Quotes by Dr Darshita Babubhai Shah in Bitesapp read free

Dr Darshita Babubhai Shah

Dr Darshita Babubhai Shah Matrubharti Verified

@dbshah2001yahoo.com
(1.5m)

मैं और मेरे अह्सास
भूमिजा
भूमिजा ने राजा जनक का नाम रोशन किया l
अच्छी बेटी, पत्नि और माँ का उदाहरण दिया ll

रामजी के साथ चौदाह साल बनवास काटकर l
सही माइने में सहधर्मिणी का फर्ज अदा किया ll

एक बार भी नहीं पूछा क्यूँ सब छोड़ना होगा l
उसने बिना वाद विवाद के आशीर्वाद लिया ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
सुकून के पल
सुकून के पल छीन लिये यादों ने l
बहुत इंतजार करवाया है वादों ने ll

मुस्किल से आँख बंध की थी ओ l
नीद उड़ा दी ख्वाबों के जालों ने ll

हुस्न की मल्लिका को देखकर ही l
नशीली महफ़िल सज़ाई साजो ने ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
सुकून के पल
यादें सुकून के पल में आकर सता जाती हैं l
इस तरह से यादें कौन सा सुकून पाती हैं ll

ना सुबह देखती है ना रात देखती है बस l
वो बिना इत्तला किये कभी भी आती हैं ll

सुहाने और नशीले लम्हें को दोहराकर l
निगाहों में अश्क़ों की बरसात लाती हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
रूह का रिश्ता
हसीन निगाहों में नज़र दे के जाऊँगा l
नज़र मिलाने का हुनर दे के जाऊँगा ll

नासमझ बन रहे हो या अनजान हो l
रूह के रिश्ते की खबर दे के जाऊँगा ll

दिल से कभी भी भूला न सकोगे ऐसी l
एक नशीली प्यारी प्रहर दे के जाऊँगा ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
बंजर भूमि
बाग की बंजर भूमि पर गुल खिला ने चला हूँ l
गुलशन की दुनिया में प्यार पिला ने चला हूँ ll

खूबसूरती हुस्न की आशिकों बहका रही है l
तिराडो की कायनात को हिला ने चला हूँ ll

प्यार की नदियों की जल धारा को बहाकर l
प्यासी भूमि की प्यास को बुझा ने चला हूँ ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
नज़ारा
सुबह से लेकर रात हो गई याद करते करते l
बेहोश हो गये दर्द भरे नग़में सुनते सुनते ll

जग में परिवर्तन ही संसार का नियम है कि l
नजरिया और नज़ारा बदला चलते चलते ll

मौसम की रवानी ने कुछ इस तरह बहकाया l
चांद सितारे सो गये मेरे साथ थकते थकते ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
हौसला
आज हौसलों के टूटे साज़ को जोड़ने चला हूँ l
दर्दभरे रास्ते महफिल की और मोड़ने चला हूँ ll

बस कुछ भी हो जाए ये सोचकर आगे बढ़ l
रीति,रस्मो रिवाजों की मटकी फोड़ने चला हूँ ll

चाहत की खुशी की ख़ातिर बिना मर्जी के l
आख़री बार ख़ुदा हाफ़िज़ बोलने चला हूँ ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
टूटे साज़
दर्द को आदत बना लेना आसान नहीं हैं l
ज़ख्मों को गले लगा लेना आसान नहीं हैं ll

आखरी बार ख़ुदा हाफिज कहने के लिए l
रंगीन महफिल सजा लेना आसान नहीं हैं ll

हमेशा के जुदा होते वक्त कहने वाली सभी l
बात को सीने में दबा लेना आसान नहीं हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

हो कौन बता दो
हो कौन बता दो एक बार तो बताना पड़ता हैं l
है ग़र इश्क़ तो बारहा बोलके जताना पड़ता हैं ll

मासूमियत और नजाकत को बरकरार रखके l
अंदर ओ बाहिर से खुद को सजना पड़ता हैं ll

यू खामोशी से इज़हार ए मोहब्बत नहीं होती l
तकाजा ये रश्में मोहब्बत का निभाना पड़ता हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

बहारों से पूछो
हसीं हुस्न को कैसे छुते है बहारों से पूछो जाकर l
नशे सा अह्सास मिलता है छुने का लुत्फ़ पाकर ll

हजारों मोहब्बत के अरमान हासिल हो
गये l
सुषुप्त जिन्दगी में खुशियाँ छा गई रंगत
लाकर ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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