Forgotten name in Hindi Short Stories by Virendra Devangan books and stories PDF | भूल गया नाम

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भूल गया नाम

85 वर्षीय मनोहर आज अजीब पशोपेश में थे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि उनका नाम क्या है? वह अपना नाम जो भूल गए थे।

इसके पहले भी वे हालांकि चश्मा, घड़ी, पेन और न जाने क्या-क्या भूल चुके थे, लेकिन वे थोड़े-से प्रयास से या थोड़ी देर बाद मिल गये थे।  पर, नाम को भूल जाना उन्हें अचंभित कर रहा था।

असल में वे तीन माह से अपने बेटी-दामाद के पास बैंगलोर में रह रहे थे।  उन्हें वहां अपने नाम की कोई जरूरत महसूस नहीं हुई और न किसी ने उन्हें उनके नाम से पुकारा।

जबकि गांव में उन्हें उनके संगी-साथी और बड़े-बुजुर्ग उनको उनके नाम से पुकारा करते थे। इसीलिए, उन्हें अपना नाम कंठस्थ था। अनजान शहर में उन्हें कौन नाम से पुकारता, लिहाजा वे अपना नाम ही भूल गए।

बेटी-दामाद तो उन्हें 'पापा' कहकर पुकारते थे।

अब, अनजान महानगर में उनके लिए स्थिति ये हो गई कि वे अपना नाम पूछे, तो किससे?
न कोई उन्हें जानता था, न वे किसी को जानते थे।

वे इसी उहापोह में पास के सब्जी मार्केट भी घूमे आए कि हो सकता है, घूमने-फिरने से उनकी याददाश्त वापस आ जाए या खुदा-न-खास्ता कोई जान-पहचान वाला मिल जाए, तो उसकी विकट समस्या का समाधान निकल आए।

वापसी के दौरान वे उस दुकानदार से भी सकुचाते हुए पूछे, जहां वे अक्सर घरेलू सामान लेने जाते थे और बैठकर टाइम पास करते थे,"सेठजी मेरा नाम क्या है?"

दुकानदार जहां हंसकर जवाब दिया, वहीं अन्य ग्राहक खिला-खिला कर हंस पड़े,"मुझे क्या मालूम दद्दा?"

इससे वह लज्जित होता हुआ अपने फ्लैट में चला गया। सोचा,' खुद का नाम भूल जाना एक अजीब समस्या है'

आज घर में बेटी-दामाद भी नहीं थे। वे जिस कंपनी के मैनेजर और असिस्टेंट मैनेजर थे, मीटिंग के लिए तड़के मुंबई निकल गए थे। वे 5 वर्षीय नाती को उनके भरोसे छोड़ते हुए कह गए थे कि हम लोग दिनभर मीटिंग में रहेंगे। अब, रात को ही आपसे मोबाइल में बात हो पाएगी।

हालांकि फ्लैट में दो-दो कामवालियां लगी हुई थीं, जो सुबह-शाम आती थीं। एक साफ-सफाई, झाड़ू , पोंछा, बर्तन करती थी, तो दूसरी चाय-नाश्ता, लंच व डीनर तैयार कर देती थी।

वे अभी शाम को इन्हीं कामवालियों के भरोसे नाती को छोड़कर बाजार गये हुए थे।

जब उन्हें बाजार में कोई न मिला, तो वे वापस  लौट कर निराश मन एक कामवाली से पूछे,"सौम्या, तुम बता सकती है कि मेरा नाम क्या है?"

अब, सौम्या को क्या मालूम कि 'अंकल' का नाम क्या है? जब से वे यहां आए हैं, उन्हें अंकल ही कह रही है।

वह अनभिज्ञता जाहिर करते हुए बोली,"नहीं तो अंकल। मैं क्या जानूं आपका नाम?"

"क्या जरूरत पड़ गई आपको अपने नाम की?" सौम्या अचरज से पूछी।

"जरूरत तो नहीं है, मगर मैं अपना नाम भूल गया हूं, इसीलिए पूछ रहा हूं।"

यह सुनकर वह अचम्भे में पड़ गयी। दांतों तले उंगली दबा ली।

तभी सौम्या को लगा कि उसके नाती से पूछ लिया जाए। वह उसके नाती को बुलाकर पूछी,"मन्ना, ये बता 'अंकल' का नाम क्या है?"

वह सहजता से मुस्कुराते हुए बोला,"मुझे मालूम है! इनका नाम नानाजी है!!"... और वह वहां से भाग खड़ा हुआ।

तभी गांव से उनके 84 वर्षीय पड़ोसी का फोन यह कहने के लिए आया कि वह उसके घर की रखवाली अब तक तो पूरी ईमानदारी से किया, पर आगे नहीं कर पाएगा, क्योंकि उसकी तबीयत खराब हो रही है।

वह बोला,"मनोहर', अब लौट आओ, तो अच्छा रहेगा। तबीयत बिगड़ने से आगे मैं तुम्हारे घर की रखवाली नहीं कर पाऊंगा।"

जैसे ही उसने अपना नाम सुना, वैसे ही उसे याद हो आया कि उसका नाम 'मनोहर' है। 

वह सोचा, 'बुढ़ापा जीवन की अजीब सांझ है, जो अपने नाम तक को भुला देता है और जाने क्या-क्या करता है; आगे-आगे देखिए होता है क्या?'
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लघुकथा पढ़ने के लिए हार्दिक शुक्रिया आपका। पढ़ने के उपरांत समीक्षा लिखना तो बनता है साथियों।