Hamsafar in Hindi Short Stories by Rakesh Kumar Sharma books and stories PDF | हमसफ़र

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हमसफ़र

बदन पर किसी ठंडी चीज का एहसास पाकर मेरी तंद्रा टूटी। विचारों के भंवर से बाहर निकल कर देखा तो सामने निधि बैठी हुई थी, उसके हाथ में बाम की एक डिब्बी थी जिससे वह बाम मेरे गले पर लगा रही थी।

“तुम कब आई” - मैंने पूछा।

“बीवीजी तो पिछले 2 दिन से यहीं पर है बाबूजी”।

हाथ में चाय के प्याले लेकर सामने से आते हुए बनवारी ने मुझसे कहा।

“पिछले 2 दिन से” - मैंने सकुचाते यह कहा

“मेरी बात नहीं मानोगे तो ऐसा ही होगा” - थोड़ा गुस्से से निधि बोली।

“मैंने तुम्हारी कौन सी बात नहीं मानी”।

“कल मना किया था ना बारिश में भीगने को”।

“हां, पर तुम ही तो मुझे खींच कर ले गई थी बाहर बारिश में” - मैंने थोड़ा हंसते हुए कहा।

“अच्छा जी अब सारा इल्जाम मेरे सर पर रख दो” - कुछ इतराते हुए निधि बोली।

“अरे नहीं ऐसा नहीं है” - मैंने धीरे से कहा।

“अच्छा दवाई ले लो तुम और थोड़ा आराम करो” - निधि ने कहा।

“मैंने मां बाबूजी को खबर दे दी है, सब बेकार में परेशान हो रहे थे। मुंबई आने की कह रहे थे पर मैंने मना कर दिया कि ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है” - चाय के प्याले उठाते हुए निधि बोली।

“थैंक्यू” - मैंने कहा।

“अब मुझे भी थैंक्यू करोगे” - निधि ने धीरे से पलटते हुए कहा।

मैं फिर से आंखें बंद कर अतीत के पन्नों में खो गया। एक अजीब सा रिश्ता था हम दोनों मैं। अभी 2 साल पहले ही मैं यूपी के एक छोटे से शहर से काम के सिलसिले में मुंबई जैसे महानगर में आया था। ऑफिस ज्वाइन करने से पहले सबसे बड़ी परेशानी मेरे लिए ठहरने की थी। मुंबई जैसे शहर में मकान पाना अपने आप में एक बड़ी मुसीबत का काम था। कई दिनों की जद्दोजहद के बाद आखिर मुझे एक अपार्टमेंट में मकान मिल गया। दो-तीन दिन घर को व्यवस्थित करने के बाद मैंने ऑफिस ज्वाइन किया। ऑफिस का स्टाफ काफी अच्छा और खुशमिजाज था। कुछ दिन काम करने के बाद मैं भी वहां के माहौल में लगभग घुलमिल सा गया था।

लगभग एक महीने बाद निधि ने हमारे ऑफिस के फाइनेंस डिपार्टमेंट में अपनी जॉइनिंग ली। एकदम पतली दुबली सी, परंतु खुशमिजाज लड़की थी निधि। शुरुआत के कुछ दिन तक तो मेरी और उसकी औपचारिक बात हुई। परंतु धीरे-धीरे हम एक दूसरे से काम के सिलसिले में और ज्यादा मिलने लगे। उसका व्यवहार अत्यंत सरल तथा संयमित था। हम दोनों लगभग रोज़ ही साथ-साथ खाना खाते थे। आॅफिस से कुछ और लोग भी अक्सर हमारे साथ ही खाते थे।

“आज कहीं बाहर लंच करें” - एक दोपहर अपनी सीट से उठते हुए मैंने निधि से पूछा।

“हां मैं भी यही सोच रही थी। रोज-रोज एक जगह लंच करने से मैं भी बोर हो गई हूं”।

उस दिन हम दोनों ने एक रेस्टोरेंट में लंच किया और फिर लंच के बाद घूमने के लिए जुहू बीच पर चले गए। चारों तरफ ठेले वालों, फेरी वालों का जमवाड़ा लगा था। एक पानीपुरी के ठेले पर जाकर निधि ने कहा -

“चलो रोहित पानी पूरी खाते हैं?” पानी पूरी खा कर हम आगे की तरफ बढ़े।

“कितनी अच्छी हवा चल रही है ना?” - निधि ने मुस्कुराते हुए पूछा।

“हां यह मुंबई की सबसे सुंदर जगह में से एक है” - मैंने मुस्कुराते हुए कहा। वैसे भी यह शहर प्र्यटन के लिए काफी मशहूर है।

“अच्छा तुम्हारे घर में कौन-कौन है”? अचानक बात को पलटते हुए निधि ने कहा।

“घर में मैंने.....” कुछ अटकते हुए मैंने कहा।

“हां घर में” - निधि ने कुछ शरारती अंदाज में पूछा।

“घर में मां है, बाबूजी हैं और एक छोटी बहन है।

“इतने लोगों को छोड़कर तुम यहां चले आए?”

“अरे यार काम के सिलसिले में तो आना ही पड़ेगा ना नहीं तो कमाएंगे, खाएंगे कैसे”

“हां यह भी ठीक है, काम के लिए तो लोगों को दूर-दूर तक जाना पड़ता है”।

उस दिन हम शाम तक एक दूसरे के साथ ही रहे। एक दूसरे का साथ हमें काफी पसंद आया। निधि अक्सर शाम को घर आकर बनवारी के काम में उसकी मदद करती थी। मां पिताजी से भी अक्सर कई बार फोन पर उसने बात की। मेरी छोटी बहन की तो वह एक सहेली सी बन गई थी। जब भी समय होता दोनों घंटों फोन पर बातें करती रहती। मेरी हर छोटी बड़ी चीज का निधि को ख्याल रहता था। एक तरह से वह मेरी जिंदगी का एक अटूट हिस्सा बन चुकी थी। एक शाम ऑफिस के खत्म होने के बाद हम दोनों बाजार में घूमने के लिए निकल पड़े। बाजार में टहलते हुए अचानक निधि ने मुझसे पूछा -

“रोहित मैं तुम्हें कैसी लगती हूं”?

“मतलब?” - मैंने कुछ अचकचा कर पूछा।

“अगर मैं तुम्हें पसंद हूं क्यों ना हम शादी कर ले?”

“शादी.....” - मैं बीच में ही रुक गया।

“देखो निधि तुम मुझे बहुत पसंद हो, परंतु मैंने अभी तक शादी के बारे में सोचा नहीं है। मेरे ऊपर कई जिम्मेदारियां है”।

“हां, तो मैं कब तुम्हारी जिम्मेदारियों के बीच में आ रही हूं, हम दोनों मिलकर इन जिम्मेदारियों का बोझ आराम से उठा सकते हैं” - निधि ने कहा।

“निधि अभी मुझे और समय चाहिए सोचने के लिए” - मैनें कहा।

“अच्छा ठीक है....” कहकर निधि आगे बढ़ गई।

“सुनो तो यार” - मैंने पीछे से कहा परंतु मेरी बात को बिना सुने ही निधि आगे की ओर चली गई। इसके बाद कई दिन तक ऑफिस में मेरा और उसका कोई वार्तालाप नहीं हुआ। मैंने कई बार उसे समझाने की कोशिश करी परंतु उसने बड़े ही सहज ढंग से बात को आया-गया कर दिया। एक दिन ज़्यादा जोर देने पर वह मेरे साथ बाहर घूमने के लिए चल पड़ी। मौसम बहुत सुहाना था। अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई। हम एक शेड के नीचे बारिश से बचने के लिए खडे हो गये। निधि आज पहले से ज्यादा सहज लग रही थी।

“चलो आज बारिश में भीगते हैं” कहते हुए उसने मेरा हाथ खींचा।

“अरे नहीं सर्दी लग जाएगी रहने दो” - मैनें बारिश से बचते हुए कहा।

पर वह नहीं मानी और मुझे खींचकर बारिश में ले गई। हम काफी देर बारिश में साथ साथ चलते रहे। मैं विचारों के भवर में खोया हुआ था, साथ ही साथ मुझे अपने ऊपर थोड़ा ग्लानि भी थी कि जो लड़की मेरा इतना ख्याल रखती है, मैं क्यों उसे अपना हमसफर नहीं बना पा रहा हूं। मैरे सामने ऐसी को मजबूरी भी तो नहीं थी। जिम्मेदारी तो सभी के पास होती है पर क्या इस सब से बचने के लिए किस सरल मन को ठेस पहुचानां ठीक है क्या? इन्हीं विचारों में खोए हुए कब घर पास आ गया पता ही नहीं चला।

“अच्छा अब मैं चलती हूं” - कहते हुए निधि आगे की तरफ बढ़ी।

“घर चलो एक-एक कप चाय हो जाए” - मैंने कहा।

“नहीं अब काफी देर हो गई है। अब मुझे चलना चाहिए” - कहकर निधि चली गई।

घर पहुंचकर बनवारी ने मुझे टॉवल दिया और मैंने अपना सारा शरीर साफ किया परंतु शाम होते-होते मुझे तेज बुखार और सर्दी में जकड़ लिया। उसके बाद कब अचेतना चेतन मन पर हावी हो गई मुझे पता ही नहीं चला। आंख खुली तो सामने निधि को बैठा हुआ पाया।

अचानक मोबाइल फोन की घंटी से मेरी चेतना जागी। फोन उठाकर देखा तो मां का फोन था। शायद कई बार फोन मिलाया होगा।

“हेलो - प्रणाम मां” मैंने कहा।

“प्रणाम बेटा, कैसा है तू, आज मां की याद नहीं आई तुझे। आज तेरा जन्मदिन है उसी के लिए मैंने तुझे फोन किया है।

“अरे हां मां!” मुझे तो बिल्कुल भी याद नहीं था कि आज मेरा जन्मदिन है। “अच्छा पिता जी कैसी हैं, और छोटी कैसी है?”

“यहां सब ठीक हैं। तेरी बड़ी याद आती है। तू बता तेरा क्या हाल है, अब तेरी तबीयत कैसी है”?

“मैं भी ठीक हूं मां”

फिर कुछ इधर-उधर की बातें मां के साथ होती रही। काफी देर बात करने के बाद जैसे ही मैंने फोन रखा तभी अचानक दरवाजे की घंटी बजी, बनवारी घर पर नहीं था इसलिए मैंने स्वयं उठकर दरवाजा खोला। देखा तो सामने निधि खड़ी थी। बिना कुछ बोले वो सीधे अंदर चली आई।

“आज ऑफिस नहीं गई” - मैंने पूछा।

“नहीं आज मैंने छुट्टी ली है” - वह थोड़ा गुस्से में बोली। अचानक उसने एक लिस्ट निकाल कर मेरे हाथ में थमा दी और कहा बाजार से यह सारा सामान मंगवा दो। इतना कह कर वो सीधी रसोई की तरफ मुड़ गई।

“यह सब क्या है?” - मैंने पूछा।

“आज मैंने तुम्हारे जन्मदिन पर एक पार्टी रखी है, यह सब उसी का सामान है। कुछ खास दोस्तों को भी बुलाया है शाम को”

“तुम्हें याद है” मैंने धीरे से कहा।

वह कुछ नहीं बोली और चुपचाप जाकर रसोई में काम करने लगी। मैंने बनवारी को बुलाकर लिस्ट उसके हाथ में दे दी तथा सामान लाने को कहा। में जाकर चुपचाप बिस्तर पर लेट गया। निधि सारा दिन किचन में तैयारी में लगी रही। जिस लगन से वो सब तैयारी कर रही थी, उसको देख कर मेरे मन मे उसके लिए एक अलग सा अहसास घर कर रहा था। शाम को एक सुंदर सा केक उसने ऑर्डर करके मंगवा लिया था। उसे सेंटर टेबल पर सजा कर खाने का सामान भी उसके साथ में लगा दिया गया था। थोड़ी ही देर में कुछ करीबी दोस्त घर पर आ गए। निधि उन सब की आवभगत में लग गई। कुछ देर बाद हमने केक काटा तथा खाना खाकर म्यूजिक बजा दिया। निधि बड़े उत्साह के साथ यह सब कर रही थी। दोस्तों के जाने के बाद निधि ने सारा सामान व्यवस्थित किया। इस सबके बाद मैंने उससे कहा चलो अब तुम्हे भी घर छोड़ दूं। हम दोनों नीचे उतरकर साथ-साथ चलने लगे।

“बीच पर चलोगी” - मैंने अचानक उससे पूछा।

उसने स्वीकृति में अपना सिर हिला दिया।

हम दोनों बीच पर पहुंचे। आज वहां पर काफी भीड़भाड़ थी। लोग समुंदर के किनारे टहल रहे थे। बच्चे किनारे पर मस्ती कर रहे थे।

हम दोनों चमकीली रेत पर जाकर बैठ गए। चांदनी रात थी हर तरफ चांदनी छुटकी हुई थी। सामने समुद्र की लहरें पूरे वेग के साथ हमारी तरफ आती तथा किनारे से टकराकर वापस चली जाती। आज पानी की इन लहरों को देखकर मुझे कुछ अजीब सा एहसास हो रहा था। इन लहरों की ही भांति मेरे जीवन में भी कुछ दिनों एक झंझावात चल रहा था जिससे उबरने के लिए काफी कोशिश कर रहा था। परंतु आज मेरा मन एकदम शांत था। शायद मेरे मन ने उस समस्या पर विजय पा ली थी।

“निधि मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूं” - मैंने उसकी ओर देखकर कहा।

“हां कहो” उसने धीरे से कहा तथा समंदर की ओर देखने लगी।

“जीवन के इस सफर में क्या तुम मेरी हमसफ़र बनोगी”- मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा।

वो मुझे अचानक टकटकी लगाकर बहुत देर तक देखती रही। पानी की कुछ बूंदे उसकी आंखों की सतह से उतर कर उसके चेहरे पर आ गई। उसकी नम आंखों ने अनकहे ही सब कुछ कह दिया था। शायद कुछ बातों को कहने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं होती, बिना कुछ कहे ही दिल उन बातों को स्वयं समझ लेता है। उसने अपना सर मेरे कंधे पर रख दिया। हम दोनों चुपचाप काफी देर तक वहीं बैठे रहे। सामने समुद्र पर पड़ने वाली रोशनी से लहरें स्वर्णिम हो चली थी। इस स्वर्णिम रोशनी ने मेरे अंदर के अंधकार को दूर कर दिया था। बार-बार किनारे से टकराती लहरों की शीतलता का एहसास मेरे अंतर्मन को भी हो रहा था.......

 

- राकेश शर्मा