Adhuri Kitaab - 2 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 52

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 52

अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 52: नई किताब का पहला पन्ना
रात बहुत गहरी थी।
चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था।
पुरानी हवेली के उस कमरे में, जहाँ कुछ देर पहले तक अधूरी किताब रखी थी, अब सिर्फ एक छोटी-सी मेज़ बची थी।
मेज़ पर वही किताब बंद पड़ी थी।
अनन्या और आरव उसके सामने खड़े थे।
दोनों को लग रहा था कि आखिरकार सब खत्म हो चुका है।
अनलिखित ग्रंथ का अंधकार समाप्त हो चुका था।
पहली कहानी की माँ जा चुकी थी।
प्रथम संपादक भी अपनी दुनिया में लौट चुके थे।
और अधूरी किताब...
अब शांत थी।
आरव ने धीरे से कहा,
"शायद इस बार सच में सब खत्म हो गया।"
अनन्या ने किताब को देखते हुए हल्की मुस्कान दी।
"नहीं..."
आरव ने उसकी ओर देखा।
"क्या?"
"मुझे नहीं लगता कि इसकी कहानी कभी खत्म हो सकती है।"
आरव हँस पड़ा।
"तुम्हें अब भी इस किताब पर भरोसा है?"
अनन्या ने किताब पर हाथ रखा।
"पहले मुझे इससे डर लगता था।"
"फिर मैंने इसे समझने की कोशिश की।"
"और अब..."
वह कुछ पल रुकी।
"अब मुझे लगता है कि यह किताब किसी एक इंसान की नहीं है।"
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"तो फिर इसे यहीं रहने देते हैं।"
"जिसे जब ज़रूरत होगी..."
"किताब उसे रास्ता दिखा देगी।"
दोनों कमरे से बाहर जाने लगे।
लेकिन तभी...
ठक!
पीछे से आवाज़ आई।
दोनों एक साथ रुक गए।
अनन्या ने धीरे से पीछे देखा।
किताब अब भी बंद थी।
"शायद हवा से..."
आरव ने कहा।
लेकिन तभी...
ठक... ठक...
इस बार आवाज़ साफ थी।
अनन्या वापस मेज़ के पास गई।
उसने किताब उठाई।
किताब का कवर गर्म था।
"आरव..."
"यह गर्म है।"
आरव ने किताब को छुआ।
उसे भी गर्मी महसूस हुई।
फिर किताब अपने-आप खुल गई।
पन्ने तेजी से पलटने लगे।
पहला...
दूसरा...
दसवाँ...
पचासवाँ...
सभी पन्ने पार होते हुए किताब सबसे आखिरी पन्ने पर आकर रुक गई।
वहाँ वही वाक्य लिखा था—
"अगर तुम यह पढ़ रहे हो... तो कहानी अभी सच में खत्म नहीं हुई।"
लेकिन अब उसके नीचे एक और पंक्ति दिखाई दे रही थी।
"नई कहानी का पहला पन्ना तुम्हारे सामने है।"
अनन्या की साँस रुक गई।
"लेकिन यहाँ तो कोई पन्ना था ही नहीं..."
उसने किताब को पलटा।
किताब के पीछे से एक नया पन्ना निकल आया था।
बिल्कुल सफेद।
उस पर अभी तक एक भी शब्द नहीं था।
आरव ने पूछा,
"क्या यह वही नई किताब है जिसकी आवाज़ हमने सुनी थी?"
अनन्या ने सिर हिलाया।
"शायद।"
तभी कमरे में एक बच्चे की आवाज़ गूँजी—
"क्या आप मेरी कहानी लिखेंगे?"
अनन्या और आरव ने एक-दूसरे को देखा।
"कौन है?"
कोई जवाब नहीं आया।
फिर वही आवाज़—
"मैं बहुत समय से इंतज़ार कर रहा हूँ।"
आरव ने कमरे का दरवाज़ा खोला।
बाहर कोई नहीं था।
पूरा गलियारा खाली था।
लेकिन फर्श पर...
छोटे-छोटे पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।
गीली मिट्टी से बने हुए।
एक...
दो...
तीन...
वे निशान कमरे से बाहर की ओर नहीं जा रहे थे।
बल्कि...
सीधे दीवार तक जा रहे थे।
और दीवार के पास जाकर अचानक गायब हो गए।
आरव ने दीवार को हाथ लगाया।
"यहाँ कुछ है।"
उसने थोड़ा दबाव डाला।
दीवार का एक हिस्सा अंदर धँस गया।
और सामने एक छोटा-सा गुप्त दरवाज़ा खुल गया।
अंदर पूर्ण अंधकार था।
अनन्या ने पूछा,
"हवेली में यह कमरा कब से था?"
आरव ने सिर हिलाया।
"मुझे नहीं पता।"
दोनों अंदर गए।
कमरा बहुत छोटा था।
दीवारों पर पुरानी तस्वीरें लगी थीं।
कुछ तस्वीरों में लोग किताबें पढ़ रहे थे।
कुछ में लेखक लिख रहे थे।
और कुछ तस्वीरों में...
एक ही बच्चा दिखाई दे रहा था।
हर तस्वीर में अलग उम्र।
लेकिन चेहरा वही।
अनन्या धीरे-धीरे एक तस्वीर के पास गई।
उस बच्चे की आँखें उसे देखकर जैसे मुस्कुरा रही थीं।
तस्वीर के नीचे एक तारीख लिखी थी—
1897
दूसरी तस्वीर—
1924
तीसरी—
1958
चौथी—
1986
पाँचवीं—
2012
अनन्या के चेहरे पर हैरानी फैल गई।
"यह बच्चा..."
आरव ने कहा,
"हर युग में मौजूद था।"
अचानक सबसे आखिरी तस्वीर पर लिखे शब्द चमकने लगे।
"2026"
तस्वीर में वही बच्चा था।
लेकिन इस बार...
उसके हाथ में एक किताब थी।
और किताब के कवर पर लिखा था—
अधूरी किताब।
अनन्या के हाथ काँप गए।
"इसका मतलब..."
पीछे से आवाज़ आई—
"हाँ।"
दोनों पलटे।
वही बच्चा कमरे के दरवाज़े पर खड़ा था।
लगभग दस साल का।
सफेद शर्ट...
काले बाल...
और आँखों में अजीब-सी गहराई।
आरव तुरंत उसके सामने खड़ा हो गया।
"तुम कौन हो?"
बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—
"मेरा नाम..."
वह कुछ पल रुका।
फिर बोला—
"कबीर।"
अनन्या ने पूछा,
"तुम्हें इस किताब के बारे में कैसे पता?"
कबीर ने उसकी ओर देखा।
"क्योंकि..."
"यह किताब मेरी है।"
आरव चौंक गया।
"तुम्हारी?"
कबीर ने सिर हिलाया।
"लेकिन..."
"इसे मैंने नहीं बनाया।"
अनन्या ने पूछा,
"फिर किसने?"
कबीर की मुस्कान गायब हो गई।
उसने धीरे से कहा—
"जिसने पहली अधूरी किताब लिखी थी..."
अनन्या का दिल जोर से धड़कने लगा।
"लेकिन पहली लेखिका तो..."
कबीर ने उसकी बात पूरी की—
"तुम थीं।"
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
कबीर ने अपनी जेब से एक पुराना बुकमार्क निकाला।
उसे देखते ही आरव पहचान गया।
"यह..."
"प्रथम संपादक का बुकमार्क?"
कबीर ने कहा,
"उन्होंने मुझे दिया था।"
अनन्या ने घबराकर पूछा,
"उन्होंने तुम्हें क्यों दिया?"
कबीर ने सीधे उसकी आँखों में देखा।
"क्योंकि उन्होंने कहा था..."
"जब तुम दोनों कहानी का पुराना अध्याय बंद कर दोगे..."
"तब मुझे तुम्हारे पास आना है।"
अनन्या ने धीमे स्वर में पूछा—
"क्यों?"
कबीर ने किताब उसकी ओर बढ़ाई।
"क्योंकि..."
"अधूरी किताब का सीजन खत्म नहीं हुआ।"
"उसका असली रहस्य अब शुरू हुआ है।"
अचानक किताब के नए सफेद पन्ने पर पहला शब्द अपने-आप उभरा—
"कबीर"
फिर उसके नीचे दूसरा शब्द दिखाई दिया—
"जन्म..."
और तीसरी पंक्ति लिखी गई—
"वह बच्चा जिसे किसी कहानी ने कभी लिखा ही नहीं।"
अनन्या ने स्तब्ध होकर किताब को देखा।
आरव ने धीरे से पूछा—
"अगर उसे किसी कहानी ने लिखा ही नहीं..."
"तो फिर वह पैदा कैसे हुआ?"
कबीर ने सिर उठाया।
उसकी आँखें अचानक सुनहरी चमक से भर गईं।
वह मुस्कुराया।
और बहुत धीमे स्वर में बोला—
"क्योंकि मैं कहानी का पात्र नहीं हूँ..."
"मैं वह हूँ जो कहानियाँ बनने से पहले मौजूद था।"
कमरे की सारी लाइटें एक साथ बुझ गईं।
अंधेरे में सिर्फ अधूरी किताब चमक रही थी।
और उसके नए पन्ने पर आखिरी शब्द उभरा—
"शुरुआत..."
क्रमशः...