अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 60: अंतिम पुस्तकालय का रास्ता
नैना की आँखें खुली हुई थीं।
उन आँखों में अब वह काली परछाईं नहीं थी, जो कुछ देर पहले तक उसे अपने कब्जे में लेने की कोशिश कर रही थी। अब उनमें एक अजीब-सी सुनहरी चमक थी।
अनन्या उसके बिल्कुल पास बैठी थी।
उसने घबराकर पूछा—
"नैना... तुम्हें याद आ गया?"
नैना ने धीरे से सिर हिलाया।
"हाँ, दीदी।"
अनन्या की आँखें नम हो गईं।
लेकिन अगले ही पल नैना ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
"हमें बहुत जल्दी करनी होगी।"
आरव और कबीर दोनों उनकी तरफ देखने लगे।
आरव ने पूछा—
"अंतिम पुस्तकालय कहाँ है?"
नैना कुछ पल चुप रही।
जैसे उसके दिमाग में कोई बंद दरवाज़ा खुलने की कोशिश कर रहा हो।
फिर उसने आँखें बंद कर लीं।
"यह किसी शहर में नहीं है।"
कबीर ने तुरंत पूछा—
"तो कहाँ है?"
नैना ने आँखें खोलीं।
"जहाँ कहानी खत्म होने से पहले..."
"उसका पहला शब्द लिखा गया था।"
अनन्या ने धीरे से कहा—
"मतलब?"
नैना ने अधूरी किताब की तरफ देखा।
"हर कहानी का एक पहला शब्द होता है।"
"लेकिन हर कहानी का पहला शब्द कागज़ पर नहीं लिखा जाता।"
"कुछ कहानियाँ..."
"किसी याद से शुरू होती हैं।"
कबीर ने गंभीर होकर कहा—
"और अंतिम पुस्तकालय उन सभी पहली यादों को संभालकर रखता है।"
आरव ने पूछा—
"लेकिन हम वहाँ जाएँगे कैसे?"
नैना ने जवाब दिया—
"तीन दरवाज़ों से।"
"पहला दरवाज़ा..."
"यादों का।"
"दूसरा..."
"सच का।"
"और तीसरा..."
नैना रुक गई।
अनन्या ने पूछा—
"तीसरा?"
नैना की आवाज़ बहुत धीमी हो गई।
"कुर्बानी का।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अचानक अधूरी किताब हवा में उठ गई।
उसके पन्ने तेजी से पलटने लगे।
एक पन्ने पर एक पुराना नक्शा बन गया।
नक्शे में कोई शहर नहीं था।
कोई सड़क नहीं।
कोई पहाड़ नहीं।
सिर्फ तीन गोल दरवाज़े बने थे।
पहले पर लिखा था—
"जो याद है।"
दूसरे पर—
"जो सच है।"
तीसरे पर—
"जो खोना पड़ेगा।"
आरव ने तीसरे दरवाज़े को देखते हुए कहा—
"यह मुझे बिल्कुल पसंद नहीं आ रहा।"
कबीर हल्का-सा मुस्कुराया।
"कहानी कभी आसान रास्ता नहीं देती।"
अनन्या ने कहा—
"तो चलो।"
आरव ने उसकी तरफ देखा।
"इतनी जल्दी?"
अनन्या ने सिर हिलाया।
"हमारे पास समय नहीं है।"
नैना ने धीरे से कहा—
"समय है..."
"लेकिन बहुत कम।"
तीनों ने किताब के नक्शे पर हाथ रखा।
इस बार नैना भी उनके साथ थी।
जैसे ही चारों की उँगलियाँ पन्ने से छुईं...
पूरा कमरा सफेद रोशनी से भर गया।
अनन्या ने आँखें बंद कर लीं।
उसे लगा जैसे वह किसी गहरी खाई में गिर रही है।
फिर अचानक...
धड़ाम!
वह जमीन पर आ गिरी।
उसने आँखें खोलीं।
सामने एक छोटा-सा घर था।
घर देखकर उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
"यह..."
कबीर ने पूछा—
"क्या हुआ?"
अनन्या ने धीमे स्वर में कहा—
"यह मेरा बचपन का घर है।"
आरव ने चारों ओर देखा।
"लेकिन यह तो..."
"तुमने हमें कभी बताया नहीं कि तुम कहाँ रहती थीं।"
अनन्या ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया।
वह घर के दरवाज़े की ओर बढ़ गई।
नैना उसके पीछे चल रही थी।
जैसे ही अनन्या ने दरवाज़ा खोला...
अंदर से बच्चों की हँसी सुनाई दी।
एक छोटी लड़की कमरे में बैठी थी।
उसके हाथ में रंगीन पेंसिल थी।
वह कागज़ पर कुछ लिख रही थी।
अनन्या उसे देखकर रुक गई।
वह लड़की...
खुद अनन्या थी।
उसके पास एक और छोटी बच्ची बैठी थी।
नैना।
छोटी नैना उत्साह से कह रही थी—
"दीदी, मेरा नाम भी लिखो।"
छोटी अनन्या हँसकर बोली—
"पहले तुम कहानी सुनाओ।"
"क्या?"
"तुम बड़ी होकर क्या बनोगी?"
छोटी नैना ने तुरंत कहा—
"मैं..."
वह कुछ सोचने लगी।
फिर बोली—
"मैं ऐसी कहानी बनूँगी जिसमें कोई कभी अकेला नहीं होगा।"
छोटी अनन्या हँस पड़ी।
"पागल!"
"और तुम?"
नैना ने पूछा।
छोटी अनन्या ने अपनी पेंसिल उठाई।
"मैं ऐसी किताब लिखूँगी..."
"जिसे पढ़कर हर इंसान अपना दुख भूल जाए।"
दोनों बहनें एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगीं।
अनन्या की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसे सब याद आ रहा था।
वह धीरे से फुसफुसाई—
"हम ऐसे थे..."
नैना उसके पास आकर खड़ी हो गई।
"हाँ।"
फिर नैना ने कहा—
"लेकिन यह सिर्फ याद नहीं है।"
कबीर ने तुरंत समझ लिया।
"पहला दरवाज़ा।"
अनन्या ने उसकी ओर देखा।
कबीर ने कहा—
"हमें इस याद को पार करना होगा।"
"कैसे?"
नैना ने कहा—
"इसे बदलकर नहीं।"
"इसे स्वीकार करके।"
अनन्या ने कमरे में अपनी छोटी उम्र की दोनों बहनों को देखा।
उसने आँखें बंद कीं।
"मैं स्वीकार करती हूँ..."
"कि मैं तुम्हें भूल गई थी।"
"मैं स्वीकार करती हूँ कि मैं डर गई थी।"
"और मैं स्वीकार करती हूँ..."
"कि तुम्हें खोने का डर इतना बड़ा था कि मैंने तुम्हारी याद ही मिटा दी।"
कमरा धीरे-धीरे धुंधला होने लगा।
छोटी अनन्या और नैना एक-दूसरे में घुलकर रोशनी बन गईं।
सामने एक दरवाज़ा दिखाई दिया।
उस पर लिखा था—
"पहली याद पार हुई।"
चारों दूसरे दरवाज़े के सामने पहुँचे।
इस बार दरवाज़ा लोहे का था।
उस पर लिखा था—
"सच के बिना प्रवेश वर्जित है।"
दरवाज़ा खुला।
अंदर एक लंबा कमरा था।
कमरे के बीच चार कुर्सियाँ थीं।
हर कुर्सी के सामने एक आईना।
कबीर ने कहा—
"अब हर किसी को अपना सच बोलना होगा।"
आरव ने पूछा—
"किससे?"
आईने से आवाज़ आई—
"खुद से।"
पहले आरव आगे बढ़ा।
उसने आईने में देखा।
उसका प्रतिबिंब उससे अलग खड़ा था।
प्रतिबिंब बोला—
"तुम अनन्या को खोने से डरते हो।"
आरव ने कहा—
"हाँ।"
"तुम्हें डर है कि वह एक दिन अपनी कहानी चुनकर तुम्हें पीछे छोड़ देगी।"
आरव चुप रहा।
फिर बोला—
"हाँ।"
आईना टूट गया।
उसके पीछे दूसरा रास्ता खुल गया।
अब अनन्या की बारी थी।
आईने में उसका चेहरा दिखाई दिया।
प्रतिबिंब ने पूछा—
"तुम्हें सबसे ज्यादा डर किस बात से लगता है?"
अनन्या ने कहा—
"नैना को खोने से।"
"और?"
अनन्या ने आँखें बंद कर लीं।
"मुझे डर है..."
"कि एक दिन मेरी वजह से..."
"मेरे अपने लोग मुझसे नफरत करने लगेंगे।"
आईना चटक गया।
फिर नैना आगे आई।
उसके प्रतिबिंब ने पूछा—
"तुम्हारा सबसे बड़ा डर?"
नैना ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
फिर उसकी आँखों से आँसू निकल आए।
"कि मेरी बहन मुझे फिर से भूल जाएगी।"
आईना टूट गया।
अब सबकी नजर कबीर पर थी।
कबीर धीरे-धीरे आईने के सामने गया।
उसके प्रतिबिंब ने कुछ नहीं कहा।
सिर्फ उसे देखता रहा।
कबीर ने खुद ही कहा—
"मेरा डर..."
"यह नहीं कि मैं मर जाऊँगा।"
"मेरा डर यह है..."
"कि मैं कभी पूरी कहानी नहीं बन पाऊँगा।"
कुछ पल बाद आईना पूरी तरह टूट गया।
सामने तीसरा रास्ता खुल गया।
तीसरा रास्ता बहुत अंधेरा था।
इतना अंधेरा कि चारों को एक-दूसरे की आवाज़ से ही पता चल रहा था कि वे साथ हैं।
आखिरकार वे एक विशाल दरवाज़े के सामने पहुँचे।
उस पर लिखा था—
"कुर्बानी।"
अनन्या ने धीरे से कहा—
"यहाँ क्या खोना होगा?"
नैना ने किताब को देखा।
उसका चेहरा अचानक बदल गया।
"एक याद।"
आरव ने पूछा—
"किसकी?"
किताब के पन्ने अपने-आप पलटे।
चारों के नाम दिखाई दिए।
अनन्या।
आरव।
कबीर।
नैना।
फिर एक वाक्य उभरा—
"इन चारों में से एक को अंतिम पुस्तकालय तक पहुँचने के लिए..."
अगली पंक्ति धीरे-धीरे दिखाई दी—
"अपनी सबसे प्रिय याद छोड़नी होगी।"
अनन्या ने तुरंत कहा—
"मैं करूँगी।"
नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"नहीं।"
"तुमने मेरे लिए पहले ही बहुत कुछ खोया है।"
आरव बोला—
"तो मैं करूँगा।"
कबीर ने उसे रोक दिया।
"नहीं।"
"यह फैसला इतना आसान नहीं है।"
तभी दरवाज़े के पीछे से भक्षक की धीमी हँसी सुनाई दी।
"क्यों लड़ रहे हो?"
"मैं बता देता हूँ किसे क्या खोना है..."
चारों चुप हो गए।
भक्षक बोला—
"अनन्या अपनी बहन की याद खोएगी।"
नैना का चेहरा सफेद पड़ गया।
"आरव अनन्या को भूल जाएगा।"
आरव ने मुट्ठियाँ भींच लीं।
"कबीर अपनी पूरी पहचान खो देगा।"
कबीर की आँखें गंभीर हो गईं।
फिर आवाज़ नैना की ओर मुड़ी—
"और नैना..."
कुछ पल सन्नाटा रहा।
फिर—
"तुम अपनी बहन की आवाज़ हमेशा के लिए खो दोगी।"
नैना की आँखों से आँसू गिर पड़े।
"नहीं..."
अनन्या ने उसे अपने सीने से लगा लिया।
"कुछ भी हो..."
"मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगी।"
तभी अधूरी किताब जोर से चमकी।
उसके पन्ने पर एक नया वाक्य लिखा गया—
"कुर्बानी हमेशा वह नहीं होती जो सबसे ज्यादा दुख दे..."
"कभी-कभी कुर्बानी वह होती है..."
"जिसे छोड़ने के बाद कहानी खुद रास्ता चुनती है।"
कबीर ने पन्ना पढ़ा।
फिर उसकी आँखें अचानक फैल गईं।
"मुझे समझ आ गया।"
आरव ने पूछा—
"क्या?"
कबीर ने दरवाज़े की तरफ देखा।
"हमें अपनी कोई याद छोड़नी नहीं है।"
"हमें..."
वह रुका।
"अपना सबसे बड़ा झूठ छोड़ना है।"
दरवाज़ा अचानक चमक उठा।
और उस पर एक नया शब्द दिखाई दिया—
"सच।"
दरवाज़ा खुलने लगा।
लेकिन उसके पीछे जो था...
उसे देखकर चारों की साँसें रुक गईं।
वहाँ एक अनंत पुस्तकालय था।
हजारों नहीं...
लाखों किताबें।
हर किताब अलग रोशनी से चमक रही थी।
और सबसे बीच में...
एक विशाल काली किताब रखी थी।
उसके कवर पर लिखा था—
"भक्षक की असली कहानी"
कबीर ने धीमे स्वर में कहा—
"हम पहुँच गए।"
अनन्या ने उस किताब को देखा।
लेकिन उसी क्षण...
काली किताब अपने-आप खुल गई।
पहले पन्ने पर सिर्फ एक नाम लिखा था—
"अनन्या।"
और उसके नीचे—
"लेखक नहीं..."
"पहला पात्र।"
अनन्या का चेहरा सफेद पड़ गया।
क्योंकि अब उसे समझ आ चुका था—
उसने भक्षक को बनाया नहीं था।
भक्षक ने उसे बनाया था।
और अंतिम पुस्तकालय में...
उनकी कहानी से भी पुरानी एक कहानी उनका इंतज़ार कर रही थी।
क्रमशः...