A Red Diary in Hindi Crime Stories by Shubhra Dubey books and stories PDF | A Red Diary

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A Red Diary

* Crime Story *

## A Red Diary ##

रात के ठीक बारह बजे थे। शिमला की वादियों में बर्फ़बारी शुरू हो चुकी थी और मल्लिक विला के बाहर सन्नाटा पसरा था। लेकिन विला के भीतर का माहौल उस बर्फीली रात से भी ज्यादा ठंडा और खौफनाक था। इंस्पेक्टर विक्रम सिंह अपने भारी बूटों की आवाज के साथ आलीशान बंगले के लिविंग रूम में दाखिल हुए। उनके सामने एक लाश पड़ी थी—शहर के मशहूर बिजनेसमैन दिग्विजय मल्लिक की।

दिग्विजय मल्लिक अपनी आरामकुर्सी पर बैठे थे, उनका सिर एक तरफ झुका हुआ था। गले पर उंगलियों के गहरे नीले निशान साफ गवाही दे रहे थे कि उनका गला घोंटा गया था। कमरे की हालत अजीब थी। खिड़कियां अंदर से कसकर बंद थीं और उनके भारी पर्दे गिरे हुए थे। कमरे का इकलौता दरवाजा भी अंदर से बंद था, जिसे कुछ देर पहले ही घर के नौकरों ने कुल्हाड़ी से काटकर खोला था।
"तो, यह एक क्लासिक 'बंद कमरे का रहस्य' है," विक्रम ने अपने असिस्टेंट, सब-इस्नेपेक्टर अमित की तरफ देखते हुए कहा।
"जी सर," अमित ने अपनी डायरी संभालते हुए जवाब दिया। "डॉक्टर के मुताबिक मौत करीब दो घंटे पहले, यानी रात दस बजे के आसपास हुई है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि कमरे की चाबी दिग्विजय जी की जेब के अंदर थी। अगर कातिल बाहर गया, तो उसने दरवाजा अंदर से कैसे लॉक किया? और अगर वह अंदर ही था, तो गया कहां?"
विक्रम ने कमरे का बारीकी से मुआयना करना शुरू किया। वह हर छोटी चीज को देख रहे थे—मेज पर रखी आधी खाली व्हिस्की की बोतल, दो ग्लास, एशट्रे में सुलगकर बुझ चुकी सिगरेट के टुकड़े, और फर्श पर बिखरी हुई कुछ फाइलें। साफ था कि मौत से पहले दिग्विजय किसी के साथ बैठकर ड्रिंक कर रहे थे। वह शख्स कोई अजनबी नहीं, बल्कि उनका बेहद करीबी रहा होगा।
"घर में इस वक्त कौन-कौन मौजूद है, अमित?" विक्रम ने दस्ताने पहनते हुए पूछा।
"सर, तीन लोग हैं। दिग्विजय जी की युवा पत्नी कामिनी, उनका सौतेला बेटा राहुल, और उनका पुराना वफादार नौकर रामू। इन तीनों के अलावा इस विला में कोई नहीं आ सकता, क्योंकि बाहर दो खूंखार रॉटवाइलर कुत्ते खुले घूमते हैं। अगर कोई अजनबी आता, तो वे जरूर भौंकते।"
विक्रम ने एक गहरी सांस ली। मामला पेचीदा था, लेकिन कातिल इसी घर में था। उन्होंने सबसे पहले कामिनी को पूछताछ के लिए बुलाया। कामिनी दिखने में बेहद खूबसूरत थी, लेकिन इस वक्त उसकी आंखों में आंसू और चेहरे पर डर साफ दिख रहा था।
"मिसेज मल्लिक, रात नौ से ग्यारह के बीच आप कहां थीं?" विक्रम ने नरम लेकिन सख्त लहजे में पूछा।
"मैं... मैं अपने बेडरूम में थी, इंस्पेक्टर," कामिनी ने कांपती आवाज में कहा। "मुझे सिरदर्द था, इसलिए मैं रात नौ बजे ही दवा खाकर सो गई थी। मुझे तो तब पता चला जब रामू ने चिल्लाकर सबको जगाया।"
"क्या आपके और दिग्विजय जी के बीच सब ठीक था? सुना है दिग्विजय जी अपनी वसीयत बदलने वाले थे?" विक्रम का सवाल सीधा और तीखा था।
कामिनी के चेहरे का रंग उड़ गया। "यह सच नहीं है! हां, हमारे बीच मामूली अनबन होती थी, लेकिन मैं उनसे बेहद प्यार करती थी। वसीयत के बारे में मुझे कुछ नहीं पता।"
कामिनी के जाने के बाद विक्रम ने राहुल को बुलाया। राहुल एक बिगड़ैल और अय्याश किस्म का युवक था, जिस पर कर्ज का भारी बोझ था। वह पुलिस को देखकर भी बिल्कुल भी विचलित नहीं लग रहा था।
"इंस्पेक्टर, सीधे मुद्दे पर आइए," राहुल ने सोफे पर बैठते हुए कहा। "मुझे मालूम है आप मुझ पर शक कर रहे हैं। लेकिन मैं रात साढ़े नौ बजे अपने कमरे में चला गया था और हेडफोन लगाकर गेम खेल रहा था। आप मेरे फोन का डेटा चेक कर सकते हैं। और हां, बुड्ढे के मरने से सबसे ज्यादा फायदा मुझे ही है, यह मैं छुपाऊंगा नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि खून मैंने किया है।"
"और वह दरवाजा अंदर से कैसे बंद हुआ, राहुल? क्या तुम्हें कोई जादू आता है?" विक्रम ने उसकी आंखों में झांकते हुए पूछा।
"वह तो आप पुलिस वालों का काम है ढूंढना," राहुल ने मुस्कुराते हुए कहा।
आखिर में बारी आई नौकर रामू की। रामू पिछले बीस सालों से दिग्विजय की सेवा कर रहा था। वह थर-थर कांप रहा था।
"साहब, मैंने कुछ नहीं किया," रामू रोने लगा। "रात पौने दस बजे मलिक साहब ने मुझे दो ग्लास और बर्फ लाने को कहा था। कमरे में उनके साथ कोई था, लेकिन साहब ने मुझे अंदर आने से मना कर दिया और ट्रे दरवाजे पर ही ले ली। मैंने देखा नहीं कि अंदर कौन था। फिर दस बजे मैंने मलिक साहब के कमरे से किसी के चिल्लाने की हल्की सी आवाज सुनी। जब मैं भागकर आया और दरवाजा खटखटाया, तो अंदर से कोई आवाज नहीं आई। दरवाजा लॉक था। मैंने छोटे साहब (राहुल) और मालकिन को बुलाया। फिर हमने दरवाजा तोड़ा।"
विक्रम ने रामू की बात को ध्यान से सुना। उनके दिमाग में एक कशमकश चल रही थी। रामू की बात से साफ था कि रात दस बजे कोई कमरे के अंदर मौजूद था। लेकिन वह बाहर कैसे निकला? खिड़कियां बंद थीं, दरवाजा अंदर से लॉक था और चाबी लाश की जेब में थी।
विक्रम दोबारा क्राइम सीन पर गए। उन्होंने फर्श पर बिखरी फाइलों को उठाया। वे दिग्विजय की नई वसीयत के कागजात थे, जिन पर अभी दस्तखत नहीं हुए थे। उस वसीयत के मुताबिक, दिग्विजय अपनी सारी जायदाद एक चैरिटी ट्रस्ट को देने वाले थे। यानी कामिनी और राहुल दोनों को फूटी कौड़ी नहीं मिलने वाली थी। हत्या की वजह साफ थी—दौलत।
लेकिन 'कैसे?'—यह सवाल अभी भी हवा में तैर रहा था। अचानक विक्रम की नजर दरवाजे के पास पड़े एक पतले, मजबूत नायलॉन के धागे और एक छोटे से चुंबक पर पड़ी, जो सोफे के नीचे छुपा हुआ था। विक्रम के चेहरे पर एक ठंडी मुस्कान तैर गई। 'बंद कमरे' का तिलस्म टूट चुका था। कातिल ने एक बेहद शातिर चाल चली थी, लेकिन वह एक छोटी सी गलती कर बैठा था।
विक्रम ने अमित को आवाज दी, "अमित, सबको इसी लिविंग रूम में इकट्ठा करो। इस बंद कमरे का सस्पेंस खत्म करने का वक्त आ गया है।"
मल्लिक विला के लिविंग रूम में तनाव का माहौल और गहरा गया। कामिनी, राहुल और रामू तीनों सोफे पर आकर बैठ गए। इंस्पेक्टर विक्रम सिंह उनके सामने चक्कर काट रहे थे, मानो किसी बिल्ली की तरह अपने शिकार पर नजर रख रहे हों।
"आप सब सोच रहे होंगे कि कोई इंसान मर्डर करने के बाद एक ऐसे कमरे से कैसे गायब हो सकता है जो चारों तरफ से बंद हो?" विक्रम ने अपनी बात शुरू की। "शुरुआत में यह किसी भूतिया कहानी जैसा लगता है। लेकिन अपराध विज्ञान में भूत-प्रेत के लिए कोई जगह नहीं होती। कातिल ने हमें भ्रमित करने के लिए एक बहुत ही पुरानी और शातिर ट्रिक का इस्तेमाल किया।"
विक्रम ने जेब से वह छोटा चुंबक और नायलॉन का धागा निकाला और टेबल पर रख दिया।
"यह क्या है, इंस्पेक्टर?" राहुल ने झल्लाते हुए पूछा। "हमें यहां क्यों बिठा रखा है? अगर आपके पास कोई सबूत है तो सीधे बात कीजिए।"
"धीरज रखो, राहुल," विक्रम ने शांत आवाज में कहा। "जब रामू रात पौने दस बजे ड्रिंक की ट्रे देकर गया, तब दिग्विजय जी अकेले नहीं थे। कातिल पहले से ही कमरे के अंदर था या ठीक उसी वक्त अंदर दाखिल हुआ। दिग्विजय जी को बातों में उलझाकर उनकी ड्रिंक में कोई नशीली चीज मिलाई गई। जब वे बेहोशी की हालत में आ गए, तो कातिल ने बड़ी बेरहिमा से उनका गला घोंट दिया।"
"लेकिन दरवाजा अंदर से बंद था!" कामिनी ने टोकते हुए कहा।
"यहीं पर कातिल की चालाकी सामने आती है," विक्रम ने दरवाजे की तरफ इशारा करते हुए समझाया। "कातिल ने खून करने के बाद चाबी को दिग्विजय जी की जेब में वापस डाला। फिर उसने दरवाजा बाहर से बंद किया, लेकिन इस तरह कि हमें लगे वह अंदर से बंद है। उसने चाबी को अंदर के लॉक में ही रहने दिया। दरवाजे के हैंडल और अंदर की कुंडी में इस नायलॉन के धागे और चुंबक को फंसाया गया। बाहर निकलने के बाद, दरवाजे की झिरी (gap) के नीचे से धागे को खींचा गया, जिससे अंदर की कुंडी नीचे गिर गई और दरवाजा अंदर से लॉक हो गया। फिर एक जोरदार झटके से धागे और चुंबक को बाहर खींच लिया गया। लेकिन हड़बड़ी में, चुंबक का एक छोटा हिस्सा टूटकर वहीं सोफे के नीचे गिर गया।"
अमित ने विस्मय से कहा, "अद्भुत सर! लेकिन यह काम किया किसने?"
विक्रम कामिनी के पास जाकर रुक गए। "मिसेज कामिनी, आपने कहा था कि आप रात नौ बजे दवा खाकर सो गई थीं। लेकिन आपके बेडरूम के डस्टबिन में मुझे एक गीला तौलिया मिला, जिससे फाउंडेशन और मेकअप के साथ-साथ किसी के हाथों का खून साफ किया गया था। और सबसे बड़ी बात, दिग्विजय जी की नई वसीयत के कागजात पर आपकी उंगलियों के निशान मिले हैं। आपने वसीयत को रोकने के लिए अपने पति की जान ले ली!"
कामिनी का चेहरा सफेद पड़ गया। वह हकबका गई, "नहीं... यह झूठ है! मैंने कुछ नहीं किया!"
"रुको, विक्रम," राहुल अचानक हंस पड़ा। "अगर कामिनी ने खून किया, तो वह धागे वाली ट्रिक नहीं जान सकती। वह इतनी टेक्निकल नहीं है। यह मर्डर मैंने किया है!"
पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। अमित ने तुरंत अपनी गन निकाल ली।
"तुमने?" विक्रम ने राहुल की तरफ देखा।
"हां, मैंने," राहुल ने गर्व से कहा। "वह बुड्ढा मेरी जिंदगी बर्बाद कर रहा था। मुझे पैसों की जरूरत थी और वह सब कुछ ट्रस्ट को दे रहा था। कामिनी को तो बस मोहरा बनाया गया था। मैंने ही उसे उकसाया था कि वह दिग्विजय की ड्रिंक में नशा मिलाए। जब वह बेहोश हो गया, तो अंदर जाकर गला मैंने घोंटा। और हां, वह धागे वाली ट्रिक मेरी ही थी। मैंने एक सस्पेंस थ्रिलर फिल्म में इसे देखा था।"
कामिनी फूट-फूट कर रोने लगी, "राहुल, तुमने मुझसे कहा था कि तुम सिर्फ उन्हें डराओगे! तुमने मुझे धोखा दिया!"
"धोखा तो इस दुनिया का नियम है, डियर," राहुल ने ठंडी हंसी हंसते हुए कहा।
विक्रम ने अमित को इशारा किया। अमित ने आगे बढ़कर राहुल के हाथों में हथकड़ी पहना दी।
"राहुल मल्लिक, तुम्हें अपने पिता की हत्या के जुर्म में और कामिनी मल्लिक, तुम्हें इस अपराध में साथ देने के जुर्म में गिरफ्तार किया जाता है," विक्रम ने कड़क आवाज में कहा।
बाहर बर्फ़बारी अभी भी जारी थी, लेकिन मल्लिक विला के भीतर का रहस्य अब पूरी तरह सुलझ चुका था। लालच और धोखे की इस खूनी खेल का अंत हो चुका था। विक्रम ने अपनी टोपी संभाली और बर्फीली रात में अपनी पुलिस जीप की तरफ बढ़ गए। उनके लिए यह सिर्फ एक और केस था, लेकिन शिमला के इतिहास में यह 'बंद कमरे का मर्डर' हमेशा के लिए दर्ज हो गया।