Adhuri Kitaab - 2 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 54

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 54

अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 54 : भक्षक का पहला शिकार
अधूरी किताब का फटा हुआ पन्ना हवा में घूमता हुआ नीचे गिरा।
उस पर सिर्फ एक शब्द लिखा था—
"भागो..."
अनन्या ने किताब को सीने से लगा लिया।
"किधर?"
कबीर ने बिना पीछे देखे कहा—
"जहाँ कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।"
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"लेकिन यह हवेली से बाहर जाने का रास्ता नहीं है।"
कबीर अचानक रुक गया।
उसने सामने की दीवार को देखा।
"हमें बाहर नहीं जाना।"
"हमें..."
"कहानी के अंदर जाना है।"
अनन्या ने हैरानी से पूछा—
"कहानी के अंदर?"
कबीर ने सिर हिलाया।
"भक्षक कहानी के बाहर से आया है।"
"अगर हम कहानी के अंदर चले गए..."
"तो वह हमें तुरंत नहीं पकड़ पाएगा।"
पीछे गलियारे में वही काली परछाईं धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।
ठक...
ठक...
ठक...
हर कदम के साथ दीवारों से अक्षर गायब होते जा रहे थे।
एक जगह दीवार पर लिखा था—
"यह हवेली कभी..."
परछाईं वहाँ से गुज़री...
और पूरा वाक्य गायब हो गया।
अनन्या की आँखें फैल गईं।
"वह सिर्फ लोगों को नहीं..."
"शब्दों को भी मिटा रहा है।"
कबीर ने गंभीर होकर कहा—
"इसीलिए उसे भक्षक कहते हैं।"
"वह इंसानों को नहीं खाता..."
"वह कहानियाँ खाता है।"
कबीर ने अधूरी किताब अनन्या के हाथ से ली।
उसने एक पन्ना खोला।
उस पर एक जंगल बना हुआ था।
घना...
काला...
और बिल्कुल शांत।
"यहीं।"
उसने पन्ने पर हाथ रखा।
अचानक चित्र हिलने लगा।
पेड़ों की पत्तियाँ हवा में झूमने लगीं।
एक पक्षी उड़कर किताब के किनारे तक आया।
आरव पीछे हट गया।
"यह..."
"जिंदा है?"
कबीर ने कहा—
"हाँ।"
फिर उसने अनन्या और आरव की ओर देखा।
"तैयार?"
अनन्या ने सिर हिलाया।
तीनों ने एक साथ पन्ने को छुआ।
अचानक...
उनके पैरों के नीचे की ज़मीन गायब हो गई।
तीनों किताब के भीतर गिरने लगे।
धड़ाम!
अनन्या जमीन पर आ गिरी।
उसके चारों तरफ घना जंगल था।
आरव कुछ दूरी पर पड़ा था।
कबीर उनके बीच खड़ा था।
अनन्या ने चारों ओर देखा।
"हम सच में किताब के अंदर आ गए?"
कबीर मुस्कुराया।
"हाँ।"
आरव ने पेड़ की छाल को छुआ।
"लेकिन यह तो बिल्कुल असली है।"
कबीर बोला—
"क्योंकि हर अच्छी कहानी..."
"अपने अंदर एक पूरी दुनिया रखती है।"
अनन्या ने किताब को देखा।
लेकिन...
किताब अब उसके हाथ में नहीं थी।
वह गायब हो चुकी थी।
"किताब कहाँ गई?"
कबीर ने शांत स्वर में कहा—
"वह हमारे साथ नहीं आई।"
"तो फिर?"
"वह बाहर रह गई।"
अनन्या का चेहरा गंभीर हो गया।
"मतलब भक्षक उसे..."
कबीर ने बात पूरी की—
"हाँ।"
"वह अब किताब को खा सकता है।"
आरव ने पूछा—
"तो हमें वापस जाना होगा।"
कबीर ने सिर हिलाया।
"लेकिन वापस जाने का रास्ता..."
"हमारे पास नहीं है।"
अचानक जंगल में एक आवाज़ गूँजी।
"मदद करो..."
अनन्या ने तुरंत आवाज़ की दिशा में देखा।
"किसी की आवाज़ है।"
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"रुको।"
आवाज़ फिर आई—
"मुझे बचा लो..."
इस बार आवाज़ एक छोटी लड़की की थी।
अनन्या आगे बढ़ने लगी।
लेकिन कबीर ने उसे रोक लिया।
"मत जाओ।"
"क्यों?"
"यह जंगल की पहली परीक्षा है।"
"यहाँ हर आवाज़ सच नहीं होती।"
अनन्या ने ध्यान से सुना।
लड़की फिर रोई—
"माँ..."
अनन्या का दिल पिघल गया।
"लेकिन अगर सच में कोई बच्ची है तो?"
कबीर चुप रहा।
आरव ने कहा—
"हम साथ चलेंगे।"
तीनों आवाज़ की दिशा में बढ़ने लगे।
कुछ दूर जाकर उन्हें एक छोटी लड़की दिखाई दी।
वह पेड़ के नीचे बैठी रो रही थी।
उसके कपड़े पुराने थे।
चेहरे पर आँसू थे।
अनन्या उसके पास बैठ गई।
"डरो मत।"
"हम तुम्हें घर पहुँचा देंगे।"
लड़की ने धीरे से सिर उठाया।
उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
अनन्या पीछे हट गई।
कबीर चिल्लाया—
"भागो!"
लड़की का चेहरा अचानक बदल गया।
उसका शरीर धुएँ में बदलने लगा।
और उसके मुँह से वही काली आवाज़ निकली—
"मिल गए..."
काला धुआँ तेजी से उनकी ओर बढ़ा।
आरव ने अनन्या को पीछे खींचा।
कबीर ने हाथ उठाया।
उसकी हथेली से सुनहरी रोशनी निकली।
धुआँ पीछे हट गया।
लेकिन...
कबीर के हाथ पर एक काला निशान बन गया।
अनन्या घबरा गई।
"तुम्हें चोट लगी!"
कबीर ने हाथ छिपा लिया।
"कुछ नहीं हुआ।"
आरव ने गंभीर स्वर में कहा—
"झूठ मत बोलो।"
कबीर ने उसकी ओर देखा।
"भक्षक ने मुझे छू लिया है।"
अनन्या का चेहरा उतर गया।
"इसका मतलब?"
कबीर ने धीमे स्वर में कहा—
"अब वह मेरा पीछा कर सकता है।"
"और अगर यह निशान मेरे दिल तक पहुँच गया..."
वह रुक गया।
अनन्या ने पूछा—
"फिर?"
कबीर ने जवाब नहीं दिया।
आरव ने उसकी ओर देखा।
"तुम मर जाओगे?"
कबीर ने पहली बार अपनी आँखें झुका लीं।
"नहीं..."
"उससे भी बुरा।"
जंगल अचानक शांत हो गया।
पक्षियों की आवाज़ बंद हो गई।
हवा रुक गई।
कबीर ने ऊपर देखा।
पेड़ों के बीच आसमान दिखाई नहीं दे रहा था।
लेकिन...
पेड़ों की शाखाओं पर धीरे-धीरे काले अक्षर उभरने लगे।
एक...
दो...
दस...
सैकड़ों...
फिर सभी अक्षर मिलकर एक वाक्य बने—
"पहला शिकार..."
अक्षर बदलने लगे।
अब लिखा था—
"कबीर।"
अनन्या घबरा गई।
"नहीं!"
कबीर ने पीछे हटते हुए कहा—
"यही कारण था कि मैं तुमसे दूर रहना चाहता था।"
आरव ने उसकी ओर देखा।
"तुम्हें पता था?"
"हाँ।"
"तुम्हें पता था कि वह तुम्हें ढूँढ रहा है?"
कबीर ने सिर हिलाया।
"क्योंकि..."
"मैं उसका पहला शिकार नहीं हूँ।"
आरव की आँखें सिकुड़ गईं।
"तो कौन था?"
कबीर ने जंगल के सबसे पुराने पेड़ की ओर देखा।
उस पेड़ के तने पर एक चेहरा उभर आया।
एक स्त्री का चेहरा।
अनन्या उसे देखते ही जम गई।
वह चेहरा...
पहली कहानी की माँ का था।
कबीर ने धीमे स्वर में कहा—
"भक्षक ने सबसे पहले..."
"उन्हें निगलने की कोशिश की थी।"
अनन्या की साँस रुक गई।
"लेकिन वह तो..."
कबीर ने कहा—
"उन्होंने खुद को कहानी से बाहर कर दिया।"
"ताकि हम सब बच सकें।"
आरव ने पूछा—
"और अब?"
कबीर ने अनन्या की ओर देखा।
"अब वह वापस आ गई हैं।"
उसी क्षण पेड़ के पीछे सुनहरी रोशनी चमकी।
एक स्त्री की आवाज़ आई—
"अनन्या..."
अनन्या की आँखें भर आईं।
"माँ..."
आवाज़ फिर आई—
"मुझे बचाने मत आना..."
"पहले खुद को बचाओ।"
और अचानक...
पूरे जंगल में काली स्याही फैलने लगी।
पेड़ सूखने लगे।
जमीन पर लिखे सारे शब्द मिटने लगे।
कबीर ने घबराकर कहा—
"वह आ गया!"
दूर अंधेरे में वही काली परछाईं दिखाई दी।
लेकिन इस बार...
वह अकेली नहीं थी।
उसके पीछे सैकड़ों काली आकृतियाँ थीं।
हर आकृति के चेहरे पर किसी अधूरी कहानी का चेहरा था।
आरव ने अनन्या का हाथ कसकर पकड़ लिया।
कबीर ने कहा—
"अब हमें भागना नहीं है..."
उसकी आँखें सुनहरी हो उठीं।
"अब हमें पहली बार कहानी के लिए लड़ना होगा।"
दूर से भक्षक की आवाज़ गूँजी—
"कहानी..."
"तुम्हारी नहीं है।"
"अब यह मेरी है।"
और उसी क्षण...
जंगल की जमीन दो हिस्सों में फट गई।
अनन्या, आरव और कबीर तीन अलग-अलग दिशाओं में गिरने लगे।
क्रमशः...