chaptar 7 in Hindi Crime Stories by devil books and stories PDF | दी किंग ऑफ अंडरवर्ल्ड - 7

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दी किंग ऑफ अंडरवर्ल्ड - 7

रात के करीब ढाई बजे।
पुराने मिल एरिया की टूटी सड़कों पर पुलिस की गाड़ियों की लाल-नीली लाइट्स चमक रही थीं।
बारिश अभी-अभी रुकी थी और सड़क पर जमा पानी में उन लाइट्स की परछाइयाँ अजीब डर पैदा कर रही थीं।
चारों तरफ पुलिस वाले दौड़ रहे थे।
“ऊपर कोई गया क्या?”
“नहीं सर!”
“पीछे वाला रास्ता चेक करो!”
ACP कबीर राठौड़ अपनी जीप के पास खड़ा बिल्डिंग को देख रहा था।
तीन मंज़िला पुरानी इमारत।
टूटी खिड़कियाँ।
जंग लगे लोहे के दरवाजे।
लेकिन कबीर की नजर सिर्फ ऊपर तीसरी मंजिल पर थी।
जहाँ कुछ मिनट पहले गोलियों की आवाजें गूँजी थीं।
उसने धीरे से सिगरेट निकाली।
आग लगाई।
एक लंबा कश लिया।
फिर बिना कुछ बोले सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।
दो कॉन्स्टेबल उसके पीछे आने लगे।
“सर हम—”
“नीचे रहो।”
उसकी आवाज़ शांत थी… लेकिन ऐसी कि कोई बहस न करे।
कबीर अकेला ऊपर चढ़ने लगा।
हर कदम के साथ सीढ़ियों पर जमा पानी चरमराता।
ऊपर पहुँचते ही उसे खून की गंध महसूस हुई।
दरवाजा आधा खुला था।
उसने धीरे से उसे धक्का दिया।
चर्ररर…
कमरा खुलते ही कुछ सेकंड के लिए पूरा दृश्य उसकी आँखों के सामने ठहर गया।
फर्श पर तीन लाशें।
दीवारों पर गोलियों के निशान।
टूटी कुर्सियाँ।
खून से सना फर्श।
एक आदमी का चेहरा इतना बुरी तरह कुचला गया था कि पहचानना मुश्किल था।
कमरे में अभी भी बारूद की हल्की गंध थी।
मतलब हमला ज्यादा देर पहले नहीं हुआ था।
कबीर धीरे-धीरे अंदर गया।
उसकी आँखें हर चीज़ नोट कर रही थीं।
कोई घबराहट नहीं।
कोई जल्दबाजी नहीं।
जैसे वो crime scene नहीं… किसी किताब का पन्ना पढ़ रहा हो।
वह पहली लाश के पास बैठा।
सीधे माथे के बीच गोली।
साफ निशाना।
प्रोफेशनल।
दूसरी लाश—
टूटी हुई कोहनी… गर्दन की हड्डी टूटी।
बहुत brutal।
तीसरी लाश पर आकर कबीर कुछ सेकंड रुका।
चेहरा पूरी तरह कुचला हुआ।
गुस्से में किया गया काम।
उसने धीरे से कहा—
“पहली गलती…”
कमरे में खामोशी थी।
तभी उसकी नजर टेबल पर गई।
वहाँ एक गोली रखी थी।
सिर्फ एक गोली।
खून से सनी हुई।
कबीर उसके पास गया।
उसे हाथ में उठाया।
उसकी आँखों में हल्की मुस्कान आई।
“तू चाहता है मैं तुझे देखूँ…”
उसने गोली जेब में रख ली।
“…ठीक है।”
तभी नीचे से आवाज़ आई—
“सर!”
कबीर खिड़की के पास गया।
नीचे पुलिस वाला खड़ा था।
“पीछे वाली गली में बाइक के टायर के निशान मिले हैं!”
कबीर ने बाहर अंधेरे में देखा।
बारिश के बाद सड़क चमक रही थी।
उसने धीरे से कहा—
“तू भाग नहीं रहा…”
उसकी आँखें ठंडी हो गईं।
“…तू रास्ता बना रहा है।”
उसी समय।
शिवपुर के पुराने हिस्से में।
एक विशाल हवेली।
ऊँची दीवारें।
लोहे का भारी गेट।
बाहर हथियारों से लैस आदमी।
शहर में लोग उसे “मिर्ज़ा हवेली” कहते थे।
कभी यहाँ नेताओं की गाड़ियाँ रुकती थीं।
अब अपराधियों की रुकती थीं।
अंदर का माहौल अजीब शांत था।
जैसे बाहर की दुनिया का शोर इस जगह तक पहुँचता ही नहीं।
एक बड़े कमरे में धीमी उर्दू ग़ज़ल चल रही थी।
कमरे के बीचोंबीच लकड़ी की मेज पर शतरंज की बिसात रखी थी।
उसके सामने बैठा था—
सुल्तान मिर्ज़ा।
सफेद कुर्ता।
सफेद दाढ़ी।
आँखों में अजीब सन्नाटा।
उसका चेहरा देखकर कोई नहीं कह सकता था कि ये आदमी शिवपुर के आधे अपराधों की जड़ है।
उसकी सबसे खतरनाक बात यही थी—
वो कभी गुस्सा नहीं करता था।
क्योंकि जो आदमी गुस्से में फैसला करे…
वो गलती करता है।
और सुल्तान गलती नहीं करता था।
कमरे का दरवाजा खुला।
एक आदमी अंदर आया।
चेहरे पर घबराहट साफ थी।
“भाई…”
सुल्तान ने बिना ऊपर देखे पूछा—
“समर मर गया?”
“नहीं भाई।”
“हमारे लोग?”
आदमी कुछ सेकंड चुप रहा।
“तीनों खत्म।”
सुल्तान ने शतरंज का एक प्यादा आगे बढ़ाया।
टक।
बस इतनी आवाज हुई।
फिर उसने पूछा—
“कैसे मरे?”
“दो को गोली… तीसरे का चेहरा…”
वो बोलते-बोलते रुक गया।
सुल्तान ने पहली बार उसकी तरफ देखा।
“बोल।”
“कुचल दिया।”
कमरे में कुछ सेकंड की खामोशी रही।
फिर…
सुल्तान हल्का सा मुस्कुराया।
आदमी हैरान था।
“भाई?”
सुल्तान धीरे से उठा।
खिड़की तक गया।
बाहर रात का अंधेरा फैला था।
“गुस्सा…”
उसने धीमी आवाज़ में कहा।
“…सबसे बड़ी कमजोरी।”
वो मुड़ा।
“अब वो गलती करेगा।”
आदमी समझ नहीं पाया।
“लेकिन भाई… वो लगातार हमारे लोगों को मार रहा है।”
सुल्तान वापस शतरंज की मेज तक आया।
उसने एक और मोहरा उठाया।
“शतरंज में प्यादे मरते हैं।”
टक।
मोहरा नीचे रखा गया।
“राजू…”
टक।
“विक्का…”
टक।
“ये सब प्यादे थे।”
उसने ऊपर देखा।
“राजा अभी जिंदा है।”
कमरे में बैठे सारे लोग खामोश हो गए।
क्योंकि पहली बार उन्हें महसूस हुआ—
सुल्तान डर नहीं रहा।
वो इंतजार कर रहा है।
दूसरी तरफ।
शहर के बाहरी इलाके में।
एक पुराना गैराज।
ऊपर लगी ट्यूब लाइट बार-बार झपक रही थी।
अंदर समर बेचैनी से टहल रहा था।
उसके हाथ काँप रहे थे।
दिमाग में बार-बार वही दृश्य घूम रहा था—
अर्नब का किसी का चेहरा फर्श पर पटकना।
एक बार।
दो बार।
तीन बार।
जब तक आदमी पहचान में आना बंद न हो जाए।
समर ने शराब की बोतल उठाई।
सीधे मुँह से पीने लगा।
तभी पीछे से आवाज आई—
“डर लग रहा है?”
समर पलटा।
अर्नब बाइक के पास खड़ा था।
चेहरे पर कोई भाव नहीं।
जैसे अभी कुछ हुआ ही न हो।
समर गुस्से में उसके पास आया।
“तू समझता क्यों नहीं?!”
अर्नब शांत रहा।
“सुल्तान राजू नहीं है!”
“मुझे पता है।”
“नहीं पता तुझे!”
समर चिल्लाया।
“राजू सड़क का गुंडा था! विक्का उसका कुत्ता!”
“लेकिन सुल्तान…”
उसने उंगली उठाई।
“…सुल्तान पूरा शिवपुर चलाता है!”
“पुलिस में आदमी उसके!”
“कोर्ट में आदमी उसके!”
“नेताओं में आदमी उसके!”
“तू जिसे मार रहा है ना…”
उसकी आवाज भारी हो गई।
“…वो सिर्फ उसके प्यादे हैं।”
कुछ सेकंड तक सिर्फ बारिश की बूंदों की आवाज सुनाई देती रही।
फिर अर्नब मुस्कुराया।
धीमी… ठंडी मुस्कान।
“अच्छा है।”
समर हैरान।
“क्या अच्छा है?”
अर्नब ने सिगरेट जलाई।
धुआँ धीरे-धीरे उसके चेहरे के सामने फैल गया।
“अब खेल मजेदार होगा।”
समर उसे देखता रह गया।
उसे पहली बार महसूस हो रहा था—
अर्नब अब सिर्फ बदला नहीं ले रहा।
वो इस सबको enjoy करने लगा है।
और यही चीज सबसे खतरनाक थी।
अगली सुबह।
शिवपुर सेंट्रल जेल।
लोहे का भारी गेट धीरे-धीरे खुला।
अंदर से एक आदमी बाहर आया।
लंबा शरीर।
आँख के पास पुराना कट।
हाथों पर टैटू।
चेहरे पर अजीब मुस्कान।
नाम—
शाहिद “काला” अंसारी।
शिवपुर का सबसे brutal hitman।
उसके बारे में कहानियाँ चलती थीं।
किसी ने कहा उसने एक आदमी को जिंदा दफना दिया था।
किसी ने कहा उसने अपने भाई को सिर्फ पैसों के लिए मार दिया।
सच क्या था…
कोई नहीं जानता था।
लेकिन एक बात सब जानते थे—
काला दर्द से नहीं डरता था।
जेलर ने डरते हुए पूछा—
“इतनी जल्दी जमानत कैसे मिल गई?”
काला मुस्कुराया।
“कुछ लोग…”
उसने बाहर खड़ी काली SUV की तरफ देखा।
“…अब भी मुझसे प्यार करते हैं।”
SUV का दरवाजा खुला।
अंदर सुल्तान मिर्ज़ा बैठा था।
काला अंदर बैठ गया।
गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
कुछ मिनट दोनों चुप रहे।
फिर सुल्तान ने पूछा—
“जेल कैसी थी?”
काला हँसा।
“उबाऊ।”
“कितने मारे अंदर?”
“चार।”
“क्यों?”
“एक खर्राटे बहुत लेता था।”
सुल्तान हल्का सा मुस्कुराया।
क्योंकि उसे ऐसे ही लोग पसंद थे—
जो हिंसा को काम नहीं… आदत समझते हों।
उसने जेब से एक फोटो निकाली।
अर्नब की धुंधली तस्वीर।
काला फोटो को ध्यान से देखने लगा।
“यही है वो लड़का?”
“हाँ।”
“सुना है बड़ा खतरनाक है।”
सुल्तान ने बाहर सड़क की तरफ देखते हुए कहा—
“खतरनाक है।”
कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर उसकी आवाज धीमी हुई—
“लेकिन अमर नहीं।”
काला मुस्कुराया।
“मार दूँ?”
सुल्तान ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
उसने धीरे से पूछा—
“अगर मौका मिले… तो क्या करेगा?”
काला की आँखों में चमक आई।
“पहले हाथ तोड़ूँगा।”
“फिर पैर।”
“फिर उसे जिंदा छोड़ दूँगा…”
वो हँसा।
“…ताकि बाकी लोग डरें।”
SUV के अंदर कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।
फिर पहली बार—
सुल्तान की आँखों में हल्की दिलचस्पी दिखी।
“देखते हैं…”
उसने धीरे से कहा।
“…शिवपुर में बड़ा जानवर कौन है।”