You and I - 6 in Hindi Love Stories by Priya Chaudhary books and stories PDF | तुम और मैं - 6

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तुम और मैं - 6

दिसंबर की सर्दियाँ अपनी पूरी रफ़्तार पर थीं। कॉलेज के कमरो में ठंडी हवाओं का डेरा था और हम अपनी क्लास की बिल्डिंग की ऊपरी मंजिल पर बैठे थे। वह दिन किसी और दिन जैसा ही लग रहा था, लेकिन मेरी सहेली के एक वाक्य ने सब कुछ बदल दिया। उसने फुसफुसाते हुए कहा, "प्रिया, कान्हा बाहर आए हैं, वो कॉलेज के गेट के बाहर खड़े हैं। उन्होंने लाल रंग की टी-शर्ट पहनी है।"
​जैसे ही यह खबर मिली, मेरे दिल की धड़कनें एक अलग लय में बजने लगीं। कॉलेज की उस बिल्डिंग की ऊंचाई से नीचे सड़क को देखना एक आदत सी बन गई थी। खिडकियों से नीचे का नज़ारा साफ था, लेकिन कान्हा की वो लाल टी-शर्ट भीड़ में कहीं खोई हुई थी। ऊपर से नीचे की तरफ टकटकी लगाकर देखना, हर आने-जाने वाले को गौर से निहारना और उस लाल रंग को ढूंढना—यह एहसास बड़ा ही अजीब था। ऊपर से नीचे की दूरी काफी  ज्यादा नहीं थी, पर वह दूरी ही उस वक्त मेरी सबसे बड़ी दुश्मन बन गई थी।
​मैंने कई बार कोशिश की, खिड़की के पास जाकर अपनी नज़रें दौड़ाईं, लेकिन वे दिखाई नहीं दिए। हो सकता है गेटकीपर ने उन्हें अंदर आने न दिया हो, या शायद वो उस भीड़ में मेरी नज़र से बच गए हों। मैं ऊपर से उन्हें देख तो नहीं पाई, लेकिन उनके वहां होने के अहसास ने ही मुझे बेचैन कर दिया था। उस वक्त मेरे मन में एक ही ख्याल था—मुझे बस उनके पास जाना है, उनसे मिलना है।
​तभी मुझे महसूस हुआ कि मेरा पेट कुछ दुख रहा था। वह पीरियड्स का हल्का सा दर्द था। सच कहूँ तो, वो दर्द इतना भी नहीं था कि मैं चल न सकूँ या क्लास में बैठ न सकूँ। लेकिन उस पल, उस दर्द ने मुझे एक मौका दिया। मुझे लगा कि यही वो सही बहाना है जिससे मैं सर से छुट्टी माँग सकती हूँ और कान्हा से मिलने के लिए आज़ाद हो सकती हूँ।
​मैं प्रोफेसर सर के पास गई। अपनी बेबसी दिखाते हुए, पेट दर्द का बहाना बनाया।  थोड़ी मिन्नतें कीं—"सर, प्लीज, बहुत दर्द हो रहा है, मुझे घर जाना होगा।" मेरी वो मासूमियत और शायद मेरे चेहरे पर दिखी बेचैनी ने काम कर दिया। सर ने मुझे जाने की इजाज़त दे दी। जैसे ही मुझे छुट्टी मिली, मैं सहेली के साथ सीढ़ियों से नीचे की ओर भागी। वह भागना सिर्फ सीढ़ियों से उतरना नहीं था, वह कान्हा की तरफ बढ़ते मेरे कदम थे। उस हड़बड़ाहट में, मैं अपनी ही धड़कनों को महसूस कर रही थी।
​जब मैं गेट के पास पहुँची, तो मेरे पैर रुक गए। मैंने चारों तरफ देखा,  पर कान्हा नहीं दिखे मुझे लगा कही वो चले तो नहीं गए पर दिल को पता था आस पास ही है वो मेरे, कॉलेज के पास ही कोई कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा  उधर चले गए थे वो क्युकी रोड  पर ऐसे खडे होना allow  नहीं था  कुछ लोग उन्हें देख रहे थे तो वो उधर चले गए थे.. फिर मेरी दोस्त ने कान्हा को कॉल किया और वो आ गए हमारी तरफ और फिर मेरी नज़रें उन पर जा टिकीं। वह लाल टी-शर्ट वाकई चमक रही थी।  जब उन्होंने मुझे देखा, तो उनके चेहरे पर वही पुरानी शांत मुस्कान थी। वह मुस्कान जिसने मेरे उस दिन के सारे तनाव को, उस मामूली से पेट दर्द को और उस ऊपरी बिल्डिंग की सारी मायूसी को एक पल में खत्म कर दिया।23 दिसंबर की वह दोपहर, जब मैं कॉलेज के गेट से बाहर निकली, तो कान्हा सामने खड़े थे। सड़क के दोनों तरफ घने पेड़ों की कतार थी, जो उस जगह को पूरी दुनिया से अलग एक एकांत कोना बना रही थी। समय बहुत कम था; कॉलेज का वक्त खत्म होने वाला था और मुझे घर भी पहुंचना था, इसलिए हम कहीं दूर जा ही नहीं सकते थे। हम बस वहीं, उन पेड़ों के पास जाकर खड़े हो गए।
​वहाँ का माहौल बहुत शांत था। चिड़ियों की चहचहाहट और पेड़ों के बीच से छनकर आती धूप—सब कुछ जैसे एक खूबसूरत कविता की तरह था।
फिर अचानक समय जैसे थम सा गया। सब कुछ बहुत सादगी भरा था, और तभी वह लम्हा आया जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
​कान्हा ने मुझे अपनी बाहों में लिया—एक बहुत ही प्यारा, बहुत ही कोमल सा 'हग'। उस आलिंगन में एक ऐसी सुरक्षा थी जो मैंने पहले कभी महसूस नहीं की थी। हम बस एक-दूसरे में खोए हुए थे। और फिर, बिना किसी उम्मीद के, बिना किसी प्लानिंग के, कान्हा ने मुझे पहली बार kiss किया।
​वह मेरा 'फर्स्ट किस' (First Kiss) था।
​सच कहूँ तो, उस पल मैं पूरी तरह से 'बेहोश' (निश्चेष्ट) हो गई थी। मुझे अपने आसपास की दुनिया का कोई होश नहीं रहा। वह पल इतना सुंदर, इतना शुद्ध और इतना गहरा था कि मैं आज भी उसे महसूस कर सकती हूँ। मेरे लिए वह बिल्कुल 'अनबिलीवेबल' था। एक तरफ मेरे मन में कान्हा के प्रति वो मासूम सा प्रेम था, और दूसरी तरफ वो स्पर्श जो मेरी रूह तक को छू गया। उस वक्त जो सिहरन मेरे बदन में दौड़ी, जो सुकून मेरे दिल में उतरा, उसे शब्दों में समेटना नामुमकिन है।
​वह 'किस' सिर्फ एक शारीरिक स्पर्श नहीं था; वह उन सभी अनकही बातों का निचोड़ था जो हम उन मुलाकातों में एक-दूसरे से कहते थे। वह एक ऐसा एहसास था जिसने मुझे कान्हा के और करीब ला दिया। मुझे याद है, उस वक्त मुझे ऐसा लगा जैसे समय की सुइयाँ वहीं ठहर गई हों। न मुझे घर जाने की जल्दी थी, न कॉलेज की क्लास का कोई डर—सब कुछ बस उस एक लम्हे में सिमट गया था। 
कान्हा अपने साथ मेरे लिए आलू के पराठे लेकर आए थे। यह जानते हुए कि वे मेरे पसंदीदा हैं, फिर अपने दोस्तों के पास आये कान्हा भी एक लडके के  साथ आये हुए थे, कान्हा मेरे लिए इतना दूर से आलू पराठे लाये  वो भी खुद अपने हाथों से पराठे बनाकर लाना, उस दिन की सबसे बड़ी खुशी थी। हम दोनों ने साथ बैठकर उन पराठों का स्वाद लिया। मेरी सहेली भी वहीं थी, हम सबने साथ में हँसी-मजाक किया और वह छोटा सा पिकनिक जैसा माहौल बन गया।
​आज इतने समय बाद भी, जब मैं उस दिन को याद करती हूँ, तो मेरा दिल वैसे ही धड़कने लगता है। वह आलू के पराठों की खुशबू, उन पेड़ों की छांव, कान्हा का वो प्यार भरा साथ और वो पहला अहसास—सब कुछ इतना 'ब्यूटीफुल' है कि मेरी आँखों में खुशी के आंसू आ जाते हैं। वह दिन हमारे रिश्ते का टर्निंग पॉइंट था, जहाँ हम एक-दूसरे के लिए और भी ज्यादा गहरे, और भी ज्यादा अपने हो गए थे।उस दिन मैंने पहली बार महसूस किया कि प्यार की कोई सीमा नहीं होती। कॉलेज के नियम, क्लास की बंदिशें, प्रोफेसर का डर—सब कुछ उस लाल टी-शर्ट वाली मुलाकात के सामने फीका पड़ गया था। वह 23 दिसंबर का दिन मेरे लिए इसलिए खास नहीं था कि मैंने क्या पहना था या क्या किया था, बल्कि इसलिए खास था क्योंकि मैंने पहली बार अपने दिल की सुनी थी। मैंने अपनी मर्जी से सब कुछ छोड़कर कान्हा का चुनाव किया था।