मेरे मन में उस डर का बीज शायद तभी रोपा गया था, जब पिछले दिनों पापा मेरे ग्यारहवें जन्मदिन पर मेरे लिए ‘क्लूडो’ नाम का एक खेल उपहारस्वरूप लाए थे।
खेल के साथ एक कहानी जुड़ी थी— छह कमरोः वाले एक घर के मालिक ने छह अतिथियों को रात्रिभोज के लिए घर पर बुलाया और भोज के बाद उस की हत्या हो गई। खिलाड़ियों को बंटे पत्तों के सहारे तीन इकाइयां बूझनीं होतीं—हत्यारा, हथियार और घटनास्थल।
एक तहदार बोर्ड के बिछने पर खेल शुरू किया जाता। बोर्ड पर छह कमरों के साथ चौकोर खाने चिह्नित थे, जिन्हें पांसे की फेंक पर ऊपर आए अंक के हवाले से खिलाड़ी अपनी- अपनी गोटी विभिन्न कमरों की दिशा में ले जा कर पार करते और वहां पहुंचने पर हथियार और हत्यारे का नाम बूझने का अवसर पाते।
मुझ से ज़्यादा पापा उस खेल में रुचि लेने लगे थे। विशेषकर उस के हथियारों में। जो उन्हें बहुत उत्साहित कर दिया करते। उन्हें वह छूते,उठाते और वापस धर देते। हथियार थे भी भयंकर : पिस्तौल, छड़ी, रस्सी, छुरा, कुल्हाड़ी और स्पैनर।
मैं जानता था पापा मां को पसंद नहीं करते थे।और उन से छुट्टी पाना चाहते थे। कारण शायद मां का एग्ज़ीमा था। हालांकि वह संक्रामक नहीं था। मगर था क्रौनिक। चिरकालिक। सिबौहिरिक डर्माटाइटिस। इस में त्वचा के सिलेबस ग्लैंडज़ , वसामय ग्रंथियां बहुसंख्यक हो जाती हैं और सोबम का, वसा का उत्पादन अतिशय मात्रा में होने लगता है। साथ ही त्वचा पर, विशेषकर पीठ और चेहरे पर फुंसियां निकल आती हैं, जिन की मृत कोशिकाओं की बाहरी परत फिर पपड़ी बन कर गिरने लगती है।
वैसे तो गर्मी के महीनों में धूप के आधिक्य के कारण यह रोग कम तंग करता है किंतु मानसिक तनाव की वजह से वह कभी भी आ धमकता है।
अब अपने स्कूल की क्लास में क्लुडो के हथियार वृहताकार रूप में मेरी आंखों के आगे घूमने लगते और मैं सोचता मेरे घर पहुंचने पर मां मुझे मृत मिलेंगी।
पापा जिस डिग्री कालेज में पढ़ाते थे, वह वहां से किसी समय भी घर पर आ जाया करते। विषेशकर हर माह के पहले, तीसरे और पांचवे शनिवार को।
जिस दिन उन का दूरदर्शन पर प्रोग्राम रहा करता : समालाप।
‘समालाप’ के अंतर्गत पापा किसी विशिष्ठ व्यक्ति से पंद्रह मिनट तक बातचीत किया करते।
किंतु उन पंद्रह मिनटों के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्नों को तैयार करने हेतु वह घर पर घंटों पढ़ते और फिर जैसे ही उन्हें नोकदार और चरपरे प्रश्नों का संतोषजनक उपक्रम मिलता, वह अपनी आवाज़ को उन के अनुरूप साधने लगते। आवाज़ के मोड़, उस के उतार- चढ़ाव तथा अपने शब्दों की रूप- रचना, विभक्ति तथा सुर- परिवर्तन के फ़ुरतीलेपन पर अतिरिक्त अधिकार पाने की खातिर।
मेरी दुर्भीति पर और भार लादा दूरदर्शन की एक प्रोड्यूसर आशा चौधरी के टेलिफ़ोन ने। जिसे मां ने सुना और पापा को सुनाया, “इस वैलेंटाइन डे पर आशा चौधरी हम दोनों को अपने प्रोग्राम में रखना चाहती है। दो अन्य दम्पत्तियों के साथ, जो हमारी तरह प्रेम- विवाह किए हैं।”
“आशा चौधरी एक शरारती औरत है,” पापा भड़क लिए, “तुम उस की बातों में न आना….”
“इस में शरारत कैसी?” मां बोलीं, “तीन दम्पत्तियों में एक दम्पत्ति की शादी पिछले महीने हुई है, दूसरी की शादी को पच्चीस साल हो गए और तीसरे हम रहेंगे, बारह साल पुरानी शादी वाले….”
“असल में वह मुझे नीचा दिखाना चाहती है। तुम्हें मेरे साथ इसलिए रख रही है ताकि सारी दुनिया जान ले मैं कैसी औरत के साथ अपनी ज़िंदगी घसीट रहा हूं। बाहर की दुनिया में अपने ‘समालाप’ द्वारा जिस लोकप्रियता के शिखर पर आज मैं खड़ा हूं वह मुझे वहां से नीचे उतार लाना चाहती है। जो लोग मुझे बताया करते हैं कि बड़े से बड़े वी.आई. पी.(बहुत महत्वपूर्ण परसन) को मैं एल.आई.पी. (कम महत्वपूर्ण परसन )महसूस कराने में सफल रहता हूं,वही लोग तुम्हारे साथ देख कर मुझे ‘एन अनइम्पौर्टैट परसन’ (एक महत्वहीन व्यक्ति) मानने लगेगें। मेरी हाज़िरजवाबी, मेरी तीखी नज़र,मेरी मज़बूत पकड़ सब धरी की धरी रह जाएगी, जब लोग- बाग देखेंगे कि कैसे मैं ने आंखें मूंद कर तुम जैसी फूहड़ कोढ़िन के साथ शादी कर रखी है….”
“कोढ़िन? क्या आप ने मुझे कोढ़िन कहा?” मां रोने लगीं, “मेरे एग्ज़ीमे को आप कोढ़ मानते हैं?”
“यह कोढ़ नहीं तो क्या है? कैसा तो मवाद फूटा करता है इन सब फोड़े - फुंसियों से….”
“आप मुझ से इतनी ज़्यादा नफ़रत करते हैं,” मां का रोना बढ़ चला।
“जाओ, उधर जा कर आंसू टपकाओ,” पापा चिल्लाए, “मेरे सामने मनहूसियत मत फैलाया करो….”
“जा रही हूं….. मनसा….वाचा….कर्मणा….”
उसी रात मुझे लगा, ‘काश, इन दोनों से मुझे बारह साल पहले मिलने का अवसर मिला होता! उन्हें चेताने हेतु, सावधान! शादी रोक लो। आगे कष्ट है। क्लेश है। आपदा है। यह शादी हरगिज़ न करना।’
उसी रात मां ने आत्महत्या की थी।
न पिस्तौल से। न छड़ी से। न रस्सी से। न कुल्हाड़ी से। न छुरे से। न स्पैनर से।
अपनी नींद की ज़्यादा गोली से।
शब्द- शस्त्रास्त्र के तहत…..