रात के ठीक 11:43 बज रहे थे। दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी के पेंडुलम की आवाज़ उस सन्नाटे में हथौड़े की चोट जैसी लग रही थी। हवा में कोई भी हलचल नहीं थी, मानो पूरी कुदरत ने अपनी आख़िरी सांस फेफड़ों में रोक ली हो। आसमान का वो चिर-परिचित नीलापन और तारों की चादर गायब हो चुकी थी। उसकी जगह एक खौफनाक, पिघले हुए तांबे जैसा लाल रंग फैल चुका था, जो इंसानी नज़रों को अंधा कर देने की हद तक चमक रहा था। हवा में किसी पुराने ट्रांसफार्मर के जलने, ओज़ोन गैस और लोहे के पिघलने की एक भयानक, दमघोंटू गंध तैर रही थी। जीभ पर एक अजीब सा कसैला और मेटैलिक स्वाद आ रहा था, और शरीर के सारे रोंगटे किसी भयंकर स्थैतिक ऊर्जा (Static Energy) के कारण सीधे खड़े हो गए थे।आर्यन अपनी सातवीं मंज़िल की बालकनी में खड़ा था। उसकी उंगलियां लोहे की ठंडी रेलिंग को बेहद मज़बूती से जकड़े हुए थीं। तभी एक ऐसा अदृश्य और खामोश झटका लगा, जिसने पूरी पृथ्वी को सुन्न कर दिया। आर्यन की हथेली में रखा उसका स्मार्टफोन, जो कुछ सेकंड पहले तक दुनिया भर की ख़बरों से वाइब्रेट कर रहा था, अचानक एक तेज़ 'चिंग' की आवाज़ के साथ फटा। उसकी स्क्रीन काली पड़ गई और वह महज़ कांच और प्लास्टिक का एक बेजान टुकड़ा बन गया।नीचे शहर का नज़ारा किसी खौफनाक विज्ञान-कथा (Sci-Fi) की फिल्म जैसा हो गया। सड़क किनारे लगे बिजली के खंभों से भयंकर नीली चिंगारियां छूटीं। एक के बाद एक, शहर के सारे ट्रांसफार्मर बम की शक्ल में फटने लगे। महज़ कुछ मिलीसेकंड के भीतर, उस महानगर की सारी जगमगाती बत्तियां, आसमान में उड़ते यात्री जहाज़ों के रडार, अस्पतालों की जीवन-रक्षक मशीनें और ट्रैफिक सिग्नल एक झटके में मौत की नींद सो गए। यह कोई आम पावर-कट नहीं था। यह हमारे सूर्य से उठी एक भयंकर 'सौर ज्वाला' (Solar Flare) थी, एक ऐसा चुंबकीय तूफ़ान जिसने इंसानी गुरूर की सदियों पुरानी टेक्नोलॉजी को एक पल में राख कर दिया था।अंधेरे में डूबी उन सड़कों से अब खौफनाक चीखें उठने लगी थीं। गाड़ियों के आपस में टकराने की कान फोड़ देने वाली आवाज़ें, टूटे हुए शीशों की खनक और बेतहाशा भागते कदमों का शोर उस कंक्रीट के जंगल में गूंज रहा था। लोग बदहवास भाग रहे थे। कुछ अपनी गाड़ियों को छोड़कर इमारतों के बेसमेंट की तरफ दौड़ रहे थे, तो कुछ फुटपाथ पर घुटनों के बल गिरकर आसमान की तरफ देखते हुए चीख-चीख कर प्रार्थनाएं कर रहे थे। एक माँ अपने बच्चे को सीने से चिपकाए हुए किसी कंक्रीट की छतरी के नीचे छुपने का व्यर्थ प्रयास कर रही थी। लेकिन जब मौत खुद आसमान का सीना फाड़कर उतर रही हो, तो ईंट और पत्थर की छतें भला क्या सुरक्षा देंगी? इंसानियत अपने वजूद के सबसे गहरे और काले खौफ से गुज़र रही थी।पर इन सबके विपरीत, आर्यन की धड़कनें किसी गहरी समाधि में बैठे साधु जैसी शांत थीं। उसकी आँखों में कोई खौफ नहीं था। वह अपनी बालकनी से इस प्रलय को ऐसे देख रहा था जैसे वह कोई किताब का आख़िरी पन्ना पढ़ रहा हो। वह विज्ञान का छात्र था और कुदरत की उस खौफनाक सच्चाई को समझ चुका था, जिसे दुनिया भर के वैज्ञानिक अब तक सिर्फ एक थ्योरी मानकर नज़रअंदाज़ करते आए थे।अरबों सालों से हमारा पालन-पोषण करने वाला, हमारी पृथ्वी को जीवन देने वाला हमारा सूरज... आज अपनी उम्र का आख़िरी पड़ाव पार कर चुका था। उसके अंदर का सारा परमाणु ईंधन खत्म हो चुका था। वह लाल दानव (Red Giant) बन चुका था और अब एक महा-विस्फोट (Supernova) बस कुछ पलों की ही दूरी पर था।अचानक, सड़कों से आने वाली वो दिल दहला देने वाली चीखें मद्धम पड़ने लगीं। लोग चुप नहीं हुए थे, बल्कि आवाज़ के सफर करने का विज्ञान ही टूट रहा था। आर्यन को महसूस हुआ कि उसके जूतों के नीचे मौजूद कंक्रीट के फर्श का दबाव कम हो रहा है। बालकनी के कोने में रखा भारी मिट्टी का गमला अपनी जगह से हिला। फिर एक झटके में वह गमला, उसकी मिट्टी और उसमें लगा हुआ पौधा हवा में उठ गए।गुरुत्वाकर्षण (Gravity) दम तोड़ चुका था।नीचे सड़कों पर मंज़र और भी खौफनाक हो गया। टकराई हुई गाड़ियां, टूटे हुए शीशे, कचरे के डिब्बे और वो बदहवास भागते हुए इंसान... सब के सब ज़मीन छोड़ चुके थे। लोग हवा में हाथ-पैर मार रहे थे, तैर रहे थे, पर उनका किसी भी चीज़ पर कोई नियंत्रण नहीं था। वो शून्य में लटके हुए खिलौनों जैसे लग रहे थे। बालकनी की लोहे की ग्रिल अपनी नींव से उखड़कर आर्यन के सामने तैरने लगी। पृथ्वी का वो अजेय खिंचाव, जिसने हमें सदियों से इस ज़मीन पर बांधे रखा था, अब खत्म हो चुका था।तभी, क्षितिज (Horizon) के उस लाल तांबे वाले रंग को चीरते हुए एक ऐसी रोशनी फटी, जिसने ब्रह्मांड के हर अंधेरे को मिटाकर रख दिया। वह रोशनी इतनी सफ़ेद, इतनी भयानक और इतनी तीव्र थी कि उसे देखने मात्र से आँखों की पुतलियां जल जाएं। वह कोई आम आग नहीं थी; वह एक ब्रह्मांडीय सुनामी थी। सूर्य का वह आख़िरी विस्फोट, जो लाखों किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ़्तार से पृथ्वी को निगलने आ रहा था।उस भयंकर गर्मी ने आग के पहुँचने से पहले ही अपना काम शुरू कर दिया। समंदर का पानी एक पल में उबलकर भाप में तब्दील होने लगा। हवा में तैरते हुए आर्यन ने कोई विरोध नहीं किया। उसने अपने दोनों हाथ उस शून्य में फैला दिए और अपनी आँखें मूंद लीं। उसके होठों पर एक अजीब सी सुकून भरी मुस्कान थी।आग की वो महा-लहर पृथ्वी से टकराई।दर्द का कोई अहसास नहीं हुआ। दर्द महसूस करने के लिए तंत्रिकाओं (Nerves) को दिमाग तक सिग्नल भेजना पड़ता है, पर वह ब्रह्मांडीय आग इतनी तेज़ थी कि सिग्नल पहुँचने से पहले ही तंत्रिकाएं वाष्प (Vapor) बन चुकी थीं।आर्यन ने अपने वजूद को मिटते हुए महसूस किया। उसकी त्वचा, उसका बहता हुआ खून, उसकी मज़बूत हड्डियां... सब एक झटके में टूटकर चमकते हुए परमाणुओं (Atoms) में बिखर गए। वह शहर, वो कंक्रीट की इमारतें, वो चीखते हुए लोग, पृथ्वी के ऊंचे पहाड़, गहरे महासागर, हमारे सारे अहंकार, हमारी सारी नफरतें और हमारे सारे सपने... सब एक ही पल में जलकर उस अनंत काले समंदर में राख का एक चमकता हुआ बवंडर बन गए थे। पृथ्वी का नामोनिशान मिट चुका था।पर विज्ञान की नज़रों में यह कोई मौत नहीं थी। यह तो कुदरत का 'रीसेट बटन' था।अंतरिक्ष के उस अथाह सन्नाटे में फैलती हुई वह राख, मरे हुए सूरज और पृथ्वी के उस मलबे के साथ मिलकर एक नया नेबुला (Nebula) बना रही थी। आर्यन के शरीर का हर एक कण, उसके खून का आयरन, उसकी हड्डियों का कैल्शियम—अब उस महा-शून्य की ठंडी हवाओं में तैर रहा था। वह अब किसी शहर का नागरिक नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड का एक अहम हिस्सा था।अरबों साल के एक लंबे और खामोश इंतज़ार के बाद, अंतरिक्ष के इस खालीपन में उसी गुरुत्वाकर्षण का नियम फिर से जागेगा। वह राख, वो बिखरे हुए कण फिर से एक-दूसरे की तरफ खिंचेंगे। दबाव बढ़ेगा, एक नया धमाका होगा और फिर से एक नया तारा जलेगा। उस नए तारे के इर्द-गिर्द नई ज़मीन बनेगी, नीले बादल छाएंगे, नदियों में पानी बहेगा और शायद... अरबों साल बाद, किसी नई धरती की बालकनी में खड़ा कोई नया इंसान आसमान की तरफ देखकर ठीक यही कहानी फिर से सोचेगा। कुदरत की इस अनंत किताब का बस एक पन्ना पलटा गया था, कहानी तो अभी बाकी थी।सुखविंदर की कलम से