* मुलाकात.....
आख़िर मुलाक़ात होती क्या है?
दो लोगों का एक-दूसरे के सामने आ जाना?
एक-दूसरे से नाम पूछ लेना?
कुछ देर बातें कर लेना और फिर अपनी-अपनी ज़िंदगी में वापस चले जाना?
शायद नहीं।
क्योंकि हर रोज़ न जाने कितने लोग हमारे सामने से गुज़रते हैं। हम उन्हें देखते हैं, वे हमें देखते हैं, और अगले ही पल हम दोनों एक-दूसरे के लिए अनजान हो जाते हैं।
तो फिर कुछ मुलाक़ातें याद क्यों रह जाती हैं?
किसी पहली मुलाक़ात का कोई निश्चित समय नहीं होता।
कभी वह एक नज़र होती है, कभी एक सवाल, कभी किसी अनजान इंसान की कही हुई एक छोटी-सी बात।
और कभी-कभी...
हमें पता भी नहीं चलता कि जिस इंसान के पास हम बस कुछ मिनटों के लिए बैठे हैं, वह हमारी कहानी का कितना बड़ा हिस्सा बनने वाला है।
शायद मुलाक़ातों की खूबसूरती ही यही है।
हम उनसे कुछ उम्मीद करके नहीं मिलते।
हमें पता नहीं होता कि सामने वाला कौन है।
उसकी कहानी क्या है।
वह कहाँ से आया है।
और सबसे ज़रूरी—
वह हमारी ज़िंदगी में कहाँ तक जाएगा।
सोचिए...
इतने बड़े संसार में, जहाँ करोड़ों लोग हैं, कितने रास्ते हैं, कितने शहर हैं, कितने स्टेशन हैं, कितनी गलियाँ हैं...
उन सबके बीच दो बिल्कुल अनजान लोगों का एक ही समय पर, एक ही जगह पर आ जाना कितना बड़ा संयोग है।
शायद हमारी ज़िंदगी की कुछ सबसे बड़ी कहानियाँ ऐसे ही शुरू होती हैं।
बिना किसी तैयारी के।
बिना किसी घोषणा के।
बस...
एक मुलाक़ात से।
लेकिन आख़िर मुलाक़ातें होती कैसे हैं?
क्या हम किसी से मिलते हैं?
या कभी-कभी ज़िंदगी हमें किसी के सामने लाकर खड़ा कर देती है?
मुझे इसका जवाब तब नहीं पता था।
शायद आज भी पूरी तरह नहीं पता।
बस इतना जानती हूँ—
कुछ मुलाक़ातें ख़त्म हो जाती हैं।
कुछ रिश्तों में बदल जाती हैं।
और कुछ... हमें बदलकर चली जाती हैं।
हम सबके पास एक न एक कहानी ज़रूर होती है।
एक ऐसी कहानी, जिसे सुनाने के लिए शायद आपको बस एक सुनने वाला चाहिए।
शायद ये भी वैसी ही एक कहानी है।
और सुनने वाले… आप सब तो हैं ही।
तो चलिए, शुरू करते हैं।
1. निकली अकेली, मिली पहेली ...
रात के लगभग साढ़े दस बज रहे थे।
नूर अपनी मेज़ पर किताब खोले बैठी थी।
किताब का पहला पन्ना कब का खुल चुका था, लेकिन पिछले पंद्रह मिनट से वह उसी पन्ने पर थी।
सामने एक नीली स्याही वाला पेन रखा था, बगल में पानी की बोतल और किताबों का छोटा-सा ढेर। मेज़ पर लगी पीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
वह पढ़ने की कोशिश कर रही थी।
सच में।
लेकिन आज शब्द पढ़े नहीं जा रहे थे।
एक लाइन पढ़ती।
फिर वही लाइन दोबारा।
फिर तीसरी बार।
और फिर कुछ भी समझ नहीं आता।
उसने माथा दबाया और धीरे से बुदबुदाई—
“बस कर नूर…”
तभी बाहर से माँ की आवाज़ आई।
“नूर!”
नूर ने आँखें बंद कर लीं।
“जी माँ।”
“पढ़ रही हो?”
“हाँ।”
माँ कमरे में आईं और मेज़ पर रखी किताबों को देखा।
“कब से यही एक किताब खुली है?”
नूर ने किताब की तरफ़ देखा।
“अभी पढ़ ही रही थी।”
“अभी पढ़ ही रही थी…”
माँ ने उसकी बात दोहराई और फिर कुर्सी के पास खड़ी होकर बोलीं—
“नूर, इस बार ऐसे नहीं चलेगा।”
नूर चुप रही।
“तुम्हें पता है ना तुम्हारे पापा ने क्या कहा है?”
“पता है।”
“क्या पता है?”
नूर ने किताब बंद कर दी।
“कि इस बार qualify नहीं हुआ तो बहुत बड़ी समस्या हो जाएगी।”
माँ ने गहरी साँस ली।
“समस्या नहीं, तुम्हारे पापा ने साफ़ कहा है। इतनी पढ़ाई करवाई, इतनी सुविधाएँ दीं… अब अगर इस बार भी नहीं हुआ तो फिर वो तुम्हारी शादी की बात चलाएँगे।”
नूर ने कुछ नहीं कहा।
माँ ने थोड़ी नरमी से कहा—
“एक अच्छे घर का लड़का है। डॉक्टर है। तुम एक बार मिल तो लो उससे।”
नूर ने तुरंत सिर उठाया।
“डॉक्टर?”
माँ ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“हाँ, डॉक्टर।”
नूर ने कुर्सी पर पीछे टिकते हुए आँखें बंद कर लीं।
“माँ, प्लीज़…”
“क्या प्लीज़?”
“मुझे डॉक्टरों से वैसे ही नफ़रत है।”
माँ हँस पड़ीं।
“डॉक्टरों से किसे नफ़रत होती है?”
“मुझे।”
“और क्यों?”
नूर ने कुछ सोचकर कहा—
“एक तो डॉक्टर…”
उसने उँगलियाँ गिनने का नाटक किया।
“और दूसरा… लेक्चर।”
माँ हँसते हुए बोलीं—
“तुम्हें डॉक्टर से ज़्यादा लेक्चर से नफ़रत है।”
“दोनों एक ही पैकेज में मिलते हैं।”
माँ ने सिर हिलाया।
“बहुत बातें बनाती हो। पढ़ाई पर ध्यान दो। कल तुम्हारे पापा तुमसे बात करेंगे।”
इतना कहकर माँ कमरे से बाहर चली गईं।
दरवाज़ा बंद हुआ।
और कमरे में फिर वही ख़ामोशी लौट आई।
नूर कुछ देर तक दरवाज़े को देखती रही।
फिर धीरे से कुर्सी पर बैठ गई।
उसने किताब दोबारा खोली।
लेकिन इस बार भी अक्षर धुँधले ही लगे।
कुछ देर बाद उसका फ़ोन बजा।
स्क्रीन पर पापा का नाम था।
उसने फ़ोन उठाया।
एक तस्वीर थी।
एक लड़के की।
साथ में पापा का मैसेज—
“एक बार मिल लो। बाकी तुम्हारी मर्ज़ी।”
नूर तस्वीर को कुछ सेकंड देखती रही।
फिर फ़ोन मेज़ पर रख दिया।
दो सेकंड बाद फिर उठाया।
फोटो खोली।
फिर बंद कर दी।
“कमाल है…”
उसने धीमे से कहा।
“मेरा exam भी मैं दूँगी, शादी भी मेरी होगी… लेकिन फैसला सबका है।”
उसकी आँखों में आँसू नहीं थे।
बस थकान थी।
बहुत सारी।
इतनी कि रोने की ताकत भी शायद कहीं पीछे छूट गई थी।
उसने किताब बंद की।
फिर कमरे की घड़ी देखी।
2:03 AM.
घर में सब सो चुके थे।
नूर अपनी कुर्सी पर बैठी रही।
कुछ देर तक।
फिर अचानक उसने सामने रखी एक खाली कॉपी उठाई।
एक पन्ना खोला।
पेन हाथ में लिया।
कुछ लिखने से पहले काफी देर तक पन्ने को देखती रही।
फिर लिखना शुरू किया।
“परेशान मत होना।
मैं ठीक हूँ।
बस थोड़ी देर के लिए जा रही हूँ।
जल्दी वापस आ जाऊँगी।
मुझे नहीं पता कहाँ जा रही हूँ, क्यों जा रही हूँ… बस अभी यहाँ रहना मुश्किल लग रहा है।
परेशान मत होना।
जल्दी वापस आ जाऊँगी।
— नूर”
आख़िरी लाइन लिखने के बाद उसने पेन रख दिया।
कुछ पल वह उस पत्र को देखती रही।
फिर उसे मोड़कर मेज़ पर रख दिया।
उसने कमरे में एक बार चारों तरफ़ देखा।
वही किताबें।
वही मेज़।
वही दीवारें।
वही कमरा जिसमें उसने जाने कितनी रातें पढ़ते हुए बिताई थीं।
लेकिन आज पहली बार उसे ये कमरा अपना नहीं लग रहा था।
उसने अपना छोटा-सा बैग उठाया।
ज़रूरी सामान रखा।
और बिना किसी को जगाए घर से बाहर निकल गई।
बाहर रात ठंडी थी।
सड़क लगभग खाली थी।
नूर कुछ कदम चली।
फिर पीछे मुड़कर अपने घर की तरफ़ देखा।
उसके होंठ हिले।
“बस…”
उसने धीमे से कहा—
“यहाँ से भागना है।”
उसे खुद नहीं पता था कि वह कहाँ जाएगी।
किसके पास जाएगी।
कितनी दूर जाएगी।
या सुबह होने पर क्या करेगी।
उसे बस इतना पता था कि अभी उसे उस घर से, उस कमरे से, उन सवालों से… थोड़ी देर के लिए दूर जाना था।
वह स्टेशन की तरफ़ चल पड़ी।
रात के उस समय रेलवे स्टेशन भी लगभग वैसा ही था जैसे उसकी ज़िंदगी—
कुछ लोग अपनी मंज़िल के इंतज़ार में,
कुछ लोग लौटने के इंतज़ार में,
और कुछ…
बस कहीं जाने के लिए बैठे हुए।
नूर प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँची तो उसे पहली आने वाली ट्रेन दिखाई दी।
उसने कोई बोर्ड नहीं पढ़ा।
कोई टिकट नहीं देखा।
यह तक नहीं सोचा कि ट्रेन कहाँ जाएगी।
बस ट्रेन आई।
दरवाज़ा खुला।
और नूर चुपचाप उसमें जाकर बैठ गई।
खिड़की के पास।
बैग अपने पास रखकर।
सिर शीशे से टिकाकर।
ट्रेन चल पड़ी।
नूर बाहर देखती रही।
शहर पीछे छूटता जा रहा था।
और उसके साथ शायद उसका पुराना जीवन भी।
उसे नहीं पता था कि वह क्या कर रही है।
बस एक बात पता थी—
आज रात उसने पहली बार अपनी ज़िंदगी से भागने की नहीं…
अपनी ज़िंदगी को थोड़ी देर के लिए समझने की कोशिश की थी।
और उसे तब बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि इस ट्रेन में बैठकर…
वह जिस इंसान से मिलने वाली है,
वही आगे चलकर उसे वापस ज़िंदगी की तरफ़ देखने की वजह देगा।
2. सीट का चक्कर, सफ़र का टक्कर ....
नूर को ट्रेन में बैठे हुए अभी मुश्किल से दस-पंद्रह मिनट ही हुए थे।
वो खिड़की के पास बैठी बाहर देख रही थी।
उसे खुद नहीं पता था कि ट्रेन कहाँ जा रही थी।
बस जा रही थी।
और शायद इस वक़्त उसे भी बस यही चाहिए था—कहीं जाना।
कहाँ, क्यों और कितनी दूर… इन सवालों के जवाब उसके पास नहीं थे।
उसने अपना सिर खिड़की से टिकाया हुआ था।
तभी सामने से एक लड़का आता दिखाई दिया।
एक हाथ में भूरा-सा बैग था और दूसरे हाथ में टिकट।
साफ़-सुथरी शर्ट, अच्छी फिटिंग की जींस, बाल थोड़े बिखरे हुए लेकिन ऐसे जैसे उन्हें बिखरा हुआ ही रहने देना हो। जूते साफ़ थे और चेहरे पर एक अजीब-सी बेफ़िक्री।
वो उन लोगों में से था जिन्हें देखकर पहली नज़र में ही लगता है—
“हाँ, बंदा अपनी dressing को लेकर serious है।”
और अगर कोई उसे handsome कह दे, तो शायद गलत भी नहीं होगा।
वो अपनी सीट ढूँढते हुए नूर के पास आकर रुक गया।
उसने टिकट देखा।
फिर सीट नंबर देखा।
फिर नूर को।
“Excuse me…”
नूर ने नहीं सुना।
वो थोड़ी और बाहर देखने लगी।
लड़के ने दोबारा कहा—
“Excuse me…”
इस बार भी कोई जवाब नहीं।
उसने अपनी भौंहें ऊपर उठाईं।
“मैडम?”
नूर अब भी अपने ही ख़यालों में खोई हुई थी।
लड़का थोड़ा झुककर सीट की तरफ़ देखते हुए बोला—
“ये… मेरी सीट है।”
नूर ने जैसे सुना ही नहीं।
वो लड़का कुछ सेकंड उसे देखता रहा।
फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ खुद से बोला—
“अच्छा…”
उसने टिकट फिर देखा।
“आज तो बड़ी शांति से चोरी हो रही है।”
नूर को शायद कुछ सुनाई दिया।
उसने धीरे से उसकी तरफ़ देखा।
लड़के ने तुरंत कहा—
“हाँ, मैं आपसे ही बात कर रहा हूँ।”
नूर ने बिना कुछ कहे सीट को देखा।
फिर उसे।
फिर अपना बैग उठाया।
और चुपचाप उठकर बगल वाली सीट पर जाकर बैठ गई।
लड़का कुछ पल वहीं खड़ा रहा।
“इतना आसान?”
वो हल्का-सा हँसा।
“मैं तो सोच रहा था आज लड़ाई-वड़ाई होगी।”
नूर ने कोई जवाब नहीं दिया।
वो अपनी जगह बैठ गया और बैग नीचे रख दिया।
लेकिन शायद कहानी ने अभी उन्हें चैन से बैठने देने का फैसला नहीं किया था।
कुछ ही देर बाद एक आदमी लड़खड़ाते हुए उनकी तरफ़ आया।
शायद उसने शराब पी रखी थी। उसकी चाल ठीक नहीं थी और बोलने का तरीका भी कुछ ऐसा ही था।
उसने नूर की तरफ़ देखकर रूखे अंदाज़ में कहा—
“ए… उठो यहाँ से। मेरी सीट है।”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
उस आदमी की नज़र और बोलने का तरीका दोनों ही उसे असहज कर रहे थे।
नूर कुछ कह पाती, उससे पहले अक्शत खड़ा हो गया।
उसकी आवाज़ अब पहले वाली मज़ाकिया आवाज़ नहीं थी।
“सॉरी भाई।”
वो शांत लेकिन साफ़ आवाज़ में बोला—
“ये मेरे साथ हैं।”
आदमी ने उसे देखा।
“तो?”
अक्शत ने बिना बहस किए अपनी सीट की तरफ़ इशारा किया।
“आप अपनी सीट देख लीजिए। ये मेरे साथ बैठी हैं।”
उस आदमी ने कुछ बड़बड़ाया, फिर आगे चला गया।
अक्शत तब तक खड़ा रहा जब तक वो आगे नहीं बढ़ गया।
फिर उसने नूर की तरफ़ देखा।
“इधर आकर बैठो।”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
“मैं यहीं ठीक हूँ।”
“हाँ, लेकिन ये वाली सीट…”
उसने बगल की सीट की तरफ़ देखा।
“…थोड़ी unsafe लग रही है।”
नूर ने कुछ नहीं कहा।
अक्शत ने अपनी सीट पर थोड़ा सरकते हुए आधी जगह खाली कर दी।
“आ जाओ।”
नूर कुछ पल हिचकिचाई।
फिर आकर उसकी सीट के किनारे बैठ गई।
दोनों के बीच ठीक-ठाक दूरी थी।
अक्शत ने अपने बैग को नीचे रखा और आराम से बैठ गया।
और ट्रेन अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती रही।
नूर को नहीं पता था कि जिस सीट पर वो अभी-अभी आकर बैठी है…
वही सीट उसके सफ़र की दिशा बदलने वाली है।
3 चुप्पी का शोर, अक्षत का जोर....
कुछ सेकंड तक वो चुप रहा।
फिर नूर की तरफ़ देखकर बोला—
"ठीक है तो"
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
अक्शत ने बहुत गंभीर चेहरा बनाकर कहा—
“एक thank you तो deserve करता हूँ यार मैं।”
नूर ने कुछ नहीं कहा।
अक्शत ने इंतज़ार किया।
पाँच सेकंड।
दस सेकंड।
फिर बोला—
“मतलब सामने से कुछ जवाब नहीं आता?”
नूर चुप।
“एक छोटा-सा ‘thank you’ बोलने में क्या जा रहा है?”
फिर भी चुप।
अक्शत ने सिर हिलाया।
“ठीक है।”
वो खिड़की की तरफ़ देखने लगा।
“इतनी भी क्या अकड़ है…”
फिर दो सेकंड बाद उसकी नज़र नूर पर गई।
“या फिर…”
“यार, तुम गूंगी हो क्या?”
अक्शत ने सामने बैठी लड़की को देखते हुए कहा।
नूर ने कोई जवाब नहीं दिया।
वो बस खिड़की के बाहर देखती रही। ट्रेन अपनी रफ़्तार से चल रही थी और बाहर के पेड़, घर और बिजली के खंभे एक-दूसरे के पीछे भागते हुए से लग रहे थे।
अक्शत ने कुछ सेकंड उसे देखा, फिर अपनी सीट पर थोड़ा पीछे होते हुए बोला—
“हेलो?”
कोई जवाब नहीं।
“कुछ बोलो ना यार।”
उसने अपने मोबाइल को देखा और फिर स्क्रीन को ऊपर-नीचे करते हुए बड़बड़ाया—
“मेरा नेट भी नहीं चल रहा है। ऐसे तो मैं सच में पागल हो जाऊँगा।”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं।
अक्शत ने हल्की-सी हँसी के साथ कहा—
“अच्छा… ठीक है। लगता है परेशान हो।”
अक्शत ने दोबारा मोबाइल देखा। नेटवर्क अब भी गायब था।
“वैसे एक बात बताऊँ?”
नूर ने इस बार बस आँखों के कोने से उसकी तरफ़ देखा।
अक्शत तुरंत मुस्कुराया।
“कल इंडिया मैच जीत गयी।”
नूर फिर बाहर देखने लगी।
अक्शत का मुँह थोड़ा खुला रह गया।
“अरे…”
वो हँस पड़ा।
“कुछ तो बोलो! मैं इतनी देर से पटर-पटर बोले जा रहा हूँ और तुम हो कि ऐसे बैठी हो जैसे मैंने तुम्हारे ऊपर कोई भाषण चालू कर दिया हो।”
नूर ने कोई जवाब नहीं दिया।
अक्शत ने सिर पीछे सीट से टिकाया और नकली मायूसी में लंबी साँस ली।
“ठीक है भई। नहीं बात करनी तो मत करो।”
दो पल चुप रहा।
फिर अचानक उसकी आँखों में शरारत आ गई।
“ओओओ… बहन जी?”
नूर ने तुरंत उसकी तरफ़ देखा।
“ओए!”
अक्शत हँस पड़ा।
“किसको बहन जी बोला?”
“आपको।”
“मैं आंटी जी टाइप दिखती हूँ क्या?”
अक्शत ने अपनी हँसी रोकने की कोशिश की, लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान और फैल गई।
“नहीं तो।”
“तो फिर बहन जी क्यों?”
“बस… ऐसे ही मुँह से निकल गया।”
नूर ने आँखें छोटी करके उसे घूरा।
“बहुत अच्छे।”
अक्शत ने बिल्कुल गंभीर चेहरा बनाकर कहा—
“थैंक यू।”
नूर को उसकी शक्ल देखकर हँसी आ गई, लेकिन उसने तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ़ कर लिया।
अक्शत ने वो छोटी-सी मुस्कान देख ली।
“ओहो!”
नूर ने फिर उसकी तरफ़ देखा।
“क्या?”
“कुछ नहीं।”
“नहीं, बोलो।”
“कुछ नहीं, बस…”
अक्शत मुस्कुराते हुए बोला—
“मुझे लगा ये लड़की बोलना ही भूल गई है।”
नूर ने हल्की-सी हँसी के साथ कहा—
“तुम बहुत परेशान करते हो।”
“और तुम बहुत चुप रहती हो।”
“तो?”
“तो कुछ नहीं।”
अक्शत ने कंधे उचकाए।
“बैलेंस हो गया।”
नूर ने सिर हिलाया और फिर खिड़की की तरफ़ देखने लगी।
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर अक्शत ने अचानक पूछा—
“वैसे तुम्हारा नाम क्या है?”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
“क्यों?”
“अरे नाम तो पता होना चाहिए ना। इतनी देर से अकेले ही बातचीत कर रहा हूँ। कम से कम ये तो पता हो कि किससे कर रहा हूँ।”
नूर ने कुछ पल उसे देखा।
फिर धीरे से बोली—
“नूर।”
अक्शत ने मुस्कुराकर कहा—
“नूर?”
“हम्म।”
“अच्छा नाम है।”
नूर ने कुछ नहीं कहा।
फिर उसने पूछा—
“और तुम्हारा?”
अक्शत ने थोड़ा सीधा होकर कहा—
“अक्शत।”
नूर ने सिर हिलाया।
“हम्म।”
अक्शत ने भौंहें उठाईं।
“बस?”
“क्या?”
“मैंने नाम बताया। थोड़ा reaction तो बनता है।”
नूर ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“अच्छा नाम है।”
अक्शत ने तुरंत कहा—
“कॉपी कर रही हो।”
“क्या?”
“मैंने भी तुम्हें यही बोला था।”
नूर ने पहली बार उसकी तरफ़ देखकर थोड़ा मुस्कुराया।
“तो?”
“तो कुछ नहीं। हिसाब बराबर।”
नूर ने सिर हिलाया और फिर खिड़की की तरफ़ देखने लगी।
कुछ पल दोनों चुप रहे।
लेकिन इस बार नूर की ख़ामोशी वैसी नहीं थी जैसी पहले थी।
अक्शत ने उसे दोबारा देखा।
इस बार उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी थी।
“वैसे… ठीक हो?”
नूर ने बाहर देखते हुए कहा—
“हाँ।”
अक्शत ने कुछ नहीं कहा।
बस हल्का-सा मुस्कुराया।
“झूठ।”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
“तुम्हें कैसे पता?”
अक्शत ने खिड़की के बाहर देखा और कंधे उचकाकर बोला—
“पता नहीं।”
फिर उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुराया।
“बस लगा।”
नूर कुछ नहीं बोली।
अक्शत ने भी उसे दोबारा परेशान नहीं किया।
बस दोनों कुछ देर चुपचाप बैठे रहे।
ट्रेन अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती रही।
और शायद…
यहीं से कहानी शुरू हुई थी।
नूर को तब क्या पता था कि सामने बैठा ये लड़का उसकी ज़िंदगी में कितनी दूर तक जाने वाला है।
और अक्शत को भी कहाँ मालूम था कि जिस लड़की से वो सिर्फ़ अपना समय काटने के लिए बात कर रहा था…
वही लड़की एक दिन उसकी कहानी का सबसे ज़रूरी हिस्सा बन जाएगी।
शायद इसलिए कुछ मुलाक़ातों की शुरुआत हमें कभी समझ नहीं आती।
उनका मतलब बहुत बाद में समझ आता है।
4. सुकून की चाह, बनारस की राह.....
ट्रेन अब पहले से कहीं ज़्यादा शांत थी।
अक्शत कब अपनी सीट से टिककर सो गया, उसे खुद भी पता नहीं चला।
नूर अब भी खिड़की के बाहर देख रही थी।
कभी अंधेरा दिखाई देता, कभी किसी छोटे-से स्टेशन की कुछ पीली बत्तियाँ, और फिर सब कुछ दोबारा अंधेरे में खो जाता।
अक्शत की आँखों पर नींद पूरी तरह हावी हो चुकी थी।
तभी अचानक किसी के तेज़ बोलने की आवाज़ से उसकी नींद खुली।
“मैडम, टिकट?”
अक्शत ने आधी खुली आँखों से सामने देखा।
एक आदमी खड़ा था—काला कोट, सफ़ेद शर्ट और काली पैंट। हाथ में टिकट चेक करने वाली मशीन थी।
टीटी।
वो नूर से कुछ पूछ रहा था।
अक्शत अभी भी आधी नींद में था, लेकिन ध्यान से सुनने पर उसे समझ आया कि टीटी नूर से टिकट माँग रहा है।
वो तुरंत सीधा होकर बैठ गया।
“भाई साहब…”
टीटी ने उसकी तरफ़ देखा।
अक्शत ने आँखें मलते हुए कहा—
“इनको जल्दी जाना था, इसीलिए टिकट नहीं हो पाई।”
टीटी ने नूर की तरफ़ देखा, फिर अक्शत की तरफ़।
अक्शत ने बड़ी मासूमियत से कहा—
“आप एक काम करिए ना… इनका टिकट बना दीजिए।”
टीटी ने दोनों को कुछ अजीब-सी नज़र से देखा।
फिर नूर से बोला—
“बताइए मैडम, कहाँ का टिकट बनाऊँ?”
नूर चुप।
उसने अक्शत की तरफ़ देखा।
अक्शत ने धीरे से कहा—
“बोलो फिर।”
नूर ने उसे घूरा।
फिर धीमी आवाज़ में पूछा—
“तुम कहाँ जा रहे हो?”
अक्शत ने अपनी तरफ़ इशारा किया।
“मैं?”
फिर थोड़ी देर सोचने का नाटक किया।
“वैसे तो मैं फ़कीर आदमी हूँ।”
नूर ने भौंहें चढ़ाईं।
अक्शत ने आगे कहा—
“कभी यहाँ, कभी वहाँ… कोई एक बसेरा नहीं है।”
टीटी अब दोनों को ऐसे देख रहा था जैसे उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वो ट्रेन में टिकट चेक कर रहा है या किसी कहानी का हिस्सा बन गया है।
अक्शत ने आखिरकार कहा—
“लेकिन अभी तो अपने बाबा के घर जा रहा हूँ।”
नूर ने उसे कुछ सेकंड देखा।
फिर एक हल्की-सी नज़र दी।
अक्शत समझ गया।
“अरे…”
उसने मुस्कुराते हुए कहा—
“बनारस।”
नूर ने तुरंत टीटी की तरफ़ देखा।
“हाँ, बनारस का टिकट बना दीजिए।”
अक्शत एकदम उसकी तरफ़ मुड़ा।
“क्या?”
नूर ने बिल्कुल सामान्य चेहरा बनाए रखा।
“क्या?”
“तुम… बनारस जा रही हो?”
“अब जा रही हूँ।”
अक्शत कुछ सेकंड उसे देखता रहा।
फिर हल्का-सा मुस्कुराया।
“अच्छा…”
टीटी ने टिकट बनाना शुरू कर दिया।
कुछ देर बाद उसने टिकट नूर की तरफ़ बढ़ाया।
“पाँच हज़ार।”
नूर ने बिना कुछ कहे अपना बैग खोला।
उसमें से पैसे निकाले और टीटी को दे दिए।
अक्शत उसे देखता रह गया।
उसके चेहरे पर अब नींद का नामोनिशान नहीं था।
नूर ने पैसे दिए, टिकट लिया और वापस अपनी सीट पर बैठ गई।
अक्शत अभी भी उसे देख रहा था।
“तुम सच में बनारस जा रही हो?”
नूर ने टिकट को हाथ में देखते हुए बस इतना कहा—
“हम्म।”
टीटी के जाने के बाद अक्शत कुछ देर तक नूर को देखता रहा।
उसके मन में अब एक ही सवाल घूम रहा था—
आख़िर ये लड़की जा कहाँ रही थी?
और क्यों?
अक्शत वैसे भी मस्ती से भरा हुआ लड़का था। उसे लोगों से बातें करना, उन्हें परेशान करना और हर छोटी चीज़ में कोई न कोई मज़ेदार बात ढूँढ़ लेना आता था।
लेकिन आज…
साक्षात् भगवान ने जैसे उसके सामने वही लड़की लाकर खड़ी कर दी थी, जिसकी कल्पना वो कभी-कभी किया करता था।
दूध जैसी गोरी कलाइयाँ, जिनमें काली चूड़ियाँ बेहद खूबसूरत लग रही थीं। घने काले बाल, जैसे मानो रेशम के अनगिनत धागों को किसी ने हवा में लहरा दिया हो। गुलाबी होंठ, गालों पर हल्की-सी लाली और माथे पर लगी छोटी-सी काली बिंदी।
अक्शत ने कभी सोचा था कि अगर कभी कोई लड़की उसकी कल्पना जैसी हुई…
तो शायद कुछ ऐसी ही होगी।
और आज वही लड़की उसके सामने बैठी थी।
वो भी उसके साथ बनारस जा रही थी।
अक्शत ने आखिरकार अपनी जिज्ञासा को रोक नहीं पाया।
“तो अब तुम मुझे ये तो बताओगी ही कि बनारस क्यों जा रही हो?”
नूर कुछ पल खिड़की के बाहर देखती रही।
फिर बहुत धीमी, उदासी से भरी आवाज़ में बोली—
“नहीं पता यार।”
अक्शत ने उसकी तरफ़ देखा।
“क्या नहीं पता?”
“बस… नहीं पता।”
अक्शत ने तुरंत मुस्कुराकर कहा—
“इसका मतलब तुम मेरे साथ चल रही हो, है ना?”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
“मैं तुम्हारे साथ क्यों जाऊँगी?”
“तो?”
“तुम अपने रास्ते… मैं अपने रास्ते।”
अक्शत ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए।
“अरे बाबा, ठीक है। हाइपर मत हो।”
नूर फिर खिड़की की तरफ़ देखने लगी।
कुछ देर तक दोनों चुप रहे।
फिर नूर ने थोड़ा-सा मुँह बनाया और आखिरकार पूछ ही लिया—
“अच्छा… वैसे तुम बनारस क्यों जा रहे हो?”
अक्शत का चेहरा एकदम खिल उठा।
“हे भगवान!”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
“क्या हुआ?”
“Finally!”
वो थोड़ा आगे झुककर बोला—
“सामने से कोई सवाल तो आया!”
नूर ने उसे अजीब-सी नज़र से देखा।
अक्शत ने हँसते हुए कहा—
“तुम्हें पता है, मैं इतनी देर से प्रार्थना कर रहा था कि प्लीज़ यार… कोई मुझसे बात कर ले।”
नूर ने उसे ऐसे देखा जैसे वो अभी-अभी किसी पागलखाने से छूटकर आया हो।
अक्शत हँस पड़ा।
फिर कुछ पल बाद उसकी आवाज़ थोड़ी शांत हो गई।
“यार… लाइफ़ में ना बहुत भीड़-भाड़ हो गई है।”
नूर चुपचाप सुनती रही।
“मुझे सुकून चाहिए। इसीलिए बस चला आया… शिव के पास। अपनी माँ गंगा के पास।”
नूर ने धीरे से पूछा—
“सुकून?”
“हाँ यार।”
अक्शत ने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा—
“मैं शोर से ना पक चुका हूँ। हर तरफ़ बस कुछ न कुछ चल रहा है।”
वो कुछ पल रुका।
“मुझे यक़ीन है कि वहाँ जाकर मेरी सारी परेशानियाँ दूर हो जाएँगी।”
फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ बोला—
“कुछ पल के लिए ही सही।”
नूर ने पहली बार उसे थोड़ी गंभीरता से देखा।
“अच्छा… तो तुम किस चीज़ से परेशान हो?”
अक्शत ने उसकी तरफ़ देखा।
“हाँ, सब कुछ मैं ही पहले बताऊँ?”
“तुम बताना नहीं चाहते तो मत बताओ।”
“अरे यार, बताता हूँ ना।”
अक्शत ने एक लंबी साँस ली।
“तो बात ऐसी है कि…”
वो कुछ पल चुप रहा।
“मैं कहानियाँ और नॉवेल्स लिखता हूँ।”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
अक्शत ने आगे कहा—
“अब तक तीन नॉवेल लिख चुका हूँ। लेकिन मेरी जो हाल ही में वाली नॉवेल आई थी ना…”
उसने हल्की-सी हँसी के साथ सिर हिलाया।
“वो फ्लॉप हो गई।”
नूर कुछ नहीं बोली।
“और उसके बाद सारा कुछ बड़ा बिगड़ गया यार। प्रोड्यूसर्स का प्रेशर, पैसे का प्रेशर… ऊपर से सबकी उम्मीदें।”
उसने खिड़की के बाहर देखा।
“तो बस… चला आया अपने बाबा के पास।”
कुछ पल फिर ख़ामोशी रही।
अक्शत ने नूर की तरफ़ देखा।
इस बार उसकी आवाज़ में हल्की शरारत वापस आ गई।
अब तुम बताओ??
5. किस्सा मेरा , हिस्सा तेरा....
नूर कुछ पल चुप रही।
उसकी नज़र खिड़की के बाहर थी, लेकिन शायद उसका ध्यान कहीं और था।
बाहर अँधेरा गहरा होता जा रहा था। कभी किसी छोटे-से स्टेशन की पीली रोशनी दिखाई देती और अगले ही पल पीछे छूट जाती।
नूर ने धीरे से कहा—
“मेरी?”
“हाँ, तुम्हारी।”
अक्शत मुस्कुराया।
“इतनी देर से मैं अपनी कहानी सुना रहा हूँ। अब हिसाब बराबर होना चाहिए।”
नूर हल्का-सा मुस्कुराई।
“मेरी कोई कहानी नहीं है।”
अक्शत ने तुरंत उसकी तरफ़ देखा।
“ये सबसे बड़ा झूठ है।”
“क्यों?”
“क्योंकि हर इंसान की कहानी होती है।”
वो कुछ पल रुका।
“बस फर्क इतना है कि कुछ लोग अपनी कहानी लिखते हैं… और कुछ लोग दूसरों को लिखने देते हैं।”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
“तुम हर बात को कहानी बना देते हो क्या?”
“पेशा ही ऐसा है।”
वो हँसा।
“मैं कहानियाँ लिखता हूँ, मैडम। आदत है।”
नूर फिर बाहर देखने लगी।
“कुछ कहानियाँ सुनाने लायक नहीं होतीं।”
अक्शत का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया।
“तो मत सुनाओ पूरी।”
वो धीमे से बोला—
“कहानी सुनाने के लिए पूरी किताब खोलना ज़रूरी नहीं होता। कभी-कभी एक पन्ना भी बता देता है कि किताब किस बारे में है।”
नूर कुछ पल उसे देखती रही।
फिर उसने लंबी साँस ली।
“मैं बहुत साधारण-सी लड़की हूँ, अक्शत।”
“ये तो मैं पहले ही समझ गया था।”
“कैसे?”
“क्योंकि असाधारण लोग इतनी शांति से मेरी बक-बक नहीं सुनते।”
नूर के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
“तुम्हें हर बात में मज़ाक करना ज़रूरी लगता है?”
“नहीं।”
अक्शत ने कहा—
“लेकिन तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान लाना ज़रूरी लगता है।”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
कुछ कहने वाली थी, फिर चुप हो गई।
“ख़ैर…”
उसने बात बदलते हुए कहा—
“मेरी ज़िंदगी बहुत सामान्य थी। घर, पढ़ाई, दोस्त… वही रोज़ की भागदौड़।”
“और?”
“और कुछ नहीं।”
“कुछ तो होगा।”
नूर ने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा—
“सबको लगता था मैं बहुत खुश हूँ।”
अक्शत चुप हो गया।
“मैं हँसती थी, बातें करती थी, दोस्तों के साथ घूमती थी… घर में भी सबके सामने ठीक रहती थी।”
वो कुछ पल रुकी।
“लेकिन शायद इंसान जितना बाहर से दिखाई देता है, उतना होता नहीं है।”
अक्शत ने धीरे से कहा—
“कहानी भी तो ऐसी ही होती है।”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
“कहानी का पहला पन्ना देखकर कोई आख़िरी पन्ना नहीं समझ सकता।”
“इंसान भी वैसा ही है।”
नूर कुछ नहीं बोली।
वो आगे कहती रही—
“मेरे साथ ऐसा नहीं था कि एक दिन में कुछ बहुत बड़ा हो गया।”
“बस…”
उसकी आवाज़ धीमी हो गई।
“छोटी-छोटी चीज़ें जमा होती गईं।”
अक्शत ने सिर हिलाया।
“ज़िंदगी की सबसे भारी चीज़ें हमेशा बड़ी नहीं होतीं।”
“कभी-कभी छोटी-छोटी बातें ही इतनी जमा हो जाती हैं कि इंसान को पता भी नहीं चलता और वो भीतर से थक चुका होता है।”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
फिर बोली—
“कभी पढ़ाई का दबाव। कभी घरवालों की उम्मीदें। कभी रिश्तेदारों के सवाल।”
उसने हल्की हँसी हँसने की कोशिश की।
“और रिश्तेदारों के सवाल तो ऐसे होते हैं ना… जैसे उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मक़सद ही तुम्हारी ज़िंदगी का हिसाब लेना हो।”
अक्शत हँस पड़ा।
“ये बात तो सही है।”
नूर भी मुस्कुराई।
“फिर धीरे-धीरे हर बात में तुलना होने लगी।”
“उसकी बेटी ने ये कर लिया…”
“उसका बेटा वहाँ पहुँच गया…”
“तुम कब करोगी?”
“तुम्हारा आगे का क्या सोचा है?”
नूर की आवाज़ में अब थकान साफ़ सुनाई दे रही थी।
“सबको पता था कि मुझे क्या करना चाहिए…”
वो कुछ पल रुकी।
“बस मुझे छोड़कर।”
अक्शत ने उसकी तरफ़ देखा।
“शायद यही सबसे मुश्किल चीज़ होती है।”
“क्या?”
“जब पूरी दुनिया तुम्हारे लिए रास्ता चुन ले…”
वो खिड़की के बाहर देखने लगा।
“और तुम्हें अपना रास्ता दिखाई ही न दे।”
नूर चुप रही।
“लेकिन एक बात याद रखना।”
अक्शत ने उसकी तरफ़ देखा।
“रास्ता न दिखना और रास्ता न होना… दोनों अलग बातें हैं।”
नूर ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।
अक्शत फिर हल्का-सा मुस्कुराया।
“कभी-कभी धुंध होती है। सड़क वहीं होती है, बस दिखाई नहीं देती।”
नूर ने धीमे से पूछा—
“तुम्हें ये सब इतना कैसे पता?”
अक्शत हँसा।
“मैं लेखक हूँ।”
“हर चीज़ खुद थोड़ी जीनी पड़ती है।”
“कुछ चीज़ें दूसरों को देखकर भी समझ आ जाती हैं।”
कुछ पल ख़ामोशी रही।
फिर नूर बोली—
“मुझे खुद नहीं पता था कि मैं क्या चाहती हूँ।”
“जब कोई पूछता था कि पाँच साल बाद खुद को कहाँ देखती हो… तो मेरे पास कोई जवाब नहीं होता था।”
अक्शत ने कहा—
“पाँच साल बाद की चिंता में लोग कभी-कभी आज के पाँच मिनट भी खो देते हैं।”
“ज़िंदगी का अजीब हिसाब है ना?”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
“हम भविष्य के लिए जीना शुरू करते हैं…”
वो मुस्कुराया।
“और फिर एक दिन समझ आता है कि भविष्य आया ही नहीं। हर बार आज बनकर आया।”
नूर के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई।
“तुम्हारी बातें कभी-कभी अच्छी होती हैं।”
“कभी-कभी?”
“ज़्यादा उड़ो मत।”
“ठीक है।”
अक्शत ने हाथ जोड़ने का नाटक किया।
“आगे से सिर्फ़ बेकार बातें करूँगा।”
नूर हँस दी।
फिर उसकी हँसी धीरे-धीरे थम गई।
“फिर एक दिन लगा कि मैं थक गई हूँ।”
“बहुत ज़्यादा।”
अक्शत ने पूछा—
“किससे?”
नूर ने कुछ पल सोचा।
“हर चीज़ से।”
“लोगों से नहीं… शायद उनकी उम्मीदों से।”
“हर समय अच्छा करना है।”
“हर समय सही होना है।”
“हर समय मुस्कुराना है।”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
“और अगर एक दिन मन नहीं करे…”
वो रुक गई।
अक्शत ने उसे बीच में नहीं टोका।
नूर ने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा—
“तो लोग पूछते हैं—क्या हुआ?”
“और जब बताने की कोशिश करो…”
उसने हल्की-सी हँसी हँसी।
“तो कहते हैं—इतनी-सी बात?”
अक्शत ने धीरे से कहा—
“लोग अक्सर दर्द की गहराई उसकी वजह से नापते हैं।”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
“लेकिन दर्द का कोई पैमाना नहीं होता।”
कुछ पल दोनों चुप रहे।
ट्रेन की आवाज़ उस ख़ामोशी को भर रही थी।
छुक… छुक…
नूर ने अपने हाथों को देखा।
काली चूड़ियाँ हल्के से खनकीं।
“कल रात तक मुझे भी नहीं पता था कि मैं यहाँ बैठी होऊँगी।”
“तो फिर?”
अक्शत ने पूछा।
“बस…”
नूर ने खिड़की के शीशे पर उँगली फिराते हुए कहा—
“एक वक़्त पर लगा कि अगर अभी थोड़ी देर के लिए भी यहाँ से दूर नहीं गई… तो शायद मैं खुद को और नहीं संभाल पाऊँगी।”
अक्शत ने कुछ नहीं कहा।
नूर आगे बोली—
“इसलिए निकल आई।”
“कहाँ जाना है?”
“नहीं पता।”
“क्यों जाना है?”
“वो भी नहीं पता।”
अक्शत ने कुछ पल उसे देखा।
फिर बोला—
“शायद हर सफ़र की शुरुआत मंज़िल जानकर नहीं होती।”
“कभी-कभी बस इतना पता होता है कि जहाँ खड़े हो, वहाँ से एक कदम आगे बढ़ना है।”
नूर चुप रही।
“तो बनारस?”
अक्शत ने पूछा।
नूर ने कंधे उचकाए।
“बस नाम याद आया।”
“बस?”
“हाँ।”
अक्शत ने हैरानी से कहा—
“वाह। लड़की भी random, destination भी random।”
नूर ने उसे घूरा।
“तुम फिर शुरू हो गए।”
“अरे मैं तो बस facts बता रहा हूँ।”
नूर के चेहरे पर फिर हल्की मुस्कान आ गई।
अक्शत ने उसे मुस्कुराते देखा।
फिर कुछ पल बाद पूछा—
“तुम्हें बनारस के बारे में कुछ पता भी है?”
“ज़्यादा नहीं।”
“फिर वहाँ जाकर करोगी क्या?”
“पता नहीं।”
“रहोगी कहाँ?”
“पता नहीं।”
“वापस कब आओगी?”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
“पता नहीं।”
अक्शत ने दोनों हाथ सिर पर रख लिए।
“हे भगवान…”
नूर हँस पड़ी।
“क्या हुआ?”
“तुम्हारी ज़िंदगी में एक ही चीज़ पक्की है।”
“क्या?”
“तुम्हें कुछ पता नहीं है।”
“बहुत मज़ाक उड़ाओ।”
“नहीं, नहीं।”
अक्शत हँसते हुए बोला—
“बस कह रहा हूँ।”
फिर उसकी आवाज़ नरम हो गई।
“लेकिन कोई बात नहीं।”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
“हर चीज़ का जवाब उसी दिन मिलना ज़रूरी नहीं होता।”
“कभी-कभी सवालों के साथ भी कुछ दूर चलना पड़ता है।”
“शायद रास्ते में ही जवाब मिल जाए।”
नूर कुछ देर उसे देखती रही।
“अक्शत…”
“हम्म?”
“तुम हमेशा ऐसे ही बोलते हो?”
अक्शत मुस्कुराया।
“नहीं।”
“फिर?”
“जब कोई सुनने वाला मिल जाए, तभी।”
नूर हल्का-सा मुस्कुराई।
फिर खिड़की के बाहर देखने लगी।
“मुझे नहीं पता मैं कहाँ जा रही हूँ।”
उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।
“लेकिन शायद पहली बार मुझे ये भी नहीं चाहिए कि कोई मुझे बताए कि मुझे कहाँ जाना चाहिए।”
अक्शत ने उसकी तरफ़ देखा।
इस बार उसने कोई सवाल नहीं किया।
बस इतना कहा—
“ठीक है।”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
“बस?”
“हाँ। बस।”
“कुछ पूछोगे नहीं?”
अक्शत ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
फिर मुस्कुराकर बोला—
“कभी-कभी किसी की कहानी सुनने के लिए उसके हर पन्ने का हिसाब लेना ज़रूरी नहीं होता।”
“कुछ पन्ने खुद खुलते हैं।”
नूर ने कुछ नहीं कहा।
ट्रेन अँधेरे को चीरती हुई आगे बढ़ती रही।
और उस रात, दो अजनबियों के बीच सिर्फ़ बातें नहीं हो रही थीं।
एक अपनी कहानी सुना रही थी…
और दूसरा शायद पहली बार किसी कहानी को लिखने के बजाय जी रहा था।
6. एक इशारा , नया किनारा....
शायद उन्हें भी पता नहीं चला था कि कब वो दोनों अजनबियों से दोस्त बन चुके थे।
शायद दोस्ती का कोई एक पल नहीं होता।
कोई तारीख़ नहीं होती।
बस बातें होती रहती हैं…
और एक दिन अचानक एहसास होता है कि सामने बैठा इंसान, जिससे कुछ घंटों पहले तक अपना नाम बताने में भी झिझक हो रही थी, अब उसकी बातें सुनना अच्छा लगने लगा है।
नूर और अक्शत के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।
अब उनकी बातें सिर्फ़ एक-दूसरे के बारे में नहीं होती थीं।
वो ज़िंदगी के बारे में बात करते थे।
कभी सपनों के बारे में।
कभी लोगों के बारे में।
कभी उन चीज़ों के बारे में जिनका कोई जवाब उनके पास खुद नहीं था।
और कभी-कभी तो ऐसी बेवकूफ़ी की बातें करते कि दोनों को खुद समझ नहीं आता था कि हँसी किस बात पर आ रही है।
अक्शत को बनारस के बारे में बात करना बहुत पसंद था।
वो वहाँ की गलियों की बातें करता।
घाटों की बातें करता।
गंगा की बातें करता।
और महादेव की बातें करते हुए उसकी आवाज़ में एक अलग ही सुकून आ जाता था।
“तुम्हें पता है नूर,” उसने एक बार कहा, “बनारस को समझना आसान नहीं है।”
नूर ने पूछा, “क्यों?”
“क्योंकि वहाँ ज़िंदगी और मौत दोनों साथ रहती हैं।”
नूर कुछ पल चुप रही।
“डरावना नहीं लगता?”
अक्शत ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि शायद बनारस यही सिखाता है कि अंत से डरने से बेहतर है कि शुरुआत को ठीक से जिया जाए।”
नूर उसकी तरफ़ देखने लगी।
अक्शत ने मुस्कुराकर कहा—
“ज़िंदगी वैसे भी बहुत छोटी है। हम उसे समझने में आधी और दूसरों को समझाने में आधी निकाल देते हैं।”
“और जीते कब हैं?”
नूर ने पूछा।
अक्शत कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—
“शायद जब हमें समझाना बंद हो जाता है कि हमें कैसे जीना चाहिए।”
ये बात नूर के मन में कहीं अटक गई।
क्योंकि शायद उसकी पूरी परेशानी भी तो यही थी।
सब उसे बता रहे थे कि उसे क्या करना चाहिए।
किस रास्ते पर चलना चाहिए।
क्या बनना चाहिए।
कैसा होना चाहिए।
लेकिन किसी ने ये नहीं पूछा था कि वो चाहती क्या है।
उनकी बातें गंगा तक भी पहुँचती थीं।
अक्शत कहता—
“गंगा को देखना और गंगा को समझना दो अलग बातें हैं।”
नूर पूछती—
“तुम समझते हो?”
“बिल्कुल नहीं।”
वो हँस देता।
“लेकिन हर बार वहाँ जाकर लगता है कि शायद इस बार समझ जाऊँगा।”
“और अगर फिर भी नहीं समझे?”
“तो अगली बार फिर चला जाऊँगा।”
“इतना आसान है?”
“नहीं।”
अक्शत ने बाहर देखते हुए कहा—
“लेकिन शायद कुछ जगहें जवाब देने के लिए नहीं होतीं।”
“फिर?”
“बस सवालों के साथ बैठना सिखाती हैं।”
नूर चुप हो गई।
शायद उसे पहली बार लगा कि उसे भी जवाबों की नहीं…
थोड़ी देर अपने सवालों के साथ बैठने की ज़रूरत है।
उन्होंने मौत के बारे में भी बात की।
बहुत सहजता से।
जैसे मौत कोई डरावना शब्द नहीं, बल्कि ज़िंदगी की किताब का आख़िरी अध्याय हो।
नूर ने पूछा—
“तुम्हें मौत से डर लगता है?”
अक्शत कुछ देर खिड़की के बाहर देखता रहा।
“मौत से कम।”
“तो किससे?”
वो धीरे से बोला—
“इससे कि कहीं इंसान जीते-जी ही जीना भूल न जाए।”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
इस बार उसके पास कोई जवाब नहीं था।
क्योंकि शायद वो खुद भी तो यही कर रही थी।
वो ज़िंदा थी…
लेकिन अपनी ज़िंदगी से दूर होती जा रही थी।
और शायद इसी सफ़र में पहली बार उसके अंदर एक छोटी-सी उम्मीद जगी थी।
उसे लगने लगा था कि शायद बनारस में उसे कुछ मिलेगा।
शायद कोई जवाब।
शायद कोई वजह।
शायद कोई सुकून।
या शायद…
वो खुद।
उसे नहीं पता था कि वो वहाँ क्या ढूँढने जा रही है।
लेकिन इस बार उसे अपने “पता नहीं” से डर नहीं लग रहा था।
क्योंकि पहली बार उसे लगा था कि शायद हर चीज़ पहले से जानना ज़रूरी नहीं होता।
कभी-कभी बस चल पड़ना भी काफ़ी होता है।
कुछ देर बाद ट्रेन की रफ़्तार धीमी होने लगी।
अक्शत ने खिड़की से बाहर देखा।
उसके चेहरे पर अचानक वही मुस्कान आ गई जो नूर ने उसकी बातों में बनारस का नाम लेते हुए कई बार देखी थी।
“लो।”
नूर ने पूछा—
“क्या?”
अक्शत ने बाहर की तरफ़ इशारा किया।
“आ गए।”
नूर ने खिड़की से बाहर देखा।
स्टेशन की रोशनियाँ दिखाई दे रही थीं।
अक्शत ने धीरे से कहा—
“काशी।”
फिर मुस्कुराया।
“देवों के देव महादेव के पास।”
ट्रेन रुक गई।
दोनों ने अपना सामान उठाया और नीचे उतर गए।
स्टेशन पर लोगों की भीड़ थी।
हर तरफ़ आवाज़ें थीं।
किसी को जल्दी थी।
किसी को किसी का इंतज़ार था।
और उन सबके बीच नूर और अक्शत कुछ देर साथ चलते रहे।
फिर अक्शत अचानक रुक गया।
“अच्छा नूर…”
“हम्म?”
“मेरा रास्ता इधर है।”
नूर ने सिर हिलाया।
“ठीक है।”
“ख़याल रखना।”
“तुम भी।”
अक्शत मुस्कुराया और आगे बढ़ गया।
एक कदम।
फिर दूसरा।
फिर कुछ और।
बाहर से वो बिल्कुल सामान्य था।
लेकिन अंदर से उसके मन में बस एक ही दुआ थी—
“हे शिव जी… बस एक बार।”
“बस एक बार नूर पीछे से आवाज़ दे दे।”
वो चलता रहा।
और तभी—
“रुक्क्को!”
अक्शत के कदम वहीं रुक गए।
उसने आँखें बंद करके एक छोटी-सी साँस ली।
शायद उसकी दुआ सुन ली गई थी।
वो पीछे मुड़ा।
नूर अपना बैग संभालती हुई उसकी तरफ़ भाग रही थी।
वो उसके पास आकर कुछ पल साँस लेने लगी।
अक्शत ने पूछा—
“क्या हुआ?”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
इस बार उसकी आँखों में थकान से ज़्यादा उम्मीद थी।
“यार…”
“हम्म?”
“मुझे भी ले चलो ना।”
अक्शत कुछ पल उसे देखता रहा।
“कहाँ?”
“जहाँ तुम जा रहे हो।”
वो थोड़ी देर चुप रही।
फिर बोली—
“जहाँ शायद मेरे सारे सवालों के जवाब मिल जाएँ।”
“जहाँ शायद वो चीज़ मिल जाए जिसे मैं इतने समय से ढूँढ रही हूँ।”
अक्शत के अंदर जैसे किसी ने अचानक दीया जला दिया।
लेकिन चेहरे पर वही पुरानी बेफ़िक्री थी।
उसने अपना बैग कंधे पर ठीक किया और मुस्कुराकर कहा—
“तो फिर…”
“गाड़ी की पेटी बाँध लीजिए।”
नूर ने आँखें सिकोड़कर पूछा—
“क्यों?”
अक्शत आगे बढ़ते हुए बोला—
“सफ़र लंबा होने वाला है।”
नूर उसके पीछे चल दी।
दोनों स्टेशन से बाहर निकल गए।
और शायद उन्हें उस वक़्त पता भी नहीं था कि वो सिर्फ़ बनारस की गलियों की तरफ़ नहीं जा रहे थे।
वो दोनों अपनी-अपनी ज़िंदगी के उस हिस्से की तरफ़ बढ़ रहे थे…
जिसका उन्हें अभी कोई अंदाज़ा भी नहीं था।
क्योंकि कुछ सफ़र मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं होते।
कुछ सफ़र हमें वो दिखाने के लिए होते हैं…
जो हम अपनी जगह खड़े होकर कभी देख ही नहीं पाते।
और शायद नूर को अभी ये पता नहीं था कि वो बनारस में क्या ढूँढने आई थी।
शायद उसे सुकून चाहिए था।
शायद जवाब।
शायद एक नई शुरुआत।
या शायद सिर्फ़ एक ऐसी जगह…
जहाँ कोई उससे ये न पूछे—
“तुम्हें आगे क्या करना है?”
लेकिन क्या बनारस सच में उसके सवालों का जवाब दे पाएगा?
क्या नूर को वहाँ वो मिलेगा जिसे वो इतने समय से ढूँढ रही थी?
क्या वो कभी अपने घर वापस जाएगी?
और अगर जाएगी…
तो क्या वही नूर बनकर लौटेगी जो घर से निकली थी?
या रास्ते में कुछ ऐसा बदल जाएगा कि घर वही होगा…
लेकिन नूर वैसी नहीं रहेगी?
और अक्शत?
वो नूर को अपने साथ लेकर आख़िर कहाँ जा रहा था?
क्या वो सिर्फ़ उसे बनारस दिखाना चाहता था…
या उसके अपने सफ़र में भी कोई ऐसा राज़ था जिसे उसने अभी तक नूर से छुपा रखा था?
क्या दो अजनबियों की ये दोस्ती सच में सिर्फ़ एक सफ़र तक रहने वाली थी?
या ये मुलाक़ात उनकी ज़िंदगी का कोई ऐसा मोड़ बनने वाली थी…
जिसके बारे में उन्हें अभी कुछ भी नहीं पता था?
शायद कुछ सवालों के जवाब रास्ते में मिलते हैं।
और कुछ जवाब…
रास्ते ही बदल देते हैं।
उस रात बनारस पहुँचकर नूर को क्या मिला—ये तो वक़्त ही बताने वाला था।
क्योंकि कहानी का पहला हिस्सा ख़त्म हुआ था…
लेकिन उनका सफ़र नहीं।
भाग 1 - समाप्त।
एक इशारा हुआ था।एक नया किनारा सामने था।और शायद… कहानी अभी शुरू ही हुई थी।
* लेखक की ओर से .....
इस कहानी को यहाँ तक पढ़ने के लिए आपका दिल से शुक्रिया।
शुक्रिया उन हर पन्नों को समय देने के लिए, जिनमें शायद आपको कहीं न कहीं अपना कोई सवाल, कोई एहसास या अपनी कोई छोटी-सी कहानी मिल जाए।
उम्मीद है कि नूर और अक्शत का ये सफ़र आपको सिर्फ़ एक कहानी की तरह नहीं, बल्कि एक एहसास की तरह याद रहेगा।
आगे का सफ़र अभी बाकी है…
मिलते हैं अगले हिस्से में। ❤️
— अद्या