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मेरे बेटे को नींद आने लगी थी। थोड़ा चलते ही रोने लगा। "मम्मी मुझसे नहीं चला जा रहा। थोड़ी देर सोने दो। बस पांच मिनट सोने दो। बिना सोए कैसे चलूंगा, उल्टी आ जाएगी।" हम दोनों की भी हालत खराब हो रही थी लेकिन वहां रुकने की बैठने की कोई जगह नहीं थी। जगह-जगह खच्चर का गोबर पड़ा था। सड़क बहुत गंदी थी। पांच मिनट
हम रेलिंग के सहारे खड़े होकर सुस्ताए। फिर पुनः हिम्मत की और एक-दूसरे का जोश बढ़ाया और फिर चलने लगे। जबकि तीनों के पैर दर्द कर रहे थे। मेरा बेटा तो रोने लगा - "अब कभी नहीं आऊंगा यहां, कोई
सुविधा नहीं है। ई रिक्शा चलानी चाहिए इस रास्ते पर" । हमने उसे समझाया बेटा जरा सी हिम्मत और करो बस आने ही वाला है मंदिर। जैसे-तैसे गिरते-पड़ते पहुंच ही गए भैरव बाबा के मंदिर। करीब चार बजे का समय होगा।
ज्यादा भीड़ नहीं थी वहां, दर्शन आराम से हो गए। उतरने के लिए शायद दूसरा रास्ता था। बारिश तेज हो गई थी। हम एक टिनशेड के नीचे आधा घंटे बैठे रहे। लेकिन बारिश नहीं
रुकी। अभी अंधेरा भी हो रहा था। बाहर का भी कोई नजारा नहीं दिखाई दे रहा था। घर पहुंचने का मन हो रहा था बस कैसे भी जल्दी से घर पहुंच जाएं।
रेलिंग के पास एक बोर्ड पर लिखा हुआ था यहां से सूर्योदय बहुत अच्छा दिखाई देता है। सूर्योदय का इंतजार करें। एक बार तो मन हुआ कि चलो रुक ही जाते हैं, बारिश भी तो हो रही है। गार्गी ने फोन में मौसम अनुमान चेक किया तो पूरे दिन बारिश दिखा रहे थे।
श्रीश ने कहा कि "मम्मी आज बारिश नहीं रुकेगी। सूर्योदय नहीं देगा दिखाई। चलो ना चलते हैं। भूख भी लगी है। मन किया अब जल्दी से घर पहुंचा जाए। फिर सोचा इतनी दूर आए हैं, सूर्योदय देखे बिना जाना ठीक नहीं होगा। 6 बजे सूर्योदय होगा। बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। ठंड भी बढ़ गई थी। तीनों के पास एक-एक शॉल थी। उसी से काम चलाया। 5 बजे तक बारिश थोड़ी कम हुई। हम तीनों ने निश्चय किया चलो अब चलते हैं। उतराई में चलना आसान था।
, पैर बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे थे। बारिश पुनः तेज हो गई। मैंने सोचा बारिश के रुकने का इंतजार तो नहीं कर सकती। रात होने से पहले घर पहुंचना है। सहसा वहां लगी एक
दुकान पर नजर गई वहां कुछ रेनकोट टंगे हुए थे। हम तीनों उस दुकान पर गए पहले गरमा-गरम चाय पी कुल्हड़ वाली। फिर तीन रेनकोट खरीदे। और तीनों ने फिर से ढलान पर उतरना शुरू किया। मेरे पैरों ने जैसे जवाब ही दे दिया। एक कदम चलना भी मुश्किल हो रहा था। मेरा 12 वर्षीय बेटा जो खुद थका हुआ था,
उसके पैरों में भी दर्द हो रहा था। उससे मेरी हालत देखी नहीं गई। उसने और गार्गी ने दोनों ने मुझे पकड़ा, सहारा दिया और - "बुआ जी थोड़ी हिम्मत और करो। यहां रस्ते में रुकना ठीक नहीं। रास्ते में एक बोर्ड परआपातकालीन सहायता नम्बर लिखा था कि फोन करने पर तुरंत एम्बुलेंस आ जाएगी।" मैंने तुरंत उस नम्बर पर फोन किया बताया
मेरे पैरों में कमर से लेकर एड़ी तक बहुत दर्द है, एक कदम भी नहीं चला जा रहा। उधर से आवाज आई।
"गम्भीर हालत होने पर या बेहोश होने पर ही हम एम्बुलेंस भेजते हैं। उधर से खच्चर या ट्रॉली वाली सुविधा करो - - -" फोन कट।
श्रीश बोला मम्मी अगर तुम बेहोश हो
जाओगी तभी आएगी एम्बुलेंस। कोई नहीं तुम मुझे पकड़ लो धीरे-धीरे चलने की कोशिश करो।"
सामने से एक ट्रॉली वाला आ रहा था। नीचे पहुंचाने तक के एक व्यक्ति के दो हजार मांग रहा था। गार्गी ने कहा - "बुआ जी ऐसा करो तुम एक हजार देकर बाजार तक पहुंचो जहां से बाजार शुरू होता है।" ट्रॉली वाले ने तो
बाजार से 2 km पहले ही उतार दिया। मैं खड़ी होकर इन दोनों के आने का इंतजार करने लगी। इन दोनों के आने के बाद भी अभी पांच km का रास्ता शेष था। लेकिन बिल्कुल पैर नहीं उठ रहे थे। पैरों में सूजन आ गई थी। जगह-जगह दर्द से नीले निशान पड़ गए
थे। श्रीश के सहारे रेंग-रेंग कर कदम बढ़ाया। बाजार तक पहुंचे। बाजार में एक दुकान पर मशीन द्वारा पैरों की मसाज हो रही थी। सोचा चलो यहीं चलते हैं क्या पता कुछ आराम मिले। दस मिनट तीनों ने मसाज करवाई ।
लेकिन खड़े होते ही फिर से पैरों में दर्द होने लगा।थोड़ा नीचे उतरकर दुकान पर नाश्ता किया। घर के लिए प्रसाद लिया और फिर से तीनों ने एक-दूसरे की हिम्मत बढ़ाई और चलना शुरू किया।
नीचे बाण-गंगा पर फिर से 1 km की लाइन यात्रा कार्ड जमा करने की। यात्रा कार्ड जमा कर पैदल चलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। बस स्टैण्ड तक का ऑटो किया। बस में
चढ़ते समय भी घुटनों में बहुत दर्द हो रहा था। तीनों थके हुए थे। बस में झपकी लग गई लगभग तीन बजे जम्मू पहुंचे अपने घर। जाते ही गर्म पानी से स्नान किया राजमा-चावल खाए और सो गए। अगले दिन उठे
आठ बजे ।अपनी यात्रा कहानी भाभी को सुनाई ।सब हंस रहे थे। भाभी ने कहा चलो जम्मू का बाजार घुमा कर लाते हैं।"ना बाबा ना अब कहीं न जाना। कल सुबह सात बजे वापसी की ट्रेन है। बस अब दिल्ली जाना है। अगली सुबह जम्मू से वंदे भारत पकड़ी और दोपहर तीन बजे तक अपने घर दिल्ली पहुंचे।
पहली जम्मू- वैष्णो देवी यात्रा थी। बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ देखा। सबसे बड़ी सीख ये मिली कि श्रद्धा और हिम्मत हो तो 14 km की चढ़ाई भी आसान लगती है।
माता रानी सबकी मनोकामना पूरी करें।
जय माता दी 🙏
जीवन में कभी-कभी खुद को चुनौती देनी चाहिए।
तब पता चलता है हम कितने मजबूत हैं।
समाप्त
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डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली