Film Script: Kara in Hindi Film Reviews by Dr Sandip Awasthi books and stories PDF | फिल्म आलेख :_ कारा

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फिल्म आलेख :_ कारा

फिल्म आलेख :_ कारा

एक बेहतरीन सबाल्टर्न फिल्म

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ऐसी फिल्म जो दुनिया के अच्छे होने का भ्रम तोड़ती है। हजारों,लाखों खामोशी से घुट घुटकर मर रहे लोगों की व्यथा सामने रखती है। अच्छे इंसानों पर और दुख आते हैं,परेशानिया कम होने की जगह बढ़ जाती हैं। इन बातों को तार्किक और सलीके से तमिल फिल्म "कारा" बताती है। बेहतरीन हिंदी में यह फिल्म नेटफ्लिक्स पर अभी अभी दो हजार छब्बीस में आई है।

 

   कहानी और संवाद

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फिल्म दिखाती है किस तरह हालात उम्मीद के विपरीत होते हैं। फिर भी इंसान मेहनत करता ईश्वर के दिए जीवन को जीता है।यह आस रहती है कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा? लेकिन क्या ऐसा सच में होता है? क्या किसी ने देखा? यह लॉटरी की तरह से जिंदगी है कि लाखों टिकिट बिकते हैं तो एक जीतता है। वैसे ही जिंदगी की लॉटरी में भी लाखों में से एक ही जीतता है बाकी घुटकर,सिसककर दम तोड़ देते हैं। 

फिल्म उन्हीं लाखों लोगों की हालत को वास्तविकता से दिखाती है। किसानो को बैंक लोन देती है पर उनकी जमीन गिरवी रखने के बाद।

 फिर सूखा और अन्य कारणों से फसलें अच्छी नहीं होती और कर्जा बढ़ता जाता है। अंत में किसानों की जमीन पर कानूनन बैंक कब्जा कर लेती है।

कारस्वामी,अभिनेता धनुष , के किसान पिता की जमीन और बाकी किसानों की जमीन भी बैंक जब्त कर लेता है। 

कारस्वामी अपनी छोटी मोटी चोरी की आदतों और शहर जाकर रहने की जिद में दो वर्षों से शहर में संघर्ष कर रहा,चोरी कर रहा,पकड़ा जा रहा। फिल्म दिखाती है किस तरह गावों के युवा,खेतीबाड़ी से दूर होकर शहर में आकर चौकीदार,चोर या फिर ढाबों पर मजदूर बन जाते हैं। सारे सपने टूट जाते हैं। 

अभिनेता धनुष ने यह भूमिका भी डूबकर निभाई है। ढाबे के प्रारंभिक दृश्य में जिस तरह खाने का ऑर्डर,उसे परोसना,बर्तन धोना धनुष करते हैं वह दिखाता है की जमीन से जुड़ी भूमिकाओं लिए यह अभिनेता बहुत मेहनत ही नहीं करता बल्कि बारीकियों पर भी काम करता है।

फिल्म के संवाद जितने सहज और आम लोगों की तरह हैं उतनी ही सहज ,स्वाभाविक अभिनय पात्रों ने किया है।इस पर आगे लिखूंगा पर अभी एक नई तरह की समानता सामने आई अभिनेता धनुष को लेकर।

        धनुष,जिसे हिंदी फिल्म रांझणा और अभी अभी आई तेरे इश्क़ में,हम सभी सराह चुके हैं, सामान्य और आम लोगों से जुड़े पात्र अधिकतर निभाते हैं। वह भी इतनी कुशलता से की वह इंसान ,वह माहौल जीवंत हो उठता है। साथ ही एक आक्रोश ,वैसा आक्रोश नहीं जहां हीरो हवाई जहाज से लटककर बीस पचास लोगों को मारता है। लड़कियों और हीरोइन के संग पुष्पा होने के बाद भी नृत्य सीक्वेंस कर लेता है,भले ही कितना ही अतार्किक लगे। धनुष की फिल्में और अभिनय ,वर्षों से मैं देख रहा हूं,जमीन से जुड़ा और सबाल्टर्न वर्ग की आवाज को उठाता है। यह अभिनेता उस आक्रोश को अभिव्यक्त करता है जो बेबसी,लाचारी और अपने पर जुल्म पर जुल्म होने के बाद उपजता है। एक लाचार इंसान या तो खत्म हो जाए हालातों के बुलडोजर के आगे या वह अपनी आखिरी कोशिश कर ले?

यह अभिनेता और इसकी फिल्मों में यह आखिरी कोशिश बार बार आती है। यह लाखों करोड़ों आम लोगों की वह अनसुनी आवाज और दबी हुई हिम्मत है जो पता नहीं क्यों हम आखिर के लिए बचाकर रखते हैं। जहां तक हो हम आखिरी तिनके के भी छीन लिये जाने तक धैर्य और विश्वास रखते हैं कि ऊपर वाला कुछ करेगा। जबकि वह सोच रहा होता है कि मैं तो अदृश्य, अमूर्त हूं पर मेरी सृष्टि और यह बंदे तो मूर्त और हाथ पांव ,दिमाग, दिल सहित हैं तो यह खुद अपनी समस्याएं हल क्यों नहीं कर सकते? यह सक्षम हैं बस जरा हिम्मत और अपने पर विश्वास कर जाएं।

पर हम सभी जानते हैं कि यही चीज हम मनुष्यों से नहीं होती। ऊपर कहा न लाखों में एक हिम्मत कर पाता है,अपनी किस्मत खुद बना पाता है।

        तो यह अभिनेता उस आक्रोश को स्वर ही नहीं देता बल्कि परदे पर जीवित कर देता है। इसकी फिल्म परदे पर देखना दरअसल अपनी कहानी,हालातों को देखना और उससे जूझने और निकलने का रास्ता पाना होता है। बहुत विरले ही ऐसे अभिनेता हुए हैं भारत में जो इस तरह सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषय अपनी फिल्मों में उठाते हैं।

 

पटकथा,अभिनय और फोटोग्राफी

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फिल्म कई सच सामने रखती है।किस तरह बैंक गरीबों और किसानों को लोन देने के लिए लोन मेले लगाते हैं,उनके घर,जमीन गिरवी रख लेते हैं।जिसे वह अपनी जान देकर भी चुका नहीं पाते। 

क्योंकि मूल रकम ब्याज और अन्य फीस मिलाकर डेढ़ गुना हो जाती है। बैंक का रीजनल मैनेजर बताता है एक दृश्य में की जमीन रखकर तुम क्या करोगे? वह महंगे बीज,खाद और कीटनाशक का गणित और फिर आपदा से बच गई फसल तो उसकी सरकारी खरीद का सारा हिसाब बताता है। आखिर में महीने के तीन चार हजार ही किसान को पड़ते हैं। 

तब नायक अपने चेहरे पर सच में दुनिया भर के किसानों का दर्द और आवाज लाकर पूछता है ऐसा सवाल जो सारी पोल खोलकर रख देता है इस पूंजीवादी व्यवस्था और बैंक लोन की। वह कहता है ,"किसान की आमदनी यदि फसल बरबाद नहीं हुई तो मात्र तीन से चार हजार रुपया महीना और आप बैंक वाले किस्त बनाए साढ़े पांच हजार महीने की ? वह भी सात सालों की? 

बैंक अधिकारी बड़ी चालाकी और धूर्तता से मुस्काता है। इस अभिनेता ने भी बेहतरीन और सधा हुआ अभिनय किया है।

   यहां मैं एक बात और पूछता और बताता हूं कि यह सिस्टम कितना क्रूर और चालाक है आजादी के बाद से ही।

जो लाखों किसान कर्ज चुका नहीं पाते और उनकी जमीन जब्त होकर नीलाम हो जाती हैं तो फिर उन जमीनों का क्या होता है?  

वह जमीनें उद्योपतियों और बिल्डर्स को बेची जाती हैं। वह इन्हें खरीद कर अपने महंगे और बड़े प्रोजेक्ट बनाते हैं।

वहीं यह भी दिखाया गया है,जो सच भी है,की बैंक लूट की वारदातों में बैंक अधिकारी किस तरह दुगनी रकम खुद भी निकाल लेते हैं और नाम चोरों का आ जाता है।

       इधर तो ऐसा बैंक उच्चाधिकारी है जो खुद चोर को ऑफर देता है कि मैं तुम्हे बताता जाऊंगा और तुम वह बैंक लूटते जाना। आगे माल हम आपस में बाँट लेंगे। 

यह तल्ख सच्चाई आपको पुष्पा,एनिमल,स्त्री,कल्कि,रामयण आदि फिल्में नही दिखती। वह अलग ही दुनिया में ले जाती हैं। चंद ही फिल्मकार हैं जो यथार्थपरक फिल्में बनाये हैं और वह भी भावना और मनोरंजन को भी मिलाते हुए। ऐसे सामाजिक और जरूरी मुद्दे एक वक्त में वी शांताराम,दो आंखे बारह हाथ,डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी, श्याम बेनेगल,गोविंद निहलानी फिर प्रारंभ के दिवाकर बेनर्जी,अनुराग कश्यप और नीरज पांडे,आदित्य धर उठा रहे हैं।यह फिल्में सफल भी हो रहीं हैं।पर मुझे कहने में संकोच नहीं जिस तरह की बेहतरीन कहानी और सार्थक फिल्में (हालांकि आधी से अधिक बकवास भी यह बनाए हैं) तमिल,मलयालम और तेलुगु सिनेमा में बनी हैं उतनी आनुपातिक रूप से हिंदी में नहीं।

बहरहाल ,किसी भी किसान को तो उसकी जमीन ,एक बार जाने के बाद,दुबारा मिलती नहीं। 

        नायक भी अपनी चोरी की आदत छोड़ रेस्टोरेंट खोलने के लिए लोन लेने की सोचता है तो कितनी मुश्किले आती हैं।

पुलिस भी जब चोर पकड़ती है तो किस तरह अनगिनत धाराएं और दूसरी चोरियों का भी इल्ज़ाम उस पर लगा देती है। और कैसे मृतक किसान,नायक के पिता को,मरने के बाद भी अपनी जमीन और खेत से कानूनन बेदखल किया जाता है।

लेकिन यहां पुत्र जो है वह बैंक अधिकारी और सिस्टम को दोषी मानते हुए बैंक लूटने का फैसला करता है।

 वह केवल उतने ही पैसे चुराने की ईमानदारी रखता है जितने उसके पिता पर बैंक लोन था। लेकिन जब वह जाता है कर्ज चुकाने तो पता चलता है कर्जा पचास फीसदी बढ़ चुका है।

     वह दुबारा ग्रामीण इलाके के बैंक को लूटने की योजना बनाता है।

      फिर क्या होगा? क्योंकि एक तेज पुलिस अधिकारी उससे अपना हिसाब चुकाने के लिए उसके पीछे है।

इधर उसके पिता की मृत देह सरकारी हॉस्पिटल में लावारिस पड़ी है। जिसे उसे छुड़वाना भी है।

बहुत सारे टर्न और ट्विस्ट के साथ यह रोमांचक फिल्म "कारा" यह नायक का नाम कारस्वामी के ऊपर है,कहीं भी आपको बोरियत या पलक भी झपकाने नहीं देती। इतना अच्छा निर्देशन,एडिटिंग और फोटोग्राफी है कि फिल्म पूरा पूरा आपको नब्बे के दशक में ले जाती है जब मोबाइल फोन,सीसी टीवी कैमरे कुछ नहीं था। नायक और उसके कार्यों को निर्देशक ने बेहद सच्चाई से दिखाया है। वह हर चीज में,पहल में असफल होता है। दो बार बैंक लूटने का प्रयास असफल हो जाता है,चोरी करते पकड़ा जाता है, पिता से धन की मदद को जाता है तो पिता मना कर देते हैं, अंत में जिसे लूटना चाहते हैं वह गुंडों से इन्हें ही पिटवा देता है। इतनी असफलताएं ,जितनी आम व्यक्ति हर मोड़,हर दिन झेलता है और आखिर में सरेंडर कर देता है।लेकिन नायक उम्मीद नहीं छोड़ता और कोशिश करता है। अंत हटकर एक नई पहल बताता है।

 फिल्म एक नई बहस और मुद्दा उठाती है बाजारवाद और पूंजीवाद के खिलाफ। 

     अभिनय में चाहे नायक के लाचार, बेबस पिता हो,बैंक अधिकारी,मामा,दोस्त,पत्नी सभी ने बेहतरीन अभिनय किया है। मैं सोचता हूं हमारे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में जो देश भर के लिए एक ही है ,दक्षिण भारत के यह अभिनेता तो आते नहीं फिर यह इतना बेहतरीन अभिनय,निर्देशन और कहानी पटकथा लेखन कहां सीखते हैं?

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री तो बेकार कहानियों,घटिया अभिनय और बेकार निर्देशन से खत्म होती नजर आ रही है।ऊपर से पेन इंडिया में यह दक्षिण की बेहतरीन फिल्में और आगे जा रही हैं। चाहे अभी अभी आई गुजराती फिल्म वशीकरण दो हो या दृश्यम तीन,मोहनलाल ही मूल फिल्म में थे,जिसे बाद में हिंदी में अजय देवगन ने निभाया, सभी अच्छे सिनेमा की तस्वीर पेश करतीं हैं।बस हिंदी फिल्में ही अपने कार्पोरेट कल्चर और भाई भतीजावाद में घिरी नजर आती हैं।उम्मीद है जल्द यह दृश्य बदलेगा।

   फिल्म नेटफ्लिक्स पर है।आम व्यक्ति के संघर्ष और उससे हार नहीं मानने वाले हर व्यक्ति को देखनी चाहिए।

 

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(डॉ संदीप अवस्थी, आलोचक और फिल्म लेखक,देश विदेश से पुरस्कृत

804,विजय सरिता एनक्लेव

बी ब्लॉक,पंचशील,अजमेर,305004

मो 7737407061)