my first school trip in Hindi Travel stories by rawat books and stories PDF | मेरी पहली स्कूल ट्रिप

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मेरी पहली स्कूल ट्रिप

अक्सर जब हम विद्यार्थी जीवन में होते हैं तो हमें अपने दोस्तों के साथ बिताये वो दिन और अध्यापकों को याद करते हैं जिनके साथ हमने स्कूली जीवन बिताया था। जिनमें अक्सर कुछ खास दिन ऐसे होते हैं जिन्हें हम शायद ही भूल सकें, जो शायद हर विद्यार्थी के लिए अलग-अलग हो सकता है। 

तो मैं अपने स्कूली जीवन के कुछ खास दिनों में बिताये गये पलों को आपके साथ शब्दों में अनुभव करना चाहता हूँ जो है "मेरी पहली स्कूल ट्रिप"। 

तो ये उन दिनों की बात है जब मैंने मैट्रिक पास करके 11th में कदम रखा था। जोकि मेरे लिए रोमांचक था, क्योंकि हमारा स्कूल एक पहाड़ी इलाके में था तो जहाँ शायद ही कभी स्कूल ट्रिप का सपना पूरा हो सकता था। जहाँ हमारे गाँव से स्कूल की दूरी लगभग 2-3 km थी। जहाँ बरसात में नरम भूस्खलन- रास्तों का सामना करके स्कूल पहुँच जाना पड़ता था जो मैदानी इलाकों के मुकाबले काफी कठिन था, तो मैं अपनी कहानी पर वापस आता हूँ अपने स्कूल ट्रिप को शुरू करता हूँ। 

तो मेरा स्कूल  उत्तराखंड  के गगन-चुंबी पहाड़ियों के बीच स्थित है जहाँ के 
पर्यटन स्थल ज्यादातर पहाड़ी इलाकों में ही होते हैं। उन दिनों अप्रैल का महीना था और हम सब नई कक्षाओं में जाने का आनंद ले रहे थे। मेरी कक्षा में लगभग 33-34 विद्यार्थी थे। 

कुछ दिनों से स्कूल का माहौल बदला-बदला सा लग रहा था। कानों में खबर पड़ रही थी कि स्कूल के सभी विद्यार्थी किसी ट्रिप पर जाने वाले हैं। 

पहले तो मुझे इन बातों पर यकीन ही नहीं हुआ, क्योंकि मैं आज तक कभी स्कूल ट्रिप पर गया ही नहीं था। फिर धीरे-धीरे पता चला कि सिर्फ चार कक्षाएं - 9वीं से 12वीं तक - ही ट्रिप पर जाएंगी। अब थोड़ा-थोड़ा विश्वास होने लगा था। 

मन में एक ही बात थी - काश ये सच हो! और फिर वो दिन आ ही गया जिसका सबको इंतजार था। 

प्रिंसिपल सर स्टेज पर आए और उन्होंने बताया कि सरकार द्वारा 9वीं से 12वीं कक्षा के बच्चों को स्कूल ट्रिप पर ले जाया जाएगा। ये ट्रिप दो समूहों में होगी - एक दिन 9वीं और 11वीं के बच्चों की, और दूसरे दिन 10वीं और 12वीं के बच्चों की। 

ये सुनते ही मेरा मन खुशी से झूम उठा। उस खुशी को शब्दों में बयान करना मुश्किल है। हम उसी पल से उस दिन के सपने देखने लगे थे... 



हम बस यही सोचते रहते कि काश वो दिन कब आएगा जब हम अपनी पहली स्कूल ट्रिप पर जाएंगे। फिर अध्यापकों ने फैसला सुनाया कि पहले 10वीं और 12वीं के बच्चों को ट्रिप पर ले जाया जाएगा। हम 11वीं वाले थे, तो हमें थोड़ा और इंतजार करना पड़ा। पर कोई बात नहीं। 

और आखिरकार वो दिन आ ही गया, जब मेरा सपना सच होने वाला था। 

ट्रिप से एक दिन पहले ही अध्यापकों ने हमें बता दिया था कि हमें अपना खाना, गर्म कपड़े, पानी की बोतल और बाकी जरूरी सामान साथ रखना है। 

फिर शुरू हुई मेरी यात्रा की वो पहली सुबह। आसमान खुला था, धूप चमक रही थी, पक्षी चहचहा रहे थे और ऊँचे-ऊँचे पहाड़ मानो मुझे मेरी पहली स्कूल ट्रिप की बधाई दे रहे थे। 

हमारी मंजिल लगभग 35-40 किलोमीटर दूर थी, इसलिए पूरी यात्रा बस से तय होनी थी। सुबह-सुबह मैं और मेरे दोस्त बस में बैठ गए। ट्रिप पर जाना किसी सपने के सच होने से कम नहीं था। हम सब मस्ती के मूड में थे। 

हमारी ट्रिप में करीब 65-70 विद्यार्थी थे और हमारे साथ 3 अध्यापक भी थे - दो सर और एक मैडम। हमने वहाँ पहुँचकर दोस्तों के साथ तस्वीरें खिंचवाईं, घूमे और खूब मजे किए। वहाँ जो हमारे टूरिस्ट गाइड थे, वो हमें वहाँ के बारे में बता रहे थे कि यह जगह 200 साल पुरानी है जो कि किसी राजा-महाराजा ने बनवाया था। जिससे हमें काफी कुछ नया सीखने को मिला। 

वहाँ से वापस आते वक्त हमें एक म्यूजियम की सैर भी करवाई गई, जो काफी बड़ा था। जिसमें सालों पुरानी चीजें जैसे - टीवी, बर्तन और कई उपयोगी सामान थे जो हमें अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। 

वहाँ से घूमने के बाद हम एक बहुत बड़े पार्क में गए जहाँ सबने मिलकर खाना खाया। उसके बाद वहाँ स्लाइड पर गए, झूला झूले और कई खेल खेले, जो काफी आनंददायक था। 


और फिर हम निकल पड़े अपने-अपने घर की ओर। 

यही वो दिन था जब हमने इस यात्रा की शुरुआत की थी, और यह वही दिन था जो मेरे एक विद्यार्थी जीवन और मेरी जिंदगी का यादगार पल थे, जिन्हें मैं आपके साथ शब्दों में बयान कर रहा हूँ। और आज मैं जब 12th पास कर चुका हूँ, जब कभी अपनी स्कूली जीवन को याद करता हूँ तो मेरा मन शांत हो जाता है। 

याद आती है उन पलों की, उन दोस्तों की जो शायद कभी दोबारा मिल सकें। वह सुकून भरी जिंदगी जिसमें सिर्फ हवाओं से बात करनी होती थी। 

और ये शब्द मेरी प्रिय डायरी के नाम - 

*_कि सुकून मिला तुम्हारे उन पलों में ऐ जिंदगी, 
जो चाहकर भी दोबारा न मिल सकेंगे।_*