Mayavi Kangan Ghost Story in Hindi Horror Stories by Samar Samar books and stories PDF | मायावी कंगन भूतिया स्टोरी

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मायावी कंगन भूतिया स्टोरी

बहुत समय पहले पहाड़ों से घिरे एक सुंदर से गांव में एक गरीब लेकिन मेहनती औरत रहती थी, जिसका नाम माया था। पूरा गांव उसकी ईमानदारी और मेहनत की मिसाल देता था। उसके माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं थे और वह बिल्कुल अकेली थी। उसका एक ही सपना था—गांव में अपनी छोटी-सी दुकान खोलना, ताकि मेहनत से अपना जीवन बिता सके।

माया के पास उसकी मां की आखिरी निशानी थी—सोने के दो सुंदर कंगन। वही उसकी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी थे। उसने तय कर लिया था कि अगले दिन शहर जाकर उन कंगनों को बेचकर अपनी दुकान शुरू करेगी। सारी रात वह खुशी-खुशी अपनी दुकान के सपने बुनती रही।

लेकिन उसी रात गांव में एक चालाक चोर आ गया। उसकी नजर माया के सोने के कंगनों पर पड़ गई। आधी रात को वह चुपके से घर में घुसा और कंगन चुराकर भाग गया। सुबह जब माया उठी तो उसने संदूक खोला। कंगन गायब थे।

उसकी चीख पूरे गांव में गूंज उठी। गांव वालों ने बहुत खोजबीन की, लेकिन चोर का कोई पता नहीं चला। माया की सारी उम्मीदें एक पल में टूट गईं। जिस सपने के सहारे वह जी रही थी, वही सपना उसकी आंखों के सामने बिखर गया।

पूरा दिन वह रोती रही। शाम होते-होते आसमान पर काले बादल छा गए। तेज हवाएं चलने लगीं और भयानक बारिश शुरू हो गई। बिजली की गड़गड़ाहट पूरे गांव को डरा रही थी। उसी दर्द और निराशा में माया ने अपने घर की बल्ली से फांसी लगाकर अपनी जान दे दी।

गांव वालों ने अगले दिन उसका अंतिम संस्कार कर दिया। सबको लगा कि अब सब खत्म हो गया...

लेकिन असली डर तो अब शुरू होने वाला था।

जिस रात माया की चिता की राख ठंडी भी नहीं हुई थी, उसी रात श्मशान में अजीब घटनाएं होने लगीं। आसमान में काली बिजली चमक रही थी। अचानक माया की राख के बीच से सुनहरी रोशनी निकलने लगी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे बुला रही हो।

धीरे-धीरे राख हिलने लगी।

कुछ ही पलों बाद राख के ढेर से एक भयानक औरत बाहर निकली। उसके लंबे बिखरे बाल जमीन तक लटक रहे थे। आंखें अंगारों की तरह लाल थीं। शरीर पर जली हुई राख चिपकी हुई थी और उसके दोनों हाथों में वही चमचमाते सोने के कंगन थे।

लेकिन वे असली कंगन कैसे वापस आ गए?

यह रहस्य किसी को समझ नहीं आया।

असल में माया की आत्मा ने तपस्या और अपने अधूरे दर्द की अग्नि से उन कंगनों की मायावी शक्ति को जन्म दिया था। अब वे साधारण कंगन नहीं रहे थे। उनमें बदले की भयानक शक्ति बस चुकी थी।

उस रात पहली बार गांव में किसी ने एक औरत की डरावनी हंसी सुनी।

"मेरे... कंगन... वापस करो..."

अगली सुबह गांव का एक आदमी अपने घर के बाहर बेहोश मिला। उसके दोनों हाथों पर कंगनों के गहरे निशान बने हुए थे। वह होश में आते ही सिर्फ एक ही बात दोहराता रहा—

"लाल आंखों वाली औरत... मेरे सामने खड़ी थी..."

धीरे-धीरे हर रात कोई न कोई गायब होने लगा। किसी के घर से सोने के गहने गायब हो जाते, तो किसी को आधी रात को कंगनों की छन-छन सुनाई देती।

गांव वालों को समझ आ गया कि माया अब इंसान नहीं रही...

वह "माया विद कंगन" बन चुकी थी।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी था...
क्या कंगन चुराने वाला चोर अभी भी जिंदा था?
और क्या माया का असली बदला अभी शुरू ही हुआ था?
रात का समय था। पूरा गांव गहरी खामोशी में डूबा हुआ था। माया की मौत को तीन दिन बीत चुके थे, लेकिन उसके घर के आसपास आज भी कोई जाने की हिम्मत नहीं करता था। जैसे ही सूरज ढलता, गांव के लोग अपने दरवाजे और खिड़कियां बंद कर लेते। बच्चों को बाहर निकलने की मनाही थी और बूढ़े लोग भी भगवान का नाम लेकर जल्दी सो जाते थे। लेकिन उस रात कुछ ऐसा होने वाला था, जिसे देखकर पूरे गांव की किस्मत बदलने वाली थी।

आसमान में अचानक काले बादल छा गए। कुछ ही देर में तेज हवाएं चलने लगीं। बिजली की गड़गड़ाहट से धरती कांपने लगी और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। गांव के बाहर बने पुराने श्मशान में माया की चिता की राख अब भी पड़ी थी। तभी उस राख के बीच से हल्की सुनहरी रोशनी निकलने लगी। धीरे-धीरे वह रोशनी और तेज होती गई। अचानक राख अपने आप हवा में उड़ने लगी और उसी राख के बीच से माया की भयानक आत्मा बाहर आ गई। उसके लंबे बिखरे बाल जमीन तक लटक रहे थे, चेहरा राख से काला पड़ चुका था, आंखें अंगारों की तरह लाल जल रही थीं और उसके दोनों हाथों में चमचमाते हुए सोने के कंगन दिखाई दे रहे थे। जैसे ही उसने पहला कदम आगे बढ़ाया, उसके कंगनों से छन... छन... छन... की आवाज पूरे श्मशान में गूंज उठी।

माया धीरे-धीरे गांव की ओर बढ़ने लगी। जहां-जहां से वह गुजरती, वहां पेड़ों की टहनियां अपने आप टूटने लगतीं, कुत्ते जोर-जोर से भौंकने लगते और गांव के जानवर डरकर भागने लगते। ऐसा लग रहा था जैसे पूरी प्रकृति उसकी वापसी से कांप उठी हो।

उसी समय गांव का एक आदमी रघु अपनी बीमार मां के लिए वैद्य से दवा लेकर लौट रहा था। बारिश इतनी तेज थी कि उसे सामने का रास्ता भी ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था। तभी उसके कानों में कंगनों की धीमी आवाज सुनाई दी।

छन... छन... छन...

रघु रुक गया। उसने चारों तरफ देखा, लेकिन वहां कोई दिखाई नहीं दिया। तभी आसमान में बिजली चमकी और एक पल के लिए पूरा रास्ता रोशनी से भर गया। उसी रोशनी में उसने सड़क के बीचोंबीच एक औरत को खड़ा देखा। उसके लंबे बाल हवा में उड़ रहे थे। उसकी आंखें लाल अंगारों की तरह चमक रही थीं और उसके हाथों में सोने के कंगन चमक रहे थे।

बिजली जाते ही चारों तरफ फिर से अंधेरा छा गया।

रघु डर के मारे कांपने लगा। उसने हिम्मत करके पूछा, "क... कौन हो तुम?"

अंधेरे में वही डरावनी आवाज गूंजी, "मेरे... कंगन... किसने... चुराए...?"

रघु के हाथ से दवा की पोटली नीचे गिर गई। वह पीछे हटने लगा, लेकिन कीचड़ में उसका पैर फिसल गया और वह जमीन पर गिर पड़ा। तभी माया धीरे-धीरे उसके बिल्कुल सामने आकर खड़ी हो गई। उसके चेहरे से राख टपक रही थी और उसकी आंखों से खून जैसे लाल आंसू बह रहे थे।

माया ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। उसके कंगनों से काली धुंध निकलने लगी। वह धुंध धीरे-धीरे रघु के चारों ओर घूमने लगी। रघु पूरी ताकत से चिल्लाया, लेकिन उसकी आवाज बारिश और बादलों की गड़गड़ाहट में दबकर रह गई।

कुछ ही क्षण बाद वहां फिर से सन्नाटा छा गया।

अगली सुबह गांव वाले जब खेतों की ओर जा रहे थे, तो उन्होंने रघु को पुराने बरगद के पेड़ के नीचे बेहोश पड़ा देखा। उसकी दोनों कलाइयों पर जलने जैसे गोल निशान बने हुए थे, जैसे किसी तपते हुए कंगन ने उन्हें कसकर पकड़ लिया हो।

जब रघु को होश आया तो वह कांपते हुए केवल एक ही बात बार-बार दोहराने लगा, "वह लौट आई है... वह अपने कंगन ढूंढ़ रही है... जो भी चोर है, वह उसे जिंदा नहीं छोड़ेगी..."

यह खबर पूरे गांव में आग की तरह फैल गई। अब किसी को यकीन नहीं रहा कि यह सिर्फ एक अफवाह है। सभी समझ चुके थे कि माया की आत्मा सचमुच वापस आ चुकी है।

उसी शाम गांव के मंदिर में सभी लोग इकट्ठा हुए। हर चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था। तभी गांव का सबसे बूढ़ा आदमी हरिदास धीरे-धीरे खड़ा हुआ और बोला, "माया की आत्मा तब तक शांत नहीं होगी, जब तक उसके कंगन चुराने वाला उसके सामने नहीं आएगा। लेकिन मुझे डर है कि वह असली चोर को ढूंढ़ने से पहले पूरे गांव को अपने श्राप का शिकार बना देगी।"

हरिदास की बात सुनकर मंदिर में सन्नाटा छा गया।

तभी मंदिर के बाहर फिर से वही आवाज गूंजने लगी।

छन... छन... छन...

सभी लोगों की नजर मंदिर के मुख्य दरवाजे पर टिक गई। दरवाजा बिना किसी के छुए धीरे-धीरे अपने आप खुलने लगा। बाहर घना अंधेरा था। अचानक उस अंधेरे में दो लाल आंखें चमकीं और एक भयानक हंसी पूरे गांव में गूंज उठी।

उस हंसी को सुनते ही मंदिर के अंदर बैठे सभी लोगों के शरीर डर से कांपने लगे।