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Aanchal Sharma

Aanchal Sharma

@aanchalsharma.693112
(982)

दिल आज भी वही गलती करता है,
तेरे बिना जीने की कोशिश।

माँ — हिम्मत की पहली पाठशाला



जब दुनिया ने कहा “तू नहीं कर पाएगा”,
तब माँ ने मुस्कुरा कर कहा — “मैं हूँ ना”।
जब रास्ते काँटों से भरे थे,
माँ ने अपने आँचल से उन्हें ढक दिया।
माँ कोई किताब नहीं,
फिर भी हर सबक सिखा जाती है।
माँ कोई पदवी नहीं,
फिर भी जीवन जीना समझा जाती है।
खुद भूखी रहकर,
मेरे सपनों की थाली सजाती रही।
अपने दर्द छुपाकर,
मेरे चेहरे की हँसी बचाती रही।
जब हारने लगा था खुद से,
माँ ने मेरी आँखों में विश्वास भरा।
कहा — “गिरना हार नहीं होता,
उठना ही असली जीत का रास्ता होता।”
माँ ने सिखाया —
हालात कितने भी कठिन हों,
झुकना नहीं है।
आँसू आएँ तो आने दो,
पर उम्मीद को कभी रोना नहीं है।
उसके हाथों की रेखाओं में
मेरे भविष्य की कहानी थी।
उसकी हर दुआ में
मेरी कामयाबी की निशानी थी।
माँ कमजोर नहीं होती,
वो चुप रहना जानती है।
माँ हारती नहीं है,
वो सहना जानती है।
आज जब मैं थोड़ा मजबूत हूँ,
तो ये मेरी नहीं —
माँ की जीत है।
क्योंकि जिसने मुझे खुद पर भरोसा करना सिखाया,
वो सिर्फ मेरी माँ है।
अगर कभी थक जाओ जीवन से,
तो माँ की आँखों में देख लेना,
तुम्हें फिर से उठ खड़े होने की ताकत मिल जाएगी।
माँ — सिर्फ जन्म देने वाली नहीं,
बल्कि ज़िंदगी बनाने वाली होती है।

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पागल नहीं हूँ मैं,
बस तेरी आदत सी लग गई है…
हर सांस तेरा नाम लेती है।

मयखाने


जब से हुई है मेरी आमद शहर में तेरे,
मुझसे रूठे-रूठे सारे मयखाने हैं।
जब से हुई है आमद मेरी शहर में तेरे,
हर जाम में अब तेरी यादों के पैमाने हैं।
पहले जो दर्द को पीकर हँस लिया करता था,
आज आँसू भी मुझसे कतराने हैं।
तेरी जुदाई ने ऐसा सन्नाटा छोड़ा,
कि साक़ी भी अब मुझसे घबराने हैं।
भीड़ में रहकर भी तन्हा सा रहता हूँ,
मेरे अपने ही अब मुझे पहचानने हैं।
तेरे बाद न इश्क़ बचा, न शराब बची,
बस ख़ामोशी के साए सिरहाने हैं।
जिस शहर में ढूँढता था सुकून कभी,
वहीं हर गली ने ज़ख़्म पुराने जगाने हैं।
तू पास नहीं तो क्या मयख़ाना क्या,
अब तो साँसें भी मुझसे रूठ जाने हैं।

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मयखाने


जब से हुई है मेरी आमद शहर में तेरे,
मुझसे रूठे-रूठे सारे मयखाने हैं।
जब से हुई है आमद मेरी शहर में तेरे,
जामों में भी अब तन्हाई के अफ़साने हैं।
पहले जो हर मोड़ पे आबाद हुआ करते थे,
आज निगाहों से वो सब बेगाने हैं।
तेरी एक झलक ने ऐसा जादू कर डाला,
कि शराब से ज़्यादा तेरे दीवाने हैं।
अब न साक़ी की अदाओं में वो बात रही,
न उन महफ़िलों में पुराने तराने हैं।
तेरे इश्क़ ने मुझको ऐसा मदहोश किया,
कि मयखाने भी अब मुझसे अनजाने हैं।

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क्या इतनी बुरी हूँ मैं, माँ?


क्या इतनी बुरी हूँ मैं माँ,
जो हर बार आपकी निगाहों में कमी ही दिखती हूँ?
क्या इतना गलत हूँ मैं माँ,
जो आपकी उम्मीदों की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते
सांसें ही थक जाती हैं?

मैंने तो बस इतना चाहा था
कि एक बार आप मुझे देखकर मुस्कुरा दें,
कि एक बार मेरे सिर पर हाथ रखकर
कह दें — “बेटी, तू ठीक कर रही है।”
पर हर बार आपकी आँखों में
मेरी गलतियाँ ही उभर आती हैं,
मेरी कोशिशें शायद छोटी पड़ जाती हैं।

क्या इतनी बुरी हूँ मैं माँ,
कि आपकी जितनी चाहत थी,
उतनी मैं खुद को साबित नहीं कर पाई?
पर माँ… मेरी रातें भी रोकर ही कटती हैं,
आपकी उम्मीदों के वजन से
मेरे सपनों की हड्डियाँ भी चटकती हैं।

मैं कमजोर नहीं हूँ माँ,
बस थक गई हूँ हर पल ये साबित करते-करते
कि मैं भी किसी की बेटी हूँ,
मैं भी मायने रखती हूँ,
मैं भी प्यार की हकदार हूँ।

आप जानती हैं माँ,
जब आप गुस्से में कह देती हैं
कि “तुझसे कुछ नहीं होगा,”
तो मेरे भीतर का पूरा आसमान
तपकर राख हो जाता है।
फिर भी मैं चुप रहती हूँ,
क्योंकि आपसे बहस जीतना
मेरी हार होती है।

पर माँ, एक बात आज खुलकर कह दूँ —
मैं बुरी नहीं हूँ।
मैं बस इंसान हूँ,
जिसे गलतियाँ करने का हक है,
जिसे समझने की जरूरत है,
जिसे प्यार की भूख है।

मैं हर बार गिरकर उठती हूँ,
क्योंकि आपने ही सिखाया था
कि बेटी कभी टूटकर बैठती नहीं,
लड़ती है…
आखिरी सांस तक लड़ती है।

आज भी लड़ रही हूँ माँ,
दुनिया से भी, खुद से भी,
और कभी-कभी… आपसे भी।
पर इस लड़ाई में
मैं आपको खोना नहीं चाहती।

माँ…
काश एक बार आप महसूस करें
कि मैं बुरी नहीं, बस अधूरी हूँ,
और आपका एक शब्द,
एक गर्माहट भरा हाथ,
मुझे पूरा बना सकता है।

काश आप समझें माँ,
कि आपकी ही बेटी हूँ,
आपकी ही छाया हूँ,
आपकी ही सीख मेरे भीतर सांस लेती है।

और माँ…
मैं टूटकर भी मुस्कुराती हूँ,
गिरकर भी उठ जाती हूँ,
क्योंकि आपके जैसा बनने की जिद
अभी भी सीने में धड़कती है।

इसलिए नहीं, माँ —
मैं बुरी नहीं हूँ।
मैं वही हूँ
जिसे आपने प्यार से गढ़ा था,
जिसने हर दर्द में आपका नाम लेकर
हिम्मत जुटाई थी।

आज आपसे एक ही दुआ मांगती हूँ—
मुझे कम मत आंकिए माँ,
बस एक बार मेरे दिल की थकान समझिए,
और देखिए —
मैं कितनी मजबूत बन सकती हूँ
अगर आप साथ हों।

क्योंकि माँ…
बेटियाँ बुरी नहीं होतीं,
बस प्यार की एक किरण से
पूरी दुनिया बदल देती हैं।

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मां की ममता

रात की ठंडी हवा में जब मैं रोया था,
तो किसी ने अपनी ओढ़नी से मुझे ढक लिया था,
वो कोई फरिश्ता नहीं...
मेरी मां थी — जिसने खुद को भुला दिया था।

जब मैं गिरा, तो ज़ख़्म मुझे लगे,
पर दर्द उसकी आँखों से बह गया,
मेरे हर आंसू को उसने यूं पी लिया,
जैसे खुद की प्यास से सौदा कर लिया।

वो भूखी रही, ताकि मैं खा सकूं,
वो जागती रही, ताकि मैं सो सकूं,
हर मुश्किल को मुस्कुराहट से ढकती रही,
ताकि मैं ज़िंदगी में हंसना सीख सकूं।

कभी डांटा, तो लगा क्यों नाराज़ हुई,
पर अब समझता हूं —
वो डांट नहीं, दुआ थी,
जो मुझे गिरने से पहले संभाल गई।

अब जब दूर हूं, तो एहसास होता है,
उसकी गोद ही असली जन्नत थी,
जहां कोई डर नहीं था,
सिर्फ सुकून और मोहब्बत थी।

मां... तू कहां ढूंढूं तुझे इस भीड़ में,
हर खुशी में तेरी कमी खलती है,
तेरे बिना ये घर तो है दीवारों का जंगल,
तेरे बिना मेरी दुनिया अधूरी लगती है।

अगर जन्नत सच में कहीं है ऊपर,
तो वहां तेरे कदमों की खुशबू होगी,
क्योंकि तेरे बिना कोई दुआ मुकम्मल नहीं होती,
मां... तू ही खुदा की सबसे खूबसूरत तस्वीर होगी।

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पापा मेरे सुपर हीरो

जब मैं गिरा था पहली बार,
तब तुमने थाम लिया था हाथ,
ना कुछ कहा, ना जताया ग़म,
बस बन गए मेरी दुनिया का साथ।

रातों को जाग कर जो मेरी तबीयत पर ध्यान देता था,
भूखा रहकर भी जो मेरे लिए खाना छोड़ देता था,
कभी आँखों से नींद चुरा कर,
मेरे सपनों को अपने पसीने से सींचता था।

तुम्हारे कंधों पर बैठ कर
मैंने दुनिया को ऊँचा देखा था,
पर तुम्हारे झुकते कंधों का
दर्द कभी समझ ना सका था।

तुम्हारी जेबें हमेशा खाली सी थीं,
पर दिल खजानों से भरा होता था,
मेरी हर फरमाइश के पीछे
तुम्हारा हर सपना कुर्बान होता था।

तुमने कभी ‘थक गया हूँ’ नहीं कहा,
कभी अपने दुख मुझसे नहीं बांटे,
तुम बस मुस्कुराते रहे
जैसे तुम्हें दर्द छूता ही न हो।

जब कभी मैं रोया,
तुम्हारी आँखें छुपकर भीग जाती थीं,
पर सामने आकर तुम
हमेशा चट्टान बन जाते थे।

अब जब खुद को बड़ा समझ बैठा हूँ,
तो तुम्हारी जगह समझ नहीं पा रहा हूँ,
हर छोटी बात पर जो तुम डांटते थे,
वो आज जीवन का पाठ बन गया है।

तुम्हारे दिए संस्कारों की छाया में
मैं आज भी खुद को सुरक्षित पाता हूँ,
पापा, तुम मेरी ताकत हो,
तुम्हारे बिना ये जीवन अधूरा सा लगता है।

अगर इस दुनिया में कोई भगवान ज़िंदा है,
तो वो मेरे लिए तुम हो पापा,
ना कोई केप पहनते हो, ना उड़ते हो,
पर मेरे दिल के सुपरहीरो सिर्फ तुम हो पापा।


पापा,
तुम्हारी वो खामोशियाँ अब बहुत चुभती हैं,
कभी सोचा नहीं था कि
तुम्हारे बिना भी साँसे चलेंगी...
पर अब हर धड़कन में
तुम्हारा नाम बस गया है।



समर्पित उन सभी पिताओं को,
जिन्होंने चुपचाप अपना सारा जीवन
सिर्फ अपने बच्चों की ख़ुशियों के लिए जी दिया।

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मेरे लफ्ज़ों की वो चुभन मत याद रखना

मेरे लफ़्ज़ों की वो चुभन मत रखना याद,
कभी हाल-ए-दिल भी पढ़ लिया करो, बिना आवाज़।
तेरे चेहरे को जब सबने घूरा था तानों से,
मैंने खुद को ज़हर पिलाया था अपने ही बयान से।

हां, कह दिया ‘काला’, वो एक लफ्ज़, एक आग था,
पर तेरी हिफ़ाज़त का उस पल बस वही इक राग था।
ज़माने की नज़रों में गिरने न दूँ तुझे,
इसलिए खुद गिर गई, बस तुझसे छुपा के रो दी मैं।

तू सोचता है – मैं अपने होती तो यूँ न कहती,
पर मेरे जैसा कोई अपना यूँ भी क्या सहती?
अपनों से ही तो जख़्म मिलते हैं सबसे गहरे,
तेरा खामोश होना मेरी रूह तक जलाए बहते लहू से।


रातों को चुपके से तेरी तस्वीर से बातें करती हूँ,
तेरी हर नाराज़ी को अपनी सज़ा मानकर जीती हूँ।
तेरी हर पोस्ट पढ़ती हूँ, पर कमेंट नहीं करती,
क्योंकि मैं अब भी अपनी सूरत तेरे नाम से डरती।

कितनी बार सोचा, आ जाऊँ तेरे सामने रो लूँ,
तेरे कदमों में बैठ, अपनी गलती को धो लूँ।
पर तेरी आंखों में वो बेरुख़ी मुझे तोड़ देती है,
और मैं लौट जाती हूँ, अधूरी साँसों के साथ।

सुनो… अगर कभी दिल से निकल जाए मेरी वो बात,
तो एक बार फिर से मुझे ‘अपनी’ कह देना सौगात।
मैं फिर से वही चुपचाप लड़की बन जाऊँगी,
जो तेरे साये में भी, खुद को आबाद पाती थी।


चलो मान लो, मैं गुनहगार हूँ उस एक लम्हे की,
पर क्या हम भूल नहीं सकते उस सज़ा के सिलसिले की?
मुझे फिर से वो मुस्कान दे दो जो तेरे नाम की थी,
फिर चाहे तू कह दे, "तू मेरी जान थी… और है भी।"


अगर मेरे इश्क़ में अब भी कोई सच्चाई बाकी हो,
तो मेरी माफ़ी में भी एक मोहब्बत की गहराई हो।
तेरा हाथ थाम लूं, बस इतना ही ख्वाब है,
तेरी ‘अपनी’ बनूं फिर से — यही मेरा जवाब है।

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अगर अपने होते तो शायद



मत पूछो क्यों कह दिया काला तुझे उस रोज़,
लब कांपे थे, दिल रोया था, न था कुछ सोचा उस रोज़।
ग़ुस्से में बहक गई थी, बेख़ुदी का आलम था,
तेरी ही खातिर लड़ी थी, मगर तू ही मेरा मातम था।


तू कहता है — अगर अपने होते, तो यूँ न कहते,
क्या बताऊँ, अपने तो वही होते जो दिल से समझते।
तेरे बिना हर रिश्ता अधूरा सा लगता है,
तेरा दर्द ही मेरा अपना सा लगता है।


शायद तेरे दिल को अब भी दर्द होता है,
मेरी उस एक बात का ज़हर सा असर होता है।
पर क्या तूने कभी सोचा, मैं क्यों तेरे ख़िलाफ़ गई?
भीड़ के बीच तेरी इज़्ज़त बचाने की जंग लड़ गई।


मैंने खुद को झुठलाया, बस तुझे बचाने को,
अपनी मोहब्बत को बदनाम किया, ज़माने को भुलाने को।
मैं तेरी हूँ, ये बात मैं उस दिन भी जानती थी,
तेरी आंखों में मेरा अक्स रोज़ पहचानती थी।


तेरी चुप्पी अब रुला देती है हर शाम को,
किताबें बंद कर देती हूँ, जब तुझसे जुड़ा कोई नाम हो।
तेरी नाराज़ी मेरी रूह को तकलीफ देती है,
सज़ा का नाम नहीं, ये तो बस मोहब्बत की तफ़्सील देती है।


अगर तू माफ़ कर दे, तो शायद सांसें लौट आए,
तेरे नाम की धड़कन फिर से गीत बन जाए।
तेरे बिन हर ग़ज़ल अधूरी, हर लफ़्ज़ उदास है,
तेरे प्यार के बिना, ये दुनिया एक वीरान प्यास है।


तू लौट आ, मेरी गलती को दिल से माफ़ कर दे,
अपनेपन की एक झलक से हर दर्द साफ़ कर दे।
मैं फिर न कहूँगी कुछ भी जो तुझे चुभ जाए,
बस एक बार अपनी कह दे, हर ज़ख्म भर जाए।

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