" इधर-उधर घूमने के अलावा कभी घर के कामों पर भी ध्यान दे दिया कर, हमेशा घूमती रहती है...! " गरिमा ने आंखें तरेरते हुए पंखुड़ी की तरफ देख कर कहा
गरिमा की जलती हुई बातें सुन पंखुड़ी के बगल में खड़ी उसकी सहेली रिया ने हौले से पलक का कंधा थपथपाया और दबे पांव वहां से खिसक गई।
पलक अपनी सौतेली मां गरिमा की बातें सुनती हुई कमरे के भीतर चली गई । उसको कितनी ही बातें सुनाते हुए गरिमा न जाने क्या क्या बोले जा रही थी , और पलक चुपचाप उनकी बातें सुनते हुए घर के कामों को निपटाने में लगी थी ।
ऐसा नहीं था , कि पलक को इन सब बातों से फर्क नहीं पड़ता था । लेकिन रोज-रोज कि इस किच किच की जैसे उसे अब आदत ही पड़ गई थी । वह बिना कुछ बोले बस उनकी बातें सुनती जाती और अपने काम में लगी रहती ।
बर्तनों को उठाकर एक तरफ रखते हुए पंखुड़ी की आंखों से आंसू कब लुढ़क कर उसके गालों पर आ गए, उसे पता ही नही चला । उसने अपने आंसू पोंछे और अपनी मां के साथ बिताए पलों में खो गई , जो उसकी मां के जाने के बाद उसके जीने का सहारा बन गए थे । उसकी मां ने कभी उसे इस तरह नही डांटा था । बल्कि उसकी गलतियों को भी पल में भूल जाती थीं वो....
......हालांकि पंखुड़ी छोटी ही थी । जब उसकी मां का स्वर्गवास हुआ , लेकिन अभी भी उनकी कोई भी याद उसके दिलो दिमाग में धुंधली नही हुई थी... और न वो अपनी मां के साथ बिताए हुए पलों को छड़ भर के लिए भूली थी ।
पंखुड़ी को वो दिन याद आ गया , जब वह अपनी मां की गोद में सर रखकर लेटी थी । कितने प्यार से उसकी मां ने उसके सर को सहलाते हुए कहा था कि," पंख बेटा ! मेरा सपना है , कि तू बड़ी होकर अपने पैरों पर खड़ी हो । "
अपनी बड़ी-बड़ी पलकों को झपकाते हुए अपनी मां की ओर देख कर कितना बचकाना सा सवाल किया था उसने ," मां मैं तो रोज अपने पैरों पर खड़ी होती हूं ! "
उसकी बात सुन मां जोर से हंसी थी ," ऐसे नही मेरी पगली! मैं तुझे कुछ बनते हुए देखना चाहती हूं । जैसे की कलेक्टरनी , डॉक्टरनी..! "
उनकी बात सुन पंखुड़ी को ज्यादा कुछ समझ नही आया । उसने उनकी तरफ देखकर कहा," आप बना देना मुझे कलेक्टरनी! " फिर वो मुस्कुराकर अपनी मां के सीने से लग गई । तब उसे कहां पता था...? कि विधाता उससे उसकी मां को इतनी जल्दी छीन लेंगे।
लेकिन अंजाने ही उसकी मां उसे एक लक्ष्य देकर गई थी । जिसे वह किसी भी हाल में पूरा करना चाहती थी। अपनी मां का सपना पूरा करने का , तो जैसे जुनून सा छा गया था उस पर.....
और इसीलिए वो गरिमा की खरी खोटी सुनकर भी अपनी पढ़ाई में पीछे नहीं रहती थी । उसके पापा अनिरुद्ध शर्मा की भी गरिमा की वाक् कला के आगे , एक नही चलती थी । इसलिए कई बार प्रयास करने के बाद पंखुड़ी के मना करने पर वो भी शांत हो गए थे.... लेकिन उनका शांत रहना पंखुड़ी के लिए अब मुसीबत बनता जा रहा था । गरिमा बात बिना बात पंखुड़ी को खरी-खोटी सुनाती रहती और कभी-कभी तो उसपर हाथ भी उठा देती थी ।
गरिमा की अपनी भी एक बेटी थी जो अभी पांच साल की ही थी । एक वही थी , जिसके कारण घर में पंखुड़ी का दिल लगा रहता था ।
आज पंखुड़ी की बारहवीं की परीक्षा का परिणाम आने वाला था। जिसके कारण वो आज सुबह से ही व्याकुल हुई जा रही थी । अनिरुद्ध जी शाम को ही घर लौटने वाले थे जिससे उसे अपना रिजल्ट देखने के लिए शाम का इंतजार करना था और उसके लिए ये इंतजार भारी पड़ रहा था । अपने मन को बहलाने के लिए वो आंगन में इधर से उधर डोल रही थी ।
जी तो उसका कर रहा था, की वो भाग कर रीता के घर चली जाए.... पर कमरे में बैठी गरिमा की तरेरती आंखे देख , वो घर से बाहर जाने में कतरा रही थी ।
.......तभी रीता भागती हुई उसके पास चली आई । वो और पंखुड़ी दोनो साथ में ही पढ़ती थीं। उसे आता हुआ देखकर पंखुड़ी बहुत खुश हो गई । उसने आंखो ही आंखो में रीता से पूछा , तो उसने मुस्कुराती हुई आंखो से हां में पलके झपका दी ।
अब तो पंखुड़ी की खुशी दोगुनी हो गई । उसने धीरे से रीता को कमरे में चलने का इशारा किया और खुद भी कमरे में चली आई । रीता जैसे ही आई उसने पंखुड़ी को कस कर गले लगा लिया। पंखुड़ी भी उससे गले लगी खड़ी रही ।
एक वही तो थी जिससे वो अपने सुख दुख बांट लिया करती थी । नही तो अपनी मां के जाने के बाद जैसे वो लड़की बिल्कुल अकेली हो गई थी । कहने को पिता का सहारा तो था, लेकिन रोज रोज की कलह से वो भी अब बेबस हो गए थे । फिर पंखुड़ी भी अब उनसे कुछ नही कहती थी । शायद अपने कारण वो अपने पिता को दुखी नहीं करना चाहती थी ।
लेकिन वो ही जानती थी कि अंदर ही अंदर वो अपनी मां को कितना याद करती है ।
कितना खास होता है न, मां बेटी का रिश्ता ! बेटी चाहे ससुराल में हो , या मायके में.... एक मां ही तो होती है जिससे वो अपने सारे सुख दुख कह लेती है । मां क्या होती है... और कितनी जरूरी होती है ! यह केवल वो ही बता सकता है , जिसने उसके न होने का बिछोह झेला हो । यही हाल कुछ पंखुड़ी का हो रहा था की वो खुशी में भी फफक कर रो पड़ी......
रीता उसे रोते देख उससे अलग हुई और बोली, "तू क्यों रो रही है....? रोना तो मुझे चाहिए...! "
उसकी बात सुन पंखुड़ी ने खुद को शांत किया और उसकी तरफ देखकर असमंजस में बोली , " तुझे क्यों रोना चाहिए..? "
" हम्म्म " गहरी सांस भरकर रीता ने अपना फोन उसकी तरफ बढ़ा दिया ।
पंखुड़ी ने फोन लिया और स्क्रीन को गौर से देखने लगी । उसमे पंखुड़ी का रिजल्ट था जिसमे लिखा था की पंखुड़ी ने टॉप किया है । ये देखकर तो पंखुड़ी और भी ज्यादा खुश हो गई पर फिर कुछ सोचते हुए रीता की तरफ देखकर बोली,
" मैंने टॉप किया, तो इसमें तेरे रोने जैसा क्या है..? "
" ओ बहन..! " कहते हुए रीता ने स्क्रीन स्क्रॉल कर दी, जिसमे अब पंखुड़ी ने देखा की रीता फर्स्ट आई थी । रिजल्ट देख वो फिर असमंजस में रीता की तरफ देखने लगी ।
इस बार रीता ने एक हल्का सा घूंसा पंखुड़ी की पीठ पर जमा दिया और मुस्कुराते हुए शिकायत भरे लहजे में बोली , " तू मुझसे ज्यादा नंबर क्यों लाई...? "
उसकी बात सुन पंखुड़ी मुस्कुराने लगी । उसको मुस्कुराते देख रीता भी मुस्कुराई और उसके कंधे में हाथ डालते हुए बोली, " मुझे पार्टी चाहिए ! वो भी बढ़िया वाली...! "
" हम्मम " पंखुड़ी ने हामी भरी तभी पीछे से आती आवाज की तरफ दोनो का ध्यान गया और दोनो पीछे की तरफ देखने लगीं....
क्रमशः
#प्रियंका गुप्ता "rimmi "