Quotes by Dr Darshita Babubhai Shah in Bitesapp read free

Dr Darshita Babubhai Shah

Dr Darshita Babubhai Shah Matrubharti Verified

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(2m)

मैं और मेरे अह्सास

मुराद
सफ़ल जिदगी का सपना साकार नहीं हो पाया l
मुराद दिल में रह गई सच्चा प्यार नहीं हो
पाया ll

ताउम्र मजलिस और महफिलों में ही घूमता
रहा l
ग़ज़ले तो बहुत लिखी पर कलमकार नहीं हो पाया ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

आँचल की वह छांव
ममता का वह गांव
खेलो ना तुम दाव
सुन लो दिल की राव

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

राज
दिल में क्या राज छुपाया हैं l
रिश्ता शिद्दत से निभाया हैं ll

जिगर में तिश्नगी उठी और l
निगाहों ने अश्क बहाया हैं ll

मोहब्बत की ठंड उतारने को l
दर्द को तड़के सुकाया हैं ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

झूठा ये प्यार रहने दो
जानते हैं चालाकियां झूठा ये प्यार रहने दो l
बता दिल की आज खुलकर सबसे कहने दो ll

बड़ा बुजदिल निकला हाथ छोड़कर चल दिया l
तन्हा छोड़ गया तो तन्हाई का दर्द सहने दो ll

अब उदासियों को खुदा हाफ़िज़ कह दिया l
जिस तरफ़ तकदीर ले जाए वहां बहने दो ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
ग़ज़ब ही करेगी नजर धीरे धीरे l
ग़ज़ब ही करेगी नजर धीरे धीरे l
मोहब्बत करेगी असर धीरे धीरे ll

हौसलों को बनाये रखना सदा l
जिंदगी होगी बसर धीरे धीरे ll

मंजिल की ओर आगे बढ़ता जा l
सुहाना होगा सफ़र धीरे धीरे ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

आवाज़ देकर वापिस बुला क्यूँ नहीं देते l
मोहब्बत की क़सम दे मना क्यूँ नहीं देते ll

इश्क जिसका भुला नहीं पाए कैसे भी अब l
उसने भुला दिया है तुम भुला क्यूँ नहीं देते ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

याद करते वो बहाने से
शुक्रगुजार है याद करते वो बहाने से l
लगाता है कि बहुत डरते है ज़माने से ll

आंख मिचकर कूदे इश्क़ के रोजगार में l
एक बार भी नहीं सोचा दिल लगाने से ll

लाख कोशिश करलो जाने वाला कभी l
कोई वापिस नहीं लौटता है मनाने से ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

हाथों मैं हाथ ले चलेंगे l
एक दूसरे के संग रहेंगे ll

शेह शर्म ना आएँगी बीच में l
हाल ए दिल खुलके कहेंगे ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

महक जिन्दगी में घुली जा रही हैं
प्यार की महक जिन्दगी में घुली जा रही हैं l
तब से चैन और सुकून की साँस पा रही हैं ll

खुशनुमा सुबह में चारो ओर खूबसूरती छाई l
आज बहारों की मल्लिका रंगत ला रही हैं ll

पहेले प्यार की पहली धड़कने बेकाबू हुई कि l
कहीं से बयारों के साथ सदाएं आ रही हैं ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

लिफ़ाफ़ा
जाते हुए एक बड़ा सा लिफ़ाफ़ा थमाया हैं l
जाने कौन से वाकिये को उसमे समाया हैं ll

सारा आगे पीछे का चिट्ठा जानते फिर भी l
क्यूँ बार बार एक ही प्रश्न को उठाया हैं ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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