Mera Saahitya Lekhan in Hindi Short Stories by Rakesh Kumar Sharma books and stories PDF | मेरा साहित्य लेखन

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मेरा साहित्य लेखन

आज दोपहर को घर के आंगन मे बैठा में आराम कर रहा था। अचानक दिमाग में कुछ लिखने का ख्याल आया। सोचा कुछ अच्छा सा लिखूं। पर क्या लिखना है ये तय नहीं कर पा रहा था। कई बार विचार आया कुछ साहित्य के उपर लिख डालू। जो बुद्विजीवी है उनके दिमाग के लिए कुछ खुराक हो जायेगी। यदी कहीं कोई पुरस्कार मिल गया तो अपनी तो बल्ले-बल्ले हो जाएगी और अगर कुछ न भी मिला तो कम से कम मोहल्ले के लोगों के बीच कुछ सम्मान सा तो हो ही जायेगा। ये सोचकर में कागज और कलम लेने के लिए उठा। कागज को हाथ मै पकडकर और कलम से सिर खुजाते हुए सोचने लगा कहां से शुरू करू। अब साहित्य के बारे में लिखना कोई मंदिर का प्रसाद तो है नहीं। भई ये सब लिखने के लिए एक माहौल की जरूरत होती है, अब सोचने के लिए पता नहीं हमको अपनी कितनी इन्द्रीयों का इस्तेमाल करना पडता है, ये बात सब को थोडे ही मालूम है। अभी कुछ सोचने के लिए बैठा ही था कि अचानक बच्चों की चै-पौं शुरू हो गई और इसके बाद मेरी घरवाली बच्चों के पीछे चिल्लाती हुई आ गई। उसके हाथ में एक पुरानी सी झाडू थी। बच्चों को शरारत करते देख उसका गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुचा। बस फिर क्या, अपने हाथ की झाडू को मिसाइल कि तरह उसने बच्चों पर एसे फेंका जैसे वो मिसाइल दुश्मन के किले को जमीनोज़द ही कर देगी। पर बच्चे भी तो हमारे ही है, झाडू को अपनी ओर आते देख बेटा झट से नीचे बैठ गया। झाडू का सीधा वार टेबल पर रखे फूलदान पर हुआ और वो नीचे गिरकर टुकड़े-टुकडे़ हो गया।

‘‘लो हो गया काम...’’ बरबस मेरे मुह से ये निकला।

इस सब घटनाक्रम के बाद तो बस मेरी घरवाली की आंखों से ज्वाला सी फूट पड़ी। कुछ मनमोहक शब्दों का उच्चारण हुआ हरामजा.......... और इस सबके बाद उसने तीखी निगाहों से मुझे देखा। मेरे पास आते ही और मुझे लिखता देख पता नहीं उसे क्या हो जाता है। उसको ऐसा लगता है जैसे में कुछ विशेष काम तो करता ही नहीं हूँ, बस सारा दिन निठल्ला बैठा रहता हूं और वो ऐसा व्यक्त करती है जैसे वही इंडिया का पूरा बजट बनाती हो।

इस सब से खिज कर मैने फैसला किया कहीं बाहर एकांत में जाकर लिखता हूँ। कम से कम वहां शांति तो होगी और फिर कई बार बाहर के माहौल में जाकर दिमाग में अच्छे-अच्छे विचार भी तो आते है। यही सब सोचकर मैनें पैंट शर्ट पहनी और बाहर साईकिल लेने के लिए गया। बाहर जाकर देखा कि साईकिल का पिछला टायर पंचर था।

‘इसको भी अभी पंचर होना था’ ख़ीजते हुऐ मैने कहा।

कोई भी अच्छा काम करने से पहले अगर ऐसे अपशगुन हो जाये तो मन वैसे ही विचलित हो जाता है। और फिर मेरे जैसी कुशाग्र बुद्धि वाले इंसान कुछ ज्यादा ही आगे तक की सोच लेते है। अब मैने विचार बनाया कि रिक्शा पकड कर पास के पार्क में जाता हूँ, इस समय वहां ज्यादा लोग भी नहीं होंगे और शांति भी होगी। यही सोच कर बाहर निकला, रिक्शा पकड कर सेन्ट्रल पार्क के गेट पर पहुंच गया। रिक्शा को पैसे देकर गेट से अंदर दाखिल हुआ। मेरी उम्मीद के मुताबिक यहां अभी भीड़ नहीं थी। कोने की एक बैंच पर मैं फैल कर बैठ गया। पूरी बैंच पर एक अनुभवी लेखक की तरह मैने अपने कागज फैला दिये। सोचा देखने वालें भी सोचेंगे की एक अभ्यस्त लेखक पूरी तन्मयता से अपने लेखन में व्यस्त है। मन ही मन मुस्कुराया और फिर चारों ओर माहौल का जायजा लेेने लगा। तभी मेरी नज़र थोडी दूरी पर बैठे एक बुजुर्ग पर पड़ी। 70-72 के आस-पास रहें होंगें। बड़े खामोश से बैठे थे। मै ध्यान से उन्हें देखने लगा। उनके चहरे के भाव बता रहे थे कि वो किसी गंभीर सोच में है। मेेरी भी उत्सुकता अब कुलबुलाने लगी। परमार्थ का काम सकून देता है इसी भावना के साथ मैं अपनी बैंच से उठा और उनकी ओर चल पड़ा। पास जाकर दुआ-सलाम हुई मैनें अपना परिचय दिया और उनके उनके बारे में पूछा। अपना परिचय मैनें इस प्रकार दिया मानो में साहित्य जगत का कोई जाना माना नाम हूँ। मैं तो इन महाशय को साधारण ही समझ रहा था परन्तु ये तो उस्ताद निकले। जब उन्होने लेखन के बारे में बात करनी शुरू की तो मुझे अब कुछ भी नहीं सुझ रहा था। उनके ज्ञान के सामने मेरी सारी जानकारी दम तोड़ रही थी और अब मैने जैसे-तैसे उनसे पीछा छुडाया और वापस अपनी बैंच पर आकर बैठ गया। इस सारे प्रकरण के पश्चात् सोचा चलो अब एकाग्र होकर कुछ लिख लिया जाए।

अब मन साहित्य की ओर से उचट रहा था। फिर मैनें सोचा कुछ हल्का-फुल्का ही लिख डालता हूं कौन सा मै कोई तीसमारखां हूं। यह सब सोच कर मैने पुनः आस-पास निगाह डाली और पैन को इस प्रकार मुंह में डालकर घुमाने लगा मानो मुझ से पहले तो सोचने का काम किसी ने किया ही नहीं। पर तभी एक ऐसी घटना घटी कि सारा मिजाज ही खराब हो गया। कम्बख्त एक कौये ने मेरी शर्ट पर बीट कर दी। मन ऐसा खराब हुआ की पुछो मत। मैने घुरते हुऐ कौये को देखा तो मुझे देख कर वा कांव-कांव करने लगा। उसकी इस हरकत ने मेरे गुस्से को सातवंे आसमान पर पहंुचा दिया। मैने आव देखा न ताव और पास ही पड़ा एक मोटा सा पत्थर उठा कर पूरी जान से कौये की ओर फैंका जैसे माने मैं इन्द्र का वज्र फैक रहा हूं जो उस नासमझ कौये के प्राण हरण करके ही वापस आयेगा। मैं अपने निशाने के प्रति आश्वस्त था, आखिर बचपन मैं पत्थर मारकर पेड़ से आम तोड़ने में में परिपक्व था। परन्तु हाॅय री किस्मत, कम्बख्त निशाना चूक गया और पत्थर मिसाईल की तरह उडता हुआ सामने के पेड़ की ओर चला गया। वहां पर एक नवयुगल दुनिया की आपा-घापी से बेखबर अपनी ही दुनिया में मशगुल थे। मेरा फैका हुआ पत्थर उन मोहतरमां के माथे पर लगा। लाल रक्त की एक धार सी बह निकली। यह सब देख कर उन मोहतरमां के साथी की त्यौरी चढ़ गई और उसने मेरी तरफ देखा और फिर दनदनाता हुआ मेरी तरफ भागा। उसको अपनी ओर आता देख कर मेरी तो जैसे जान ही निकल गई। यूं तो अपनी जवानी के दिनों मे मैं भी दंड पेलता था और ऐरा-गैरा मेरी ओर डर कर देखता भी नहीं था, परन्तु अब उम्र भी हो चली थी इसलिए इस घटना को देखकर मेरी हिम्मत ने जबाब दे दिया। जैसे ही वो नौजवान मेरे पास आया, आनन-फानन मेरे मुंह पर दो-तीन मुक्के रसीद कर दिये। कुछ मधुर संवाद भी हुऐ। इस सब घटना के दौरान मेरी शर्ट भी फट गयी और मुंह से खुन भी निकल आया। आस-पास की बैंचों पर बैठे लोग हमारी ओर दौड़े। उन्होंने आकर इस मल्ल युद्व को रोकने की पुरजोर कोशिश की पर वो नौजवान किसी के भी काबू में नहीं आ रहा था। मेरी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा और ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो मेरा राम-नाम सत्य करके ही मानेगा। अब इसे में अपनी किस्मत कहूं या मौके की नजाकत, उस मोहतरमां को पता नहीं क्यों मेरी हालत पर तरस सा आ गया। उसने आकर उस नौजवान को रोका और उसको खींच कर मुझसे दूर ले गई। उस नौजवान के दूर जाते ही मेरी जान में जान आई। मैं सर पर पैर रख कर तुरंत ही अपनी बैंच की ओर भागा और सीधा वहीं जाकर दम लिया।

अपनी उखडती टुटती सांसों को मैंने काबू में करते हुए आस-पास का मुआयना किया तो पाया लोग मुझेे ही देख कर हंस रहें है। तभी उस नामुराद कौये की आवाज मेरे कानों मे फिर से पड़ी। वो पेड़ की ऊंची ड़ाल पर बैठ कर मेरी ही तरफ कांय-कांय कर रहा था मानें मेरे हालात का मजाक उठा रहा था। मैने ज्वलंत निगाहों से उसे घूरा तो वो एकटक मेरी
ओर देखने लगा। उसकी इस हरकत से मेरे तन-बदन में माने आग के शोले भड़क गये। मै एक बार फिर से उसे मारने के लिए उठा पर तुरंत ही मेरे ज़हन में कुछ देर पहले घटी घटना की याद ताज़ा हो उठी। मै मन मसोस कर वापस बैंच पर बैठ गया। इस पूरे घटनाक्रम से मेरी काफी जगहसाई हो चुकी थी अतंः बुझे मन से में वापस अपने घर की ओर चल दिया। पूरे रास्ते भर कोई न कोई जान-पहचान वाला मिल ही जाता और मेरे फटेहाल पर चुटकी ले ही लेता।

‘‘अरे मिश्रा जी ई का हाल हुई गवा, कौनो कुत्ता पिछे पड गवा का’’

अव इन सब को मैं क्या बताता की कैसे अपनी मौत से पिछा छुडा कर आ रहा हूं।
जैसे तैसे गिरते पडते आखिरकार मैं अपने घर पहुंच ही गया। जैसे ही घर में दाखिल हुआ पत्नी मेरी हालात देख कर चिल्लाई
‘‘हाय दईया ये क्या हो गया, कहां से लूट पिट कर आ रहे हो’’।

के साथ मैं अपनी बैंच से उठा और उनकी ओर चल पड़ा। पास जाकर दुआ-सलाम हुई मैनें अपना परिचय दिया और उनके उनके बारे में पूछा। अपना परिचय मैनें इस प्रकार दिया मानो में साहित्य जगत का कोई जाना माना नाम हूँ। मैं तो इन महाशय को साधारण ही समझ रहा था परन्तु ये तो उस्ताद निकले। जब उन्होने लेखन के बारे में बात करनी शुरू की तो मुझे अब कुछ भी नहीं सुझ रहा था। उनके ज्ञान के सामने मेरी सारी जानकारी दम तोड़ रही थी और अब मैने जैसे-तैसे उनसे पीछा छुडाया और वापस अपनी बैंच पर आकर बैठ गया। इस सारे प्रकरण के पश्चात् सोचा चलो अब एकाग्र होकर कुछ लिख लिया जाए।

अब मन साहित्य की ओर से उचट रहा था। फिर मैनें सोचा कुछ हल्का-फुल्का ही लिख डालता हूं कौन सा मै कोई तीसमारखां हूं। यह सब सोच कर मैने पुनः आस-पास निगाह डाली और पैन को इस प्रकार मुंह में डालकर घुमाने लगा मानो मुझ से पहले तो सोचने का काम किसी ने किया ही नहीं। पर तभी एक ऐसी घटना घटी कि सारा मिजाज ही खराब हो गया। कम्बख्त एक कौये ने मेरी शर्ट पर बीट कर दी। मन ऐसा खराब हुआ की पुछो मत। मैने घुरते हुऐ कौये को देखा तो मुझे देख कर वा कांव-कांव करने लगा। उसकी इस हरकत ने मेरे गुस्से को सातवंे आसमान पर पहंुचा दिया। मैने आव देखा न ताव और पास ही पड़ा एक मोटा सा पत्थर उठा कर पूरी जान से कौये की ओर फैंका जैसे माने मैं इन्द्र का वज्र फैक रहा हूं जो उस नासमझ कौये के प्राण हरण करके ही वापस आयेगा। मैं अपने निशाने के प्रति आश्वस्त था, आखिर बचपन मैं पत्थर मारकर पेड़ से आम तोड़ने में में परिपक्व था। परन्तु हाॅय री किस्मत, कम्बख्त निशाना चूक गया और पत्थर मिसाईल की तरह उडता हुआ सामने के पेड़ की ओर चला गया। वहां पर एक नवयुगल दुनिया की आपा-घापी से बेखबर अपनी ही दुनिया में मशगुल थे। मेरा फैका हुआ पत्थर उन मोहतरमां के माथे पर लगा। लाल रक्त की एक धार सी बह निकली। यह सब देख कर उन मोहतरमां के साथी की त्यौरी चढ़ गई और उसने मेरी तरफ देखा और फिर दनदनाता हुआ मेरी तरफ भागा। उसको अपनी ओर आता देख कर मेरी तो जैसे जान ही निकल गई। यूं तो अपनी जवानी के दिनों मे मैं भी दंड पेलता था और ऐरा-गैरा मेरी ओर डर कर देखता भी नहीं था, परन्तु अब उम्र भी हो चली थी इसलिए इस घटना को देखकर मेरी हिम्मत ने जबाब दे दिया। जैसे ही वो नौजवान मेरे पास आया, आनन-फानन मेरे मुंह पर दो-तीन मुक्के रसीद कर दिये। कुछ मधुर संवाद भी हुऐ। इस सब घटना के दौरान मेरी शर्ट भी फट गयी और मुंह से खुन भी निकल आया। आस-पास की बैंचों पर बैठे लोग हमारी ओर दौड़े। उन्होंने आकर इस मल्ल युद्व को रोकने की पुरजोर कोशिश की पर वो नौजवान किसी के भी काबू में नहीं आ रहा था। मेरी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा और ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो मेरा राम-नाम सत्य करके ही मानेगा। अब इसे में अपनी किस्मत कहूं या मौके की नजाकत, उस मोहतरमां को पता नहीं क्यों मेरी हालत पर तरस सा आ गया। उसने आकर उस नौजवान को रोका और उसको खींच कर मुझसे दूर ले गई। उस नौजवान के दूर जाते ही मेरी जान में जान आई। मैं सर पर पैर रख कर तुरंत ही अपनी बैंच की ओर भागा और सीधा वहीं जाकर दम लिया।

अपनी उखडती टुटती सांसों को मैंने काबू में करते हुए आस-पास का मुआयना किया तो पाया लोग मुझेे ही देख कर हंस रहें है। तभी उस नामुराद कौये की आवाज मेरे कानों मे फिर से पड़ी। वो पेड़ की ऊंची ड़ाल पर बैठ कर मेरी ही तरफ कांय-कांय कर रहा था मानें मेरे हालात का मजाक उठा रहा था। मैने ज्वलंत निगाहों से उसे घूरा तो वो एकटक मेरी ओर देखने लगा। उसकी इस हरकत से मेरे तन-बदन में माने आग के शोले भड़क गये। मै एक बार फिर से उसे मारने के लिए उठा पर तुरंत ही मेरे ज़हन में कुछ देर पहले घटी घटना की याद ताज़ा हो उठी। मै मन मसोस कर वापस बैंच पर बैठ गया। इस पूरे घटनाक्रम से मेरी काफी जगहसाई हो चुकी थी अतंः बुझे मन से में वापस अपने घर की ओर चल दिया। पूरे रास्ते भर कोई न कोई जान-पहचान वाला मिल ही जाता और मेरे फटेहाल पर चुटकी ले ही लेता।
‘‘अरे मिश्रा जी ई का हाल हुई गवा, कौनो कुत्ता पिछे पड गवा का’’

अव इन सब को मैं क्या बताता की कैसे अपनी मौत से पिछा छुडा कर आ रहा हूं।
जैसे तैसे गिरते पडते आखिरकार मैं अपने घर पहुंच ही गया। जैसे ही घर में दाखिल हुआ पत्नी मेरी हालात देख कर चिल्लाई
‘‘हाय दईया ये क्या हो गया, कहां से लूट पिट कर आ रहे हो’’।

ये कहते हुअे वो घर के अंदर की ओर भागी और आनन-फानन हल्दी का लेप बना कर ले आई। मेरे सिर को पकड़ कर उसने लेप लगाया तो कुछ राहत सी महसूस हुई। बच्चे भी घबराकर मेरे आस-पास बैठ गये।

‘क्या जरूरत भी बाहर जाने की’ वो असहज होकर बोली।
‘खांमहखां अपनी सिर फुटवाकर आ गये’। अगर लिखना ही है तो घर में बैठकर ही लिखा करो।

मैं चुपचाप अपने बिस्तर पर लेट गया और सोचने लगा कि अब कभी भी लिखने के लिए ऐसी कोई मुसीबत मोल नहीं लूंगा। अभी दो-चार मिनट ही हुऐ होंगे आंख लगे कि मेरे परम मित्र शुक्ला जी दनदनाते हुये घर में दाखिल हुये। मुझे बिस्तर पर लेटा हुआ देखकर बोले - ‘अरे तुम यहां बिस्तर पर आराम फरमा रहे हो और मैं यहां साहित्य अकादमी से भागकर तुम्हारे लिए साहित्य लेखन का काम लेकर आया हूं’।

भगवान कसम उनकी यह बात सुनकर मेरे तन-बदन में आग सी लग गयी। मैं त्यौरी चढ़ा कर बोला-

‘भाड़ में गया ये साहित्य लेखन, और खबरदार जो तुमने फिर कभी इस घर मैं साहित्य लेखन का नाम भी लिया तो’
मेरा गुस्सा देखकर शुक्ला जी अचरज मैं पड़ गये पर मेरी आंखों की ज़्वाला को देख कर तुरंत ही घर से नौ-दो ग्यारह हो गये। मैं पुनः आंख बंद करके सो गया......


- राकेश शर्मा