Good Servant in Hindi Motivational Stories by Wajid Husain books and stories PDF | गुड सर्वेंट

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गुड सर्वेंट

            वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानी

हेड पोस्ट ऑफिस की पुरानी इमारत शहर के बीचो-बीच अंग्रेज़ी हुकूमत की अकड़ की तरह खड़ी थी। सुबह के धुंधलके में जब पूरा शहर उनींदा पड़ा रहता, तब बाबू सतीश चंद्र सबसे पहले इस इमारत का ताला खुलवाता। वह अपनी नौकरी को पूजा समझता था। उसकी दुनिया कुछ रजिस्टरों, सरकारी मुहरों और हिसाब- किताब की सीधी रेखाओं में सिमटी हुई थी। 

सतीश की एक आदत पूरे दफ्तर में मशहूर थी- वह पोस्टमास्टर वाल्टर मसीह के आने से पहले पहुंचता और उनके जाने के बाद ही घर लौटता। अंग्रेज़ पोस्ट मास्टर कई बार उसके इस समर्पण पर मुस्कुराया भी था। एक दिन तो उसने पीठ थपथपाकर कहा था- "गुड सर्वेंट।"

 बस वही दो शब्द सतीश के जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार बन गए थे। वह कई दिनों तक उन शब्दों को मन-ही-मन दोहराता रहा था। उसे लगता था कि उसकी मेहनत आख़िर किसी की नज़र में तो आई। घर लौट कर उसने पत्नी से भी गर्व से कहा था-"गोरे साहब ने ख़ुद मेरी तारीफ की है।" पत्नी ने मुस्कुरा कर कहा था-"तारीफ से चूल्हा नहीं जलता जी, तनख़्वाह बढ़वा लेते।" सतीश हंस पड़ा था। उसे सचमुच लगता था कि ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है। 

 ज़िले भर के खातों का मिलान करना, पासबुक देखना, जमा-निकासी की जांच करना उसका रोज़ का काम था। वह अंको को ऐसे पढ़ता था जैसे कोई पुजारी धार्मिक ग्रंथ पढ़ता हो। छोटी- सी गड़बड़ी भी उसकी नज़र से बच नहीं सकती थी।

एक दिन वह मोटे रजिस्टरों में नज़रें गड़ाए हुए था तभी एक खाते पर उसकी नज़र टिक गई। शहर के बड़े व्यापारी विपिन अग्रवाल के खाते में निकासी की रक़म दर्ज थी-दस रुपए। लेकिन दस के आगे किसी ने चालाकी से एक शून्य जोड़ दिया था। रक़म सो हो गई थी। यानी नब्बे रुपए गायब थे।

सतीश का गला सूख गया। उसने कांपते हाथों से दूसरी एंट्री देखी। फिर तीसरी। सब कुछ साफ था-किसी ने विपिन अग्रवाल के खाते में हेरा फेरी की थी। 

उसके माथे पर पसीना छलक आया। वह रजिस्टर उठाकर सीधा पोस्ट मास्टर के कमरे की ओर भागा। 

वाल्टर मसीह अपने बड़े से कमरे में बैठा कुछ अर्ज़ियां देख रहा था। सामने कई लोग खड़े थे। उसकी नीली आंखों में वही हमेशा की तरह हुकूमत का अहंकार तैर रहा था। सतीश ने झुककर रजिस्टर आगे बढ़ाया-"सर... इसमें शायद..."

वाल्टर मसीह ने रजिस्टर खोला। एक पल के लिए उसकी आंखें ठिठकीं। फिर उसने तुरंत रजिस्टर बंद कर दिया। 

"तुमसे यह चेक करने को किसने कहा?"

"सर... मिलान करते समय..."

"गेट आउट!"

कमरे में अचानक सन्नाटा फैल गया। 

सतीश हक्का-बक्का बाहर आ गया। पहली बार उसे लगा की गोरे साहब की आंखों में डर था। वही आदमी जिसे वह ईमानदारी का प्रतीक मानता था, आज उसकी और ऐसे देख रहा था जैसे कोई चोर पकड़ा गया हो। 

उस दिन दफ्तर बंद होने के बाद भी पोस्ट मास्टर अपने कमरे में रुका रहा। बाहर अंधेरा गहराने लगा। चपरासी जा चुके थे। पर सतीश अपनी पुरानी आदत के मुताबिक बैठा रहा। वह हमेशा पोस्ट मास्टर के निकलने के बाद ही निकलता था। पोस्टमास्टर बार- बार कमरे में झांकता। उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। आख़िर वह तमतमाता हुआ बाहर आया और सतीश का गिरेबान पकड़ लिया-"यू बास्टर्ड। ऑफिस बंद होने के बाद यहां क्यों बैठा है?"

"सर... मैं तो रोज़..."

"गेट आउट!"

उसने सतीश को धक्का दे दिया।

सतीश सहम गया। घर पहुंचकर उसने न वर्दी उतारी न किसी से बात की। बस सीधे सोफे पर ढह पड़ा। पत्नी घबराई हुई उसके सामने आ खड़ी हुई। 

"क्या हुआ?"

काफी देर बाद उसने पूरी बात बताई। 

"आप पागल हो गए हैं क्या?" उसने धीमी लेकिन कांपती आवाज़ में कहा, "चौदह रुपए महीने की नौकरी है आपकी। अगर गौरे साहब ने सारा इल्ज़ाम आप पर डाल दिया तो?"

"पर मैंने कुछ किया नहीं..."सतीश ने हकलाते हुए कहा।

"किसे फर्क पड़ता है? अंग्रेज़ का कहा सच माना जाएगा या एक बाबू का?"

सतीश चुप रहा।

पत्नी की आंखें भर आई-"नौकरी गई तो घर कैसे चलेगा? विमला की शादी अगले साल करनी है। जेल हो गई तो हम सड़क पर आ जाएंगे। मेरी मानिए... चुप रहिए। जैसे सब आंख बंद करके जीते हैं, वैसे ही जी लीजिए।"

 सतीश ने पहली बार अपने भीतर डर को सिर उठाते महसूस किया। उसे लगा जैसे सच बोलना कोई पुण्य नहीं, अभिशाप है।

उसी समय कोने में बैठी उसकी पंद्रह साल की बेटी विमला बोली, पापा मास्टर जी कहते हैं-"पाप करने वाला और पाप छिपाने वाला, दोनों बराबर के अपराधी होते है।"

कमरे में अचानक सन्नाटा फैल गया। 

पत्नी झल्ला उठी-"तुम बीच में मत बोलो। किताबों की बातें ज़िंदगी में नहीं चलतीं।"

लेकिन सतीश की आंखें बेटी के चेहरे पर टिक गई। वहां डर नहीं था, केवल सीधी सच्ची चमक थी। 

उस रात वह सो नहीं पाया। कभी पत्नी का भय उसके सामने खड़ा हो जाता, कभी बेटी की आवाज़। सुबह होते-होते उसने फैसला कर लिया। अगले दिन उसने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी। दोपहर तक पुलिस पोस्ट ऑफिस पहुंच गई। रजिस्टर निकाले गए। खाते जांचे गए। सब कुछ एकदम साफ था। कहीं कोई गड़बड़ी नहीं‌। सतीश के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह समझ गया-उसके जाने के बाद रात में रिकॉर्ड बदल दिए गए थे। 

वाल्टर  मसीह ने सख्त आवाज़ में कहा-"यह आदमी दफ्तर की प्रतिष्ठा ख़राब करना चाहता है।" कुछ ही दिनों में सतीश को नौकरी से निकाल दिया गया। आदेश में लिखा था-"कर्तव्य में लापरवाही और झूठी शिकायत।"

जिस आदमी ने पूरी ज़िंदगी सरकारी मुहरों को भगवान समझा था, वहीं अब सरकारी कागज़ के एक टुकड़े से अपराधी बना दिया गया था। 

धीरे धीरे घर के हालत बिगड़ने लगी। बर्तन बिके। पत्नी के गहने गिरवी रखे गए। विमला की शादी टूट गई। लड़के वालों ने साफ कह दिया-"जिस लड़की का बाप नौकरी से निकाला गया हो, उससे रिश्ता नहीं करेंगे।"

सतीश अब कभी स्टेशन पर बोरे ढोता, कभी दुकानों के हिसाब लिखता। लेकिन शहर की नज़र में वह "निकाला हुआ बाबू" बन चुका था। सबसे ज़्यादा उसे तब चोट लगती जब पुराने डाकिए उसे देखकर रास्ता बदल लेते। 

एक दिन उसे बाज़ार में पुराना पोस्टमैन रामदीन मिला। उसने इधर-उधर देखकर धीरे से कहा-"बाबूजी, गलती आपकी बस इतनी थी कि आपने सच को सरकारी दफ्तर में खोज लिया।"

उस रात सतीश बहुत देर तक रोता रहा। उसे पहली बार लगा कि ईमानदारी शायद गरीबों के लिए सबसे महंगी चीज़ है। 

करीब छः महीने बाद व्यापारी विपिन अग्रवाल किसी काम से पोस्ट ऑफिस पहुंचे। बातचीत में उन्हें पुराने घोटाले की भनक लगी। उन्होंने अलग-अलग कर्मचारियों से पूछताछ की। तब जाकर उन्हें पता चला कि उनके खाते से पैसे निकालने का विरोध करने वाला बाबू नौकरी से निकाल दिया गया था। 

विपिन अग्रवाल सीधे सतीश के घर पहुंचे। 

टूटी चारपाई, सीलन भरी दीवारें और कोने में बैठी विमला को देखकर वह कुछ देर चुप रहे। 

"आपने मेरे लिए नौकरी गंवा दी?" उन्होंने भारी आवाज़ में पूछा। 

सतीश सिर झुकाकर बोला-"मैंने सिर्फ अपना फ़र्ज़ निभाया था।"

विपिन अग्रवाल की आंखें भर आई। उन्होंने उसी समय सतीश को अपनी फर्म में मुनीम की नौकरी दे दी। वेतन पोस्ट ऑफिस से तीन गुना ज़्यादा था। 

धीरे-धीरे ज़िंदगी पटरी पर लौटने लगी। सतीश फिर से साफ कपड़े पहनने लगा। घर में चूल्हा ठीक से जलने लगा। लेकिन उसके भीतर विमला की शादी टूटने की टीस बाकी थी। 

एक दिन किसी काम से विपिन अग्रवाल सतीश के घर आए। उन्होंने पूछा-"अंग्रेज़ के ख़िलाफ़ आपने सच बोलने की हिम्मत कैसे की?"

सतीश ने मुस्कुरा कर विमला की ओर देखा-"मैं नहीं इसने हिम्मत दी थी।"

विमला झेंप गई।

विपिन अग्रवाल देर तक उसे देखते रहे। उन्हें लगा जिस लड़की ने अपने पिता को सच पर टिके रहने की ताक़त दी, वह साधारण नहीं हो सकती। 

कुछ महीनो बाद उन्होंने अपने बेटे के लिए विमला का रिश्ता भेज दिया। शादी के दिन जब बारात दरवाज़े पर पहुंची, सतीश को समझ आया-उसने ज़िंदगी भर "गुड सर्वेंट" बनने के लिए सरकारी मुहरों पर भरोसा किया था लेकिन सबसे बड़ी मुहर अदालत या दफ्तर की नहीं इंसान की आत्मा की होती है। वह लग जाए तो बरी होने के लिए किसी आदेश की ज़रूरत नहीं पड़ती।

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