ye aakashwani hai in Hindi Comedy stories by Yashvant Kothari books and stories PDF | ये आकाशवाणी है

Featured Books
Categories
Share

ये आकाशवाणी है

 

 
      

 

 

 

ये आकाशवाणी है

 

    यशवन्त कोठारी

 

ये आकाशवाणी है, अब आप यशवन्त कोठारी से आकाशवाणी पर एक  समीक्षात्मक व्यंग्य टिप्पणी सुनिये। शहर मंे आकाशवाणी केन्द्र का होना पत्रकारांे, लेखकांे, कलाकारांे, बुद्धिजीवियांे, वगैरा-वगैरा किस्म के लोगांे के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं, जब से आकाशवाणी खुली है, सभी श्रमजीवी पत्रकार श्रम करना बन्द करके आकाशवाणीजीवी हो गये हैं। लेखकांे ने काफी हाउस छोड़कर आकाशवाणी के बाहर मोर्चा जमा लिया है। पता नहीं कब किस प्रकार के प्रोग्राम मंे कौन प्रोग्राम एक्ज्यूकेटिव उन्हंे कहां फिट कर ले। कुल मिलाकर स्थिति ऐसी है कि सन्नाटा साहित्य से हटकर आकाशवाणी भवन की ओर चल दिया है। इधर एक दो बार आकाशवाणी केन्द्र की ओर जाना हुआ। पता चला एक गेट लम्बे समय से बन्द है इससे पता चलता हैं कि आकाशवाणी मंे प्रवेश के द्वार भी नये लोगांे के लिए बन्द हैं। पुराना शिड्यूल बना है, कौन रोज-रोज फेर बदल करंे। मैंने आकाशवाणी केन्द्र मंे एक बात महसूस कि, वहां पर प्रोग्राम एक्ज्यूकेटिव देखकर अनदेखा कर जाते है। आप पर विशेष कृपा दृष्टि हो तो एक उडती नजर डाल देगंे, कहंेगेः‘‘तुम्हारे जैसे कई आते हैं, तुम कौन नौ के तेरह कर दोगे। सामान्यतया, प्रोग्राम एक्ज्यूकेटिव आपको स्टूडियो या एस.डी. के साथ मीटिंग मंे मिलेगंे, बचे हुए समय मंे वे चाय, सिगरेट से टाइम पास करते हुए मिलेंगे।

आइये कुछ जानकारी कार्यक्रमांे की ली जाये। युववाणी कार्यक्रम मंे लगभग सभी कार्यक्रम शहरी युवाआंे के लिए होते हैं, अब आकाशवाणी वालांे को कौन समझाये कि गांवांे मंे भी 80 प्रतिशत युवा रहते हैं, और उनको भी युववाणी की आवश्यकता है।

एक कार्यक्रम आता है, झलकियां, जिसमंे लतीफांे और सम्मिलित ठहाकांे की गूंज रहती है, क्या कोई अन्य शिष्ट हास्य व्यंग्य या परिहास का कार्यक्रम सम्भव नहीं है ?

आकाशवाणी द्वारा प्रसारित समाचारों के बारे मंे भी बहुत तकलीफ है, केन्द्रीय व प्रादेशिक दोनांे ही समाचारांे मंे उच्चारण की अशुद्धता हर समझदार व्यक्ति को पीड़ा देती है। प्रादेशिक समाचार कभी-कभार ठीक आ भी जाये तो यांत्रिक गडबडी सब गुड गोबर कर देती है।

साहित्यिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमांे के बारे मंे क्या कहा जाए, किसी जमाने मंे अच्छे कार्यक्रम आमन्त्रित श्रोताआंे की उपस्थिति रिकार्ड कर प्रसारित होते थे लेकिन अब स्थिति इतनी सुखद नहीं है कई लोग जो अच्छे साहित्य सेवी हैं या रहे है आकाशवाणी से अपना नाता तोड़ चुके हैं। देश के कई केन्द्रांे मंे कभी अच्छे साहित्यकार प्रोड्यूसर वगैरा थे, लेकिन अब वहां पर अफसरशाही और ब्यूरांेक्रेसी का साम्राज्य है, कभी कभार कोई एक आध रचना अच्छी प्रसारित हो जाती है तो यह श्रोताआंे की किस्मत ही कही जायेगी।

स्थिति मंे सुधार की अपेक्षा तो करनी ही चाहिये साथ ही आकाशवाणी भी अपने अफसरी तन्त्र से ऊपर उठेगी ऐसी उम्मीद हर श्रोता करता है। कभी-कभी लगता है आकाशवाणी के हवामहल और नाटकांे का स्तर भी वह नहीं रहा है जो पहले था। शायद आकाशवाणी को अच्छे कार्यक्रमांे की तलाश हो उचित होगा यदि यह तलाश जारी रहेें।

और अन्त मंे एक लतीफा-

एस, डा. ने प्रोग्राम एक्ज्यूक्यूकेटिव से कहा-‘‘आपको प्रतिभा की खोज करनी चाहिये। ‘‘कुछ दिनांे बाद एक्यूक्यूटिव ने स्लिप भिजवाई ‘‘सर प्रतिभाजी तो नहीं मिली आप कहंे तो किसी और को बुक कर लंे।’’

तो हे श्रोता, पाठक अब हमारी पहली सभा समाप्त होती हैं।

 

0     0            0

 

                                            यशवन्त कोठारी