Tilsmi - Part 2 in Hindi Fiction Stories by Chandni choudhary books and stories PDF | तिलस्मी - भाग 2

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तिलस्मी - भाग 2

तिलस्मी

भाग द्वितीय

रात के अँधेरे में आकाश पर तारे टिमटिमा रहे थे। उदय सिंह अमर सिंह को पुकारता हुआ तिलस्मी महल के भीतर उसकी तलाश में आगे बढ़ रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अमर सिंह आखिर कहाँ चला गया।

वह महल के उन हिस्सों की ओर बढ़ता गया, जहाँ वे दोनों आज तक कभी नहीं गए थे। आगे बढ़ते-बढ़ते उसे तिलस्मी महल के भीतर जाने का एक अनजाना रास्ता दिखाई दिया।

उदय सिंह सावधानी से उस रास्ते पर आगे बढ़ा। कुछ दूर जाने पर उसकी नजर एक रहस्यमयी दरवाजे पर पड़ी। दरवाजे पर दो हंसों की सुंदर प्रतिमाएँ बनी हुई थीं।

उदय सिंह कुछ क्षण उस दरवाजे को देखता रहा। उसने उसे खोलने का प्रयास किया, लेकिन उसे कोई उपाय समझ नहीं आया।

तभी दरवाजे के किनारे लगी मिट्टी पर उसका हाथ गया। मिट्टी हटाने पर उसकी उँगलियों को कोई कठोर वस्तु महसूस हुई।

उसने मिट्टी हटाकर देखा तो वहाँ एक चाबी पड़ी थी।

उदय सिंह ने चाबी हाथ में ली और मन ही मन सोचा—

“शायद यही इस दरवाजे की चाबी है।”

उसने चाबी ताले में लगाई, लेकिन दरवाजा नहीं खुला।

उदय सिंह ने आश्चर्य से दरवाजे को देखा। फिर उसने चाबी वहीं लगी रहने दी और दरवाजे के दूसरे हिस्से पर अपना हाथ रखा।

अचानक एक तेज और भयंकर आवाज गूँज उठी।

उदय सिंह एक पल के लिए वहीं ठिठक गया।

तभी एक रहस्यमयी वाणी सुनाई दी—

“जिसे तुम ढूँढ रहे हो, वह तुम्हें यहीं मिलेगा... और एक दिन ऐसा आएगा, जब इस सारे रहस्य से पर्दा उठेगा, उदय सिंह।”

उदय सिंह के मन में जैसे तूफान उठ गया।

“यह कैसी आवाज थी? इसे मेरा नाम कैसे पता? और इसे कैसे पता कि मैं किसे ढूँढ रहा हूँ?”

वह अभी इन प्रश्नों के उत्तर खोज ही रहा था कि दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा।

उदय सिंह कुछ क्षण उस खुले हुए दरवाजे को देखता रहा। उसके भीतर गहरा अँधेरा था।

उसने साहस किया और एक कदम अंदर बढ़ाया।

तभी पीछे से परिचित आवाज आई—

“उदय सिंह!”

उदय सिंह तुरंत पीछे मुड़ा।

सामने अमर सिंह को देखकर वह आश्चर्यचकित रह गया।

“अमर सिंह! तुम कहाँ चले गए थे? मैं तुम्हें न जाने कब से ढूँढ रहा था। मैंने तुम्हें बाहर भी बहुत खोजा, लेकिन तुम कहीं नहीं मिले!”

अमर सिंह ने शांत स्वर में कहा—

“मित्र, पहले स्नान कर लेते हैं। सुबह होने वाली है। उसके बाद पूजा-पाठ करके आराम से बैठेंगे, तब मैं तुम्हें सब कुछ बताऊँगा।”

उदय सिंह ने कुछ पूछना चाहा, लेकिन अमर सिंह वहाँ से आगे बढ़ गया। उदय सिंह भी उसके पीछे चल पड़ा।

दोनों ने स्नान किया, पूजा-पाठ किया और अपने वस्त्र सुखाने के लिए रख दिए। इसके बाद उन्होंने नए वस्त्र धारण किए।

फिर दोनों तिलस्मी महल के एक कमरे में जाकर बैठ गए।

वह कमरा देखकर उदय सिंह को आश्चर्य हुआ। महल में कोई रहता नहीं था, फिर भी वह कमरा अत्यंत सुंदर और सुसज्जित था। उसकी दीवारें सुंदर चित्रकारियों से सजी थीं और उनमें वीर योद्धाओं की आकृतियाँ बनी हुई थीं।

दोनों मित्र वहाँ बैठ गए।

अमर सिंह ने अपनी पोटली खोली और उसमें से कंद-मूल, फल और बेर निकालकर सामने रख दिए।

उदय सिंह की उत्सुकता अब और बढ़ गई थी। उसके मन में पिछली रात की आवाज और वह रहस्यमयी दरवाजा बार-बार घूम रहा था।

उसने अमर सिंह की ओर देखते हुए कहा—

“मित्र, अब मुझे कल रात का पूरा वृत्तांत बताओ। तुम कहाँ चले गए थे? मैं तुम्हें बहुत देर तक खोजता रहा।”

अमर सिंह कुछ क्षण शांत रहा। फिर उसने उदय सिंह की ओर देखा और पिछली रात की घटना बताने लगा।

उधर दूसरी ओर रूपवती भी अपने कक्ष में उदय सिंह के विचारों में खोई हुई थी।

बार-बार उसके सामने वही चेहरा आ रहा था, जिसे उसने दुनावत नगर में पहली बार देखा था।

वह मन ही मन सोच रही थी—

“काश! वह एक बार फिर दिखाई दे जाए... तो मैं उससे पूछूँ—तुम कौन हो?”

उसे स्वयं भी समझ नहीं आ रहा था कि एक अनजान युवक की छवि उसके मन में इतनी गहराई से क्यों बस गई है।

और इधर तिलस्मी महल के उस रहस्यमयी कमरे में अमर सिंह अब उस रात का ऐसा वृत्तांत सुनाने वाला था, जिसका संबंध शायद उसी तिलस्मी महल के रहस्य से था।

वह आवाज किसकी थी?

दरवाजे पर बनी दो हंसों की प्रतिमाओं का क्या रहस्य था?

और अमर सिंह पिछली रात आखिर कहाँ चला गया था?

इन प्रश्नों के उत्तर अभी तिलस्मी महल की गहराइयों में छिपे थे...