white shawl in Hindi Classic Stories by SHREYA INDUSHREE books and stories PDF | सफ़ेद शॉल

Featured Books
Categories
Share

सफ़ेद शॉल

तुम्हारे हिस्से का मौन मेरे हिस्से में आया.... और तेरा मन मेरे मन को भाया.....
यामिनी की मृत्यु के सातवें दिन घर में अब पहले की तरह सन्नाटा नहीं रहा था।लोग थे,रिश्तेदार थे,बर्तन खनक रहे थे।
धीमी आवाज़ों में बातचीत हो रही थी।लेकिन तारा को लग रहा था कि घर पहले से कहीं अधिक खाली हो गया है।शायद इसलिए क्योंकि कुछ लोग घर में नहीं रहते।वे घर ही होते हैं।

यामिनी ऐसी ही थीं।उनकी धीमी आवाज़,सुबह की चाय,बरामदे में रखा उनका झूला,अधूरी पढ़ी किताबें।सब कुछ जैसे अभी भी वहीं था।फिर भी कुछ नहीं था।दोपहर के समय तारा उनकी अलमारी साफ़ करने लगी।
माँ ने कहा था"जो किताबें हैं, लाइब्रेरी को दे देना।बाकी सामान देख लेना।"
अलमारी पुरानी सागौन की लकड़ी की थी, बहुत वर्षों पुरानी।
उसमें कपूर और पुराने काग़ज़ों की मिली-जुली गंध बसी हुई थी।
तारा धीरे-धीरे सामान निकालती गई।साड़ियाँ,पुरानी डायरियाँ,कुछ पुरस्कार,कुछ तस्वीरें।फिर सबसे नीचे एक छोटा-सा संदूक दिखाई दिया।तारा ठिठक गई।
उसने यह संदूक पहले कभी नहीं देखा था।पीतल का छोटा-सा ताला लगा था।लेकिन ताला बंद नहीं था।उसने ढक्कन उठाया।
अंदर एक सफेद शॉल रखी थी।बहुत सावधानी से तह की हुई।
साधारण...पुरानी।कहीं-कहीं धागे उधड़े हुए।तारा ने शॉल उठाई।और तभी उसे महसूस हुआ कि भीतर कुछ और भी है।
शॉल के बीचों-बीच एक बंडल रखा था।

पुराने पत्र,पीले पड़ चुके, और धागे से बँधे हुए।तारा का दिल अनायास तेज़ धड़कने लगा।सबसे ऊपर एक छोटा-सा कागज़ रखा था।उस पर यामिनी की लिखावट थी।वही सुंदर, और गोल अक्षर।
"मेरे बाद जो भी इन्हें पाए,कृपया इन्हें जलाना मत।क्योंकि यही मेरे जीवन का वह हिस्सा है,जिसे मैंने कभी जीते-जी किसी से नहीं कहा।"

तारा जैसे पत्थर की हो गई।उसने कागज़ दोबारा पढ़ा।फिर तीसरी बार।

यामिनी?

वही यामिनी?

जो हर बात खुलकर कहती थीं?जो परिवार में सबसे ईमानदार मानी जाती थीं?उनके जीवन का कोई हिस्सा ऐसा भी था...जिसके बारे में किसी को पता नहीं था?
तारा फर्श पर बैठ गई।उसने धीरे-धीरे धागा खोला।सबसे ऊपर का पत्र निकाला।
तारीख़....12 जुलाई, 1969

तारा की साँस अटक गई।यह उसकी माँ के जन्म से भी पहले का पत्र था।
पत्र की शुरुआत हुई"प्रिय यामिनी,
आज मैंने तय किया था कि तुम्हें नहीं लिखूँगा।
लेकिन कुछ लोग आदत नहीं होते।
वे उस साँस की तरह होते हैं
जिसे रोकने की कोशिश भी उसे और ज़रूरी बना देती है।"
तारा की आँखें फैल गईं।पत्र के अंत में एक नाम था...अनिरुद्ध।
वह नाम घर में कभी नहीं सुना गया था,कभी नहीं।
तारा ने जल्दी से दूसरा पत्र उठाया।
फिर तीसरा।
फिर चौथा।
हर पत्र के अंत में वही नाम।
अनिरुद्ध।
और हर पत्र में...
ऐसा प्रेम...
जिसके बारे में उसने केवल उपन्यासों में पढ़ा था।
लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न कुछ और था।
अगर अनिरुद्ध यामिनी के जीवन में इतना महत्वपूर्ण था...
तो परिवार में किसी ने उसका नाम कभी क्यों नहीं लिया?
और नाना?
विवेक त्रिवेदी?
जो यामिनी के पति थे?
वे कहाँ थे इस कहानी में?
तारा का सिर घूमने लगा।
उसे अचानक लगा कि जिस स्त्री को वह पूरी उम्र जानती रही...
वह शायद केवल आधी कहानी थी।
बाकी आधी...
उस सफेद शॉल में छिपी हुई थी।
बाहर शाम उतर रही थी।
घर के लोग अपने-अपने कमरों में जा चुके थे।
और तारा...
फर्श पर बैठी...
पचपन साल पुराने एक प्रेम के सामने थी।
एक ऐसे प्रेम के सामने...
जो किसी की मृत्यु के बाद भी जीवित था।
उसने अगला पत्र खोला।
और उसे बिल्कुल नहीं पता था कि अगले कुछ दिनों में वह केवल अपनी नानी के बारे में नहीं...
बल्कि प्रेम, स्त्री और मौन के बारे में अपनी सारी धारणाएँ बदलने वाली है।

उस रात तारा अपने कमरे में नहीं गई।वह यामिनी की अलमारी के सामने फर्श पर बैठी रही।सफेद शॉल उसकी गोद में थी।
और सामने रखे थे,पचपन साल पुराने पत्र।
बाहर रात गहरा रही थी।घर सो चुका था।लेकिन तारा की आँखों में नींद नहीं थी।
उसने पहला पत्र फिर से खोला।
इस बार धीरे-धीरे।
हर शब्द पर रुकते हुए।
प्रिय यामिनी,
आज विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में तुम्हारी कुर्सी खाली थी।
और मुझे पहली बार समझ आया कि कुछ लोग केवल अपने शरीर से नहीं आते।
वे अपने साथ एक पूरा मौसम लेकर आते हैं।
तुम्हारे न होने से आज पूरा दिन नवंबर जैसा लगा।
जबकि बाहर जुलाई है।
तारा अनायास मुस्कुरा दी।
यह प्रेमपत्र था।
लेकिन वैसा नहीं जैसा फिल्मों में होता है।
यह किसी ऐसे आदमी का पत्र था...
जो प्रेम में होने से पहले एक लेखक रहा होगा।
वह आगे पढ़ती गई।
तुमसे एक शिकायत है।
तुम्हें किताबें लौटाने की आदत नहीं है।
और जो किताबें तुम ले जाती हो,
उनमें अपने बाल छोड़ आती हो।
कल निराला की कविताओं में तुम्हारा एक बाल मिला।
उसे निकालकर फेंक देना चाहिए था।
लेकिन मैंने पूरी किताब वापस रख दी।
तारा ठिठक गई।
यह वाक्य पढ़कर उसके भीतर कुछ हल्का-सा काँपा।
इतना साधारण,इतना छोटा...फिर भी इतना अंतरंग।
पत्र समाप्त हुआ।नीचे वही नाम.....!अनिरुद्ध।
तारा ने दूसरा पत्र उठाया।
लेकिन इस बार कुछ और उसके ध्यान में आया।
सभी पत्र अनिरुद्ध के नहीं थे।
बीच-बीच में यामिनी के भी थे।
उसने एक पत्र खोला।
ऊपर लिखा था,प्रिय अनिरुद्ध,
तारा ने अनायास साँस रोक ली।
यह पहली बार था जब वह अपनी नानी को प्रेम में बोलते हुए सुनने वाली थी।
पत्र छोटा था।
आज माँ ने कहा कि मैं बहुत हँसने लगी हूँ।
उन्हें क्या बताती कि इसका कारण क्या है।
कुछ लोग जीवन में आते नहीं,
धीरे-धीरे हमारे दिनों में घुल जाते हैं,जैसे चाय में चीनी।
दिखाई नहीं देते,लेकिन स्वाद बदल देते हैं।
तारा ने पत्र नीचे रख दिया।
उसे अचानक यामिनी की याद आई।
वही यामिनी जो सुबह चाय बनाते समय मुस्कुराती थीं।
जो हर बात पर कहती थीं,
"ज़िंदगी को बहुत गंभीरता से मत लिया करो।"
क्या वह मुस्कान कहीं यहीं से आई थी?
क्या उसके पीछे अनिरुद्ध था?
तारा को महसूस हुआ,वह अपनी नानी की कहानी नहीं पढ़ रही।
वह उस लड़की की कहानी पढ़ रही है...जो कभी यामिनी बनने से पहले थी।
उसने अगला पत्र खोला।
तारीख़......18 नवंबर 1970
और इस बार शब्द अलग थे,उनमें बेचैनी थी।
यामिनी,
आज तुम्हारे पिता मुझसे मिले।
और मुझे पहली बार समझ आया कि प्रेम केवल दो लोगों की कहानी नहीं होता।कभी-कभी पूरा समाज उसमें आकर बैठ जाता है।
तारा सीधी होकर बैठ गई।
आगे लिखा था,उन्होंने बहुत विनम्रता से बात की।लेकिन उनकी विनम्रता में जो अस्वीकृति थी,वह किसी अपमान से अधिक कठोर थी।मैं उन्हें दोष नहीं देता।शायद मैं भी उनकी जगह होता,तो यही करता।
लेकिन आज पहली बार मुझे डर लगा है।
तारा के हाथ रुक गए।
डर......!
यानी यहीं कहीं कहानी बदलने वाली थी।
यहीं कहीं वह प्रेम...
जिसकी खुशबू इन शुरुआती पत्रों में थी...
दर्द में बदलने वाला था।
उसने जल्दी से अगला पत्र उठाया।
लेकिन तभी एक पुरानी तस्वीर नीचे गिर गई।
काले-सफेद रंग की,कोनों से घिसी हुई।
तारा ने उसे उठाया।
और उसके हाथ काँप गए।
तस्वीर में दो लोग थे।
एक युवा लड़की,और एक युवक।दोनों विश्वविद्यालय के किसी प्रांगण में खड़े थे।लड़की मुस्कुरा रही थी।वह यामिनी थी।
लेकिन वैसी नहीं जैसी तारा ने कभी देखी थी।
उसकी आँखों में एक उजाला था,एक निश्चिंतता.....एक सपनों भरी चमक।
और उसके बगल में खड़ा युवक...शायद अनिरुद्ध था।
लंबा,दुबला,गंभीर चेहरा।
लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह यामिनी पर टिकी हुई थीं।
तारा बहुत देर तक तस्वीर को देखती रही।
फिर उसके भीतर एक अजीब-सी टीस उठी।
क्योंकि उसने अचानक समझ लिया,यह केवल एक प्रेम कहानी नहीं थी।
यह उस स्त्री की कहानी थी...
जिसने जीवन का एक पूरा अध्याय अपने परिवार से छिपाकर रखा।
और अब...
उसकी मृत्यु के बाद...
वह अध्याय खुल रहा था।
धीरे-धीरे,शब्द दर शब्द......पत्र दर पत्र।
और तारा को आभास हो गया था कि इन पत्रों के अंत में केवल प्रेम नहीं मिलेगा।
कोई ऐसा निर्णय मिलेगा...
जिसने तीन जीवन बदल दिए थे।
यामिनी का...अनिरुद्ध का....और विवेक त्रिवेदी का।

सन् 1970.....इलाहाबाद विश्वविद्यालय।सर्दियों की एक धूपभरी दोपहर थी।पुरानी इमारतों की दीवारों पर समय की परतें जमी थीं।बरगद के पेड़ों के नीचे छात्र समूहों में बैठे थे।
कहीं कविता पढ़ी जा रही थी।कहीं राजनीति पर बहस चल रही थी।
और विश्वविद्यालय की पुरानी लाइब्रेरी के पीछे वाले प्रांगण में...
यामिनी और अनिरुद्ध बैठे थे।
उनके बीच कोई प्रेम प्रस्ताव नहीं हुआ था।न कोई फिल्मी स्वीकारोक्ति।
वे बस धीरे-धीरे एक-दूसरे के जीवन में उतर गए थे।
पहले किताबें,फिर कविताएँ,फिर लंबी सैरें।और फिर वह अवस्था...
जब किसी व्यक्ति का नाम सुनकर ही मन मुस्कुरा उठता है।
उस दिन यामिनी अपनी कॉपी में कुछ लिख रही थी।
अनिरुद्ध उसे देख रहा था,बहुत देर से।
अचानक यामिनी ने सिर उठाया।"क्या है?"

अनिरुद्ध हँसा।"कुछ नहीं।"

"झूठ।"

"ठीक है।"

वह कुछ क्षण चुप रहा।फिर बोला,
"मैं बस यह सोच रहा था कि तुम्हें देखते हुए समय इतना तेज़ क्यों बीत जाता है।"
यामिनी का चेहरा हल्का-सा लाल हो गया।उसने तुरंत नज़रें झुका लीं।लेकिन मुस्कान छिपा नहीं सकी।
उस दिन पहली बार दोनों ने महसूस किया,
जो उनके बीच है...
उसे अब केवल मित्रता नहीं कहा जा सकता।लेकिन प्रेम जितना सुंदर होता है...उसकी आहट उतनी ही भयावह भी होती है।
क्योंकि प्रेम के साथ भविष्य का प्रश्न जुड़ जाता है।
और भविष्य...दोनों के लिए सरल नहीं था।
यामिनी एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार की बेटी थी।उसके पिता उच्च न्यायालय में वकील थे।परिवार सम्मानित था।परंपराएँ कठोर थीं।
वहीं अनिरुद्ध...एक साधारण बंगाली परिवार से था।उसके पिता स्कूल शिक्षक थे।घर में धन नहीं था।सिर्फ किताबें थीं।
उस समय के भारत में...यह अंतर छोटा नहीं माना जाता था।
लेकिन प्रेम अक्सर उन बातों को महत्व नहीं देता...जिन्हें समाज सबसे अधिक महत्व देता है।
समस्या तब शुरू हुई...जब यामिनी के पिता को इस संबंध का आभास हुआ।एक शाम उन्होंने यामिनी को अपने कमरे में बुलाया।कमरे में हमेशा की तरह कानून की किताबें रखी थीं।
दीवार पर गाँधी जी की तस्वीर थी।और बीच में बैठे थे उसके पिता।
शांत....बहुत शांत।यामिनी उस शांति को पहचानती थी।
वह तूफ़ान से अधिक खतरनाक होती थी।
उन्होंने सीधे पूछा,"क्या तुम उस लड़के से प्रेम करती हो?"
यामिनी का दिल जैसे रुक गया।कुछ क्षणों तक वह कुछ नहीं बोल सकी।
फिर बहुत धीरे से कहा,"हाँ।"

कमरे में मौन भर गया।उसके पिता ने आँखें बंद कर लीं।
मानो वे इसी उत्तर की आशंका कर रहे थे।
बहुत देर बाद बोले,"क्या वह तुमसे विवाह कर सकता है?"

यामिनी ने तुरंत कहा"हाँ।"

लेकिन उसके पिता मुस्कुरा दिए।एक थकी हुई मुस्कान।
"बेटी,
प्रेम और विवाह एक ही चीज़ नहीं होते।"

यामिनी की आँखें भर आईं।"मेरे लिए हैं।"
उसके पिता ने पहली बार उसकी ओर देखा।
और उस क्षण...यामिनी को लगा कि वे बूढ़े हो गए हैं।कई वर्षों से अधिक बूढ़े।
"काश दुनिया भी ऐसा ही सोचती।"
बस इतना,न कोई गुस्सा,न कोई धमकी।और यही बात सबसे अधिक दर्दनाक थी।क्योंकि विरोध करने के लिए क्रोध चाहिए।
लेकिन उनके पिता के भीतर केवल भय था।
समाज का।परिवार का।लोगों का।

कुछ दिनों बाद उन्होंने अनिरुद्ध को बुलाया।यही वह मुलाक़ात थी जिसका उल्लेख उस पत्र में था।अनिरुद्ध आज भी उसे याद करता था।कमरे में चाय रखी गई।सम्मानपूर्वक बात हुई।
कोई अपमान नहीं।लेकिन कुछ सम्मान ऐसे होते हैं...जो अस्वीकृति से भी अधिक चोट पहुँचाते हैं।
यामिनी के पिता ने कहा"तुम अच्छे लड़के हो।"अनिरुद्ध चुप रहा।

"शायद मेरी बेटी तुमसे प्रेम भी करती है।"फिर वे कुछ क्षण रुके।"लेकिन मैं यह विवाह नहीं कर सकता।"

अनिरुद्ध ने पहली बार पूछा"क्यों?"

उनकी आँखें झुक गईं।"क्योंकि मैं उतना साहसी नहीं हूँ।"

बस....

कोई लंबा तर्क नहीं।कोई सामाजिक भाषण नहीं।केवल एक स्वीकारोक्ति।"मैं उतना साहसी नहीं हूँ।"

उस शाम जब अनिरुद्ध वापस लौटा...तो उसे लगा कि प्रेम हार भी सकता है।और उस रात यामिनी ने उसे पत्र लिखा।
शायद अपने जीवन का सबसे छोटा पत्र।
अनिरुद्ध,
अगर दुनिया केवल हम दोनों से बनी होती,
तो मैं कल ही तुमसे विवाह कर लेती।
लेकिन दुनिया हम दोनों से नहीं बनी।
और यही हमारी सबसे बड़ी त्रासदी है।
यामिनी

पत्र छोटा था।लेकिन उसी रात...पहली बार दोनों को महसूस हुआ,उनकी कहानी का सबसे कठिन अध्याय शुरू हो चुका है।
क्योंकि अब उनके सामने प्रेम नहीं...
निर्णय खड़ा था।
और निर्णय हमेशा प्रेम से अधिक निर्दयी होता है।

तारा ने अगला पत्र खोला।
तारीख़ थी.....3 मार्च, 1971
पत्र यामिनी का था।लेकिन लिखावट वैसी नहीं थी जैसी पहले पत्रों में थी।पहले के अक्षरों में एक लय थी।एक सहजता।
एक खिली हुई धूप।
इन अक्षरों में थकान थी।जैसे हर शब्द लिखने से पहले बहुत रोया गया हो।तारा ने पढ़ना शुरू किया।
प्रिय अनिरुद्ध,
यह पत्र लिखते हुए मुझे लग रहा है जैसे मैं अपने ही किसी हिस्से का अंतिम संस्कार कर रही हूँ।
तारा की उँगलियाँ रुक गईं।
आगे लिखा था,

कल रात पिता को दिल का दौरा पड़ा।
डॉक्टर ने कहा है कि उन्हें किसी भी प्रकार का तनाव नहीं होना चाहिए।
कुछ पंक्तियों बाद.... आगे लिखा हुआ था।
माँ पूरी रात रोती रहीं।पहली बार मुझे लगा कि मैं केवल उनकी बेटी नहीं हूँ।मैं उनके भय का भी एक हिस्सा हूँ।
तारा की आँखें धीरे-धीरे पत्र पर टिक गईं।
अनिरुद्ध,
प्रेम मनुष्य को साहसी बनाता है।
लेकिन कुछ रिश्ते उसे कायर भी बना देते हैं।
और मैं स्वीकार करती हूँ...
मैं साहसी नहीं निकली।
तारा के भीतर कुछ काँपा।
यह वही वाक्य था जो कुछ महीने पहले यामिनी के पिता ने कहा था,"मैं उतना साहसी नहीं हूँ।"
और अब...
यामिनी भी वही बात कह रही थी।
पत्र आगे बढ़ता गया।
अगर मैं केवल एक स्त्री होती,तो तुम्हारे पास चली आती।
लेकिन मैं एक बेटी भी हूँ।और शायद इसी कारण हार रही हूँ।
शब्द धुँधले होने लगे।
तारा ने गहरी साँस ली।
फिर पढ़ा,
अगले महीने मेरा विवाह तय कर दिया गया है।कमरे में सन्नाटा भर गया।तारा जैसे पत्थर हो गई।
उसे मालूम था कि यामिनी ने विवेक त्रिवेदी से विवाह किया था।
लेकिन यह पढ़ना...
कि उस विवाह से पहले कोई अनिरुद्ध भी था...
कुछ और ही था।
पत्र का अंतिम भाग सबसे कठिन था।
मैं तुमसे यह नहीं कहूँगी कि मुझे भूल जाओ।क्योंकि प्रेम आदेश से समाप्त नहीं होता।
और मैं यह भी नहीं कहूँगी कि मेरा इंतज़ार करना।क्योंकि वह अन्याय होगा।
मैं केवल इतना कहूँगी,जहाँ भी रहो,अच्छे रहना।
और अंत में.....
अगर कभी बहुत वर्षों बाद हम किसी सड़क पर मिलें...तो कृपया मुझसे यह मत पूछना कि मैंने तुम्हें क्यों छोड़ा।
क्योंकि उस प्रश्न का उत्तर मेरे पास भी नहीं होगा।
यामिनी

तारा ने पत्र बंद कर दिया।उसकी आँखें भीग चुकी थीं।
क्योंकि यह कहानी किसी धोखे की नहीं थी।किसी विश्वासघात की नहीं थी।यह उन लोगों की कहानी थी...जो एक-दूसरे से प्रेम करते थे।और फिर भी साथ नहीं रह सके।

कुछ देर बाद उसने अगला पत्र उठाया।यह अनिरुद्ध का उत्तर था।
तारीख़.....12 मार्च, 1971
तारा का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
क्या उसने गुस्सा किया होगा?
क्या उसने यामिनी को दोष दिया होगा?
क्या उसने उसे कायर कहा होगा?
उसने पत्र खोला।
और पहली पंक्ति पढ़ते ही उसकी आँखें भर आईं।
प्रिय यामिनी,
मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ।
बस इतना....और उसी एक वाक्य में...
इतना प्रेम था कि तारा को लगा जैसे कोई उसके सीने पर हाथ रखकर धीरे-धीरे दबा रहा हो।
पत्र आगे कहता था,शायद इसलिए नहीं कि मैं बहुत उदार हूँ।
बल्कि इसलिए कि मैं तुम्हें जानता हूँ।
और जो स्त्री अपने पिता को रोते हुए नहीं देख सकती,
वह स्वयं को रोते हुए देख लेगी।
लेकिन अपने निर्णय से पीछे नहीं हटेगी।
तारा की आँखों से आँसू टपक पड़े।
अनिरुद्ध यामिनी को समझता था।
इतना गहराई से...
कि शायद स्वयं यामिनी भी नहीं।
फिर पत्र की अंतिम पंक्तियाँ आईं।
मैं विवाह में नहीं आऊँगा।
क्योंकि मैं इतना मजबूत नहीं हूँ।
लेकिन जिस दिन तुम्हारी विदाई होगी...
उस दिन शहर छोड़ दूँगा।
ताकि तुम्हें जाते हुए न देखना पड़े।
तारा ने पत्र धीरे से बंद कर दिया।
खिड़की के बाहर रात उतर चुकी थी।
और पहली बार उसे महसूस हुआ,
प्रेम का सबसे बड़ा दुख बिछड़ना नहीं होता।
सबसे बड़ा दुख यह होता है कि दो लोग एक-दूसरे के लिए सही हों...
और समय उनके लिए गलत हो।
लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई थी।
पत्रों के बंडल में अभी बहुत कुछ बाकी था।
और सबसे ऊपर रखी सफेद शॉल...
अब भी अपने भीतर कोई रहस्य छिपाए बैठी थी।
क्योंकि तारा ने अभी तक यह नहीं जाना था,
कि विवाह के बाद भी अनिरुद्ध और यामिनी के बीच क्या हुआ।
और यह रहस्य...

तारा को हमेशा लगता था कि प्रेम कहानियाँ विवाह पर समाप्त हो जाती हैं।फिल्मों में ऐसा ही होता था,उपन्यासों में भी।
लेकिन उसके सामने रखे पत्र बता रहे थे कि कुछ कहानियाँ वहीं से शुरू होती हैं जहाँ बाकी कहानियाँ समाप्त हो जाती हैं।
उसने अगला पत्र उठाया।
तारीख़....27 अगस्त, 1972
यानी यामिनी के विवाह के लगभग एक वर्ष बाद।
तारा का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
क्या अनिरुद्ध ने फिर लिखा था?
क्या यामिनी ने उत्तर दिया था?
उसने पत्र खोला।
और पहली ही पंक्ति ने उसे रोक दिया।
अनिरुद्ध,
आज विवाह को एक वर्ष पूरा हो गया।
कुछ क्षणों तक तारा पत्र को देखती रही।
यामिनी की लिखावट शांत थी,स्थिर भी।
लेकिन शब्दों के नीचे एक अजीब-सी थकान बह रही थी।
विवेक बहुत अच्छे हैं।
शायद जितने अच्छे पति की कल्पना की जा सकती है,
उससे भी अधिक।
तारा ठिठक गई।
उसने फिर पढ़ा।
हाँ।
यामिनी ने यही लिखा था।
उन्होंने मुझे कभी किसी बात के लिए रोका नहीं।
कभी आवाज़ ऊँची नहीं की।
कभी मेरे सपनों का मज़ाक नहीं उड़ाया।
फिर एक लंबा खाली स्थान।
और उसके बाद
लेकिन प्रेम...
शायद अच्छाई से नहीं होता।
तारा की आँखें भर आईं।
यह वाक्य कितना निर्दयी था......
और कितना सच्चा।पत्र आगे बढ़ा।
मैं अपराधबोध में जीती हूँ।
क्योंकि मैं एक अच्छे आदमी को वह नहीं दे पा रही
जिसकी वह अपेक्षा करता है।
और मैं उस आदमी को भूल नहीं पा रहीजिससे मुझे कुछ भी अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए।
तारा ने पत्र नीचे रख दिया।
उसने पहली बार विवेक त्रिवेदी के बारे में सोचा।
उस आदमी के बारे में...
जो इस कहानी का खलनायक नहीं था।फिर भी शायद सबसे अधिक दुख उसी को मिला था।
कुछ देर बाद उसने अगला पत्र खोला।
यह अनिरुद्ध का था।
प्रिय यामिनी,
अब हमें एक-दूसरे को लिखना बंद कर देना चाहिए।
तारा का दिल धक् से रह गया।
पत्र आगे कहता था,
क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे जीवन में मेरी स्मृति तुम्हारे वर्तमान से बड़ी हो जाए।
फिर.....
और मैं यह भी नहीं चाहता कि विवेक त्रिवेदी नाम का वह आदमी,जिसे मैं जानता तक नहीं,मेरी वजह से कभी दुख पाए।
तारा की आँखें नम हो गईं।
यह आदमी कौन था?
कितना प्रेम करता था?
कि अपने प्रेम से भी अधिक दूसरे के जीवन की चिंता कर रहा था।
पत्र के अंत में लिखा था,
मैं तुम्हें भूलूँगा नहीं।लेकिन अब तुम्हें लिखूँगा भी नहीं।
क्योंकि कुछ प्रेमों की गरिमा उनकी दूरी में बची रहती है।
और नीचे था....
अनिरुद्ध
तारा ने धीरे से पत्र मोड़ दिया।कमरे में रात गहरी हो चुकी थी।
लेकिन उसके भीतर अब एक नया प्रश्न जाग गया था।
अगर यह आख़िरी पत्र था...
तो फिर इस संदूक में इतने सारे पत्र क्यों थे?
और तभी...
उसे बंडल के सबसे नीचे एक अलग लिफाफ़ा दिखाई दिया।
बाकी पत्रों से अलग,पुराना।
और उस पर केवल एक पंक्ति लिखी थी"यह पत्र मेरी मृत्यु के बाद पढ़ा जाए।"

लिखावट यामिनी की थी।तारा का गला सूख गया।धीरे-धीरे उसने लिफाफ़ा उठाया।उसके हाथ काँप रहे थे।
क्योंकि उसे अचानक महसूस हुआ।कि असली रहस्य अभी तक खुला ही नहीं था।
और शायद...
यामिनी ने अपनी पूरी कहानी किसी पत्र में नहीं,बल्कि इसी एक अंतिम लिफाफ़े में छिपा रखी थी।तारा देर तक उसे देखती रही।
खोलने का साहस जुटाती रही।
और बाहर...
रात की हवा में कहीं दूर कोई पेड़ हिल रहा था।मानो अतीत अपने अंतिम रहस्य के साथ उसका इंतज़ार कर रहा हो।