Gunti - Book Review in Hindi Short Stories by Dr Sandip Awasthi books and stories PDF | गुण्टी - स्टोरी by Renu Husen

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गुण्टी - स्टोरी by Renu Husen

“गुण्टी...गुण्टी... । जाने कहाँ गई है गुण्टी सुबह-सुबह? आज इतनी सुबह कैसे जग गई? ज़रुर खिड़की से निकल गई होगी गुट....गुट....ट”।

“अम्मा, क्यों परेशान होती हो। कूदती-फांदती हरियाली के पीछे भाग गई होगी। कुछ खा-पीकर लौट आएगी...”। मौसी ने कहा।

“हाँ री बच्ची। परेशान क्यों न रहूँ। सबसे सुंदर है मेरी गुण्टी। मुझे तो इसकी चिंता खाए जाती है कहीं पकड़ी गई तो....हाय!” अम्मा सिसक उठी। तभी गुण्टी उसे खिड़की पर दिखाई दी और वह चिल्ला उठी, अरे ओ गुण्टी, चल इधर.....कहाँ गई थी?”

गुण्टी फुर्र से नीचे उतरी और चूजों के साथ हिल-मिल गई। गुण्टी को देख सब हैरान हुए। गुण्टी के पंख और भी ज़्यादा लाल सुनहरे और चमकदार हो आए थे। वह सुबह-सुबह लाल टमाटर की तरह लग रही थी। उसे देख उसकी सहेलियाँ पूछ बैठी, क्या बात है आज बड़ी सुंदर लग रही हो?”

बात दूर-दूर तक पहुँच गई थी। नन्हे-नन्हे चूज़े अपनी-अपनी अम्माओं से गुण्टी का ज़िक्र कर चुके थे। ये सब सुनकर सबसे बूढ़ी मुर्गी धीरे-धीरे चलती हुई गुण्टी की अम्मा के पास पहुँची और उसके खोए विचारों को तोड़ते हुए बोली, “अरे गुण्टी की अम्मा क्या सोच रही है?

क्या तूं खुश है कि गुण्टी को प्यार मिल रहा है?”

“नहीं....नहीं बड़ी अम्मा। मैं तो परेशान हूँ, चिंतित हूँ उसके भविष्य का सोचकर। आखिर मालिक क्यूँ?” कहते-कहते वह फिर दीवार को देख रही थी कि गुण्टी खिड़की पर फिर उभर आई, साथ में सहेलियां थीं। 

गुण्टी का अम्मा के कमरे में प्रवेश करते ही एक सौंधी-सौंधी भीनी-सी महक फैल गई। गुण्टी सचमुच चमक रही थी लेकिन यह क्या उसके गले में लाल रंग का सुंदर रिबन किसने बांधा? अम्मा अभी हैरान ही थी कि गुण्टी की सहेलियों ने बताया कि मालिक ने बांधा? गुण्टी फिर खेल में मग्न हो गई।

सचमुच गम्भीर बात थी। जब बात बड़ी दिखे तो बात पेट की नहीं रहती, दिमाग की घण्टी बजती है और जुबां चलने लगती है...गुट...गुट...गुट।

“बड़ी बी, मुझे तो अपनी आज़ादी के दिन याद आ रहे हैं। जानती हो हमारे यहां जिसे ज़्यादा दाना दिया जाता था....नहीं...नहीं... ऐसा नहीं हो सकता...मेरी गुण्टी के साथ तो बिल्कुल नहीं...नहीं...मैं ऐसा नहीं होने दूँगी!” 

“गुट...गुट...अरे गुण्टी की माँ परेशान न हो। ऐसा कुछ नया नहीं होने जा रहा यहां। आखिर एक न एक दिन तो सबको जाना ही है।

‘‘गुट...गुट...अरे गुण्टी की माँ परेशान न हो। ऐसा कुछ नया नहीं होने जा रहा यहाँ। आखिर एक न एक दिन तो सबको जाना ही है। हम मुर्गियाँ हैं इंसान नहीं। आखिर कब तक बचोगी शैतानों से। ये तो नियम है। इससे मत भागो। अपने मन को कठोर कर लो...’’ कह कहकर बड़ी बी चुप हो गई लेकिन गुण्टी की माँ ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।

हाँ, शायद गुण्टी को आज बेचा जाने वाला था-काटने के लिए। कहते हैं वो इंसान हैं। खाक इंसान हैं शैतान कहीं के। हम निरीहों को मार डालते हैं अपने पेट के लिए छिः धिक्कार है...और गुण्टी की माँ रो रही थी।

गुण्टी फुदकती हुई आई और माँ-माँ करके झूमने लगी। लेकिन यहाँ क्या माँ रो रही है, क्यूँ?

‘‘माँ, तुम रो रही हो...क्यूँ? अरे चुप हो जाओ। तुम्हें तो खुश होना चाहिए। जानती हो बाहर सुंदर-संुदर गाड़ियाँ तैयार खड़ी हैं और शायद मुझे ले जाया जा रहा है। घुमाने के लिए...! माँ...देखो ना कितनी सुंदर लग रही हूँ?’’

माँ उसे प्यार करने लगी। गुण्टी ने माँ के आँसू पौंछे लेकिन उसकी सिसकियाँ न बंद कर सकी। वह फिर से कह उठी, ‘‘माँ अगर मैं कहीं जा भी रहीं हूँ तो आ जाऊँगी। अब इसमें इतना रोने की क्या बात है?’’

इतना कहते ही गुण्टी की माँ ने गुण्टी को सीने से लगा लिया और मन ही मन कह उठी, कितनी मासूम है इसे तो अब तक सच्चाई ही नहीं बताई गई। क्या हमारा मरना भी मरना है? नहीं शहीद होना है। उफ, ये मुंए, मरदूद मुझे ले जाते काटने के लिए। इस नन्हीं जान ने तो एक अण्डा तक नहीं दिया अब तक...।

‘‘गुण्टी...गुण्टी...’’ सहेलियों की पुकार ने माँ को हिला डाला। सहेलियाँ कह रही थीं? ‘‘गुण्टी...मालिक शायद तुम्हें ही ढूँढ रहे हैं, चलो!’’

गुण्टी के मन में एक अजीब-सी खुशी थी। शायद व्याकुलता थी जो उसकी आँखों में बार-बार चमक ला देती थी। शायद आज़ादी की व्याकुलता, उत्सुकता इस संसार को देखने की। इस पिंजड़े से बाहर संसार कैसा होगा। अनुपम...अनोखा...सुनहरा...लुभावना। न जाने क्या-क्या नहीं सोच रखा था गुण्टी ने। लेकिन इस सारी उथल-पुथल के साथ एक दुःख भी था। उसे अपनी माँ और अपनी सहेलियों से बिछुड़ने का दुःख ज्यादा था। नहीं सहेलियाँ कितनी प्यारी हैं। साथ-साथ खेलती हैं शायद उनसे बिछुड़ने का दुःख ज्यादा था। गुण्टी नहीं समझ पा रही थी।

गुण्टी मस्त थी। सहेलियों से घिरी हुई। वह कुछ भी अनुभव नहीं कर पा रही थी कि उसे कौन ज़्यादा स्मरण हो आएगा। गुण्टी जा रही थी। माँ लगातार भीगे नयनों से देख रही थी। माँ ही नहीं सभी। गुण्टी सबकी प्यारी थी और साथ ही गुण्टी को अजीब ढंग से ले जाया जा रहा था। सहेलियों ने बाहर वाले पिजड़े का दरवाज़ा बंद कर दिया। गुण्टी मालिक की गोद से सभी को देख रही थी। वह दूर होती जा रही थी। वह दूर होती जा रही थी...होती जा रही थी...। वह सभी को देख रही थी-अपनी सहेलियों को, बड़ी बी को, अपनी अम्मा को... देखती रही। उसकी एक आँख अंत में अपनी माँ पर केंद्रित हो गई। शायद यही सच था। वह उदास हो गई। उसकी अनचाही-सी खुशी अब ओझल हो गई थी। वह चुप थी।

गुण्टी बाहर लाई गई। गुण्टी को एक बड़ी-सी, बहुत सजी हुई जीप की छत पर खड़ा कर दिया गया और दाना डाल दिया गया। जीप पर चढ़कर वह हैरान रह गई। उसे दूर तक गाड़ियों की कतार दिख रही थी और आस-पास घेरा डाले हुए, बहुत सारे सफेद पोश लोग। गुण्टी ने अपने दाहिनी ओर देखा-‘‘अरे, यह क्या? ये कौन है? ये तो बकरी है, मगर ये मेरे साथ...चलो ठीक है... कोई साथ तो है...।’’

‘क्या सोच रही हो मुर्गी? मेरा नाम बिण्टी है। अच्छा हुआ तुम आ गई। मैं तो कब से यहाँ अकेली हूँ। इन लोगों को देख रही हूँ जाने क्या-क्या कर रहे हैं...अच्छा क्या नाम है तुम्हारा?’’

बिण्टी बकरी सब कुछ एक ही सांस में कह गई थी। शायद बेचैन थी कि कोई आए तो कुछ कहे। गुण्टी उसे देखे जा रही थी। अब वह खुश थी अपनी एक नई सहेली को पाकर और इस नए संसार को देखकर...।

‘‘गुट...गुट...गुट...मेरा नाम गुण्टी है। तुमसे मिलकर खुशी हुई। अब हमारा सप़$र अच्छा कटेगा। लेकिन क्या तुम बता सकती हो कि हमें कहाँ ले जाया जा रहा है? और गु...ट...गुट...ये बड़ी चादरों पर लाल रंग से क्या लिखा है? क्या तुम बता सकती हो?’’

‘‘नहीं...मैं...मैं...मैं...साॅरी ये तो मुझे पता नहीं। मैं भी कब से यही सोच रही हूँ। पर सोच-सोच कर तसल्ली कर लेती हूँ कि घास तो मिली खाने के लिए वो भी हरी-हरी...है ना?’’

और वह फिर हरी-हरी घास में मुँह मारने लगी। तभी गुण्टी और बिण्टी की नज़र अपने से पीछे वाली गाड़ी पर पड़ी। उस पर एक विशाल दैत्य जैसा आदमी चढ़ रहा था। सिपऱ्$ लुंगी लपेटी हुई थी, काला-सा, बड़ी-बड़ी मूछों वाला था वह। गुण्टी डर गई। फुदक कर बिण्टी के पास आ गई। बिण्टी भी सहम गई।

‘‘छिः कितना भयानक है। क्या ये सारे रास्ते हमारे साथ रहेगा? एक तो अपनी जात का कोई है भी नहीं हमारे साथ...लेकिन प्यारी गुण्टी, तुम पि़$क्र न करो, मैं हूँ न तुम्हारे साथ।’’

शायद बिण्टी कुछ बहादुर थी या फिर स्वयं को दिलासा दे रही थी। खर्र...ख...र्र...र...खर्र...र्र...र पीं...पीं...तभी जीप स्टार्ट हो गई। जीप धीमे-धीमे बढ़नी शुरू हुई। आगे भी लोग थे और पीछे भी। लोग चिल्लाने लगे-‘‘वल्र्ड ऐनीमल डे जिंदाबाद’’, ‘‘पशु दिवस जिं़दाबाद...।’’

अधिकतर पुरुष सफेद धोती-कुर्ता पहने हुए थे। सबके सिरों पर टोपियाँ भी थीं। जीप के पीछे वही भयानक आदमी वाली जीप थी और उसके पीछे झण्डे लिए कुछ लोग, काले झण्डे। उनके पीछे दो पुरुषों ने चादर खोल कर पकड़ी हुई थी। बाएं से दाएं कुछ बड़ा-बड़ा लिखा हुआ था। न बिण्टी ही समझ पाई न गुण्टी और फिर उनके पीछे ‘जिंदाबाद-जिंदाबाद’ के नारे लगाते लोग थे। उनके पीछे ट्रैफिक या रैली की गाड़ियाँ थी। पता नहीं, मगर भीड़ थी। सुनाई दिया, ‘‘अरे भई, देर मत करो, रैली का टाइम बीता जा रहा है। एम. पी. साहब वक़्त के बड़े पाबंद हैं। बारह बजे तक पहुँचना भी है।’’

‘‘हाँ, हाँ अरे...? मुन्ना...सामान नहीं लाया...? जा, दौड़कर ले आ। पहलवानजी को भी कुछ याद नहीं, मस्त बैठे हैं। और ये आदमी उसी भयानक मूछों वाले के पास पहुंच गया।

‘‘क्या पहलवान जी, आपको याद नहीं क्या रखना है पास में? हर बात का ध्यान हम ही रखेंगे क्या?’’

पहलवान जी- ‘‘जी...जी...वो...मैं तो...तो...जी...। कहते ही रह गए और वह बोलता-बोलता गायब हो गया। तभी एक छोटा-सा लौंडा दौड़ा-दौड़ा आया और जीप पर चढ़ गया। हाथ की थैलियों से हरी घास और दाने निकालकर बिण्टी और गुण्टी के सामने रखने लगा। हाँ ये लड़का इनकी देखभाल के लिए ही रखा गया होगा।

पीछे वाली जीप पर भी कुछ लोग चढ़ आए थे। उन लोगों ने मिलजुल कर पहलवानजी की दुकान सजा दी। उन्हें बैठने के लिए चैंकी दी गई। पेड़ का कटा हुआ तना उनके सामने रखा गया, बड़ा-सा चाकू रखा गया जिसे वह बार-बार तेज़ करने लगा। वह अब घूर-घूर कर बार-बार कभी गुण्टी और कभी बिण्टी की तरफ देख रहा था।

दोनों की आँखें खुली की खुली रह गयीं। बिण्टी और गुण्टी ने खाना छोड़ दिया। बिण्टी धीरे-धीरे बोल उठी-‘‘अच्छा तो अब समझी। देख रही हो गुण्टी हमें यहाँ क्यूँ लाया गया है? हमें इतना सजाया संवारा क्यूँ गया है? और ये लाल रेशमी रिबन हमारे गले में क्यूँ बाँधे गए हैं...?’’

‘‘हाँ...गुट...गुट...कुछ-कुछ तो मेरी समझ में भी आ रहा है कि हमें बार-बार खाना क्यूँ दिया जा रहा है।’’

चाकू को तेज करने की आवाज़ कानों से दिल तक लगातार चोट कर रही थी और उसकी तेज चमकदार धार बार-बार उनकी आँखों को चैंधिया रही थी। गुण्टी रोने लगी।

गाड़ियाँ धीरे-धीरे चल रही थी। नारे लग रहे थे और गुण्टी रो रही थी। उसे अपनी माँ की याद सताने लगी। वह समझने लगी कि माँ क्यूँ रो रही थी? वह समझने लगी कि उसकी खुशी छलावा थी, झूठ थी। गुण्टी सड़क के दोनों ओर देख रही थी। ऊँची-ऊँची मीनारें थीं दोनों तरफ। बड़ी चैड़ी सड़क से गुज़र रही थी रैली। सड़क के दोनों और जहाँ-जहाँ रैली निकलती लोग जमा हो जाते। और तब तो रंग-बिरंगी पोशाकों में औरतें भी साथ चलने लगीं थीं। जीप पर बैठा लड़का अब भी दाना डाल रहा था। पीछे की जीप वाला पहलवान रह-रहकर चाकू की धार बनाने लगता। गुण्टी सोच रही थी। उसकी मौत उसकी आँखों के सामने उसके साथ-साथ चल रही है। पता नहीं कौन-सी मंजिल आखि़री हो?

बिण्टी बोली, ‘‘क्या सोच रही हो गुण्टी, हम तो जन्मे ही इसीलिए हैंµआदमी का भोजन बनने के लिए। लेकिन मैं सोच रही हूँ अगर हमें हलाल ही करना है तो ये मुए जुलूस क्यूँ निकाल रहे हैं। सड़कें साप़$ क्यूँ करवाई हैं? गाड़ियाँ क्यूँ सजाई हैं? क्या यह कोई नई या विशेष बात है जो इतने लोग इतने से काम के लिए जुलूस निकाल रहे हैं? नारे लगा रहे हैं?

बिण्टी अपनी बात की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करती रही। गुण्टी मौन थी। बिण्टी उसके हाव-भाव पहचान गई और बोल पड़ी-‘‘देखो गुण्टी, सच तो यह है कि अब इस दुनिया से विदा लेने का थोड़ा-सा ही समय रह गया है। अपने आखरी वक्त को हमें हँसकर ही गुज़ारना चाहिए और फिर देखो ना किसी और पशु को हलाल करते समय ऐसी धूमधाम होती है क्या? देखों ना चारों तरफ देखो और मजे लो...।“

‘‘लेकिन बिण्टी मुझे समझ में नहीं आता कि अपने पेट के लिए ये लोग हम निरीह पशुओं को क्यूँ मारते हैं? क्या हममें जान नहीं। हम इनकी तरह बोल नहीं सकते। क्या इस बात का फायदा उठाते हैं वो?’’

गुण्टी कह गई लेकिन बिण्टी चुप रही। रैली चल रही थी। बिण्टी कुछ सोच कर बोल उठीµ‘‘गुण्टी क्या तुम सुन रही हो? ये लोग क्या कह रहे हैं? देखो कितनी रंग-बिरंगी और सुंदर झालर लगाई हुई है। ...गुण्टी क्यों न हम इनकी बातें सुनें वक्त कट जाएगा।’’

‘‘शाकाहारी बनो!...शाकाहारी बनो!

माँसाहारी हाय! हाय!...माँसाहारी हाय! हाय! शाकाहारी बनो!...शाकाहारी बनो! हमारी फसलें, हरी फसलें...जिंदाबाद...! जिदंाबाद...!’’

शाकाहारी बनो...! शाकाहारी बनो!’’ गुण्टी भी सुनने लगी थी ये नारे लेकिन उसकी समझ में आ रहा था। दोनों एक साथ बोलीं-‘‘शाकाहारी?’’

फिर दोनों हँस पड़ी और गुण्टी बोली-‘ये शाकाहारी क्या होता है? और माँसाहारी? इनका क्या मतलब है? बिण्टी?’’

‘‘भई मुझे तो इंसानों की ये मुश्किल भाषा समझ नहीं आती। पता नहीं किसको जिंदाबाद और किसको हाय-हाय करते जा रहे हैं।’’

‘‘हाँ, पर एक बात है...देखो देखो कितनी ऊँची मीनारें...बाप रे...अगर हम वहाँ से गिरंे तो...ओ...हो...मर ही जाएंगे। है ना बिण्टी’’

‘‘और क्या...अरे देखो गाड़ियाँ घूम रही हैं। नहीं, मुड़ रही हैं...हाय। कितनी सुंदर जगह है ये...ये हरियाली...आहा कितना अच्छा लग रहा है यहाँ दोनों तरफ पेड़ हैं ऊँचे-ऊँचे...।’’

वे दोनों बातों में लग गई और रैली बढ़ती रही। शोर कुछ ज़्यादा होने लगा था। माइक की आवाज़ें तेज़ हो गई थीं-‘‘सब लोग अपनी पोज़ीशन ले लें अब हम इण्डिया गेट के बिल्कुल पास हैं। सभी लोग अपनी पोज़ीशन ले लें...।’’

दो आदमी आगे से पीछे भागते हुए आए और पहलवान जी को कुछ समझाने लगे। वे लोग इधर-उधर भाग-भाग कर सब ठीक-ठाक कर रहे थे। इण्डिया गेट आ गया था। गाड़ियाँ घूम कर इण्डिया गेट पहुँच रही थीं। वहाँ पहले से ही कुर्सियाँ लगी थीं। मंच सजा दिया गया था। माइक्स का दूर-दूर तक इंतजाम था। बिण्टी और गुण्टी हैरान रह गईं क्योंकि अब उन्हें अन्य गाड़ियों में और मुर्गियाँ, बकरियाँ, कबूतर आदि दिखने लगे थे। ये गाड़ियाँ दूसरी सड़कों से आकर इसी कतार में मिल गईं थीं।

खर्र...खर्र...र्र...गाड़ियाँ धीरे हो रही थीं। दो आदमी दौड़ते हुए आए और प्यार से गुण्टी को गोद में उठा लिया। गुण्टी बिण्टी की ओर देखने लगी।

‘‘अच्छा बिण्टी। खुदा हाफिष्ज। खुदा ने चाहा तो फिर मिलेंगे।’’ और बिण्टी देखती रही। गुण्टी को मंच कर बैठा दिया गया। मंच पर और भी चूजे़ थे, मुर्गियाँ थीं, बकरियाँ थीं। कुछ देर बाद बिण्टी भी वहीं आ गई। वे एक दूसरे से मिलने लगे, बतियाने लगे। गुण्टी बिण्टी को देखकर खुश थी। उन सभी को दाने और घास मिल गये थे। 

कुर्सियाँ भर गईं थीं। पीछे वही नारे लगाने वाले लोग खड़े हो गए। मंत्राीजी भी समय पर आ गए। उनका स्वागत किया गया और मंच के दूसरी ओर बैठने की उचित व्यवस्था की गई। मंत्राी जी के पास वही लोग बैठ गए जो अब तक गाड़ियों में भाषण दे रहे थे। गुण्टी ने सामने देखा तो वही पहलवान दराँती लेकर बैठ गया था।

गुण्टी ने बिण्टी को देखा और बिण्टी ने गुण्टी को। फिर सभी में आपस में चर्चाएँ शुरू हो गईं। पहलवान फिर चाकू तेज़ करने लगा। वे समझ गए कि बारी-बारी से अब उनके कटने का समय आ गया है।

मंच पर कार्यक्रम आरम्भ हो गया। एक...दो...तीन... भाषण होते गए। नारे लगे। अंत में मंत्राी महोदय आए। कहना शुरू किया... शाकाहारी-जो माँस न खाए। लेकिन गुण्टी को यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा भी हो सकता है यानी पशु-पक्षियों को लाया जाए और दरांती रखी हो और छोड़ दिया जाए। नहीं अभी उसे यकीन नहीं हुआ था।

भाषण तेज़ होता गया,

‘‘लानत है ऐसे लोगों पर जो माँस खाते हैं! यह पाप है! कहाँ चले गए हैं हमारे धर्म...हमारे शास्त्रा...हमारी पूजा...? क्या हो गया है हमारी इंसानियत को? क्या ये जीव नहीं? क्या इनमें जान नहीं? क्या इन्हें दर्द नहीं होता। माँस खाना, जीव की हत्या करने के बराबर है। माँस खाने वाला भी कसाई ही होता है...!’’ 

और तालियाँ बजती गई। भाषण चलता गया। बात कुछ समझ में आ रही थी...। फिर मंत्राी जी ने बढ़कर एक पिंजड़ा खोला। कबूतर उड़ा दिए गए। साथ ही गुब्बारे उड़े। कुर्सियों के पीछे खड़े लोग मंत्राी जी ‘ज़िंदाबाद-जिं़दाबाद’ करते हुए आगे आए और उन्हें माला पहनाने लगे। गुण्टी और बिण्टी अब मंच पर सहमी-सहमी नहीं थीं। दोनों पास-पास आ गईं। गुण्टी बोली-‘‘बिण्टी, बिण्टी कितना अच्छा लग रहा है ना।’’

‘‘लेकिन ये मुआ कसाई पहलवान जो बैठा है अब तक। जब तक ये नहीं टलेगा तब तक चैन नहीं आएगा। मुझे तो याद है। तुम तो अभी छोटी हो ना। मैं जब छोटी थी। अपने दादा को शहीद होते देखा था मैंने दूर से। आह! वो दर्दनाक दृश्य...जानती हो दुनिया में सबसे क्रूर ये कसाई ही तो होते हैं। ना ये हमारी गिड़गिड़ाहट सुनते हैं और न आँसू...।’’

तभी गुण्टी ने देखा कि उन नारे लगाने वालों ने ‘हाय-हाय’ करते हुए कसाई की दराँती उठाकर फंेकी और उसका घेराव कर लिया। गुण्टी ताली बजाने लगी-‘‘आहा! आहा! अब आया ना मज़ा, उसकी तो दराँती ही फेंक दी। अरे! बिण्टी देखो, ये लोग तो हमारी ओर ही आ रहे हैं... और...और ...उनके हाथ में फूल-मालाएँ भी हैं...अरे देखो तो...।’’

और गुण्टी को मंत्राी जी ने गोद में उठा लिया। कितना अच्छा लग रहा है इसकी गोद में। कोई खूशबू लगाई है शायद। आह, क्या प्यारी महक है...गुण्टी सोच रही थी और उसे फिर उसी गाड़ी में वापिस खड़ा कर दिया गया। पीछे-पीछे बिण्टी भी आ गई। बिण्टी बोली-‘‘अरे गुण्टी देख। वह पहलवान तो सबसे हँस-हँस कर बातें कर रहा है। अच्छा तो ये नाटक था हमें डराने के लिए।’’

‘‘हाँ बिण्टी। वे देखो चूजे़ अपने पिजड़े में कितने चहक रहे हैं। बाकी सब भी अपनी-अपनी गाड़ियों में जा चुके हैं।’’

वे लोग इण्डिया गेट में अपनी-अपनी सड़कों पर मुड़ गए। बिण्टी और गुण्टी खुश थे। गुण्टी सोच रही थी फिर से मिले नए जीवन के बारे में। सोच रही थी फिर अपनी सहेलियों से मिलेगी। सारी दास्तान सुनाएगी और मिलेगी अपनी प्यारी-प्यारी माँ से। वह रोमांचित हो आई। आँख भर आई उसकी। शायद इसीलिए भी कि कुछ पलों के लिए मिली प्यारी सहेली से कुछ ही देर बाद बिछुड़ जाएगी। वह भीगे नयनों से बिण्टी की ओर देखने लगी। बिण्टी भी देख रही थी। दोनों समझ रहीं थीं अपने आँसुओं के अर्थ को... मुस्कुरा दीं।

गाड़ियाँ लौट रही थीं। गोधूलि की बेला का सूरज गुण्टी के पंखों पर चमक रहा था। बिण्टी ने कहा था-‘‘तुम बहुत सुंदर लग रही हो।’’ और उसने कहा, ‘‘देखो वे इमारतें शाम के समय उनमें बत्तियाँ कितनी सुंदर लग रही हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी ने सितारों की चादर इन पर डाल दी हो। हंै ना गुण्टी?’’

‘‘हाँ और सड़क के बीच में जले बल्बों की कतार। आह कितनी सुंदर है। मैं सब कुछ बताऊँगी अपनी सहेलियों को। ये सारा नज़ारा प्यारा प्यारा। सब कुछ सुनाऊँगी अपनी माँ को। अच्छा बिण्टी क्या तुम मेरी माँ से मिलोगी? बहुत अच्छी है मेरी माँ।’’ और वह माँ का स्मरण कर ठण्डी साँस लेने लगी।

गाड़ियाँ अब एक बहुत बड़ी सजी इमारत के पास रूक गईं। भीड़ छिटकते-छिटकते अपने घर जा चुकी थी। वो पहलवान कसाई भी कब का न जाने कहाँ चला गया था। अब इस गाड़ी के आस-पास बहुत सी कारें जमा हो गई थीं और जैसे-जैसे अंधेरा बढ़ रहा था कारें आ आकर रूक रही थीं।

‘‘बिण्टी ये तो हमारा घर नहीं है। ये हम कहाँ आ गए?’’

‘‘ठहरो गुण्टी सब पता चल जाएगा।’’

इतने में ड्राइवर और सह-चालक दोनों आकर गुण्टी और बिण्टी के पास बैठ गए। हवा ठण्डी चल रही थी। वे बीड़ी सुलगाकर बैठ गए और बतियाने लगे-‘‘यार, इन एम.पी. लोगों का भी अजब ही चक्कर है। दिन में कुछ करते हैं तो रात को पार्टी किए बिना नहीं रहते। अबे, देख क्या आलीशन काॅकटेल पार्टी है।’’

‘‘हाँ यार। कार्यक्रम भी तो जबरदस्त था। पर हम तो थक गए भई। पता नहीं कब आॅर्डर मिले घर जाने का?’’

और वे दोनों धीरे-धीरे बीड़ी के कश लेते बतियाते रहे। अंधेरा हो चुका था। दो आदमी अंदर से दौड़े-दौड़े आए और चिल्लाए।

‘‘ऐ ड्राइवर लोग। साॅब ने कहा है गाड़ी घर ले जाओ और फिर तुम घर जा सकते हो।’’

वे गुण्टी और बिण्टी को उठाकर अंदर ले गए। गुण्टी ने बिण्टी से पूछा, ‘‘अरे हमें ये अंदर क्यों ले जा रहे हैं?’’

‘‘शायद यहाँ हमारा उचित स्वागत हो और हमें हमारा उचित स्थान मिले।’’

‘‘हाँ, लगता है अब हमारा और भी आदर किया जाएगा। देखो ना यहाँ भी तो कितनी संुदर मेज़ कुर्सियाँ लगी हैं। और खाने की सुंदर-सुंदर चीजे़ं।’’

‘‘हाँ गुण्टी मेरे तो मुँह में पानी आ रहा है। मैं...मैं...गुण्टी...।’’

गुण्टी और बिण्टी को उठाए वे दोनों आदमी खट से किचन में दाखि़ल हो गए।

काॅकटेल पार्टी देर रात तक चली। सुबह तक सब समेटा जा चुका था। गाड़ियाँ और नेता, बड़े-बड़े लोग अपने-अपने घर जा चुके थे। सुबह जमादार झाडू लगा रहा था। कूड़े में सुंदर पंख इकट्ठे किए जा रहे थे। कुत्ते हड्डियों के टुकड़ों को रात से खा रहे थे।

बिण्टी और गुण्टी को फिर कोई नहीं देख पाया।