Quotes by Dr Darshita Babubhai Shah in Bitesapp read free

Dr Darshita Babubhai Shah

Dr Darshita Babubhai Shah Matrubharti Verified

@dbshah2001yahoo.com
(1.8m)

मैं और मेरे अह्सास
नज़ारा
दिल बहला सके एसा कोई नज़ारा नहीं मिला l
दो लम्हें जी सके खुशी का इशारा नहीं मिला ll

जिंदगी भर दिल में हमेशा से शिकायत रही l
पूरा समंदर घूम लिया कही किनारा नहीं मिला ll

इलाज - ए - दर - ओ - दिल का क्या करे अब l
रातभर ढूँढते रहे आसमाँ में सितारा नहीं मिला ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
तन्हाई
तन्हाई की ये दास्ताँ क्या हैं?
जीस्त क्या है? जाँ क्या हैं?

क्यूँ जुदा हो गये हो कि l
तेरे मेरे दरमियाँ क्या हैं?

सिर्फ़ एक बार फिर से l
मिलन का झरियाँ क्या हैं?

ऐसे ना किया करो के l
पता है, बागयाँ क्या हैं?

गर हौसला बुलन्द हो तो l
उड़ान को आसमाँ क्या हैं?
२५-४-२०२६
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

मतलबी संसार
चाहत का इज़हार करते करते रात हो गई है l
ख्यालों में बात करते नींद से मात हो गई है ll

जहां में हर कोई अपनी खिचड़ी पका रहा है l
अब तो मतलबी संसार से ना'त हो गई है ll

चार लोंगों की निगाहों से बचकर आज तो l
आँखों ही आँखों मे चुपके से बात हो गई है ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

साथी
ताउम्र साथ देनेवाला साथी पल भर भी नहीं मिलता l
शायद किसीसे भी मेरा तो मुकद्दर भी नहीं
मिलता

तमन्ना थी जिन्दगी के सफर में कोई तो मिल
जाए l
दिलवाला तो क्या कोई दिल पत्थर भी नहीं
मिलता ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

तन्हाई
पेश जिस को ज़िन्दगी के सब उजाले कर दिए l
उस ने ख़ामोशी से औरों के हवाले कर दिए ll

मुस्कुराते हुए चले देखे बिना पीछे सखी l
खूबसूरत गुल मिला हमको किनारे कर दिए ll

कोई शक सूबा न रह जाये तो सब कह डाला है l
बेतुकी छोटी सी बातों के खुलासे कर दिए ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

मुसाफ़िर
ख़ुदा हाफ़िज़ मत कहना शहर से जाते जाते l
बहुत दर्द होता है तुझे देखते हुए जाते जाते ll

खामोशी से चल दिये बिना कुछ कहे सुने l
थोड़ा सही प्यार और दुलार लुटाते जाते ll

गर कभी आना जाना तो लम्हा भर के लिए l
मिलने की त्रासदी लेना शहर में आते जाते ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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My New Gazal Compos by AI
पीता नहीं हूँ, पिलाई गई हैं
हुस्न जाम की महफिल में लाई हैं l
मैं पीता नहीं हूँ, पिलाई गई हैं ll

चार घूँट रूप के हाथों से पीए l
स्वर्ग की आह्लादकता पाई हैं ll

साथ बैठकर पीने का मज्जा l
अजीब सी सुकूनियत आई हैं ll

मुद्दतों के इन्तज़ार के बाद तो l
दोस्तों के संग रौनक भाई हैं ll

रुहनियत का एहसास देने l
इश्क - ए - हकीकी गाई हैं ll
२७-४-२०२६
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह
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मैं और मेरे अह्सास

कशमकश
ताउम्र बहतरीन जिंदगी की कशमकश में गुज़र गई l
मंज़िल की तलाश को अनजानी राहों में भटक गई ll

शीतल चाँदनी रात में चमकते सितारों को गिन कर l
इन्तजार के मारे आज आँखों से नींद ही झपक गई ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

जिन्दा
बिन मौसम बरसातें लिखते रहना l
ख़ुद को भीगो कर यूँ खिलते रहना ll

दिल की दुनिया को ताज़ा रखने को l
बिन मतलब दोस्तों से मिलते रहना ll

बज़्म में रंगीली सी ग़ज़लें गाकर l
अपना टूटा जिगरा सिलते रहना ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

बेबसी
इंतजार के मारे दम तोड़ने को मजबूर मत कर करना ll
अर्ज़ है कभी भी इतना थक के चूर मत कर करना ll

आज माँ की ममता के हाथों मजबूत हो गये
है तो l
यूँ हमारी बेबसी को देख कर गुरूर मत कर करना ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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