गंगा है, वह गुरु है जिसके मुख में यह गंगा है, वह गुरु है जिसकी आँखों में यह गंगा है, वह गुरु है ऐसे गुरुदेव को मैं प्रणाम करता हूँ ।



√• [गुरु मुख में नाद (शब्द) है। गुरु मुख में वेद (ज्ञान) है। गुरु मुख में सब विश्व समाया हुआ है। गुरु ईश्वर है। गुरु गोरस (गंगा) है। गुरु ब्रह्मा है। गुरु माता पार्वती (मूल प्रकृति) है ।]



√•परम गुरु ज्ञान वृद्ध होता है। उसकी देह दिव्य होती है। वह सतत युवा होता है। वह मौन उपदेश करता है। वृद्ध शिष्यगणों का संशय नष्ट करने में वह समर्थ होता है।



"चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्या गुरुर्युवा गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशयाः ॥"

(शंकराचार्य )



√•ऐसे गुरु को दक्षिणामूर्ति कहा जाता है। जो मूर्तिमन्त है तथा उपदेश देने में दक्ष (कुशल) है, उसका नाम दक्षिणामूर्ति है।



"ओं नमः प्रणवार्थाय शुद्धज्ञानैकमूर्तये ।

निर्मलाय प्रशान्ताय दक्षिणामूर्तये नमः ॥

निधये सर्वविद्यानां भिषजे भवरोगिणाम् ।

गुरवे सर्वलोकानां दक्षिणामूर्तये नमः ॥"

(शंकराचार्य)



√•जिससे संदेह रहित ज्ञान प्राप्त हो, उसे मैं प्रणाम करता हूँ। जिसके भीतर का ईश तत्व जितना विकसित होता है, उसमें उतना ही गुरुत्व होता है। पूर्ण विकसित होने पर वह ईश्वर होता है। ईश्वर गुरु है। यह विकास तप से सम्भव होता है। तपी गुरु है। तपस्वी गुरु है। तप का स्वरूप निर्माणात्मक होता है, ध्वंसात्मक नहीं। बिना तप के निर्माण असंभव है। उदाहरणार्थ मिट्टी में पानी डाल कर उसे पैरों से रौंदा जाता है। इसके बाद चाक पर रख कर उसे पट का रूप दिया जाता है। फिर सुखाया जाता है। तब अग्नि में रख कर तप्त किया जाता है। इस प्रकार बना हुआ घट अपने भीतर पानी को धारण करने में समर्थ होता है। पानी भर जाने पर वह घट कलश रूप में पूज्य होता है। अन्य उदाहरण- बाँस काटा जाता है। फिर उसे तपा कर सीधा किया जाता है। पुनः उसमें छिद्र किये जाते हैं। इतना कष्ट सहने के पश्चात् वह वेणु (बाँसुरी) के रूप में ओठों पर रखा जाता है। भगवान् कृष्ण के अधरामृत को पौने का सौभाग्य बाँसुरी को मिलता है। यह तप का फल है। बाँस तप कर के बाँसुरी बन कर पूज्य हो जाता है। जैसे बाँसुरी के मध्य में पोलास्थान (शून्य) होता है, वैसे ही जिसका हृदय छल कपट से शून्य होता है, वह तपस्वी भगवान् को प्रिय है। तीसरा उदाहरण- स्वर्ण को अग्नि में डाला जाता है। इससे उसको मैल जल जाती है। और उसमें चमक आ जाती है। पुनः इस स्वर्ण को गलाकर गर्म कर, ठोक पीट कर विभिन्न आकार देते हैं। ये आकार आभूषण के रूप में सुन्दरियों के नाक, कर्ण, कण्ठ, मस्तक पर शोभायमान होते हैं। इससे स्वर्ण का महत्व/मान बढ़ता है। यह तप का फल है। मनुष्य के सन्दर्भ में तप का अर्थ है-व्रत उपवासादि / प्रायाश्चित। जो संकल्प के साथ नियम पूर्वक भगवत् परायण होकर अपने शरीर को तपाता है, मन को तपाता है, इन्द्रियों को तपाता है, वह तपी है। सहर्ष कष्ट का वरण करना अथवा सुखोपभोग से अपने को विलग रखना ही तप है। इससे शरीर का मल जल जाता है, मन की मैल मिट जाती है, चित शुद्ध हो जाता है। मल= पाप पाप नाश का एक मात्र उपाय है, तप तप से पाप जलता है। पापहीन होने से व्यक्ति महत्व को प्राप्त होता है।



√• असत्य भाषण न करना, अप्रिय वचन न बोलना, अत्यधिकि न बोलना वाणी का तप है। मौन रहने से वाक् सिद्धि मिलती है।



√•दोष दर्शन से परे रहना, आँखें आधीमुदी रखना, दृश्य के पीछे आँखें न दौड़ाना नेत्रों का तप है। आँखों पर पट्टी बाँधने से चक्षु सिद्धि मिलती है। गान्धारी को यह सिद्धि प्राप्त थी ।



√•मन की चञ्चलता का निरोध करके उसे एकाम करना मानस तप है। मानस तप से संकल्प की सिद्धि होती है।



√•अल्पाहार करना, अस्वाद भोजन करना, विवस्त्र रहना वा अत्यल्पवस्त्र पहनना, शीत-उष्ण प्रभाव सहन करना, ब्रह्मचर्य, पवित्रता शारीरिक तप है। शारीरिक तप से आरोग्य एवं दीर्घायु की प्राप्ति होती है। कायिक, बाचिक, मानसिक तप से हर प्रकार का कल्याण होता है। तप से निः श्रेयस की प्राप्ति होती है। तपी ब्राह्मण पूज्य होता है। ऐसे ब्राह्मण को मैं प्रणाम करता हूँ ।



√•आशीर्वाद देने से तथा शाप देने से तप की हानि होती है। अतः तपी के लिये उदासीन वृत्ति श्रेयस्कर है। अवधूत साधु इसी कोटि में आते हैं जैसे-जड भरत, शुकदेव, दत्तात्रेय ।



√•तप का पर्याय है, अग्नि। अग्नि स्वयं तपता है तथा अपनी आँच से दूसरों को तपाता है। अतः तपी अग्निमय होता है। अपने भीतर की अग्नि को प्रज्ज्वलित करना तप है। इस अग्नि को छिपाये रखना तप है। किन्तु अग्नि छिपती नहीं। जो लोग अपने तेज को बाहर प्रकट होने नहीं देते, वे धन्य हैं। ऐसे तपी को मेरा प्रणाम !



√•अग्नि के तीन रूप हैं- जठराग्नि, वडवाग्नि, दावाग्नि। इन तीनों अग्नियों के ताप को जो सहन करता है, वह तपस्वी है। कुण्डली में इन अग्नियों के स्थान नियत हैं।



√•कुण्डली में दूसरा भाव मुख है। मुख में जिहा होती है। वडवा नाम जिहा का। जिहा स्वादेन्द्रिय है।



√•रस से स्वाद की अनुभूति होती है। रस तनमात्र की उत्पत्ति रूप से होती है। रूप तन्मात्र से अग्नि की सृष्टि होती है। अग्नि से जल की सृष्टि होती है। इस प्रकार जिह्वा में विराजमान अग्नि रस वा जल रूप लार टपकाता रहता है। जिह्वास्थ अग्नि भोजन के रस को पाने के लिये सतत उद्यत रहती है। यह अग्नि कभी शान्त नहीं होती। इसके कारण व्यक्ति बिना भूख के स्वाद के चक्कर में उदर को भरता जाता है। इससे उदर की अग्नि कुपित होती है, मन्द पड़ती है। इसका फल होता है- अग्निमान्द्य। यह व्याधि का मूल है। कुण्डली में पाँचवाँ भाव आमाशय है। आमाशय की भीतरी दीवारों में असंख्य जठर पन्थियाँ होती हैं। इनसे जठर रस निकलता है। यह रस पाचक है। आमाशयस्थ अग्नि को जठराग्नि कहते हैं। इससे भूख लगती है। जठराग्नि एवं वडवाग्नि में धनिष्ठ संबंध है। इन दोनों अग्नियों में संतुलन की स्थिति समाप्त होते ही रोगोत्पत्ति होती है वडवाग्नि के आधिक्य से जठराग्नि मन्द पड़ती है।



√•जठराग्नि के मन्द पड़ते ही अरुचि/स्वादहीनता आती है। इस असंतुलन के कारण जिड़ा में छाले पड़ते हैं। इतना ही नहीं, वडवाग्नि और जठराग्नि के संघर्ष के फलस्वरूप मुख और पेट दोनों बिगड़ जाते हैं। दाँतों की जड़ें हिल जाती हैं, आँखों की ज्योति क्षीण होने लगती है, पेट भारी हो जाता है और स्फूर्ति चली जाती है। पेट के अन्दर अग्न्याशय, पित्ताशय, आमाशय, पक्वाशय होते हैं। इनमें व्याप्त अग्नि को व्यापक रूप से जठराग्नि कहते हैं। अग्न्याशय, पित्ताशय (यकृत), पक्वाशय (आंत्र), जठराशय से निकलने वाला रस पित्तज होता है। इस रस की कमी से कान के पर्दे पर कफ जमा हो जाती है जिससे कम सुनाई देता है, नाक में कफ बढ़ जाती है जिससे सांस लेने में कठिनाई होती है, ओठों पर श्वेतता का आगमन होता है, उच्चारण दोष उत्पन्न होता है। वात पित्त कफ- ये तीनों अग्नि के स्वरूप है। बात पिता है, अग्नि का। कफ पुत्र है, अग्नि का। पित्त स्वयं अग्नि है। वात का तन्मात्र स्पर्श है। पित्त का तन्मात्र रूप है। जल का तन्मात्र रस है।



√•१. शब्द= शब्द (वाणी)



√•२. स्पर्श =वात (वायु) उपस्थस्थानी (सप्तम भाव)।



√•३. रूप= पित (अग्नि) उदर स्थानी (पंचम भाव)।



√• ४. रस =कफ (जल) मुख स्थानी (द्वितीय भाव ) ।



√•५. गन्ध =पुरीष (ठोस)



√•स्पर्श तन्मात्र रस का पितामह है, रूप का पिता है। अथवा, वात तत्व/ धातु कफ का पितामह है, पित्त का पिता है।



√•इन तीनों अग्नियों में दावाग्नि सबसे बली है। यह उपस्थस्थानी है। यह घर्षण जन्य महान् सुख की अधिष्ठात्री है। शिश्न की बाह्य दीवार तथा योनि की भीतरी दीवार के परस्पर सघन स्पर्श से इस अग्नि की उत्पत्ति होती है। यह काम / मैथुन सुख की जनयित्री है। इस अग्नि का सेवन करने के लिये सारा संसार सतत लालयित रहता है। जो इस पर विजय पाता है, वह तपी है। मैं ऐसे तपी को प्रणाम करता हूँ।



√•मुख कफ प्रधान है। पेट पित्त प्रधान है। उपस्थ वात प्रधान है। मुख ऊर्ध्व भाग में है। पेट मध्य क्षेत्र में है। उपस्थ अधोस्थानी है।



√•१. मुख में कफाग्नि / रसाग्नि / जिह्वाग्नि / वडवाग्नि का निवास है। इस अग्नि में पड्स की आहुति दी जाती है। फिर भी यह अग्नि शान्त नहीं होती। यह अग्नि कटु तिक्ति अम्ल लवण कषाय मिष्ठ समिधाओं से प्रसन्न होती है। इन समिधाओं से मुख में हवन न करना वा अस्वाद रस लेना तप है। केवल पानी पीकर रहना एक तप है।



√• २. पेट में पित्ताग्नि / जठराग्नि / रूपाग्नि / पचनाग्नि का निवास होता है। इसमें अन्न ही आहुति दी जाती है। इस अग्नि को प्रसन्न करने के लिये अन्न खाना अनिवार्य है। यह अग्नि मृत्यु होने पर ही बुझती है। अन्न न खाना अर्थात् उपवासन/ अनशन पेट का तप है। यह दूसरा तप है।



√•३. गुह्य स्थान में वातग्नि / स्पर्शाग्नि / मैथुनाग्नि / कामाग्नि का वास होता है। इसमें पुरुष और स्त्री क्रमशः वीर्य और रज का हविष डालते हैं। इससे यह अग्नि प्रसन्न होती है/तृप्त होती है/ शान्त होती है, किन्तु बुझती नहीं यह घर्षणाग्नि दावाग्निसृष्टि का हेतु है। बिना इसके संतति वृद्धि नहीं होती। सभी प्राणी इस अग्नि की चपेट में हैं। मैथुन न करना/ वीर्य वा रज का क्षयन न करना तीसरा तप है। लोक में इसे ब्रह्मचर्य कहते हैं। सूर्य ब्रह्मचारी है।



√•संसार में बिना तप किये कोई महान् सुख नहीं प्राप्त होता ।



"नातप्ततपसो लोके प्राप्नुवन्ति महासुखम्।"

( वनपर्व २५९ । १३)



√•तप के द्वारा महान की प्राप्ति होती है।



"तपसा विन्दते महत्।"

(आश्रमपर्व ३६ । २९ )



√•इस कर्मभूमि में जन्म लेकर जो मनुष्य तप नहीं करता, वह भाग्यहीन है, अभागा है।



"प्राप्येमा कर्मभूमिं न चरति मनुजो वस्तपो मन्दभाग्यः ।"

(भर्तृहरिनीति शतक १०१)



√•तप के प्रभाव को दबाना वा तप का अतिक्रमण करना कठिन है।



"तपो हि दुरतिक्रमम् ।"

( मनुस्मृति १२ । २३९)



√•तप का अभियान करने से तप का प्रभाव क्षीण होता है।



"तपः क्षरति विस्मयात् ।"

( मनुस्मृति ४ । २३६)



√• इस सारे दैव और मानुष जगत् का मूल तप ही है।



"तपोमूलमिदं सर्वं दैवमानुषकं जगत्।"

(मनु. ११ । २३३ )



√•तप कर के सब कुछ पाया जाता है, बहुत बातें करने से क्या होता है ?



"तपसा लभ्यते सर्व प्रलापः किं करिष्यति।"

(शान्तिपर्व १५३ । ३४)



√• इन्द्रियों का संयम करने से ही तप होता है, अन्यथा नहीं ।



"इन्द्रियाण्येव संयम्य तपो भवति नाऽन्यथा।"

( पञ्चदशी)



√•घर में ही रहते हुए पाँचों इन्द्रियों को वश में रखना तप है।



"गृहेऽपि पञ्चेन्द्रिय निग्रस्तपः ।"

( हितोपदेश ४।८५ )



√•शिवजी कहते हैं-हे पार्वती । सम्पूर्णि सृष्टि का आधार एक मात्र तप है। गोस्वामी जी के शब्दों में...



"तप अधार सब सृष्टि भवानी !"

( बालकाण्ड, रा. च. मा.)



√•तप सुख देने वाला तथा दुःखों का नाश करने वाला होता है।



"तपु सुखप्रद दुःख दोष नसावा।"

( बालकाण्ड, रा. च. मा. )



√• जब तक तीन अग्नियों के स्वरूप का साक्षात्कार नहीं होता, तब तक तप का प्रत्यय समझ में नहीं आता । तप का बोध होते ही व्यक्ति तपारूढ़ होता है, तप में प्रतिष्ठित होता है।



मैंने यहाँ वह सब लिखा, जो मुझे दृष्टिगत हुआ। अग्निदेव तप से प्रसन्न होते हैं। मैं अग्नि की शरण में हूँ ।

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आचार्य दीपक सिक्का

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ॐ नमः शिवाय



बुध के उपाय, श्री विष्णुसहस्रनामावली और श्री विष्णु के विभिन्न अवतारों का remedies में कैसे उपयोग होता है:



विभिन्न संयोजन बुध के दोष या ग्रह दोष तब उत्पन्न होते हैं जब व्यक्ति धोखाधड़ी में शामिल होता है या बच्चों से शत्रुता या दूसरों की संपत्ति के गलत इस्तेमाल के कारण ऐसा होता है। इसके प्रभाव से भ्रम, बच्चों पर असर और मानसिक समस्याएँ हो सकती हैं। इन दोषों को दूर करने के लिए श्री विष्णु की पूजा की जाती है। हालांकि, उपाय सुझाने से पहले कुंडली का बहुत गहन विश्लेषण आवश्यक होता है, अन्यथा उपाय काम नहीं करते।



1. जब बुध मंगल से पीड़ित हो और अग्नि तत्व वाले क्षत्रिय राशियों में हो, तब व्यक्ति को श्री नरसिंहसहस्रनामावली का पाठ श्री लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनामावली के साथ करना चाहिए। यही उपाय तब भी किया जाता है जब बुध अग्नि तत्व राशि में पीड़ित हो।





2. जब बुध पूर्ण ब्राह्मण राशियों में पीड़ित हो या जब कालचक्र दशा उस राशि की हो जहाँ बुध स्थित है और वह ब्राह्मण राशि हो, तब श्री विष्णुसहस्रनामावली का पाठ लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनामावली के साथ किया जाना चाहिए। यह तब करना चाहिए जब बुध खराब घरों में या खराब अंश में स्थित हो। इस स्थिति में, यदि श्रीरामचरितमानस का पाठ उचित तरीके से किया जाए तो वह भी प्रभावी होता है। ध्यान रखें कि श्रीरामचरितमानस का पाठ श्री हनुमान के आह्वान की आवश्यकता होती है, जो कि विशेष सावधानी से करना चाहिए। श्रीरामसहस्रनामावली भी उतनी ही प्रभावी होती है जब बुध कर्क राशि आदि में स्थित हो। हालांकि, जब मीन राशि से संबंध हो, तब केवल श्री विष्णुसहस्रनामावली का जाप किया जाना चाहिए।





3. जब बुध शनि से पीड़ित हो, तब श्री कल्कि पुराण का दान और उसका पाठ बहुत प्रभावी होता है। कुछ राशियों में स्वामी अयप्पा की पूजा की जाती है।





4. द्रेक्काण को ध्यान में रखते हुए खड़े, बैठे या लेटे हुए देवताओं का निरीक्षण करें और उनके अनुसार पूजा करें।



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आचार्य दीपक सिक्का

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ॐ नमः शिवाय



जन्म कुंडली और मनुष्य के 5 विकार मोह और ज्योतिष



भारतीय दर्शन और शास्त्रों के अनुसार, मनुष्य के भीतर पांच मुख्य विकार होते हैं— काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार। हमारी इस विशेष श्रृंखला के पिछले अंकों में हमने काम, क्रोध और लोभ को डिकोड किया था। आज इस श्रृंखला का चौथा भाग है: मनुष्य को सबसे गहराई में बांधने वाला विकार — मोह ।



मोह एक ऐसा मायाजाल है जो हमें यह भ्रम देता है कि जो हमारा है, वह हमेशा हमारा ही रहेगा। यह सत्य को देखने की हमारी दृष्टि को धुंधला कर देता है।

जब मोह की बात आती है, तो महाभारत के 'धृतराष्ट्र' से बड़ा कोई उदाहरण नहीं है। उनका अपने पुत्र दुर्योधन के प्रति ऐसा अंधा मोह था कि उन्हें धर्म-अधर्म, सही-गलत कुछ दिखाई नहीं दिया। इसी मोह ने अंततः पूरे कुरुवंश का सर्वनाश कर दिया। क्रोध और लोभ व्यक्ति को भटकाते हैं, लेकिन 'मोह' व्यक्ति को जड़ों से ही अंधा कर देता है।



वात्सल्य और मोह के बीच की वो बहुत बारीक रेखा

अक्सर लोग अपने परिवार या बच्चों के प्रति 'मोह' को 'प्रेम' या 'वात्सल्य' समझ बैठते हैं, लेकिन इन दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है:



वात्सल्य यह शुद्ध, निस्वार्थ और देने वाला भाव है। वात्सल्य व्यक्ति को पोषण देता है और उसे स्वतंत्र बनाता है। एक पक्षी का अपने बच्चों को दाना खिलाना और फिर उन्हें आसमान में उड़ने के लिए छोड़ देना— यह वात्सल्य है। वात्सल्य कहता है— "तुम बढ़ो और विकसित हो।"



मोह यह स्वार्थ, भय और अधिकार से जन्म लेता है। मोह में यह डर छिपा होता है कि "यह मेरा है, मुझसे दूर न हो जाए, और मेरे अनुसार ही चले।" मोह जंजीर बन जाता है। मोह कहता है— "तुम मेरे पास रहो और वैसे ही रहो जैसा मैं चाहता हूँ।" वात्सल्य 'कर्तव्य' है, जबकि मोह 'अधिकार' का भ्रम है।



आइए समझते हैं कि कुंडली के कौन से ग्रह और योग इस गहरे मायाजाल के लिए ज़िम्मेदार होते हैं।

मोह के मुख्य कारक ग्रह:



चंद्रमा - मन और भावनाएं: चंद्रमा हमारी भावनाओं और मन का कारक है। जब चंद्रमा कमज़ोर या पीड़ित होता है, तो व्यक्ति भावनात्मक रूप से असुरक्षित हो जाता है। यही असुरक्षा लोगों या चीज़ों से चिपकने की आदत, यानी 'मोह' को जन्म देती है।



शुक्र - रिश्तों का मायाजाल: शुक्र प्रेम, जीवनसाथी और भौतिक सुखों का कारक है। जब शुक्र राहु से दृष्ट हो, तो प्रेम एक 'ऑब्सेशन' या मोह में बदल जाता है। व्यक्ति रिश्तों में इस कदर उलझ जाता है कि अपनी पहचान ही खो देता है।



राहु - भ्रम राहु वह धुआं है जो सच्चाई को छुपा देता है। राहु ही वह ग्रह है जो नश्वर (अस्थायी) चीज़ों में शाश्वत (स्थायी) होने का भ्रम पैदा करता है। मोह राहु का ही सबसे शक्तिशाली हथियार है।



कुंडली में मोह बढ़ाने वाले मुख्य योग:

(विशेष: यहाँ भी लग्न और लग्नेश का अध्ययन सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति तब तक किसी चीज़ के मोह में अंधा नहीं होता, जब तक उसका स्वयं का व्यक्तित्व (लग्न) कमज़ोर न हो और वह अपनी खुशियों के लिए दूसरों पर निर्भर न हो जाए।)



लग्न/लग्नेश का पीड़ित होना और चंद्रमा की स्थिति: यदि लग्नेश कमज़ोर हो और चंद्रमा राहु या शनि के प्रभाव में हो, तो व्यक्ति के भीतर 'छूट जाने का डर' बहुत हावी रहता है। वह लोगों से अत्यधिक मोह कर बैठता है।



चतुर्थ भाव में पाप प्रभाव: चतुर्थ भाव हमारे मन की शांति का है। यदि यहां राहु या नीच का चंद्रमा हो, तो व्यक्ति अपनी मानसिक शांति के लिए दूसरों पर इतना निर्भर हो जाता है कि उसका मोह उसे हर समय बेचैन रखता है।



पंचम भाव और गुरु-राहु (संतान मोह): पंचम भाव संतान का है। यदि यहाँ राहु हो या पंचमेश राहु के साथ हो, तो व्यक्ति का अपनी संतान के प्रति वात्सल्य, धृतराष्ट्र जैसे 'अंधे मोह' में बदल जाता है। वह अपने बच्चों की गलतियों को भी नज़रअंदाज़ करने लगता है।



ग्रहण योग (राहु-चंद्र युति): जब कुंडली में राहु और चंद्रमा एक साथ हों, तो यह मन पर ग्रहण लगा देता है। व्यक्ति सही और गलत का विवेक खो देता है और किसी व्यक्ति, वस्तु या पद के प्रति गहरे मोह में फंस जाता है।



मोह को नियंत्रित करने वाले ग्रह



केतु - परम वैराग्य अगर राहु मोह है, तो केतु 'वैराग्य' है। केतु हमें सिखाता है कि इस संसार में कुछ भी हमारा नहीं है। एक मजबूत केतु व्यक्ति को रिश्तों में रहते हुए भी उनसे अनासक्त रहना सिखाता है, जैसे पानी में कमल का पत्ता।



सूर्य - आत्म-ज्ञान और स्वतंत्रता: सूर्य हमारी आत्मा है। जब सूर्य बली होता है, तो व्यक्ति को यह भान होता है कि उसकी खुशी किसी दूसरे व्यक्ति पर निर्भर नहीं है। मजबूत सूर्य मोह के धुंधलके को अपने प्रकाश से चीर देता है।



शुभ बृहस्पति - विवेक और धर्म: गुरु हमें 'सत्य' का ज्ञान देता है। एक मजबूत गुरु व्यक्ति को वात्सल्य (कर्तव्य) और मोह (अधिकार) के बीच का अंतर समझाता है।



मोह को शांत करने के ज्योतिषीय व व्यावहारिक उपाय:



निष्काम कर्म का अभ्यास: गीता का यह संदेश मोह का सबसे बड़ा एंटीडोट है। अपने परिवार और बच्चों के प्रति अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाएं (वात्सल्य), लेकिन उनसे किसी विशेष परिणाम या व्यवहार की अपेक्षा न रखें (मोह त्यागें)।



भगवान शिव की उपासना: चंद्रमा (मन/मोह) को भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण किया है। जब मोह बहुत तड़पाने लगे और किसी को खोने का डर हावी हो, तो शिव की शरण में जाना सबसे अचूक उपाय है।



अस्थायित्व का ध्यान: रोज़ खुद को याद दिलाएं कि यहाँ जो कुछ भी है— रिश्ते, धन, पद— सब किराए का है। कुछ भी हमेशा के लिए आपका नहीं है।



सूर्य को अर्घ्य: अपनी आत्मा (सूर्य) को बलवान बनाएं ताकि आप भावनात्मक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें।

अपनी कुंडली का सही आकलन करके हम अपने विकारों को न सिर्फ समझ सकते हैं, बल्कि उन्हें नियंत्रित कर जीवन को सही दिशा दे सकते हैं। ज्योतिष के ऐसे ही गूढ़ सूत्रों से जीवन में ज्योति और जागृति लाई जा सकती है, बस आवश्यकता है ग्रहों के संकेतों को सही से समझने की।



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आचार्य दीपक सिक्का

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पराशर मत — विंशोत्तरी एवं षोडशोत्तरी दशा में लग्न अनुसार 3 नक्षत्रों में विशेष अशुभ (ग्रन्थ प्रमाण सहित)
मूल सिद्धान्त (पराशर नियम)
• दशा चयन जन्म नक्षत्र एवं विशेष योग से होता है।
• नक्षत्र फल उसके स्वामी ग्रह से।
प्रमाण — Brihat Parashara Hora Shastra
श्लोक —
“नक्षत्राधिष्ठिता दशा जन्मकाले प्रवर्तते”
• षोडशोत्तरी दशा — विशेषतः होरा लग्न / सूर्य प्रभाव से लागू।
श्लोक —
“रवौ बलिनि षोडशोत्तरी दशा विधीयते”
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१. मेष लग्न (अश्विनी-भरणी-कृत्तिका)
• विंशोत्तरी लागू → भरणी अशुभ (शुक्र = 2,7 मारकेश)
• षोडशोत्तरी लागू → कृत्तिका (सूर्य तीक्ष्ण कर्मफल)
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२. वृषभ लग्न (कृत्तिका-रोहिणी-मृगशीर्ष)
• विंशोत्तरी → मृगशीर्ष (मंगल = 7,12 पाप)
• षोडशोत्तरी → कृत्तिका (सूर्य 4 स्वामी कठोर फल)
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३. मिथुन लग्न (मृगशीर्ष-आर्द्रा-पुनर्वसु)
• विंशोत्तरी → पुनर्वसु (गुरु = 7 मारक)
• षोडशोत्तरी → आर्द्रा (राहु तीव्र परिणाम)
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४. कर्क लग्न (पुनर्वसु-पुष्य-आश्लेषा)
• विंशोत्तरी → पुष्य (शनि 7,8 स्वामी)
• षोडशोत्तरी → आश्लेषा (बुध 3,12 कष्ट)
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५. सिंह लग्न (मघा-पूर्वाफाल्गुनी-उत्तराफाल्गुनी)
• विंशोत्तरी → पूर्वाफाल्गुनी (शुक्र अशुभ)
• षोडशोत्तरी → मघा (केतु तीक्ष्ण कर्मफल)
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६. कन्या लग्न (उत्तराफाल्गुनी-हस्त-चित्रा)
• विंशोत्तरी → चित्रा (मंगल 3,8 स्वामी)
• षोडशोत्तरी → हस्त (चन्द्र 11 स्वामी)
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७. तुला लग्न (चित्रा-स्वाति-विशाखा)
• विंशोत्तरी → चित्रा (मंगल 2,7 मारकेश)
• षोडशोत्तरी → स्वाति (राहु अस्थिर फल)
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८. वृश्चिक लग्न (विशाखा-अनुराधा-ज्येष्ठा)
• विंशोत्तरी → अनुराधा (शनि पाप प्रभाव)
• षोडशोत्तरी → ज्येष्ठा (बुध 8,11 स्वामी)
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९. धनु लग्न (मूल-पूर्वाषाढ़ा-उत्तराषाढ़ा)
• विंशोत्तरी → पूर्वाषाढ़ा (शुक्र 6,11 स्वामी)
• षोडशोत्तरी → मूल (केतु मूलकर्म फल)
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१०. मकर लग्न (उत्तराषाढ़ा-श्रवण-धनिष्ठा)
• विंशोत्तरी → धनिष्ठा (मंगल संघर्षकारक)
• षोडशोत्तरी → श्रवण (चन्द्र मारक सम्बन्ध)
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११. कुम्भ लग्न (धनिष्ठा-शतभिषा-पूर्वभाद्रपद)
• विंशोत्तरी → पूर्वभाद्रपद (गुरु 2,11 मारक)
• षोडशोत्तरी → शतभिषा (राहु तीक्ष्ण)
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१२. मीन लग्न (पूर्वभाद्रपद-उत्तरभाद्रपद-रेवती)
• विंशोत्तरी → रेवती (बुध 7 स्वामी मारक)
• षोडशोत्तरी → पूर्वभाद्रपद (गुरु द्वितीय प्रभाव)
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शास्त्रीय निष्कर्ष (पराशर सिद्धान्त)
• दशा बदलने से अशुभ नक्षत्र भी बदल सकता है।
• विंशोत्तरी → चन्द्राधारित कर्मफल।
• षोडशोत्तरी → सूर्य/होरा बल आधारित फल।
• अतः एक ही लग्न में अलग दशा लागू होने पर अलग नक्षत्र अधिक अनिष्टकारी बनता है।
पराशर सिद्धान्त — पक्ष, होरा लग्न और 120-116 वर्ष दशा का वास्तविक नियम (ग्रन्थ आधार)
प्रमाण ग्रन्थ — Brihat Parashara Hora Shastra
श्लोक सिद्धान्त —
“दशाभेदाः कालभेदात् प्रवर्तन्ते न संशयः”
अर्थ — कालभेद (पक्ष, बल, योग) से दशा बदलती है।
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१. शुक्ल पक्ष जन्म → चन्द्र होरा प्रधान → 120 वर्ष दशा
पराशरी नियम
• शुक्ल पक्ष में चन्द्र बलवान।
• चन्द्र होरा या चन्द्रप्रधान लग्न स्थिति।
• तब चन्द्राधारित दशा स्वीकार।
फल
➡ विंशोत्तरी दशा (120 वर्ष) लागू।
शास्त्रीय आधार —
“चन्द्रबलसमायुक्ते विंशोत्तरी प्रशस्यते”
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२. कृष्ण पक्ष जन्म → सूर्य होरा (सिंह प्रकृति) → 116 वर्ष दशा
नियम
• कृष्ण पक्ष में सूर्य प्रभाव प्रमुख।
• सूर्य होरा / सिंहादि अग्नि प्रभाव।
फल
➡ षोडशोत्तरी दशा (≈116 वर्ष भोग आयु) लागू।
श्लोक —
“रवौ बले षोडशोत्तरी दशा विधीयते”
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३. दशा बदलने से नक्षत्राधिपति प्रभाव भी बदलता है
पराशर सिद्धान्त —
“यस्यां दशायां ग्रहाधिपत्यं तस्यैव फलनिर्णयः”
अर्थ
• जो दशा लागू होगी उसी क्रम के ग्रह फल देंगे।
• इसलिए नक्षत्र स्वामी का फल भी दशा प्रणाली पर निर्भर।
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४. क्यों कुंडली में केवल विंशोत्तरी नक्षत्र स्वामी लिखना अपूर्ण
कारण
• आधुनिक सॉफ्टवेयर जन्म नक्षत्र → स्वतः विंशोत्तरी मान लेते हैं।
• पराशर ने दशा चयन शर्ताधीन बताया है।
अतः —
✔ नक्षत्र स्वामी स्थिर नहीं
✔ दशा बदलने पर फलाधिपत्य की व्याख्या बदलती है।
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५. नक्षत्र मैत्री (कुण्डली मिलान) पर प्रभाव
पराशरी तर्क
• गुण मिलान में नक्षत्र स्वामी आधार।
• यदि वास्तविक दशा अलग हो → ग्रहाधिपत्य सम्बन्ध बदलता है।
फल
• नक्षत्र मैत्री गलत आंकी जा सकती है।
• विशेषतः जब षोडशोत्तरी लागू हो पर विंशोत्तरी मान ली जाए।
शास्त्रीय सिद्धान्त —
“अयुक्ते दशानिर्णये फलभ्रंशो न संशयः”

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ॐ नमः शिवाय।



आसक्ति मानसिक क्रिया है। इसका अभिप्राय यह है कि मन बार-बार अपनी आसक्ति के विषयों की ओर भागता है जो किसी व्यक्ति, इन्द्रिय विषय, प्रतिष्ठा, शारीरिक सुख त्यादि में हो सकती है। यदि किसी व्यक्ति या इन्द्रिय विषय का विचार हमारे मन में बार-बार उठता है तब निश्चय ही यह मन का उसमें आसक्त होने का संकेत है। यदि यह मन ही आसक्त हो जाता है तब भगवान इस आसक्ति के विषय के बीच बुद्धि को क्यों लाना चाहते हैं। क्या आसक्ति का उन्मूलन करने में बुद्धि की कोई भूमिका होती है? हमारे शरीर में सूक्ष्म अंत:करण होता है जिसे हम बोलचाल की भाषा में हृदय भी कहते हैं। यह मन, बुद्धि और अहंकार से निर्मित होता है। इस सूक्ष्म शरीर में बुद्धि मन से श्रेष्ठ है जो निर्णय लेती है जबकि मन में इच्छाएँ उत्पन्न होती है और यह बुद्धि द्वारा लिए गए निर्णय के अनुसार मोह के विषयों में अनुरक्त हो जाता है।



उदाहरणार्थ यदि मनुष्य की बुद्धि यह निर्णय करती है कि धन सम्पत्ति ही सुख का साधन है तब मन में धन प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हो जाती है। यदि बुद्धि यह निश्चय करती है कि जीवन में प्रतिष्ठा ही सबसे महत्त्वपूर्ण है तब मन में प्रतिष्ठा और ख्याति पाने की अभिलाषा उत्पन्न होती है। दूसरे शब्दों में, मन में बुद्धि के बोध के अनुसार इच्छाएँ विकसित होती हैं।



पूरे दिन हम अपने मन को बुद्धि द्वारा नियंत्रित करते हैं। जब हम अपने घर में होते है तब हम अनौपचारिक मुद्रा में रहते हैं जिसमें मन भी सहजता का अनुभव करता है जबकि अपने कार्यालय में रहते हुए हम औपचारिक मुद्रा में रहना सही समझते हैं। ऐसा नहीं है कि मन कार्यालय की औपचारिकताओं में प्रसन्न रहता है, अपितु वह अवसर मिलते ही अपेक्षाकृत घर जैसी अनौपचारिकताओं को अंगीकार करना चाहता है। इस प्रकार हमारी बुद्धि निश्चय करती है कि कार्यालय में औपचारिक आचरण का पालन करना अनिवार्य है। इसलिए बुद्धि मन को नियंत्रित करती है और हम पूरे दिन अपने कार्यालय में औपचारिक मुद्रा में रहते हैं और हमें मन की प्रकृति के विपरीत औपचारिक शिष्टाचार का पालन करना पड़ता है। इसी प्रकार मन कार्यालय के कार्यों में सुख अनुभव नहीं करता। यदि उसे स्वतंत्र छोड़ दिया जाए तब वह कार्यालय में कार्य करने की अपेक्षा घर में बैठकर टेलीविजन देखना चाहेगा किन्तु बुद्धि उसे यह आदेश देती है कि जीवन निर्वाह हेतु कार्यालय में बैठकर कार्य करना अनिवार्य है। इसलिए बुद्धि पुनः मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाती है और लोग आठ घंटे या अधिक समय तक कार्य करते हैं।



उपर्युक्त उदाहरण से हमें यह ज्ञात होता है कि हमारी बुद्धि मन को नियंत्रित करने में सक्षम है। इसलिए हमें अपनी बुद्धि को उचित ज्ञान के साथ पोषित करना चाहिए और उसका प्रयोग मन को उचित दिशा की ओर ले जाने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करने में करना चाहिए।



बुद्धियोग मन को कर्म फलों से विरक्त रखने का विज्ञान है जो बुद्धि में यह दृढ़ निश्चय विकसित करता है कि सभी कार्य भगवान के सुख के निमित्त हैं। ऐसी स्थिर बुद्धि वाला मनुष्य एकाग्रता से अपने लक्ष्य पर ध्यान रखता है और निर्बाध गति से धनुष से छोड़े गए बाण के समान अपने मार्ग को पार कर लेता है। ऐसा साधक यह संकल्प लेता है-"यदि मेरे मार्ग में लाख बाधाएँ उत्पन्न हो जाएँ और यदि सारा संसार मेरी निंदा करे और यदि मुझे अपने जीवन का भी बलिदान क्यों न करना पड़े तब भी मैं अपनी साधना नहीं छोडूंगा।



" साधना की उच्च अवस्था में यह संकल्प इतना अधिक दृढ़ हो जाता है कि साधक को अपने मार्ग पर चलने से कोई डिगा नहीं सकता किन्तु वे लोग जिनकी बुद्धि अनेक शाखाओं में विभक्त है, अपने मन को विभिन्न दिशाओं की ओर भटकते हुए पाते हैं। वे मन की एकाग्रता को विकसित करने में समर्थ नहीं होते जो भगवान की ओर जाने वाले मार्ग के लिए आवश्यक होती है।



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आचार्य दीपक सिक्का

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कौन सा ग्रह क्या अशुभ फल देता है:-



सूर्य

सरकारी नौकरी या सरकारी कार्यों में परेशानी, सिर दर्द, नेत्र रोग, हृदय रोग, अस्थि रोग, चर्म रोग, पिता से अनबन आदि।



चंद्र

मानसिक परेशानियां, अनिद्रा, दमा, कफ, सर्दी, जुकाम, मूत्र रोग, स्त्रियों को मासिक धर्म, निमोनिया।



मंगल

अधिक क्रोध आना, दुर्घटना, रक्त विकार, कुष्ठ रोग, बवासीर, भाइयों से अनबन आदि।



बुध

ज्योतिष आचार्य आनन्द जालान के अनुसार गले, नाक और कान के रोग, स्मृति रोग, व्यवसाय में हानि, मामा से अनबन आदि।



गुरु

धन व्यय, आय में कमी, विवाह में देरी, संतान में देरी, उदर विकार, गठिया, कब्ज, गुरु व देवता में अविश्वास आदि।



शुक्र

जीवन साथी के सुख में बाधा, प्रेम में असफलता, भौतिक सुखों में कमी व अरुचि, नपुंसकता, मधुमेह, धातु व मूत्र रोग आदि।



शनि

वायु विकार, लकवा, कैंसर, कुष्ठ रोग, मिर्गी, पैरों में दर्द, नौकरी में परेशानी आदि।



राहु

त्वचा रोग, कुष्ठ, मस्तिष्क रोग, भूत प्रेत वाधा, दादा से परेशानी आदि।



केतु

नाना से परेशानी, भूत-प्रेत, जादू टोने से परेशानी, रक्त विकार, चेचक आदिल



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Can We Do Puja Without Maintaining Hygiene?



Well, here is what different scriptures mention about this. Read it completely and you will get all kind of answers related to this question:



Vishnu Smrti - Chapter 64, Verse 9:



न चाशौचवता कार्यं देवतार्चनकर्म वै ।

यस्तत्करोति मोहेन तस्य तन्निष्फलं भवेत् ॥



Meaning - A person who is in a state of impurity must indeed not perform the act of worshipping the deity. He/she who performs it out of delusion, that act of his shall become fruitless.



According to Kularnava Tantra - Chapter 9, Verse 88-



न वारिणा शुध्यते देही नान्तःशौचेन शुध्यति । अन्तःशौचेन शुध्यन्ति तस्मादन्तः शुचिर्भवेत् ॥



The embodied atma is not purified by water, nor is it purified without internal purity. It is by internal purity that beings are purified; therefore, one should be pure within.



According to Garuḍa Puraṇ - Parva Khaṇḍa, Chapter 222 -



अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।

यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥



Whether a person is impure or pure, or even if he/she has passed through all possible states (of impurity), he/she who remembers the Lotus-eyed god (Vishnu) becomes pure both externally and internally.



Manusmrti - Chapter 2, Verse 60-



अद्भिः गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति ।

विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ॥



The limbs of the body are purified by water, the mind is purified by truth; the individual atma is purified by learning and austerity; and the intellect is purified by knowledge.



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Aachaarya Deepak Sikka

Founder Graha Chaal Consultancy

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ॐ नमः शिवाय।



वेदों में प्रयुक्त काम शब्द या वासना केवल यौन इच्छाएँ नहीं हैं बल्कि इसमें सभी प्रकार के भौतिक सुख भी सम्मिलित हैं।

इस प्रकार वासना कई रूप दर्शाती है। जैसे:-

धन की इच्छा,

शारीरिक लालसाएँ,

प्रतिष्ठा की अभिलाषा,

सत्ता की भूख इत्यादि।

वासना केवल भगवान के प्रति प्रेम का विकृत प्रतिबिंब है जो कि प्रत्येक जीवित प्राणी का अंतर्निहित स्वभाव है।

जब आत्मा शरीर से संयुक्त होकर माया शक्ति के सम्पर्क में आती है तब तमोगुण के संयोग से इसका दिव्य प्रेम वासना में परिवर्तित हो जाता है।

दिव्य प्रेम भगवान की सर्वोच्च शक्ति है। अतः भौतिक क्षेत्र में इसका विकृत स्वरूप जो कि काम वासना है, वह भी अति प्रबल शक्ति है।

श्रीकृष्ण ने सांसारिक सुखों के भोग की लालसा को पाप के रूप में चिह्नित किया है क्योंकि यह प्रलोभन हमारे भीतर छिपा रहता है।

रजोगुण आत्मा को यह विश्वास दिलाता है कि सांसारिक विषय भोगों से ही तृप्ति प्राप्त होगी। इसलिए किसी भी मनुष्य में इन्हें प्राप्त करने की कामना उत्पन्न होती है।

जब कामना की पूर्ति होती है तब इससे लोभ उत्पन्न होता है और इसकी संतुष्टि न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है।

कामना, लोभ और क्रोध इन तीनों विकारों से ग्रस्त होकर मनुष्य पाप करता है।

लोभ कामनाओं का प्राबल्य है जबकि क्रोध कुण्ठित इच्छा है। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने वासना या कामना को सभी बुराइयों की जड़ के रूप में चिह्नित किया है।



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आचार्य दीपक सिक्का

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There are many great sages and devotees in Hindu tradition whose lives teach powerful spiritual lessons, Here are a few important ones with key points:



1️⃣ Valmiki

• Originally a forest robber named Ratnakara.

• Transformed into a great sage through devotion and meditation.

• Author of the sacred epic Ramayana.

• Known as the Adi Kavi (first poet) in Sanskrit literature.

Lesson: Anyone can transform through devotion and sincere repentance.



2️⃣ Ved Vyasa

• Compiler of the Vedas and author of the Mahabharata.

• Also composed the Bhagavata Purana and many other Puranas.

• Known as one of the greatest sages in Hindu tradition.

Lesson: Knowledge and wisdom guide humanity toward dharma.



3️⃣ Prahlada

• A great devotee of Lord Vishnu even as a child.

• Son of the demon king Hiranyakashipu.

• Protected by Lord Vishnu in the form of Narasimha.

Lesson: True devotion protects a devotee in every situation.



4️⃣ Dhruva

• A young prince who performed intense meditation to see Lord Vishnu.

• Blessed by Vishnu and became the Dhruva Star (Pole Star) in the sky.

Lesson: Determination and devotion bring divine blessings.



5️⃣ Shabari

• A humble devotee who waited many years to see Lord Rama.

• Offered fruits to Rama with pure love and devotion.

Lesson: God values pure devotion more than wealth or status.



Common Message from all these stories:

• Faith in God

• Devotion (Bhakti)

• Righteous living (Dharma)

• Transformation through sincerity

These teachings appear in sacred texts like the Ramayana, Mahabharata, and the Bhagavata Purana.



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Aachaarya Deepak Sikka

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रुका हुआ धन प्राप्त करने के उपाय

1. पीपल को जल अर्पित करें (शनिवार)

शनिवार की सुबह पीपल के पेड़ की जड़ में जल अर्पित करें और सात परिक्रमा करें। इससे शनि की कृपा मिलती है और रुका हुआ धन मिलने में सहूलियत होती है।


2. सरसों के तेल का दीपक जलाना

शनिवार की संध्या को पीपल के नीचे या शनि मंदिर में सरसों के तेल का दीपक जलाएँ। यह बाधाओं को दूर करता है।


3. गोमती चक्र या श्री यंत्र की स्थापना

शुक्रवार के दिन घर के पूजा स्थान या तिजोरी में गोमती चक्र या श्री यंत्र स्थापित करें। धूप-दीप दिखाकर ही रखें। यह धन के स्थायित्व और प्रवाह को बढ़ाता है।


4. दान करना

शनिवार को काले तिल, सरसों का तेल या काले वस्त्र का दान किसी गरीब को करें। इससे ग्रह दोष शांत होते हैं और अटका हुआ धन वापस आने लगता है।


5. मंत्र जाप

प्रतिदिन सुबह 108 बार “ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” मंत्र का जप करें। यह धन-संपत्ति आकर्षित करने और अड़चनें दूर करने में बेहद प्रभावी है।

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