“एक मरीज़ को आप से बोटौक्स इंजेक्शन दिलाना है,सर,” सुशील कुमार अपने रोगियों के लिए मेरी सेवाएं अक्सर मुझ से मांग लिया करता है। डाक्टरी के अपने पच्चीस साल के अनुभव के बावजूद।
यह मात्र संयोग है कि बत्तीस साल पहले जब उस ने हमारे मेडिकल कालेज में दाखिला लिया था तो उत्तम शैक्षिक योग्यता रखते हुए भी केवल अपने हिंदी मीडियम को ले कर वह परेशान रहा करता था।और ऐसे में नवनियुक्त एक अध्यापक के उत्साह के अन्तर्गत मैं ने उसे अपने सरंक्षण में ले लिया था।
“टौर्टिकौलिस?” मैं ने पूछा, “डोपैमीनर्जिक ड्रग्ज़ का कोर्स पूरा करा दिया?”
“जी,सर, लेकिन संकुचन और मरोड़ काबू में नहीं आ रहे….”
टौर्टिकौलिस गर्दन की मांसपेशियों की बीमारी है ,जिन के असामान्य व अनियमित ऐंठन, सिकुड़न व कुंडलीकरण के कारण मरीज़ की गर्दन मुड़की रहती है।बोटौक्स ( बौटुलिनम टौक्सिन) इंजेक्शन इस बीमारी का दूसरा चरण है। चूंकि गरदन की मांसपेशियों की संरचना बहुत जटिल है इसलिए ग्रस्त मांसपेशी को पहचानना भी किसी कौशल से कम नहीं माना जाता।
“कब लाओगे?” मैं ने पूछा।
“आज आप खाली रहेंगे? साढ़े छः के करीब?”
“बिल्कुल….”
“मरीज़ अपने पिता के साथ पीछे आ रही है,सर,” सुशील कुमार निश्चित समय पर मेरे नर्सिंग होम आ पहुंचा।
“स्त्री है? कितने साल की?”
“पैंतीस की,सर….”
उत्तरवर्ती दृश्य जितना दारुण था, उतना ही विकट।
क्षीणकाय एक वृद्ध सज्जन मेरे पास स्थूलकाय जिस स्त्री को हाथ पकड़े ला रहे थे,वह रक्षात्मक मुद्रा में झुकी हुई नीचे की ओर देख रही थी। उस का सिर टौर्टिकौलिस द्वारा जकड़ी गई मांसपेशियों में तीव्र दर्द रहने की वजह से एक तरफ़ को ढुलका हुआ था। रह-रह कर कांप रही उस की गर्दन उस के कंधे पर खिसक चुकी थी और उस की ठुड्डी भी उस के कंधे पर निरंतर झुकी रहने के कारण उसी दिशा में घूम गई थी।
तैंतालीस साल के अपने डाक्टरी अनुभव में टौर्टिकौलिस का ऐसा भंयकर केस मैं पहली बार साक्षात देख रहा था।
“पांव में कोई तकलीफ़ है क्या?” वृद्ध सज्जन को लंगड़ाते हुए देख कर मैं ने उन से पूछा।
“मामूली चोट है,” वृद्ध सज्जन की आंखें तरल हो लीं, “कष्ट में तो मेरी बेटी है…”
“इकलौती संतान है?”
“दो लड़के भी हैं लेकिन दोनों व्यस्त रहते हैं। अपनी- अपनी नौकरी में। अपनी- अपनी गृहस्थी में….”
“यह चोट कैसे लगी?”
“कल अपनी दुकान बंद करने के बाद जैसे ही बाहर बाज़ार में उतरा, तो एक साइकल वाले ने अपना अगला पहिया मेरे साथ टकरा दिया….”
“इस उम्र में आप दुकान करते हैं? क्या बेचते हैं?”
“मेरे पिता होम्योपैथ के जानकार थे। उन्हीं ने यह दुकान 1970 में खोली थी। फिर सन 2000 के दिनों जब उन की आंखों की रोशनी जाने लगी तो उन्हों ने मुझ से मेरी अध्यापिकी छुड़वा कर मुझे दुकान पर बिठला दिया।”
“आप भी होम्योपैथी जानते हैं?” मैं ने पूछा।
“नहीं, मैं ने ज़िद में ही नहीं सीखी। उन के कहने से दुकान पर बैठता ज़रूर हूं लेकिन सीखा एकदम कुछ नहीं। शीशी पर नाम पढ़ता हूं और बेच डालता हूं….”
“लड़कों को भी इसीलिए दुकान पर नहीं बिठलाया? आप के साथ ज़बरदस्ती हुई मगर आप ज़बरदस्ती न करेंगे?”
“यही समझ लीजिए,” वृद्ध सज्जन का स्वर सामान्य हो चला।
कोई भी केस हाथ में लेने से पहले मैं मरीज़ की पारिवारिक पृष्ठभूमि से अवश्य ही परिचित हो जाना चाहता हूं। अपनी फ़ीस में फिर उसी के आधार पर जमा या मनफ़ी अमल में लाता हूं।
इन बाप- बेटी की वेशभूषा ही से समझ गया था, वे धन से खेल नहीं रहे थे।
यों भी ये सुशील कुमार के पुराने मुहल्लेदार थे। अपनी गृहस्थी और अपनी प्रैक्टिस सुशील कुमार ने एक साथ अपने पुराने मुहल्ले के दो कमरों वाले तंग मकान से शुरू की थी। नयी आबादी में उस का नया बंगला और नया क्लीनिक बेशक अगले पांच सालों में तैयार हो गए थे किंतु अब भी वह हर इतवार की सुबह वहीं बैठता था और मरीज़ देखता था। आधी फ़ीस पर।
“अपनी बेटी के बारे में बताइए। आप के दामाद कहां हैं?”
“दामाद क्या? दामाद के नाम पर विपत्ति है। लड़की अच्छी- भली एक सरकारी संस्थान में काम कर रही थी।खुश थी। लेकिन हम ने शादी ज़रूरी समझी। दामाद खोजने लगे। खोजने पर ठीक-ठाक एक लड़का मिल भी गया। शादी कर दी। फिर पांच साल तक जब बच्चा नहीं हुआ तो दामाद ने दूसरी शादी करनी चाही। वहीं से इस ने ज़िद पकड़ ली, तलाक नहीं दूंगी। डिप्रेशन हो गया। इलाज में उधर के डाक्टरों ने तेज़ दवाइयां खिला दीं। नतीजा अब सामने है। गर्दन का झोर धीरे- धीरे पूरे शरीर को धनुष की तरह झुकाए चला जा रहा है….”
“आप घबराएं मत,” मैं ने कहा, “मुझे ऐसे आपरेशन की जानकारी है जो इन्हें फिर से ज़िंदगी के घेरे में लौटा लाएगा….”
“उबार लीजिए इसे इस नरक- कुंड से,” वृद्ध सज्जन का गला भर आया, “इसे त्राण देंगे मानो मुझे और मेरी बूढ़ी पत्नी को मोक्ष मिल जाएगा….”
“जो इंजेक्शन इन्हें आज दिया जाएगा,” मैं ने उन्हें समझाने का प्रयास किया, “उस के प्रभाव पर हम नज़र रखेंगे। इंजेक्शन अगर काम कर गया तो गर्दन का आपरेशन करेंगे। सिलेक्टिव पैरिफ़रल डिनर्वेशन। और अगर वह नहीं काम करेगा तो रीढ़ का आपरेशन कर देंगे : रीज़ोटौमी….”
मेरे भीतर एक नई उमंग उठ रही थी। दोनों ही आपरेशन चुनौतीपूर्ण थे। और मैं उन्हें हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। उन पर एक आलेख लिख कर प्रतिष्ठित किसी भी अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में उसे प्रकाशित करवा सकता था।
“हमारे डाक्टर साहब अंतरराष्ट्रीय स्तर के न्यूरोसर्जन हैं,” सुशील कुमार ने वृद्ध सज्जन को ढाढ़स बंधाया, “इन के हाथ में भगवान का अभिमंत्रन है। इन के आपरेशन असफल हो ही नहीं सकते। सौभाग्यशाली मरीज़ों ही को वे नसीब होते हैं….”
“रुपए की चिंता तनिक न रखिए,” वृद्ध सज्जन उत्साहित हो लिए , “मेरी वह दुकान मेन रोड पर है।उस की पगड़ी का प्रस्ताव मेरे पास आए दिन आया करता है। पचास हज़ार। साठ हज़ार। मैं आप को मुंहमांगी फ़ीस दे दूंगा….”
“मुझे भी थोड़ा पुण्य कमाने का अवसर दें,” वृद्ध सज्जन के कंधे पर मैं ने अपना हाथ जा टिकाया, “भातृप्रेम दिखाने का अवसर दें। यह आपरेशन मैं फ़ीस के बिना करूंगा।”
“इन्हें इंजेक्शन के लिए तैयार करें?” सुशील कुमार ने मेरी ओर देखा।
“आप चाहें तो बाहर बैठ लें,” मैं ने वृद्ध सज्जन से कहा, “ हमें फ़िज़िकल एग्जामिनेशन करना होगा पहले….”
स्त्री के गर्दन की इंस्पेक्शन,(निरीक्षण) पैल्पेशन
(स्पर्श निरीक्षण), औस्कलटेशन( ह्रदय व फेफड़ो व अंदर की ध्वनियों को सुनने की क्रिया) और पर्कशन (छोटे हथौड़े से शारीरिक अंग थपथपाने की क्रिया) के अंतर्गत मैं ने सभी मांसपेशियां पूरे ध्यान से देखीं, महसूस कीं, उन की ध्वनि सुनी और उन्हें छोटे हथौड़े से ठोका- बजाया।
स्त्री की इलेक्टोमायोग्रफ़ी, (ई.एम जी.) टेस्ट रिपोर्ट ने भी उस की इन मांसपेशियों की सरगर्मी के योगफल में भारी वृद्धि दिखा रखी थी।
“150 यूनिट पहले लगा कर देखते हैं,” ग्रस्त मांसपेशी जैसे ही मेरे हाथ आई, बोटौक्स के अंतर्गत सुशील कुमार से मैं ने टौक्सिन की मात्रा उच्चरित कर दी।
“रुक जाइए,” डोलते-कांपते स्थूलकाय उस स्त्री ने पहली बार अपनी ज़ुबान खोली।
मुझे समझने में समय लगा।
“बताइए,” मैं रुक गया।
“मुझे इंजेक्शन नहीं चाहिए,” एक ज़ोरदार हल्लन उसकी गर्दन, उस के कंधे और उस की बांयी बांह सभी को कंपा-कंपा गया।
“क्यों?” हैरान होकर सुशील कुमार ने पूछा।
“मुझे सेहत नहीं चाहिए,” वह फिर ज़ोर से हिली।
“इतना अनर्थ?” मुझे उस पर बहुत गुस्सा आया, “इतना स्वार्थ? केवल अधम अपने पति पर बांध लगाने की खातिर? ऐसे बूढ़े मां-बाप को दांव पर लगा कर जो तुम्हारे सदके इस बूढ़ी उम्र में अपने लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे लिए जी रहे हैं? मर रहे हैं?”
उस की समूची काया मानो बिजली के झटके खाने लगी। स्थिर होने में उसे कम से कम पूरे पांच मिनट ज़रूर लगे किंतु स्थिर होते ही उसी ने चुप्पी तोड़ी, “आप चाहें तो इंजेक्शन लगा सकते हैं।”
चार महीने के अंतराल के बाद उसे दूसरा बोटौक्स इंजेक्शन दिया गया।
नतीजा इस बार भी अच्छा मिला।
उस की गर्दन की सभी एग्निस्ट व एंटेग्निस्ट मांसपेशियां अब मेरी जानी- पहचानी थीं।
‘सिलेक्टिव पैरिफ़रल डिनर्वेशन’ का निष्पादन मेरे हाथों पूर्णतया सफल रहा।
‘प्रोफ़ेसर क्लौड बरट्रेंड प्रोसिडियर’ कहलाए जाने वाले इस ‘सिलेक्टिव पैरिफ़रल डिनर्वेशन’ के अंतर्गत वे तंत्रिकांए मैं ने उस बिंदु पर पृथक कर दीं जहां वे संकुचित हो रही मांसपेशियों में दाखिल हो जाया करतीं थीं।
, ‘थैंक यू, क्लौड’ नाम से मैं ने फिर एक शोध- पत्र भी लिख डाला और एक अंतर्राष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में उस के प्रेषित होते ही ढेर सारी कीर्ति मेरे पास आ पहुंची।
उस में उल्लेख किया गया मानवीय कोण विशेष रूप से सराहा गया जिस के अंतर्गत वह ‘डिनर्वेशन’ मेरी इस मरीज़ के शारीरिक ढर्रे में बदलाव लाने के साथ-साथ उस के मानसिक दृष्टिकोण में भी नया मोड़ लाने में कारगर साबित हुआ था। सघन उस चिकित्सा का परिणाम मानसिक उपचार भी रहा था। उस की मांसपेशियों की ज़िद्दी व दर्दनाक जकड़न जब ढीली पड़ी तो अपना सिर सीधा रखने और सामने देखने की क्षमता ने मानो उसे उस का मूल अस्तित्व फिर लौटा दिया था।
कहां तो वह जीवन व दुनिया से नज़रें मिलाने में असमर्थ रहा करती और कहां अब वह अपने पिता का हाथ बंटाने उन के साथ उन की दुकान पर बैठने लगी थी। स्थायी रूप में। अपने व अपने पति को वैध रूप से स्वतंत्र करती हुई।
परिणाम, सुशील कुमार के साथ-साथ वह वृद्ध सज्जन भी मुझे बधाई देने थकते नहीं।