देखते ही देखते पूरा केबिन खाली हो गया, अब वहां सिर्फ अंकिता बची थी। जैसे ही वह वहां से निकलने के लिए उठी, उसकी नजर हेड चेयर पर पड़ी। उस शख्स को देखते ही अंकिता के पैरों तले जमीन खिसक गई। रणविजय के चेहरे पर जो गुस्सा, डर और नफरत का मिश्रण था, उसे देखकर अंकिता बुरी तरह कांपने लगी। वह जैसे ही वहां से भागने की कोशिश करने लगी, रणविजय ने बिजली की फुर्ती से उसका हाथ पकड़ लिया और अपनी तरफ जोर से खींचा। झटके से अंकिता सीधे उसके सीने से जा टकराई। उसके बिखरे हुए बाल उसके चेहरे पर आ गिरे। रणविजय ने अपने हाथ से बड़े धीमे और रफ अंदाज में उसके चेहरे से बाल हटाए और अपनी उस कड़क आवाज में बोला, "बहुत शौक था ना भागने का? तुम्हें... आज हम बताते हैं।" अंकिता की आँखों में डर के आँसू आ गए और वह कांपती आवाज में बोली, "प्लीज... मेरा हाथ छोड़िए, मुझे बहुत दर्द हो रहा है।"
एक पल के लिए रणविजय उसकी आवाज की उस खामोशी में खो सा गया, लेकिन फिर खुद को झटकते हुए उसने अंकिता को दीवार की तरफ धकेल दिया और उसे अपनी बाहों के घेरे में जकड़ लिया। उसने अंकिता का एक हाथ उसकी पीठ के पीछे मोड़कर मजबूती से पकड़ लिया और दूसरे हाथ से उसके बाल पीछे करते हुए उसे अपने चेहरे के एकदम करीब ले आया। अंकिता कुछ कहना चाह रही थी, लेकिन जैसे ही रणविजय की नजर अंकिता के उन कांपते हुए सुर्ख गुलाबी होंठों पर पड़ी, वह सुध-बुध खो बैठा। वे होंठ इतने अट्रैक्टिव लग रहे थे कि रणविजय का मन उन पर टूट पड़ने और उन्हें चूम लेने के लिए मचल उठा।
रणविजय ने धीरे से अपने हाथ बढ़ाए और अंकिता के होंठों को छुआ। जैसे ही उसकी उंगलियां उसके होंठों पर पड़ीं, रणविजय पूरी तरह से उस खिंचाव में बहने लगा। उस स्पर्श से अंकिता के पूरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई। रणविजय ने उसके बालों को मजबूती से मुट्ठी में जकड़ा और उसे अपने और करीब खींचा, फिर बिना किसी हिचकिचाहट के उसके होंठों को अपने होंठों में ले लिया। उसने गहराई से उसे चूमा। कुछ पल बाद, उसने अंकिता को पीछे की तरफ झटके से ढकेल दिया। दोनों ही गहरी गहरी सांसें ले रहे थे। अंकिता की हालत ऐसी थी कि उन गहरी सांसों की वजह से उसके ब्लाउज से उसका सीना ऊपर-नीचे होता हुआ साफ नजर आ रहा था। रणविजय की नजर जैसे ही वहां गई, वह अपनी सुध खोने लगा, लेकिन फिर उसने खुद को जोर से झटककर खुद पर काबू पाया और अंकिता को जोर से ढकेल दिया।
ढकेलते ही अंकिता फर्श पर जा गिरी और उसे चोट लग गई। रणविजय ने एक पल की भी देर नहीं की, उसने तेजी से दरवाजा खोला और उसे जोर से पटकते हुए केबिन से बाहर निकल गया। सीधे अपने केबिन में जाकर वह अपनी हेड चेयर पर जा धंसा। उसका दिमाग तेजी से चल रहा था- "अंकिता... ये चार साल से कहाँ थी? और मेरी ही कंपनी में? मुझे पता क्यों नहीं चला?"
उसने बिना देरी किए अपने बॉडीगार्ड और असिस्टेंट को तुरंत बुलाया। जैसे ही वे आए, उसने कड़क आवाज में आदेश दिया, "अभी के अभी पता लगाओ कि अंकिता कब से इस कंपनी में काम कर रही है! मुझे पूरी जानकारी चाहिए।" असिस्टेंट तुरंत काम पर लग गया और कुछ ही देर में सारी फाइलें लेकर लौटा। "सर, वह पिछले तीन-चार महीने से यहाँ काम कर रही है। वह अपने फ्लैट में अकेली रहती है, जो उसे ऑफिस की तरफ से मिला है। परिवार में सिर्फ उसकी माँ और भाई हैं।"
रणविजय ने एक ठंडी नजर डाली और दहाड़ते हुए कहा, "गेट आउट!" बॉडीगार्ड और असिस्टेंट डर के मारे तुरंत बाहर निकल गए। रणविजय पीछे की ओर होकर अपनी हेड चेयर पर अपना सिर टिकाकर बैठ गया और एक अजीब सी, खतरनाक मुस्कान उसके चेहरे पर तैर गई। वह धीरे-धीरे हंसने लगा और मन ही मन बोला, "अब तुम कहाँ जाओगी बच के अंकिता?"
उधर, फर्श पर गिरी अंकिता दर्द से कराह उठी। चोट लगी थी, पर उससे ज्यादा वह उस डर से कांप रही थी जो उसके अंदर तक समा गया था। वह किसी तरह लड़खड़ाते हुए उठी और डर के मारे कांपते कदमों से अपने केबिन की तरफ भागी। अपने केबिन में पहुँचकर वह कुर्सी पर सिमट कर बैठ गई। उसकी आँखों के सामने बस रणविजय का वो चेहरा और वो पागलपन था। वह बुरी तरह डर गई थी, मन में एक ही सवाल घूम रहा था- "अब मैं क्या करूँ? यहाँ से कैसे बचूँ? कैसे जाऊँ यहाँ से?"