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@aakankshawords
(5)

गंगा की हवा, वो गलियाँ काशी की,
यादों में अब भी महकती रहेंगी।
छोड़ तो रहा हूँ आज तेरी चौखट,
पर मेरी पहचान यहीं से रहेगी।
मेरे हर ख़्वाब में एक नाम रहेगा—
Banaras Hindu University,
तू सिर्फ़ विश्वविद्यालय नहीं,
मेरी ज़िंदगी का एक ख़ूबसूरत मुकाम रहेगा।

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अधूरी मोहब्बत
राहुल का जीवन हमेशा शांत और अलग था। स्कूल के गलियारों में लोग उसे देखते, लेकिन कोई उसके दिल की गहराई तक नहीं पहुँच पाता। वह बातों में कम और नजरों में गहरी होती थी। उसके दोस्तों की संख्या कम थी, पर वह जिसे जानता था, उसे समझता था—गहरी समझ, बिना कहे। लोग कहते—“उसका दिल सख्त है, कोई पास नहीं आने देता।”
आकांक्षा पहली बार उसे बारिश के दिन मिली। लाइब्रेरी की खिड़की पर बूंदें गिर रही थीं, और राहुल अपनी किताब में खोया हुआ था। उसकी आँखों में हल्की उदासी थी, जो किसी से साझा नहीं की गई थी। आकांक्षा ने महसूस किया कि उसके भीतर भी कुछ नर्म बचा है, जो किसी को दिखाई नहीं देता।
शुरुआत में, आकांक्षा सिर्फ उसे दूर से देखती। कभी लाइब्रेरी में, कभी बाग़ में। राहुल हमेशा अकेला रहता, पर आकांक्षा की नजरें धीरे-धीरे उसे महसूस करने लगीं।
एक दिन बारिश के बाद, बाग़ की चट्टानों पर हरी घास चमक रही थी। आकांक्षा ने कहा,
“तुम कहते हो दिल सख्त हो गया है, पर मैंने देखा है—बरसात के बाद चट्टानों पर भी हरी ज़िद उग आती है।”
राहुल ने पहली बार उसकी बातों में रुचि दिखाई। उसने पूछा,
“तुम हमेशा इतनी गंभीर बातें क्यों करती हो?”
“क्योंकि मैं देख सकती हूँ कि जो तुम कहते हो, उससे कहीं ज़्यादा कुछ है जो तुम छुपाते हो।”
समय के साथ, आकांक्षा ने राहुल की दुनिया में धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई। कभी उसकी पसंदीदा चाय लेकर, कभी उसकी किताबों पर हल्की हँसी छोड़कर। राहुल ने महसूस किया कि उसकी चुप्पियाँ अब अकेली नहीं थीं।
एक शाम, बगीचे की छाया में, आकांक्षा ने कहा—
“अगर इजाज़त हो, तो मैं तुम्हारे दिल में पूरी नहीं, बस अधूरी-सी मोहब्बत बनकर ठहर जाऊँ।”
राहुल ने उसकी आँखों में देखा। कोई दबाव नहीं, कोई मांग नहीं। बस शांति और अपनापन। पहली बार उसने महसूस किया कि किसी के लिए उसका सख्त दिल भी मुलायम हो सकता है।
उनकी मोहब्बत अधूरी थी। कोई वादा नहीं, कोई पूरा होने का दबाव नहीं। सिर्फ थोड़ी-सी नर्मी, थोड़ी-सी उम्मीद, और अधूरी मोहब्बत का सौंदर्य।
आकांक्षा और राहुल की दिनचर्या में छोटी-छोटी बातें शामिल हो गईं। बारिश में भीगकर किताबें पढ़ना, चाय के कप के पास बैठकर खामोशी में बातें करना, और बस एक-दूसरे की उपस्थिति महसूस करना। कभी-कभी वे झगड़ते भी—राहुल की चुप्पियों और आकांक्षा की उत्सुकता के कारण। पर हर झगड़े के बाद उनकी नज़दीकियाँ और बढ़ती।
समय बीतता गया। राहुल ने समझा कि आकांक्षा की मौजूदगी ने उसकी जिंदगी को बदल दिया है। वह अब अकेला नहीं था। उसकी चुप्पियाँ अब खाली नहीं थीं। और आकांक्षा ने समझा कि कभी-कभी मोहब्बत को पूरा करने की ज़रूरत नहीं होती—बस महसूस करने की होती है।
उनकी अधूरी मोहब्बत, उनकी छोटी-छोटी आदतें, उनकी खामोशियाँ, और उनके साझा पल—सबकुछ उनकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन गए।
कभी-कभी, वे बस बगीचे में बैठते और बारिश के बाद की नमी को महसूस करते। राहुल कहता,
“तुम्हारी नमी मेरे भीतर पहुँच जाती है।”
और आकांक्षा मुस्कुराकर जवाब देती,
“बस यहीं, अधूरी मोहब्बत बनकर, ठहर जाओ।”
कभी-कभी अधूरा होना ही सबसे पूरा महसूस होता है। और उनके लिए, यही अधूरी मोहब्बत—सदा के लिए, पर हमेशा अधूरी—सबसे खूबसूरत एहसास बन गई

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देखा उसे जब पहली बार, गुस्से का पारा चढ़ा हुआ था,
चेहरे पर सख्ती ऐसी थी, जैसे हर लम्हा अड़ा हुआ था।
आंखों में उसकी अजीब सी, एक चुभन सी झलक रही थी,
पर जाने क्यों उस चुभन में भी, एक कहानी छुप रही थी।
भौंहें तनी, लब खामोश थे, पर दिल कुछ कह जाता था,
उसका हर एक अंदाज़ मुझे, अपनी ओर खींच जाता था।
ना हंसी, ना कोई बात, बस खामोशी का साया था,
फिर भी उस अनजाने चेहरे में, कुछ अपना सा पाया था।
शायद वो गुस्सा झूठा था, या दिल कहीं टूटा होगा,
उसकी उस खामोशी के पीछे, कोई दर्द जरूर छुपा होगा।
अजीब सा रिश्ता बन गया, पहली ही उस मुलाकात में,
गुस्से वाला वो चेहरा बस, बस गया मेरी हर बात में।
कभी सोचा ना था ऐसा भी, कोई दिल को भा जाएगा,
गुस्से में भी कोई इतना, खास नजर आ जाएगा।
आज भी याद है वो पल, जब पहली बार देखा था,
उसके गुस्से में ही मैंने, अपना सुकून लिखा था। ✨

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लिखती हूँ नाम तेरा हर खाली पन्ने पर,
जैसे दुआ उतरती हो किसी सजदे पर।
शब्द मेरे सादे हैं, एहसास गहरे हैं,
तू मिले तो लगे जैसे सपने सुनहरे हैं।
किस्मत की स्याही से बस इतना लिख देना,
साथ मेरा हो तेरा — हर जन्म, हर सवेरा।

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तेरी मुस्कान में मिठास ऐसी घुली है,
जैसे हर खुशी ने चॉकलेट की शक्ल ली है।
तू पास हो तो हर दिन त्योहार लगता है,
तेरे बिना हर खुशी अधूरी सी लगती है। 💕

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मैं सबका सहारा बनी,
पर खुद को संभाल न पाई।
सबकी चुप्पियाँ सुनी मैंने,
पर अपनी आवाज़ दबाई।
मैं दर्द की भाषा जानती थी,
इसलिए हर टूटे दिल की कहानी थी,
पर किसी ने ये नहीं पूछा कभी,
मेरे अंदर भी एक परेशानी थी।
मैंने लोगों को रास्ते दिए,
पर अपनी मंज़िल खोती गई,
मैं सबको रोशनी देती रही,
और खुद ही अंधेरे में सोती गई।
अब सीख लिया है धीरे-धीरे,
कि हर बोझ मेरा नहीं होता,
मैं सहारा हूँ, कोई मंज़िल नहीं,
हर सफ़र मुझ पर नहीं रोता।
अब मैं खुद को भी सुनती हूँ,
खुद को भी थोड़ा-सा थामती हूँ,
क्योंकि जो खुद को बचा ले पहले,
वही दूसरों को सच में संभाल पाता है। 🌙

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