*शीर्षक: "नदी के उस पार वाली ट्रेनिंग"*
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गाँव का नाम था बिरसिया। राजस्थान और MP की सीमा पर बसा हुआ। यहाँ की सबसे बड़ी पहचान थी काली नदी। बरसात में उफान मारती, और गर्मी में बिल्कुल सूखी।
6 महीने पहले सरकार ने गाँव में पहली बार "महिला स्वरोजगार ट्रेनिंग सेंटर" खोला था। उद्देश्य था - गाँव की लड़कियों को सिलाई-कढ़ाई सिखाकर आत्मनिर्भर बनाना।
सेंटर नदी के बिल्कुल किनारे बना था। ईंट-पत्थर का एक कमरा। सामने पीपल का 100 साल पुराना पेड़। कहते थे इस पेड़ के नीचे रात को मत रुकना।
मैं राधा। 19 साल। 12वीं पास। पिताजी खेत में काम करते हैं। मम्मी ने कहा "जा बेटा, 3 महीने की ट्रेनिंग है। सर्टिफिकेट मिल जाएगा तो शहर में काम मिल जाएगा"।
पहले दिन 10 लड़कियां आईं। पूजा, सुमन, गीता, अनीता... सब 18 से 22 के बीच। टीचर नई थीं - सीमा दीदी। जयपुर से ट्रांसफर होकर आई थीं। उम्र 28, चश्मा, और हमेशा घड़ी बांधे रखतीं।
पहली क्लास में ही उन्होंने नियम बताया: *"क्लास का समय है दोपहर 2:13 PM से 4:13 PM तक। 1 मिनट भी लेट नहीं होना चाहिए"*।
हम सब हंस पड़े। 2:13? इतना अजीब टाइम?
दी बोलीं "सरकारी पोर्टल पर यही स्लॉट मिला है"।
पहले हफ्ते सब नॉर्मल रहा। हम कपड़े काटना, मशीन चलाना सीख रहे थे। सेंटर की एक ही खिड़की थी, जो सीधा नदी की तरफ खुलती थी।
7वें दिन से अजीब चीजें शुरू हुईं।
2:13 PM होते ही नदी का पानी अचानक तेज हो जाता। बिना बारिश के। पीपल के पत्ते सरसराने लगते, जबकि हवा बिल्कुल नहीं चलती। और सबसे डरावनी बात - खिड़की के कांच पर हर रोज पानी की बूंदें। अंदर से।
मैंने पूजा को बताया। वो बोली "भ्रम है तेरा"।
10वें दिन पूजा नहीं आई। शाम को पता चला उसकी मशीन रात 2 बजे अपने आप चल रही थी। उसकी माँ ने वीडियो भी बनाया। मशीन पर वही लाल कपड़ा था जो हम क्लास में यूज करते थे। और धागे से "G" अक्षर बना हुआ था।
12वें दिन। 2:12 PM पर लाइट चली गई। इनवर्टर भी नहीं चला। हम सब मोमबत्ती जला कर बैठे। तभी खिड़की पर टक-टक... टक-टक।
सीमा दीदी ने टॉर्च मारी। बाहर सिर्फ अंधेरा और नदी। पर नदी के पानी में 2 सेकंड के लिए एक लाश तैरती दिखी। सफेद साड़ी, गीले बाल। अगले ही पल गायब।
उस रात मुझे बुखार आ गया। सपने में एक औरत आई। 20-21 साल की। गीली सफेद साड़ी। आंखों में पानी। बोली "मेरा नाम गीता है। मेरी ट्रेनिंग अधूरी रह गई थी। 2:13 PM मेरी आखिरी क्लास थी। मुझे सर्टिफिकेट नहीं मिला... मुझे पूरा करवाओ"।
अगले दिन मैंने गाँव के बुजुर्ग ताऊ से पूछा। उन्होंने बताया - 2 साल पहले इसी जगह एक लड़की डूब गई थी। नाम गीता। वो भी सिलाई सीखने शहर जाती थी। उस दिन 2:13 PM को नहाने आई थी और पैर फिसल गया। लाश 3 दिन बाद मिली। उसके हाथ में सिलाई की कैंची थी।
सब समझ आ गया। सरकार ने बिना पता किए उसी जगह सेंटर खोल दिया जहाँ गीता डूबी थी।
मैंने सीमा दीदी को सब बताया। पहले तो वो नहीं मानीं। फिर उन्होंने पुराने रिकॉर्ड निकाले। गीता का एडमिशन फॉर्म मिला। उस पर टाइम लिखा था - 2:13 PM।
13वें दिन। सिर्फ मैं गई। बाकी सब डर के मारे मना कर गए।
2:13 PM। लाइट गई। मोमबत्ती जली। खिड़की अपने आप खुली। और वो सामने खड़ी थी।
गीता। बिल्कुल सपने जैसी। हाथ में अधूरी लाल कुर्ती।
"दी... इसे पूरा कर दो" उसकी आवाज़ फुसफुसाहट जैसी थी।
मेरे हाथ कांप रहे थे। पर मैंने हिम्मत करके सुई धागा उठाया। 2 घंटे तक मैंने बिना रुके सिलाई की। आंसू और पसीना दोनों बह रहे थे।
जैसे ही आखिरी टांका लगा, एक ठंडी हवा आई। नदी शांत हो गई। पीपल के पत्ते रुक गए। मोमबत्ती की लौ सीधी हो गई।
गीता मुस्कुराई। पहली बार उसकी आंखों में पानी की जगह शांति थी।
"धन्यवाद दीदी। अब मुझे मुक्ति मिल गई"। और वो धुंध में घुल गई।
अगले दिन से सरकारी नोटिस आया - सेंटर का टाइम बदलकर 3 PM से 5 PM कर दिया गया है। खिड़की हमेशा बंद रहती है।
आज मुझे ट्रेनिंग का सर्टिफिकेट मिला। लिफाफे के अंदर एक मुड़ी हुई लाल कुर्ती भी थी। बिल्कुल वही जो मैंने बनाई थी। कोने पर छोटे धागों से "G" लिखा था।
गाँव वाले कहते हैं अब भी कभी-कभी 2:13 PM पर नदी के उस पार मशीन चलने की खट-खट आवाज़ आती है।
पर अब डर नहीं लगता। क्योंकि कुछ आत्माएं भी बस अपना काम पूरा करना चाहती हैं। एक सर्टिफिकेट, एक पहचान, एक इज्जत।
और मैं? मैं अब शहर में बुटीक खोल रही हूं। नाम रखा है - "2:13"।
*~ समाप्त ~*
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