दादी की रसोई में छुपा इलाज*
मेरी दादी के पास हर मर्ज की दवा है। जब भी जीवन में कोई मुश्किल आ जाए, तो उनके पास हर समस्या का हल होता है। वो हमें समझाती हैं कि हर मुश्किल का सामना कैसे किया जाता है।
वो हमें अपने बीते हुए कल के बारे में सुनाती हैं। उनकी बातें सुनकर आँखें भर आती हैं। हम कितने आराम से अपनी ज़िंदगी जीते हैं, जबकि पहले के समय में ऐसा नहीं था।
दादी बताती हैं कि हमारे यहाँ अगर किसी को कहीं जाना होता था, तो उस समय यात्रा की इतनी सुविधा नहीं थी। लोग पैरों से ही चलकर जाते थे। मीलों का सफर पैदल तय करते थे।
और अगर कोई बीमार पड़ जाए, तो हम अस्पताल नहीं भागते थे। बल्कि अपनी ही रसोई से इलाज कर लिया करते थे। लोहे की कड़ाही, मिट्टी का चूल्हा और कुछ जड़ी-बूटियाँ... बस यही उनका अस्पताल था।
दादी की रसोई में हर बीमारी की दवा रखी रहती थी। सर्दी-जुकाम हो जाए तो तुलसी-अदरक का काढ़ा बन जाता। काली मिर्च और गुड़ डालकर उबालतीं, और कहतीं "ये पी ले, डॉक्टर की जरूरत नहीं पड़ेगी"।
चोट लग जाती तो हल्दी और सरसों का तेल गर्म करके लगा देतीं। कहतीं "घाव भी भर जाएगा, निशान भी नहीं रहेगा"। पेट दर्द हो तो अजवाइन और काला नमक, पेट फूल जाए तो हींग वाला पानी।
दादी डांटती भी थीं तो प्यार से। अगर मैं रोटी जलाने लगती तो कहतीं "अरे बिटिया, चूल्हा देख के रोटी सेक, मोबाइल नहीं"। मैं मुंह बना लेती। पर 2 मिनट बाद वो खुद मेरे लिए घी-चीनी वाली रोटी बना देतीं। कहतीं "ले, गुस्सा उतर गया? अब खा ले"। उनकी डांट 2 मिनट की, दुलार पूरी उम्र का।
दादी की रसोई कोई किचन नहीं, मंदिर थी। मिट्टी का चूल्हा, काली हो गई कड़ाही, और लकड़ी की पलटी। रोज सुबह उठकर सबसे पहले चूल्हे को प्रणाम करतीं। कहतीं "अन्नपूर्णा मां यहीं बैठती हैं"। आज AC वाले किचन में वो श्रद्धा कहाँ? सब बटन दबाओ, खाना तैयार। पर स्वाद? वो तो दादी के हाथ में था।
आज की तारीख में हम हर बात के लिए गोली खाते हैं। पर दादी की रसोई की दवा में साइड इफेक्ट नहीं होता था, सिर्फ प्यार होता था। उनके हाथ का स्पर्श ही आधी बीमारी ठीक कर देता था।
दादी जाते-जाते कह गई थीं "बेटा, खाने में 3 चीज जरूर डालना... प्यार, सब्र और माँ का आशीर्वाद"। तब समझ नहीं आया। आज समझ आता है। रेसिपी कोई भी हो, अगर दिल से ना बनाओ तो स्वाद नहीं आता। दादी का खाना अमृत इसलिए था क्योंकि उसमें वो 3 चीजें थीं।
आज भी जब मैं उदास होती हूँ या थक जाती हूँ, तो दादी की वो बातें याद आती हैं। उनकी रसोई की खुशबू याद आती है। और लगता है कि असली दवा तो उनके आशीर्वाद में थी।
वो चली गईं, पर उनकी रसोई के नुस्खे और उनकी सीख आज भी मेरे साथ हैं। अब जब भी मुझे कोई मुश्किल आती है, मैं आँख बंद करके दादी को याद करती हूँ... और हल अपने आप मिल जाता है।
बस इन्हीं बातों को सुनकर लगता है कि हमारी ज़िंदगी तो कुछ भी नहीं है, उनकी ज़िंदगी के आगे। उनका संघर्ष, उनका सब्र, उनका प्यार... ये सब आज की पीढ़ी के लिए एक सीख है।
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