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Yeh Ishq hai Janaab ✨💕 - Avantika
तेरे दीदार की तलब दिल पर कुछ इस क़दर छायी है, जिस ओर भी देखूँ, बस ग़मगीन तन्हाई नज़र आयी है। - Avantika
दुनिया अनेक रंगों से भरी हुई है । खुशी का रंग, दुख का रंग, दोस्ती का रंग, दुश्मनी का रंग, उनमें भी सबसे गहरा प्यार का रंग ! पर जब प्रेम की बात आती है, तो मन अनायास ही राधा-कृष्ण की ओर चला जाता है । उनका प्रेम किसी एक रंग में नहीं समाया । बल्कि प्रेम के हर रंग को अपने भीतर समेटे हुए था । वो प्रेम जो सिर्फ पाने में नहीं, समर्पण में था — जो साथ रहने में नहीं, बल्कि हर पल एक-दूसरे में बस जाने में था । शायद इसी कारण आज भी प्रेम का सबसे सुंदर रंग राधाकृष्ण के नाम से पहचाना जाता है ।
कैसे बताऊं क्या बात थी उसमें जब मिली थी वो पहली बार चांदनी रात थी, तन्हाई भी साथ थी मुस्करा रही थी फूलों जैसे खिल रही थी सर्द धूप हो जैसे बारिश में वो कुछ भीग रही थी ऐसे जैसे सावन में नाचती मोरनी हो बस तब ही इस दिल ने चुपके से कहा बस तुम ही मेरे दिल की चोरनी हो - Avantika
कैसे बताऊं क्या बात थी उसमें जब मिली थी वो पहली बार चांदनी रात थी, तन्हाई भी साथ थी मुस्करा रही थी फूलों जैसे खिल रही थी सर्द धूप हो जैसे बारिश में वो कुछ भीग रही थी ऐसे जैसे सावन में नाचती मोरनी हो बस तब ही इस दिल ने चुपके से कहा बस तुम ही मेरे दिल की चोरनी हो
मोहब्बत से मेरा क्या लेना-देना न कभी मैंने देखा इसे, न महसूस किया तो जिसे कभी देखा ही नहीं उसे कैसे मान लूँ ? और अचानक आए इस अनकहे एहसास को कैसे अपना मान लूँ ? कोई सबूत हो तो मुझे भी दिखाना ज़रा आख़िर ये प्यार क्या है मुझे भी बताना ज़रा दिल में कुछ अजीब-सी बेचैनी होती है जब वो मुझसे दूर हो जाता है खुलती है नींद से जब आँखें मेरी न जाने बिन बताए वो कहाँ छिप जाता है पता नहीं क्यों सामने मेरे वो आना नहीं चाहता है फिर दिल में एक टीस-सी उठती है जब अपने ख़्वाबों से मैं जाग उठती हूँ रात से फिर सुबह हो गई है ये जानती हूँ कोई नहीं है हक़ीक़त में जब धीरे से ये बात मानती हूँ अरे, मैं मोहब्बत करना कहाँ जानती हूँ किसी को अपना मैं कहाँ मानती हूँ प्यार क्या है, ये जानना भी मैं अब कहाँ चाहती हूँ वैसे भी … आख़िर मोहब्बत से मेरा क्या लेना-देना ? - अवंतिका
" इन नशीली निगाहों से आपने हमको जो अपना दीवाना बनाया है सनम कहीं ये इन आंखों की कोई खूबसूरत चाल तो नहीं ? ये जो भीनी सी खुशबू बिखरी है हर ओर कहीं इनकी वज़ह तुम्हारे ये लहराते हुए बाल तो नहीं ? जिनसे रिस कर अब भी गिर रही है पानी की कुछ बूंदें जो बिन मौसम भी बारिश बन कुछ भीगा सी रही है तुम्हें क्या इतना हक़ मैं भी रखता हूं ? की एक बार तुम्हारी इन उलझी जुल्फों को सवार सकूं ? "
कभी अंधेरों में तारों से मुलाक़ात की है ? कभी आसमान में उस चांद को शर्माते देखा है ? कभी टूटते तारे से कुछ मांगा है ? कभी सड़कों पर बेवजह निकल कर देखा है ? कभी मंजिल के बिना सफर पूरा किया है ? कभी ढूंढने में कुछ पाने को खुद को बेवक्त ज़ाया किया है ? कभी एक क़दम पीछे लेकर नई उड़ान भरने को दिल किया है ? कभी अपने शहर से भाग कर नए शहरों में खुद को पाया है ? कभी भटक रहे थे जिस सुकून की तलाश में उसे खुद में ढूंढा है ? कभी जिसे दूसरों में ढूंढते थे उसे ख़ुद में ढूंढ के देखो शायद वो मुस्कुराहट मिल जाए ? कभी ख़ुद से प्यार कर के देखो क्या पता दुनिया की सारी खुशियां फ़ीकी पड़ जाए ? क्या पता वो उदास चेहरा एक बार फ़िर से खिल जाए ?
दिल की बात ज़ुबान पर कभी आ नहीं पाती है, वो चुप रह जाती है पर कुछ कह नहीं पाती है। पर अपनी आँखों से वो सब कह जाती है, दिल में बसा हूँ उसके मैं ये बात उसकी नज़रें छुपा नहीं पाती हैं। वो बहुत चाहती है मुझे, हाँ मुझसे भी ज़्यादा चाहती है मुझे, बस इतनी सी बात वो कभी कह नहीं पाती है। समझता हूँ मैं उसकी आँखों की ज़ुबान को, पर उसकी लाज का सोच मैं भी बस चुप रह जाता हूँ। कहना तो चाहता हूँ मैं भी बहुत कुछ, पर उसके सामने आकर मैं कुछ कह ही कहाँ पाता हूँ।
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