SYMMETRY in Hindi Science-Fiction by arshmeer books and stories PDF | SYMMETRY

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SYMMETRY

प्रातः 6:00 बजे
आर्या की आँख खुली।
एकदम ठीक छह बजे।
वह कुछ सेकंड तक छत को देखती रही।
फिर अचानक उठ बैठी।
अलार्म नहीं बजा था।
उसने मोबाइल उठाया।
6:00 AM.
एक सेकंड भी ऊपर-नीचे नहीं।
उसकी भौंहें सिकुड़ गईं। 
मुंबई में वह कभी समय पर नहीं उठती थी।
कभी पाँच घंटे सोती, कभी बारह।
कभी पूरी रात जागती रहती।
पर यहाँ…
उसका शरीर किसी अदृश्य घड़ी की तरह व्यवहार कर रहा था।
वह बाथरूम में गई।
जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, lights अपने आप जल उठीं।
सफेद रोशनी।
बहुत साफ़।
बहुत स्थिर।
उसने शीशे में खुद को देखा—
और कुछ क्षण रुक गई।
उसकी आँखों के नीचे के dark circles हल्के हो गए थे।
सिर्फ एक रात में।
“Impossible…”
उसने चेहरा छुआ।
त्वचा असामान्य रूप से शांत लग रही थी।
जैसे शरीर ने अचानक सारी थकान छोड़ दी हो।
तभी उसकी नज़र अपनी मुस्कान पर गई।
वह अनजाने में मुस्कुरा रही थी।
और उसकी मुस्कान…
लगभग perfectly symmetrical थी।
उसने तुरंत होंठ सीधे कर लिए।
दिल की धड़कन तेज हुई।
“बस coincidence है।”
लेकिन उसके भीतर एक छोटी बेचैनी बैठ गई।
प्रातः 7:00 बजे
ब्रेकफास्ट हॉल
आज उसने ध्यान से लोगों को देखना शुरू किया।
हर व्यक्ति ठीक समय पर प्रवेश कर रहा था।
कोई जल्दी नहीं।
कोई देरी नहीं।
जैसे सभी के भीतर एक ही घड़ी फिट हो।
नेहा पहले से टेबल पर बैठी थी।
“सुप्रभात, आर्या।”
“सुप्रभात।”
“नींद कैसी रही?”
आर्या कुछ पल चुप रही।
“अजीब।”
“अजीब?”
“मुझे कोई सपना नहीं आया।”
नेहा ने सहज स्वर में कहा:
“यहाँ अधिकांश लोगों को नहीं आते।”
“क्यों?”
“मानसिक शोर कम हो जाता है।”
उसने ओटमील की कटोरी उसकी ओर बढ़ाई।
“जब दिमाग संतुलित हो जाता है, तो सपनों की आवश्यकता कम हो जाती है।”
आर्या ने हल्का हँसने की कोशिश की।
“यह scientific explanation कम और cult explanation ज्यादा लग रही है।”
नेहा नहीं हँसी।
“तुम जल्दी समझ जाओगी।”
आज उसने एक और चीज़ notice की।
लोग blink भी लगभग समान rhythm में कर रहे थे।
वह कुछ सेकंड तक पूरे hall को देखती रही।
और फिर उसके शरीर में हल्की ठंडक दौड़ गई।
क्योंकि कुछ क्षणों के लिए—
पूरा hall बिल्कुल स्थिर हो गया।
सिर्फ चम्मचों की आवाज़।
सिर्फ साँसों की धीमी लय।
और फिर…
लगभग एक साथ…
सभी ने खाना खाना फिर शुरू किया।
“तुम ठीक हो?”
नेहा ने पूछा।
“हाँ… बस।”
आर्या ने धीरे से कहा:
“क्या तुम्हें कभी लगता है कि यहाँ लोग… बहुत similar हैं?”
नेहा ने कुछ पल सोचा।
“Similarity conflict कम करती है।”
“लेकिन individuality?”
“Individuality exaggerated concept है।”
उसने शांत स्वर में कहा।
“मनुष्य जितना खुद को unique समझता है, वास्तव में उतना होता नहीं।”
आर्या ने ओटमील का चम्मच मुँह में डाला।
उसे अचानक याद आया—
उसे दालचीनी पसंद थी।
बहुत पसंद।
पर आज उसने खुद नहीं डाली।
क्यों?
वह कुछ पल उस विचार को पकड़ने की कोशिश करती रही।
फिर वह विचार धीरे-धीरे धुँधला पड़ गया।
जैसे पानी में घुलती स्याही।
पूर्वाह्न 9:20 बजे
लैब 7
उसकी प्रयोगशाला विशाल और शांत थी।
दीवारों पर स्क्रीनें लगी थीं जिन पर geometric patterns घूम रहे थे।
बीच में लंबी सफेद मेज़।
उसके लिए व्यवस्थित tools।
हर pencil बराबर दूरी पर रखी हुई।
उसने जानबूझकर एक pencil तिरछी कर दी।
कुछ सेकंड बाद—
ऊपर लगा छोटा mechanical arm सक्रिय हुआ।
उसने pencil वापस सीधी कर दी।
आर्या उसे देखती रह गई।
धीरे-धीरे उसके चेहरे पर मुस्कान आई।
“ओह… तो तुम लोग इतने obsessed हो।”
लेकिन भीतर कहीं असहजता और गहरी हो गई।
उसने अपना पहला task खोला:
“प्राकृतिक संरचनाओं में समरूपता का विश्लेषण”
स्क्रीन पर बादलों की तस्वीरें थीं।
पहाड़।
पेड़।
नदियाँ।
सिस्टम automatically patterns identify कर रहा था।
आर्या ने stylus उठाया और sketch बनाना शुरू किया।
पहले कुछ मिनट सब सामान्य रहा।
फिर उसे एहसास हुआ—
उसका हाथ अपने आप straight lines बना रहा है।
उसने जानबूझकर curve बिगाड़ने की कोशिश की।
अचानक उसकी उँगलियों में हल्की झनझनाहट हुई।
उसने stylus छोड़ दिया।
“क्या बकवास…”
उसने हथेली रगड़ी।
झनझनाहट गायब हो गई।
तभी पीछे से आवाज़ आई:
“पहले हफ्ते में सभी को ऐसा महसूस होता है।”
आर्या मुड़ी।
एक युवक दरवाज़े के पास खड़ा था।
हल्की दाढ़ी।
आँखों के नीचे थकान।
और सबसे अलग चीज़—
उसकी शर्ट का ऊपरी बटन बाकी alignment से थोड़ा टेढ़ा था।
इस पूरे संस्थान में पहली असमान चीज़।
“मैं राहुल हूँ।”
उसने कुर्सी पर बैठते हुए कहा।
“Chemical division.”
उसने table पर coffee mug रखा।
जानबूझकर बिल्कुल center से हटाकर।
आर्या ने तुरंत notice किया।
राहुल ने भी notice किया कि उसने notice किया है।
दोनों कुछ सेकंड चुप रहे।
फिर पहली बार—
यहाँ आने के बाद—
किसी ने genuinely मुस्कुराया।
“तो…” राहुल बोला।
“तुम्हें भी यह जगह creepy लगने लगी?”5% विचलन
प्रथम भाग : आमंत्रण
अध्याय 1 : अंतिम अराजक दिन
प्रातः 5:43 बजे
मुंबई
आर्या की आँख अचानक खुली।
कोई सपना नहीं टूटा था।
कोई आवाज़ नहीं आई थी।
फिर भी जैसे भीतर किसी अदृश्य हाथ ने उसे नींद से बाहर खींच लिया हो।
कमरे में हल्का अँधेरा था। खिड़की के बाहर सुबह अभी पूरी तरह पैदा नहीं हुई थी। दूर कहीं समुद्र की नमी भरी हवा बह रही थी, जिसमें बारिश और धुएँ की मिली-जुली गंध थी।
छत का पंखा लड़खड़ाती लय में घूम रहा था।
टक...
टक-टक...
टक...
वह कुछ क्षण उसे देखती रही।
फिर मुस्कुराई।
उसे ऐसी चीज़ें पसंद थीं जो पूरी तरह सही नहीं होतीं।
वह उठी और नंगे पैर बालकनी में चली गई। नीचे सड़क पर शहर धीरे-धीरे जाग रहा था। एक दूधवाला साइकिल पर डगमगाता हुआ निकला। किसी टैक्सी वाले ने गाली दी। दो कुत्ते बिना कारण भौंकने लगे।
अराजकता।
जीवित अराजकता।
आर्या ने गहरी साँस ली।
उसे हमेशा लगता था कि शहरों की भी धड़कन होती है।
मुंबई की धड़कन कभी नियमित नहीं थी।
और शायद इसी कारण वह जीवित लगती थी।
उसने रसोई में जाकर चाय चढ़ाई।
चीनी डालते समय उसका हाथ फिसला।
तीन चम्मच गिर गए।
वह कुछ पल कप को देखती रही। फिर हँस पड़ी।
“चलो… आज मीठी सही।”
चाय बनाते समय उसने दीवार पर लगे अपने sketches देखे।
टेढ़ी रेखाएँ।
अधूरे चेहरे।
टूटे geometric patterns।
Fractal designs जो जितने करीब से देखो उतने ज्यादा असंगत लगते थे।
एक sketch अलग था।
उसमें उसने समुद्र की लहरों को mathematical symmetry में बाँधने की कोशिश की थी।
वह असफल रही थी।
और वही उसकी पसंदीदा कलाकृति थी।
टेबल पर रखा सफेद लिफाफा अब भी खुला पड़ा था।
उस पर उभरे हुए अक्षरों में लिखा था:
“समरूपता अनुसंधान संस्थान”
उसने पत्र फिर उठाया।
“हम उन कलाकारों की तलाश में हैं जो गणित और सौंदर्य के मध्य छिपे संबंधों को समझते हों।
आपका कार्य चयनित किया गया है।”
नीचे हस्ताक्षर था:
डॉ. समरथ
निदेशक
आर्या ने पहली बार यह पत्र पढ़ते ही सोचा था:
“कितना pretentious नाम है।”
लेकिन फिर उसने संस्थान की तस्वीरें देखीं।
सफेद इमारतें।
पूर्ण geometry।
बर्फीली घाटी।
Absolute symmetry.
और न जाने क्यों… वह आकर्षित हो गई।
दोपहर 1:10 बजे
Packing हमेशा उसकी कमजोरी थी।
उसका कमरा युद्धभूमि लग रहा था।
कपड़े आधे बैग में, आधे कुर्सी पर। किताबें बिखरी हुईं। Paint brushes चाय के कप में पड़े।
उसने अपनी पुरानी sketchbook उठाई।
उसके बीच से एक सूखा गुलमोहर का फूल गिरा।
कुछ क्षण वह उसे देखती रही।
फिर अचानक उसे याद नहीं आया कि यह फूल किसने दिया था।
उसका माथा सिकुड़ गया।
“अजीब है…”
वह याद करने लगी।
कॉलेज?
कोई दोस्त?
कोई प्रेमी?
कुछ भी साफ नहीं आया।
सिर्फ एक धुँधली हँसी।
उसने सिर झटका।
“कम नींद का असर है।”
लेकिन जाते-जाते उसने वह फूल बैग में रख लिया।
दोपहर 2:40 बजे
लेह हवाई अड्डा
ठंडी हवा ने उसके चेहरे पर चोट की तरह प्रहार किया।
मुंबई की उमस भरी गर्मी से निकलकर यह हवा लगभग अवास्तविक लग रही थी।
हवाई अड्डे के बाहर एक सफेद SUV खड़ी थी।
इतनी साफ कि आसपास के पहाड़ उसमें प्रतिबिंबित हो रहे थे।
ड्राइवर ने बिना मुस्कुराए पूछा:
“आर्या शर्मा?”
“हाँ।”
उसने बैग लिया।
डिक्की बंद की।
और बिना एक शब्द बोले ड्राइविंग सीट पर बैठ गया।
पूरी यात्रा में उसने रेडियो तक नहीं चलाया।
पहले पहाड़ आए।
फिर बर्फ।
फिर सड़कें संकरी होने लगीं।
धीरे-धीरे मोबाइल नेटवर्क गायब हो गया।
आर्या ने खिड़की से बाहर देखा।
दूर पहाड़ों के बीच उसे कुछ सफेद आकृतियाँ दिखाई दीं।
पहले लगा बर्फ होगी।
फिर एहसास हुआ—
वह इमारतें थीं।
शाम 6:28 बजे
SUV एक लंबी सुरंग में दाखिल हुई।
सुरंग अस्वाभाविक रूप से परिपूर्ण थी।
दीवारों पर लगी lights बिल्कुल समान दूरी पर थीं।
हर सात सेकंड में एक सफेद प्रकाश उसकी आँखों के ऊपर से गुजरता।
एक।
दो।
तीन।
चार।
धीरे-धीरे उसे लगा जैसे उसका दिमाग उसी rhythm में सोचने लगा हो।
फिर अचानक सुरंग समाप्त हुई।
और आर्या ने उसे देखा।
पूरी घाटी सफेद थी।
बीच में विशाल गोलाकार संरचना।
उसके चारों ओर घनाकार भवन।
हर भवन समान।
हर खिड़की समान।
हर दूरी समान।
जैसे किसी इंसान ने नहीं… किसी algorithm ने शहर बनाया हो।
आर्या के मुँह से अनायास निकला:
“हे भगवान…”
SUV धीरे-धीरे मुख्य द्वार तक पहुँची।
द्वार स्वयं एक पूर्ण आयत था।
इतना परिपूर्ण कि उसे देखकर अजीब बेचैनी होती थी।
दो सुरक्षा गार्ड आगे बढ़े।
दोनों की ऊँचाई लगभग समान थी।
चेहरे के भाव समान।
चलने की गति समान।
एक पल के लिए आर्या को लगा जैसे उसने एक ही आदमी को दो बार देख लिया हो।
“आर्या शर्मा?”
पहले गार्ड ने पूछा।
“हाँ।”
“स्वागत है।”
उसकी आवाज़ सपाट थी।
न गर्मजोशी।
न कठोरता।
बस… नियंत्रित।
मुख्य भवन के भीतर प्रवेश करते ही आर्या रुक गई।
विशाल हॉल।
काले-सफेद संगमरमर की perfect grid।
ऊपर लटकती गोल lights।
इतनी शांति कि उसे अपने कदमों की आवाज़ अस्वाभाविक रूप से तेज लगी।
टक।
टक।
टक।
अचानक उसे एहसास हुआ—
उसके कदम इस जगह की symmetry बिगाड़ रहे थे।
और पहली बार…
उसे असहजता महसूस हुई।
तभी सामने से एक व्यक्ति आता दिखाई दिया।
सफेद coat।
मध्यम आयु।
सटीक चाल।
हर कदम बिल्कुल समान लंबाई का।
“आर्या।”
उसने हाथ बढ़ाया।
“स्वागत है। मैं डॉ. समरथ हूँ।”
आर्या ने हाथ मिलाया।
उनकी पकड़ अस्वाभाविक रूप से नियंत्रित थी।
न ज्यादा मजबूत।
न कमजोर।
मानो उन्होंने वर्षों अभ्यास किया हो कि “सही” handshake कैसा होता है।
“यात्रा कैसी रही?”
“ठीक थी।”
“अच्छा।”
एक सेकंड का विराम।
“आपका कमरा तैयार है।”
वे साथ चलने लगे।
कॉरिडोर अंतहीन लग रहा था।
हर बीस फीट पर एक दरवाज़ा।
सभी समान।
सभी सफेद।
आर्या ने पूछा:
“यह जगह… थोड़ी अलग है।”
“अलग?”
डॉ. समरथ मुस्कुराए।
“हम व्यवस्था में विश्वास करते हैं। दुनिया का अधिकांश दुःख अराजकता से जन्म लेता है।”
“पर कला तो अक्सर अराजकता से ही जन्म लेती है।”
“गलत।”
उन्होंने बिना उसकी ओर देखे कहा।
“महान कला भी छिपी हुई समरूपता पर आधारित होती है।
मनुष्य का मस्तिष्क symmetry को स्वाभाविक रूप से सुंदर मानता है।”
“और imperfect चीज़ें?”
पहली बार डॉ. समरथ रुके।
धीरे से उसकी ओर मुड़े।
“अपूर्णता केवल वह समरूपता है… जिसे हम अभी तक समझ नहीं पाए।”
उनकी आँखें शांत थीं।
बहुत शांत।
इतनी शांत कि आर्या को उनमें कुछ मृत-सा महसूस हुआ।
वे कमरा 314 के सामने रुके।
दरवाज़ा खुला।
कमरा… परिपूर्ण था।
बिस्तर बिल्कुल center में।
टेबल center-aligned।
दीवारों पर कुछ नहीं।
खिड़की से बाहर बगीचा दिख रहा था।
पेड़ समान दूरी पर लगे थे।
सभी की ऊँचाई लगभग एक जैसी थी।
आर्या ने धीमे से कहा:
“यहाँ कुछ भी random नहीं है…”
“Randomness inefficiency है।”
डॉ. समरथ ने जवाब दिया।
फिर हल्की मुस्कान के साथ बोले:
“डिनर ठीक 8 बजे है। यहाँ समय बहुत महत्वपूर्ण है।”
दरवाज़ा बंद हो गया।
कमरे में सन्नाटा भर गया।
आर्या धीरे-धीरे खिड़की तक गई।
नीचे लोग चल रहे थे।
एक साथ।
लगभग समान गति से।
उसके शरीर में हल्की ठंडक दौड़ गई।
फिर उसने खुद को समझाया:
“तू overreact कर रही है।”
लेकिन उसी क्षण…
उसे एहसास हुआ कि कमरे में लगी घड़ी की टिक-टिक और उसकी धड़कन… लगभग एक ही rhythm में चल रही थीं।
रात 8:00 बजे
डिनिंग हॉल का दरवाज़ा खुलते ही आर्या ठिठक गई।
लगभग तीस लोग भीतर मौजूद थे।
सभी सफेद कपड़ों में।
सभी एक जैसी दूरी पर बैठते हुए।
कुर्सियों के खिसकने की आवाज़ भी लगभग एक साथ आई।
ख्र्र्र...
फिर शांति।
इतनी गहरी कि चम्मच के कप से टकराने की आवाज़ भी अस्वाभाविक लग रही थी।
आर्या को टेबल नंबर 7 पर बैठाया गया।
उसके सामने एक युवती बैठी थी।
छोटे बाल।
साफ़ चेहरा।
नियंत्रित मुस्कान।
“मैं नेहा हूँ।”
उसने हाथ बढ़ाया।
उसकी आवाज़ मधुर थी… लेकिन उसमें एक अजीब नियमितता थी। जैसे हर शब्द पहले से नापा गया हो।
“आर्या।”
दोनों कुछ क्षण चुप रहीं।
फिर नेहा बोली:
“तुम मुंबई से हो?”
“हाँ।”
“मुंबई अराजक शहर है।”
आर्या हल्का हँसी।
“तुम ऐसे बोल रही हो जैसे वह कोई बीमारी हो।”
नेहा ने उसे कुछ सेकंड देखा।
“यहाँ आने के बाद तुम समझ जाओगी कि शांति कितनी सुंदर होती है।”
तभी खाना परोसा गया।
सफेद प्लेट।
सफेद कटोरी।
सब्जियाँ इतनी व्यवस्थित थीं कि वे भोजन कम, diagram ज्यादा लग रही थीं।
गाजर के टुकड़े समान आकार के।
Beans perfectly aligned.
Rice dome के आकार में रखा हुआ।
आर्या कुछ पल प्लेट देखती रही।
फिर मुस्कुराई।
“क्या यहाँ chefs ruler लेकर खाना बनाते हैं?”
नेहा ने मज़ाक नहीं समझा।
“Precision consistency बढ़ाती है।”
“और स्वाद?”
“स्वाद भी एक pattern है।”
आर्या ने पहला कौर लिया।
और कुछ क्षण रुक गई।
स्वाद... सही था।
बहुत सही।
इतना संतुलित कि उसमें कोई आश्चर्य नहीं था।
न अचानक मसाले की तीखापन।
न नमक की हल्की कमी।
न घर जैसा imperfect comfort।
बस… पूर्ण संतुलन।
और उसी कारण वह अजीब लगा।
उसने चारों ओर देखा।
लोग धीरे-धीरे खा रहे थे।
लगभग एक जैसी गति से।
किसी ने ऊँची आवाज़ में बात नहीं की।
किसी ने अचानक हँसी नहीं छोड़ी।
किसी ने खाना गिराया नहीं।
एक आदमी ने पानी पिया।
फिर ठीक दो सेकंड बाद बगल वाली महिला ने भी वही किया।
फिर सामने वाले आदमी ने।
जैसे पूरा hall invisible rhythm में साँस ले रहा हो।
आर्या के हाथ अपने आप धीमे हो गए।
उसे अचानक लगा—
अगर वह अभी ज़ोर से हँस दे तो शायद पूरा कमरा उसकी ओर देखेगा।
“तुम्हारा काम किस बारे में है?”
नेहा ने पूछा।
“Fractals. Natural chaos. Unpredictable structures.”
“Interesting.”
नेहा ने सिर थोड़ा झुकाया।
“पर आखिर में हर fractal में भी mathematical repetition होती है।”
“हाँ, लेकिन identical repetition नहीं।”
“Imperfection केवल incomplete symmetry है।”
यह वही वाक्य था जो डॉ. समरथ ने कहा था।
ठीक वही।
ठीक उसी tone में।
आर्या के भीतर कुछ खिंचा।
“तुमने यह line पहले कहीं सुनी है?”
“हाँ।”
“कहाँ?”
“Orientation lecture में।”
नेहा मुस्कुराई।
“यहाँ हम सभी बहुत कुछ साझा करते हैं।”
डिनर समाप्त होते ही सभी लोग लगभग एक साथ उठे।
कुर्सियाँ पीछे गईं।
एक साथ।
कदमों की आवाज़।
एक साथ।
आर्या वहीं बैठी रही।
उसे लगा जैसे वह किसी इंसानी जगह में नहीं… किसी perfectly programmed ecosystem में बैठी हो।
रात 9:40 बजे
कमरे में लौटकर उसने तुरंत अपनी diary निकाली।
उसकी आदत थी—
जब भी कोई चीज़ उसे असहज करे, वह उसे लिख देती थी।
उसने पेन उठाया।
फिर अचानक रुक गई।
उसकी handwriting… सामान्य से ज्यादा साफ़ थी।
सीधी।
Balanced.
उसने जानबूझकर टेढ़ा लिखने की कोशिश की।
“यह जगह अजीब है।”
लेकिन “अजीब” शब्द लिखते समय उसकी उँगलियाँ अपने आप अक्षरों को बराबर spacing में लिखने लगीं।
उसने पेन छोड़ दिया।
कुछ क्षण तक अपने हाथ को देखती रही।
फिर खुद पर हँसी।
“अब मैं paranoid हो रही हूँ।”
लेकिन हँसी पूरी नहीं आई।
उसने डायरी में लिखा:
“दिन 1
यह जगह सुंदर है।
इतनी सुंदर कि डर लगता है।
यहाँ सब कुछ सही है।
शायद बहुत ज्यादा सही।”
वह बिस्तर पर लेट गई।
ऊपर छत पर गोलाकार pattern बना था।
एकदम केंद्र से फैलता हुआ।
उसकी आँखें अनायास उस symmetry को follow करने लगीं।
धीरे-धीरे।
बार-बार।
केंद्र।
वृत्त।
केंद्र।
वृत्त।
फिर अचानक उसे एहसास हुआ—
उसकी साँसें भी उसी rhythm में चलने लगी हैं।
उसने तुरंत आँखें बंद कर लीं।
और तभी पहली बार उसे कुछ अजीब महसूस हुआ।
शांति।
गहरी, भारी, अस्वाभाविक शांति।
मुंबई में उसे सोने से पहले हमेशा आवाज़ें सुनाई देती थीं—
traffic
कुत्ते
लोग
पंखे की uneven आवाज़
यहाँ…
कुछ नहीं था।
इतना सन्नाटा कि उसे अपने कानों में रक्त बहने की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
धीरे-धीरे नींद आने लगी।
पर नींद में जाने से ठीक पहले उसके दिमाग में एक अजीब विचार आया:
“अगर किसी जगह से सारी अराजकता हटा दी जाए…
तो क्या बचता है?”
और उस रात—
उसे कोई सपना नहीं आया।