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असली शिक्षक

अंजली स्वभाव से थोडी चंचल थी मगर पढने में बेहद होशियार, कंम्प्युटर उसका प्रिय विषय था ,इसलिये परीक्षा के दिनों में अंजली अकसर अपनी परेशानी लेकर मेरे पास आती| उसे पढ़ाकर मुझे भी अच्छा लगता। मेरी कक्षा में खुशी के कारण वह अति उत्साहित रहती| मै यह सब नजर अंदाज भी कर देता । अकसर स्टाफ रूम में भी वह बेधडक चली आती ,मैने अकसर उसे वहाँ आने से रोका भी था। बारहवीं की परीक्षा के बाद अंजली इंजनियरिंग की प्रवेश परीक्षा की तैयारी में जुट गई । उसका सपना था कम्प्युटर इंजीनियर बनना। मैं उसकी सफलता को लेकर पूरी तरह आशान्वित था, आखिर परीक्षा का दिन आ ही गया ड़र और चिंता से अंजली का बुरा हाल था ।

 परीक्षा खंड में उसने जब प्रश्न पत्र हल किया तभी उसे समझ आ गया था कि उसका पेपर बिगड गया हैं । रोते हुये मुझसे मिली, पर मैं  उस समय व्यस्त था । मेने  उसे शाम को मिलकर बात करने के लिये कह कर घर भेज दिया था |  आज सोचता हूँ ये मेरी बहुत बड़ी भूल थी..  अनेको छात्रों व शिक्षकों के सामने कही गई बात कब सबुत बन, हमारे सामने झूठ को सच करने का साक्ष्य बने, हम स्वयं भी नहीं जानते।

  कुछ दिनो तक अंजली मुझे दिखाई नहीं दी| मैं भी बोर्ड की परीक्षा के कारण व्यस्त रहा| अंजली ने आगे के पर्चे दिये नहीं ... मैं इस बात से अंजान था। एक दिन स्कूल से निकल रहा था कि सामने से मेरी ही छात्रा  जो अंजली की पक्की सहेली थी रश्मी दिखाई दी| मैने उससे अंजली के विषय में जानना चाहा , उसने  तिरस्कार और भय से अपना मुँह  दूसरी ओर फेरा और जल्दि से वहाँ  से चली गई| मैं कुछ समझ ही नहीं पाया।

परीक्षा पूरी हुयी और मैं  गर्मीयों के अवकाश में वापस अपने गांव जाने की सोच ही रहा था। शाम को परिवार के साथ थोडा बाहर निकला ....सामने से अंजली के पिता आते दिखाई दिये| नमस्कार करना चाहा पर ..... उन्होंने  न जवाब दिया न देखा ही....... विचार करने लगा ‘ऐसा क्या हुआ है? उसी दिन रश्मी का व्यवहार भी आहत कर गया था मुझे’....।

 मैने पत्नी बच्चों  को घर पर छोड अकेले ही अंजली के घर जाने का निर्णय किया। मैं अंजली के घर पहुँचा,  तब रात के नौ बजे थे। परिवार साथ बैठ कर भोजन कर रहा था| दरवाजा खोलने अंजली के पिता आये| ऑखों में उतर आई क्रोध व घ्रणा को मैने महसूस किया..... सिर्फ। इतना ही बोले “शुक्र मानना कि हमने पुलिस को सूचना नहीं दी, वर्ना कहीं के नहीं रहते.....। भलाई इसी में है कि आप धर की राह पकडें .....मैं  कुछ समझता उससे पहले अंजली का फूट फूट कर रोने का स्वर सुनाई दिया और  घड़ाम की आवाज  से दरवाजा बंद हो गया । मैं हतप्रद था....हताश..... वही  सीढ़ी  पर ही बैठ गया, कुछ समझ नहीं आ रहा था।

पता नहीं क्यों कुछ समय बाद दरवाजा खुला| मेरे सामने अंजली के पिता खडे थे| उन्होंने  घीरे से घर का  दरवाजा बंद किया और मेरे कंधें पर हाथ रखकर मुझे घर  के मुख्य दरवाजे तक लाकर बोले- “मैं नहीं  जानता कि आपने इतनी गन्दी हरकत करके, गुरू शिष्य के रिश्ते को बदनाम क्यों किया। हमने समाज और अपनी पुत्री के भविष्य को ध्यान में रखते हुये, यह बात किसी को नहीं बताई आप कृपया यहॉ से चले जायें ......प्रयास करना दुबारा किसी की बेटी के साथ एैसा व्यवहार मत करना, वरना सभी से माफी मिल जाये ऐसा संभव नहीं है|

  अंजली के पिता के एक एक वाक्य मेंरे जहन पर हथोंडे की तरह वार कर रहे थे| ‘कैसा व्यवहार, कौन सी माफी? आप मुझे बताएँ तो सही, मैं तो अंजली से परीक्षा के बाद से मिला ही नहीं......”। “क्यों शरीफ बनते हैं आपका असली चैहरा कम से कम हमारे सामने तो आ गया है| बाल बच्चे वालें हैं  इसलिये हमने बात को आगे नहीं बढाया...”। इस बार मैंने जोर से कहा किस बात को...... अंजली के पिता ने आगे मुझे जो कुछ भी बताया उसे सुनकर मैं  अति शर्मिन्दा हुआ| कैसे विश्वास दिलाता उस समय कि..... यह हरकत मेरी नहीं है पर  मन  ही मन .... निष्चय किया कि बात की तह तक पहूंच कर रहुंगा कि ....यह हरकत मेरी नहीं है तो किसकी है? वापस आते समय मै अपना मोबाईल नम्बर अपनी पत्नि का मोबाईल नम्बर उनको देता आया फिर इस तरह का फोन या मैसेज आये तो मुझे तुरंत सूचित करें।

 परिवार को कुछ अंश तक मेरे इस प्रयास से मेरी ईमानदारी पर थोडा विश्वास हुआ। मैं विचार करता रहा ‘कौन है जो मेरे नाम से इतनी धिनोंनी हरकत कर सकता है .....परीक्षा के बाद जब मैने  अंजली को मिलने के लिये कहा, तभी उसे मेरे नाम से एक पत्र मिला, उसमें रात आठ बजे स्कूल के पीछे मिलने की बात लिखि थी। अंजली को समझ नहीं आया, उसने अपने पिता को भी नहीं बताया और परचा बिगड जाने के कारण अपने खराब मन को सांत्वना पाने की आशा से स्कूल के पीछे जाने के लिये घर से निकली| थोडा चलने पर ही एक साऐ ने उसे दबोच लिया पर अंजली किसी तरह से उस साये से छूट कर भाग आई| साया कुछ बोल नहीं रहा था बस एक ही बात कह रहा था “अंजली आई लव यु अंजली आई लव यु” आवाज स्पष्ट नहीं थी| दबी दबी आवाज निष्चित नहीं था अंजली को  कि वह आवाज मेरी ही थी|  उसके बाद अनेको संदेश जो उसके वाटस एप्पस पर थे| भाषा इतनी अभद्र की पढ़ने में शर्म आ जायें| उस दिन बुलावा तो मेरे नाम से आया था| इसलिये दोष मुझ पर ही था।

 अब मेरी बारी थी| इतना बडा लांछन ..  मैने घर जा कर  पत्नि को बताया| उसे भी चिन्ता सताने लगी पर उसे अपने पति पर विश्वास था। हम दौनों ने विचार किया  कि ‘फोन नम्बर किसका है’ ये जानने के  प्रयास का संयुक्त फैसला लिया, उसी नम्बंर पर फोन करने से बंद बता रहा था। पत्नि ने भी इस विषय में मेरा पूरा साथ दिया जानती थी कि यदि अंजली की और से यह बात पुलिस तक पहुँच  जाती  तो मान सम्मान व गरिमा सभी कुछ खतम हो जाता । पता लगाना कठिन काम नहीं था पर अंजली के पिता का कहना था कि उससे अंजली, व  परिवार का नाम खराब होगा। चाहे बाद में हम कितनी भी सफाई दें   अपने आप को निर्दोष  साबित कर ले, पर कपडे का दाग छुप जाता है चरित्र का दाग अमिट बनकर हमारी पीढियों  तक को प्रभावित करता है ।

पत्नि ने एक दिन शान्ति से पूछा था  ‘आपके साथ के शिक्षकों  में से कोई ऐसा है जिसके बारे में आप शक कर सकते हैं.......मैने दिमाग पर जोर डाला पर ...... समझी  बुझी बात है कि ‘हमारा मन यदि आईने की तरह साफ है तो हमें चारों और सब साफ ही नजर आता है’ बहुत सोचने के बाद मैं सिर्फ इतना कह पाया ‘किसी पर इलजाम लगाना पाप होगा, पर हमारे साथ के शिक्षकों  में अमित यादव पर मैं अविश्वास कर सकता हुं पर मेरी नजर में भी यह पाप ही होगा’।

 पत्नि ने मुझे विश्वास दिलाया हम एैसा कुछ भी नहीं करेंगें।  हमें सबसे पहले यह पता लगाना था कि वह फोन नम्बर किसका है| मेरी समझदार पत्नि ने मुझे सुझाया की आप अमित से उसका नम्बर मांग कर उसे व्हाब्सअैप में शामिल होने का न्योता दिजिये और मौका देख कर कभी दूसरे  नम्बर की मांग भी कर सकते हैं|  यह बात मुझे जच गई अब मै अमित यादव  को अपने ग्रुप में ले चुका था  एक दिन आनलाईन शापिंग के बहाने मैने उससे किसी अन्य नम्बर की मांग  करी और थोडे सोच विचार के बाद उसने मुझे एक दूसरा  नम्बर देते हुए कहा ‘इसे मैं अकसर बंद ही रखता हूं’ मैने घर आकर पत्नि से वह नम्बर निकालने के लिये कहा जिसमें अंजली को मैसेज आया था ...... मुझे व मेरी पत्नि के सर से भारी वजन उतर गया, जब हमें असली गुनहगार का पता चल गया। अंजली के पिता को बताने से पहले मुझे बडी सावधानी की जरूरत थी

   सबसे जरूरी था अंजली के सामने अपने आप को निर्दोष साबित करना ।  यह संभव था क्यों की मै कहीं भी गलत नहीं था| यह तो गलत फहमी थी जो अपनी  स्थान पर  सही भी थी| वर्तमान परिवेश और चारों तरफ घटती ऐसी घटनाये हमें किसी भी घटना को सहजता से लेने की अनुमति देती ही कहाँ  है । अमित से फोन नम्बर मिलने के बाद उसे लेकर अंजली के पिता पास गया | उन्हीं  के सामने अमित को कुछ मैसेज , उसके जवाब पा कर उन्हें  विश्वास हो गया कि यह नम्बर अमित का ही है| अंजली के पिता अपनी पुत्री के इस अपमान को जगजाहिर नहीं करना चाहते थे पर अमित यादव जैसे व्यक्ति को  इसकी सजा दिलवाना भी चाहते थे| वह संभव नहीं था क्यों कि अमित यादव अपना पक्ष ‘क्या और कैसे रखेगा ‘ यह कहना अनिष्चित था।

      मेरे दिल का बोझ कुछ कम हुआ, तेा मै अंजली के पिता से मिला| उसकी आगे की शिक्षा के बारे में बात करने से पता चला अंजली ने अपना आत्म विश्वास एकदम खो दिया है| मेरा मानना था कि पहले उसक खोये आत्मविश्वास को जगाने के प्रयास करने होंगे| उसे सामान्य जीवन के लिये प्रेरित करना ही मेरे लिये एक बडी चुनौति थी 

हमेशा चुलबुली सी रहने वाली अंजली एकदम शान्त रहती| उसकी मम्मी अगर उससे बात करने का प्रयास करती तो वह गुस्से से चिल्लाने लगतीं डाक्टर के अनुसार पेपर बिगडने व उस हादसे के बाद वह अवसाद  का शिकार हो गई थी| एक होनहार छात्रा का ऐसा हाल मेरी बर्दाश्त  के बाहर था| दवाईयां  तो डाक्टर ने दे दी थी पर उनके अनुसार उसका व्यस्त रहना सामान्य जीवनचर्या आरंभ करना जरूरी था|

 एक रात अंजली के पिता ने मुझ से अनुनय करते हुये कहा ‘आप अंजली से बात करें उसे समझायें ....’ मैं उसे सब कुछ स्पष्ट कर चुका हूँ,  शायद आपकी बात समझे मैं  अपनी बेटी के सपनों को यूं  बिखरने नहीं दे सकता| उसका वापस पढाई की और रूझान होना अत्यंत आवश्यक है ‘|

 हम शिक्षको के पास हर वर्ष अलग अलग तरह के बच्चे  आते हैं इसलिये बच्चों का मन पढने का हुनर भी खूब आ जाना स्वभाविक है| ये बात हर कोई नहीं जानता कि हम शिक्षक थोडे बहुत मनोवैज्ञानिक भी होते हैं । यहॉ मसला और मामला भिन्न ही था

एक दिन मैने अंजली को खुल  कर सारी बात स्पष्ट कर दी थी| शाम के समय मै रोज अंजली के पास बैठता, इधर उधर की बातें करता| वह सिर्फ हाँ, हूँ ना में ही जवाब देती,  मैं तो  इतने पर भी संतुष्ट था| वह प्रतिक्रिया तो  देने लगी थी| करीब महिना होने को आया, मैने अभी तक उससे पढाई की कोई बात नहीं कि थी| बस देश, दुनिया, क्रिकेट की बातें ही हमारा विषय रहता था

एक दिन मैं अपनी कॉपीया चैक करने अंजली के घर पर ही ले गया अंजली निर्लिप्त सी मेरे पास बैठी थी| मैरे उलझन भरे भाव देखकर उसने पूछा क्या हुआ  सर? मैं तो शायद इस अवसर की प्रतिक्षा ही कर रहा था| मैने उसे बताया एक सवाल ऐसा ही कि विद्ययार्थी ने कापी में जो किया है वह सही है  उत्तर भी सही है पर मुझे उसके हल करने के तरीके पर संशय है| अंजली ने झट से मेरे हाथ से कॉपी ली और दुसरे पन्ने पर सवाल हल करने लगी ....उसने उत्साह में सारा सवाल पूरा किया और बोली “सर ये सही है, बस यह छात्र बीच के दो स्टेप लिखना भूल गया ....”  मैने कहा इसका मतलब ये भी तो हो सकता है कि इस छात्र ने नकल की हो... “नहीं सर मुझे नहीं लगता की कोई इतनी छोटी सी बात के लिये नकल करेगा....” मुझे मनचाहा अवसर मिलता नजर आ रहा था|

‘अजली तुम्हें नहीं लगता कि पढाई छोड कर अब तुम अपनी जिन्दगी की सबसे बडी गलती करने जा रही हो, तुम्हारे जैसे होनहार बच्चों को जीवन में इस तरह हार मान लेना कहॉ उचित गिना जा सकता है| एक हादसा एक असफलता तुम्हे अगर इतना विचलित कर सकती है तो आगे का पूरा जीवन बिना शिक्षा के गुजर जायगा यह कैसे सोच सकती हो....| एक बात और जैसे तुम पेन्टिग करते समय अपनी हर कृति को सुन्दरतम बनाने का प्रयास करती हो, हम शिक्षक भी अपने हर छात्र को उच्चतम शिखर पर ही देखना चाहते हैं”| ‘शायद अब यह तुमसे न हो पाये’ इतना कह कर मैं चुप हो गया, अपना सामान समेट ही रहा था कि लंबे मौन के बाद अंजली का स्वर सुनाई दिया “क्या आपको लगता है कि अब भी मै आगे पढाई कर पाउंगी “.....मैंने कहा ‘क्यों नहीं बेटा तुम जरूर कर पाओगी’ इतना ही नहीं ‘अपनी मनचाही मंजिल भी अपने करीब ही पाओगी .....बस उठो कदम संभालो राहे स्वतः ही तुम्हारा इंतजार कर रहीं  हैं ”।

मैंने देखा अंजली मेरे पावें की तरफ देख रही थी, वह हादसा ही था जो उसे मेरे नजदीक आने से रोक रहा था, पर मेरी पवित्र भावना और सत्यता उसे मेरे कदमों तक ले आयी थी| आज मैंने  स्वयं को निर्दोष महसूस किया उस रात मुझे गहरी नींद आई| इसलिये नहीं की अंजली सामान्य हो गई थी वरन इस लिये की एक शिक्षक ने अपनी मर्यादा पुनः प्राप्त कर ली थी।ं

में आज भी  दिल से यही चाहता हूं कि ऐसे शिक्षकों का असली चैहरा समाज के सामने आना चाहिए|  पर अंजली जैसे अनेक छात्राओं को भी  जानता हूं जिन्होंने  इस तरह के हादसो के बाद आवाज उठाई और समाज के द्वारा इतनी तिरस्कृत कर दी गईं  की माता पिता को मजबूर होकर अपना निवास बदलना पडा| इसलिये अंजली के पिता की प्राथमिकता अपनी पुत्राी का सामान्य जीवन प्रवाह में लाकर अगले कदम पर विचार करना था। अंजली के पिता के  व मेरे  संयुक्त प्रयास द्वारा स्कूल प्रिन्सपल  तक यह बात पहुचाई गई,  उचित एक्शल लेने की विनती के साथ पूर्ण सहयोग का आश्वासन भी मिले तो उन्हे अधिक प्रोत्साहन मिलेगा|

 छात्राओं के मान सम्मान के साथ खिलवाड  न हो इसके लिए  फोन जैसे संसाधनो को सावधानी से उपयोग कर हमें स्वयं को सुरक्षित रखना चाहिये।

प्रभा पारीक,भरूच गुजरात 9427130007