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Dr Darshita Babubhai Shah

Dr Darshita Babubhai Shah Matrubharti Verified

@dbshah2001yahoo.com
(1.4m)

मैं और मेरे अह्सास

महका महका जीवन
महका महका जीवन अपनों के साथ मुस्कुराने से होता हैं l
जिंदगी में आनंद अपनों के साथ ही जीने ने से होता हैं ll

जिंदगी के हर उतार चढ़ाव में कदम क़दम पर साथ देकर l
अपनों की खुशियों में ख़ुद दिल से मुस्कुराने से होता हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

साँझ ढले
साँझ ढले यादों का डेरा लग जाता हैं l
पलकों पे अश्कों का मेला लग जाता हैं ll

वो घटों एकदूसरे की आगोश में खो जाना l
दिल दिमाग पुरानी दिनों में सर जाता हैं ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

चाँदनी रात
चाँदनी रात में मिलने की बात करता हैँ l
दिल पर कहर ढहने की बात करता हैँ ll

नीले गगन तले झिलमिलाते नजारों में l
तन में ताजगी भरने की बात करता हैँ ll

मन्द मन्द हवाओ के झोंके के साथ ही l
हुस्न का चैन हरने की बात करता हैँ ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

चलो गाँव की ओर
चलो गाँव की ओर चलने को जी करता हैं l
साँसों में वो महक भरने को जी करता हैं ll

सारा दिन यार दोस्तों के संग खेलने की l
बचपन की यादों को हरने को जी करता हैं ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

कठिन वक्त में हौसला रख मुस्कराके आना सामने l
अब न लाना कोई भी रोने धोने का बहाना
सामने ll

कलेजा हाथों पर आ जाता है तराने को
सुनके l
जिंदगी तो हररोज सुनाएगी नया तराना
सामने ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

चाहत
जीने की चाहत बेहद अज़ीज़ चीज़ हैं l
मिली हुई जिंदगी भी अजीब चीज़ हैं ll

कितनी भी सिद्दत से किया हो फ़िर भी l
प्यार में मिला धोखा भी लजीज़ चीज़ हैं ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

संकट
दिल की उदासी को तुझसे छुपाएँ कैसे?
ठीक हुँ खुद को दिलासा दिलाएँ कैसे?

तसव्वुर तो बहुत होते है हर रोज तो l
संकट में है दिल उसको बचाएँ कैसे?

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
प्रेम विवाह
प्रेम विवाह का बंधन निराला होता हैं l
दिल से जुड़ा रिसता सुहाना होता हैं ll

दिवाने मोहब्बत का वास्ता है कि l
जज़्बातों का यकी दिलाना होता हैं ll

जिसकी चाहतों में जुडे हों उसकी l
आगोश में ख़ुद को मिटाना होता हैं ll
१६-२-२०२६
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
समझाना
ना-समझ होते है उसे समझाना ज़रूरी है l
समझाने को हाल ए दिल बतलाना ज़रूरी है ll

दीदार की प्यास के साथ जीते रहे है कि l
मुकम्मल चैन ओ सुकून पाना ज़रूरी है ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

इश्क़ की आग में जले हुए
इश्क़ की आग में जले हुए को फ़िर से जलाया नहीं करते l
मोहब्बत में चोट खाए हुए का सरे आम तमाशा नहीं करते ll

दिल की क़ायनात में बसाया और रग रग में बसाया ओ l
प्यार में ख़ुद को मिटाया दिया हो उसे भुलाया नहीं करते ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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