Unspoken Desires in Hindi Women Focused by Mayur Chaudhary books and stories PDF | अधूरी तड़प, ख़ामोश छुअन

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अधूरी तड़प, ख़ामोश छुअन

पुरानी हवेलीनुमा मकान की सबसे ऊपरी मंज़िल के कमरे में आरोही की एक अलग ही दुनिया बसती थी। घर में सिर्फ़ तीन लोग थे—उसका बड़ा भाई रोहन, भाभी कविता और वो ख़ुद। भाई का दिन का ज़्यादातर वक़्त दफ़्तर और कारोबारी दौरों में गुज़रता था, जिससे घर पर अक्सर एक अजीब-सा, भारी सन्नाटा पसरा रहता। इसी सन्नाटे के बीच आरोही के सीने में एक बेनाम बेचैनी, एक अनकही प्यास सुलगती रहती थी। वह इक्कीस साल की थी, और जवानी की दहलीज पर खड़ी उसकी देह रोमांस और किसी के गहरे स्पर्श के लिए तड़पती थी।
इस तड़प को निकालने का उसका एकमात्र ज़रिया था ‘मातृभारती’ ऐप।
मातृभारती पर आरोही एक छद्म नाम से भावुक और बेहद रूमानी कहानियाँ लिखती थी। उसकी लिखी हर पंक्ति में उसकी अपनी अधूरी हसरतें, किसी के सीने से लगकर पिघल जाने की ख्वाहिशें और रात के अंधेरे में जिस्म के दहकने के अहसास छिपे होते थे। उसके पाठकों की तादाद रोज़ बढ़ रही थी। ऐप के इनबॉक्स में कई पुरुष पाठकों के संदेश आते, जो उसकी कल्पनाओं के दीवाने थे।
रात जब पूरा घर सो जाता, आरोही अपने बिस्तर पर करवटें बदलते हुए फोन की नीली रोशनी में खो जाती। मातृभारती के चैट बॉक्स में कई पुरुषों के साथ उसकी देर रात तक रोमांटिक बातें चलतीं। कोई उसकी कहानियों की मादक पंक्तियों की तारीफ़ करता, तो कोई उससे पूछता कि क्या वो असल ज़िंदगी में भी उतनी ही जज़्बाती है।
"तुम्हारी हर लाइन पढ़कर लगता है जैसे कोई नर्म उंगलियाँ सीधे रूह को छू रही हों," किसी समीर नाम के पाठक का मैसेज स्क्रीन पर चमकता।
आरोही जवाब देती, "लफ़्ज़ तो बस परछाईं हैं... असली आग तो अभी अल्फ़ाज़ों के पीछे ही दबी है।"
कभी कोई दूर बैठा अजनबी उसे अपनी बाहों में लेने की बातें करता, तो कभी कोई उसके होंठों की मिठास की कल्पना करता। वो चैट आरोही के रोंगटे खड़े कर देतीं, उसकी सांसें भारी हो जातीं, पर जब चैट बंद होती, तो फ़ोन की ठंडी स्क्रीन के साथ कमरे का अकेलापन उसे और ज़्यादा कचोटता। वो चैट सिर्फ़ एक धुंधुआती हुई प्यास बढ़ाती थीं, उसे बुझा नहीं पाती थीं। उसे एक जीती-जागती छुअन की ज़रूरत थी।
दूसरी तरफ़, उसी मकान में एक और ख़ामोश अकेलापन साँस ले रहा था—उसकी भाभी, कविता। रोहन की बेरुखी और लगातार बाहर रहने की आदत ने कविता को भी अंदर से सूखा दिया था।
गर्मियों की एक दोपहर जब बाहर सन्नाटा छाया था, आरोही सोफे पर लेटी मातृभारती पर एक नई प्रेम कहानी लिख रही थी। अचानक बिजली चली गई और कमरे में उमस बढ़ गई। कविता पसीना पोंछती हुई ठंडे पानी का गिलास लेकर कमरे में आई। सूती नाइटी में लिपटी कविता के चेहरे पर भी वही ख़ामोश उदासी थी जो आरोही अपनी कहानियों में उकेरा करती थी।
"क्या लिखती रहती हो दिन-भर उस फ़ोन में?" कविता ने पानी का गिलास देते हुए पूछा और उसके पास ही सोफे पर बैठ गई।
"बस कुछ अधूरी बातें, भाभी... जो असल ज़िंदगी में नहीं मिलतीं," आरोही ने धीमी आवाज़ में कहा। उसकी नज़र कविता के पसीने से भीगी गर्दन और कंधों पर फिसलते बालों पर टिक गई।
कविता ने हल्का-सा मुस्कुराकर आरोही का फ़ोन देखा। स्क्रीन पर एक पाठक की लिखी रूमानी चैट खुली थी। कविता ने उसे पढ़ा, और पल भर के लिए कमरे में हवा थम-सी गई। आरोही घबराई नहीं, बल्कि उसने अपनी आँखें कविता की आँखों में गाड़ दीं। उन आँखों में कोई अपराध-बोध नहीं था, सिर्फ़ वही तड़प थी जिसे कविता भी रोज़ अपने सीने में दबाकर सोती थी।
"तो... तुम इन अजनबियों से ऐसी बातें करके अपनी तन्हाई भरती हो?" कविता की आवाज़ में डांट नहीं, बल्कि एक दर्दनाक समझ थी।
"और क्या करूँ भाभी? जब कोई पास होकर भी छूने वाला न हो, तो दिल कहीं तो भटकेगा," आरोही ने बेहद नज़दीक होकर फुसफुसाया।
उस दोपहर दोनों के बीच की झिझक का बांध टूट गया। आरोही ने धीरे से अपना कांपता हुआ हाथ कविता के हाथ पर रख दिया। कविता ने हाथ नहीं खींचा। बरसों से छुअन को तरसी दो आत्माओं ने एक-दूसरे के भीतर अपना ही अक्स देख लिया था।
कविता की आँखों में एक अजीब सी नमी उतर आई। उसने अपनी उंगलियाँ आरोही के गाल पर फेर दीं। वह स्पर्श किसी भी ऑनलाइन चैट के हजारों शब्दों से कहीं ज़्यादा गहरा, सच्चा और दहकता हुआ था। आरोही की आँखें बंद हो गईं और उसके होंठों से एक धीमी सिसकारी निकल गई।
कविता ने धीरे से उसे अपनी बाहों में खींच लिया। उस तंग सोफे पर, उमस से भरी दोपहर में, दो औरतें अपने-अपने अकेलेपन को एक-दूसरे के सीने में दफ़न कर रही थीं। कविता के होंठ आरोही के माथे से होते हुए उसकी गर्दन तक सरक गए। हर छुअन में बरसों की दबी हुई हसरतों की तपिश थी। आरोही के हाथ कविता की पीठ पर कसते चले गए।
उस दिन के बाद से, घर का वो बंद सन्नाटा पूरी तरह बदल गया। रात को जब रोहन शहर से बाहर होता, तो आरोही अब भी मातृभारती पर अपनी कहानियाँ पोस्ट करती और पुरुषों के साथ रूमानी चैट में लफ़्ज़ों का खेल खेलती। लेकिन अब वो चैट सिर्फ़ उसकी कल्पनाओं की खुराक थीं। जैसे ही वह फ़ोन बंद करती, अंधेरे कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुलता, और कविता की पायल की हल्की छनछन के साथ वह अधूरी तड़प एक बेहद ख़ामोश, गहरी और मखमली हकीकत में बदल जाती।