Secular Warrior - 1 in Hindi Adventure Stories by Adi Krayunastra books and stories PDF | Secular Warrior - 1

Featured Books
  • Beginning of My Love - 13

    ​शरद राव थोड़ा और आगे बढ़कर सुनने लगे कि वॉर्ड बॉय और नर्स क्य...

  • पीपल तले उम्मीद

    ️ पीपल तले उम्मीद ️कई दिनों से आसमान में बादल लुका-छिपी का ख...

  • शब्द और सत्य - भाग 8

    22.कमजोरी का मोह छोड़ोकमजोरी कोई मजबूरी नहीं,यह तुम्हारा चुना...

  • पहली नज़र का जांदू - 19

    एपिसोड 16: बच्चों की राष्ट्रीय पहचान और बड़े सपनों की उड़ाने...

  • खौफ - 1

    नांदेड़ के धनेगाव में राज रहता था। राज एक पार्ट टाइम राइटर थ...

Categories
Share

Secular Warrior - 1

"ऊँआ... ऊँआ...!!"

अभी अभी जन्में एक बच्चे की तीखी आवाज आसपास फैले खौफनाक सन्नाटे को चीर रही थी,, हवा में एक अजीब सा दमघोंटू भारीपन था। हर सांस के साथ फेफडों में बारूद की तीखी जलती हुई गंध, झुलसते मांस की सडन और ताजे गर्म खून की लोहे जैसी महक साफ महसूस की जा सकती थी, जो किसी भी आम इंसान की रूह कंपाने के लिए काफी थी।

चारों ओर सिर्फ तबाही का मंजर था। टूटे हुए खंभे, जलते रेशमी पर्दे और जमीन पर बिखरी हजारों लाशें। ये सब उस जगह की बर्बादी को चीख चीखकर बयां कर रहे थे।

इस दौरान... एक बेहद दर्द भरी फुसफुसाहट खंडहर हो चुके कमरे में गूंजी, - "मौत अगर नियति हैं, तो जन्म इस दुनिया का सबसे बडा श्राप होगा..!"

ये आवाज एक औरत की थी, जो उसके अपने टूटे हुए छलनी हो चुके दिल से निकली थी। उस औरत का कभी सोने से चमकने वाला और राजसी तेज से भरा चेहरा अब राख धूल और दूसरों के खून से सना हुआ था।

उसकी आँखें... जिनमें कभी एक पूरे साम्राज्य का गुरूर हुआ करता था, अब वो आंखें आंसुओं के समंदर और खौफ के बवंडर में डूब चुकी थी।

इस समय उसकी गोद में एक नन्ही सी जान थी, जिसने अभी मुश्किल से इस दुनिया की हवा में अपनी पहली सांस ली थी।

... पास ही जमीन पर एक विशाल शरीर बेजान पडा था, जो एक आदमी का शव था, उस आदमी के सीने पर तलवारों के अनगिनत गहरे घाव थे। और उसकी खुली आँखें अभी भी उस औरत की ओर ही देख रही थी, मानो जैसे मौत के बाद भी वो उनकी हिफाजत करना चाहता हो।

तभी, दालान के बाहर से भारी जूतों की आवाजें नजदीक आने लगी... दूर से दिखाई दिया कि वे कुछ लोग थे, जिनके चेहरे लाल कपडे से ढके थे और उन्होंने काले रंग वाले ड्रैगन निशान के सफेद कपडे पहन रखे थे।

उनकी आंखें क्रूरता और बुरे इरादों से चमक रही थी। उनके हाथों में चमकती तलवारों से टपकता खून जमीन पर लाल निशान छोडता जा रहा था।

उनकी आहट सुनकर वो औरत घबरा गई। उसने अपनी कांपती हुई उंगलियों से अपने बच्चे के नरम गुलाबी चेहरे को छुआ। जिससे उस बच्चे ने रोना बंद कर दिया और अपनी छोटी-छोटी उंगलियों से अपनी माँ के खून से सने अंगूठे को कसकर पकड लिया।

उस एक पल ने उस औरत की आत्मा को हजार टुकडों में चीर दिया। उसके दिल में बेइंतहा दर्द, खुद से घृणा और घोर अपराधबोध का ऐसा तूफान उठा, जिसने उसकी सोचने समझने की शक्ति को खत्म कर दिया।

उसके होंठ झिझक से फडफडाने लगे, इस बीच आंसुओं की एक गर्म बूंद उस नवजात बच्चे के गाल पर जा गिरी। वो औरत सिसक कर बडी मुश्किल से बोली, - "मेरे बच्चे, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे ये दिन भी देखना पडेगा। मुझे माफ कर देना.... मैं तुम्हें उन दरिंदों के हाथों में नहीं पडने दे सकती। इस दुनिया को बचाने के लिए मेरा ऐसा कदम उठाना बहुत जरूरी है, मुझसे बहुत बडी गलती हो गई। मुझे तुम्हें जन्म नहीं देना चाहिए था।"

ये कहते हुए उस औरत के झिझक से कांपते हाथ बच्चे की नाजुक गर्दन की ओर बढे। इस पल में वो जो करने जा रही थी, उससे उसके दिल की नसें फटने को तैयार थी। उसने अपने होंठ काट लिए, जिससे हल्का हल्का खून बहने लगा।

एक माँ, जो अपने बच्चे को खरोंच तक लगने पर पूरा आसमान सिर पर उठा लेती, वो आज खुद यमराज बन रही थी। एक घुटी हुई खौफनाक सिसकी के साथ उसने अपने कांपते हाथों का दबाव बढा दिया। उसके ऐसा करते ही उस नवजात बच्चे के हाथ पैर हवा में एक दो बार हिले और उसकी आँखें फैल गई।

मुडकर जब उस औरत ने देखा कि उसके नवजात बच्चे ने तुरंत दम तोड दिया, तो वो उसे अपने सीने से लगाकर पागलों की तरह रोने लगी।

तभी एक जोरदार धमाके के साथ कमरे का आधा जला हुआ दरवाजा टूटकर बहुत दूर जा गिरा। काले ड्रैगन निशान वाले सफेद लिबास में लिपटे हुए कुछ लोग अंदर घुसे. उनके चेहरों पर लाल कपडे बंधे थे, लेकिन आँखों में झलकती क्रूरता साफ देखी जा सकती थी।

कमरे में घुसते ही उनकी नजर उस औरत और उसकी गोद में पडे बेजान बच्चे पर पडी। बच्चे को मरा देखकर एक आदमी चीखा, - "नहीं, ये क्या कर दिया इस पागल औरत ने? अपने ही बच्चे को मार दिया!"

उस आदमी की आवाज में खौफ और गुस्से का भयानक मिश्रण था, जिसके साथ उसने आगे कहा, - "इसने इस दिव्य बच्चे को मार डाला, हमारी आखिरी उम्मीद को भी नष्ट कर दिया!"

उस आदमी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने अपनी खून से सनी तलवार उठाई और उस औरत के टुकडे टुकडे कर देने के इरादे से आगे बढा।

औरत ने न तो आँखें उठाई और न ही बचने की कोई कोशिश की, वो खुद भी मौत का इंतजार कर रही थी। जैसे ही वे लोग आगे बढने को हुए, तभी उनके पीछे से एक भारी भरकम आवाज आई, - "रुक जाओ!"

इस आवाज को सुनकर वे सब ठिठक कर रुक गए। तभी एक लाल कपडे पहने शख्स धीरे धीरे चलकर उस औरत के सामने आकर खडा हो गया। उस शख्स के कपडों पर सफेद और काले रंग के ड्रैगन निशान बने थे और उसका चेहरा जला हुआ था, जो दिखने में बहुत डरावना था।

उसने उस औरत की गोद में पडे मृत बच्चे को देखा और औरत की सूनी पथराई आँखों में झांका। फिर कुछ समझते हुए उसने एक शैतानी मुस्कान के साथ कहा, - "इसे मारने की भूल मत करो, मौत तो इसे सुकून देने का काम करेगी। आज इस औरत ने जो किया है, उसकी इसे मौत से भी बदतर सजा मिलनी चाहिए। ऐसा करो... इसे जिंदा रखो। इस औरत को अपनी पूरी जिंदगी इसी पाप के बोझ, खुद से घृणा और तडप में गुजारनी होगी। हर पल इसे एहसास होना चाहिए कि कैसे इसने अपने ही हाथों से अपने बच्चे का खून किया। चलो, ले जाओ इसे।"

उस आदमी के इशारे पर दो आदमियों ने उस औरत को बालों से पकडा और बेरहमी से घसीटते हुए बाहर ले जाने लगे। इस दौरान उस औरत ने कोई विरोध नहीं किया। ऐसा लग रहा था जैसे वो एक जिंदा लाश बन चुकी थी।

लाल कपडें वाले शख्स ने जाने से पहले जमीन पर पडे उस मृत बच्चे को गौर से देखा, फिर उसके गले की ओर हाथ बढाया।

इस वक्त उस बच्चे के गले के पास एक अजीब सा काले धागे में पिरोया हुआ ताबीज पड़ा था, जिस पर कुछ प्राचीन और रहस्यमयी हरे निशान बने थे।

उस शख्स ने झटके से वो ताबीज उठाया, उसे अपनी मुट्ठी में भींचा और बाकी लोगों के साथ वहां से चला गया।

उन सबके जाने के बाद, जलकर राख हो चुके खण्डहर जैसे महल में एक खौफनाक और जानलेवा शांति छा गई।

करीब बीस मिनट बाद...

उस टूटे फूटे कमरे के दूसरी ओर एक विशाल खून से सनी लोहे की टंकी के पीछे कुछ हलचल हुई।

एक गहरा साया बहुत ही सावधानी से बाहर निकला। उस साये ने अपने सिर पर ओढा हुआ एक मोटा मैला कपडा धीरे से पीछे की ओर सरकाया।

जब उसका चेहरा दिखा, तब समझ आया कि वो एक बेहद बूढी महिला थी। जिसके चेहरे पर नजर आती अनगिनत झुर्रियां उसकी उम्र और उसके द्वारा देखे गए अनगिनत दुखों की गवाही दे रही थी।

लेकिन फिलहाल उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और स्थिरता थी। जिसके साथ वो धीरे धीरे अपने कांपते कदमों से लाशों के ढेर को पार करके उस मृत बच्चे के करीब आ गई।

उसने धीरे से अपने घुटने टेके और मरे हुए बच्चे को अपनी बाहों में लेकर उसके माथे को बहुत ही कोमलता से छुआ। उस बूढी महिला ने एक गहरी सांस ली और आसमान की तरफ देखते हुए फुसफुसाहट भरी आवाज में कहा, - "महारानी सुमित्रा, आपने कोई पाप नहीं किया है. कृपया इस तरह खुद को दोष ना दे और ना ही अपने आप से घृणा करें! ये सब सिर्फ और सिर्फ नियति का खेल है। ईश्वर जो चाहते है, उसे हम कभी बदल नहीं सकते।"

इतना कहकर उसने अपने कपडे के अंदर से एक छोटी सी शीशी निकाली, जिसमें अजीब सा नीला तरल पदार्थ चमक रहा था।

उसे देखकर वो औरत रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराने लगी और उसने वो सारा तरल उस मृत बच्चे के शरीर पर उढेल दिया। जिसके अगले ही पल वो बूढी महिला उस जगह से गायब हो गई।

वक्त, जो इस दुनिया का सबसे बडा मरहम और सबसे बेरहम शिकारी है, ये कब रेत की तरह मुट्ठी से फिसल जाता है, किसी को पता भी नहीं चलता... पलक झपकते ही तेरह साल बीत गए।

पूर्वी हिस्से में एक अरण्यशैल पर्वत के पास बसे गांव में आज दोपहर का वक्त था और सूरज आसमान से आग उगल रहा था। गाँव के कच्चे धूल भरे गलियारों पर सन्नाटा पसरा हुआ था, जिसे अचानक कुछ कदमों की आवाज ने तोड दिया।

इतने में एक लडके की तेज आवाज सुनाई दी, - "पकडो उसे! वो चुडैल की बच्ची आज बच कर नहीं जानी चाहिए!"

वहीं कुछ दूरी पर, एक नौ साल की छोटी सी लडकी पागलों की तरह भाग रही थी। उसके कपडे फटे पुराने और धूल से सने थे। उसके बाल उलझे हुए थे और उसके छोटे छोटे नंगे पैर जब खुरदरी कंकरीली जमीन पर पडते, तो धूल का एक गुबार सा उडने लगता।

उस लडकी की सांसें बहुत तेज चल रही थी, माथे से पसीना बहकर उसकी आँखों में जा रहा था, लेकिन उसके भागने की रफ्तार में कोई कमी नहीं आई।

उसने अपनी दोनों हथेलियों को अपने सीने से कसकर चिपका रखा था, मानो दुनिया की सबसे कीमती चीज उसने अपनी मुट्ठी में छुपा रखी हो।

उसके ठीक पीछे चौदह से सत्रह साल की उम्र के चार हट्टे कट्टे लडके दौड रहे थे। उनके हाथों में छोटी छोटी लाठियां भी थी और उनके चेहरों पर क्रूरता भरी मुस्कान थी।

थोडी दूर भागने के बाद, उनमें से एक लडका तंज कसते हुए चिल्लाया, - "मैंने कहा रुक जा! हमसे बचकर कहाँ तक भागेगी? जहां जाओगी हमें ही पाओगी।"

लेकिन उस लडकी ने पीछे मुडकर नहीं देखा। वो गाँव की संकरी गलियों में मुडी, एक बैलगाडी के नीचे से खिसक कर निकली और कुछ देर बाद मिट्टी के बने मटके वाले की दुकान के पास से तेजी से गुजरी।

मगर तभी अगले पल, एक गली में मुडते ही सबसे लंबे लडके ने उसकी ओर छलांग लगाई और उस लडकी की फ्रॉक का पिछला हिस्सा कसकर पकड लिया। जिससे वो लडकी धडाम से मुंह के बल जमीन पर गिरी।

गिरते ही उसके घुटने और कोहनियां छिल गई और वहां से खून रिसने लगा, लेकिन जमीन पर गिरते हुए भी उसने अपने हाथों को अपने सीने से अलग नहीं होने दिया।

उसके गिरते ही उन चारों लडकों ने उसे घेर लिया। उनकी परछाइयां उस छोटी सी बच्ची पर एक डरावने जाल की तरह पड रही थी।

तभी सबसे लंबे लडके ने हांफते हुए कहा, - "बहुत दौडाया तूने हमें, अब देख मैं तेरा क्या हाल करता हूँ पागल लडकी!"

ये कहकर वो लडका आगे बढकर उस लडकी के बालों को मुट्ठी में जकड कर उसे जमीन से ऊपर उठाने लगा। उसकी इस हरकत से लडकी दर्द से कराह उठी, लेकिन उसकी आँखों में आंसू नहीं, बल्कि एक अजीब सी विद्रोही की आग जलने लगी।

जिसे नजरअंदाज करते हुए दूसरे लडके ने चिल्लाकर कहा, - "जल्दी से उस चीज को बाहर निकाल।"

मगर उस लडकी ने जंगलीपन भरी आवाज में जवाब दिया, - "नहीं! ये चीज मेरे लिए बहुत जरूरी है, मैं इसे तुम्हें नहीं दे सकती!"

ये सुनकर उस दूसरे लडके ने एक कदम आगे बढाते हुए कहा, - "चुप कर! हमें पता है वो क्या है। वो लाल पत्तों वाली एक खास जडी बूटी है, जो तूने उस खतरनाक पहाडी से चुराई है? अगर ये हमें मिल जाये तो हकीम जी उस एक जडी बूटी के बदले पूरे पचास चांदी के सिक्के देने को तैयार हो जाएंगे। चल, इसे हमें सौंप दे!"

अपनी बात पूरी करते ही उसने लडकी का हाथ खोलने की कोशिश की, लेकिन लडकी ने पूरी ताकत से उस लडके के हाथ पर अपने दांत गडा दिए।

"आह्ह्ह! कुतिया कहीं की.." -  लडका दर्द से चीखा और उसने झटके से अपना हाथ पीछे खींच लिया।

तभी लंबा लडका बोला, - "ये ऐसे नहीं मानेगी।"

उस लंबे लडके ने लडकी के बालों को पकडकर खींचना शुरू कर दिया और उसके दाहिने हाथ को मरोडकर कहा, - "देख शकीरा, इसे हमें सीधे सीधे देदे, वरना मैं आज तेरा हाथ तोड दूंगा।"

वो लडकी, जिसका नाम शकीरा था, उसका चेहरा दर्द से पीला पडने लगा। उसकी मुट्ठी में दबी जडी बूटी, जिसके लाल पत्ते उसकी उंगलियों के बीच से थोडे थोडे नजर आ रहे थे, अब कुचलने लगी थी।

शकीरा ने मुश्किल से दर्द सहन करते हुए अपने दांत पीसकर कहा, - "छोडो मुझे!"

इस वक्त उसका पूरा शरीर दर्द से कांप रहा था, लेकिन उसकी मुट्ठी की पकड अभी भी लोहे जैसी सख्त थी। उसने बडी मुश्किल से आगे कहा, - "देखो, अगर तुमने इसे हाथ भी लगाया, तो मैं, मैं इसे..."

लंबे लडके ने ठहाका लगाकर हंसते हुए बीच में कहा, - "क्या कर लेगी? तुम हमारे सामने बस एक छोटी सी चींटी हो!"

ये कहकर उस लडके ने शकीरा के हाथ को और जोर से मरोड दिया, जिससे कडाक् की एक हल्की सी आवाज आई। हड्डी टूटने के दर्द की एक भयानक लहर शकीरा के पूरे शरीर में दौड गई, लेकिन तब भी उसने हार नहीं मानी।

मगर उसके इस बेइंतहा दर्द का फायदा उठाकर सबसे लंबे लडके ने पूरी ताकत से उसकी मुट्ठी पर जोरदार लात मार दी। जिससे उसकी दो उंगलियों की पकड ढीली पड गई और खून पसीने से सनी वो लाल पत्तों वाली जडी बूटी उसके हाथ से छुटकर धूल में जा गिरी।

लंबे लडके ने ये देखकर उसे खुशी से उसे उठा लिया। फिर अपनी लालच से चमकती आंखों के साथ जाते हुए बडबडाया, - "चलो जल्दी से चलें यहाँ से, इससे पहले कि कोई आ जाए!"

मगर जाते जाते उस सबसे लंबे लडके ने जमीन पर दर्द से कराहती शकीरा के पेट में एक जोरदार ठोकर मारकर कहा, - "भिखारिन! अगली बार हमारे रास्ते में आई तो जान से मार दूंगा।"

ये कहकर वो बाकी तीनों के साथ ठहाके लगाता हुआ चला गया। उनके जाने के बाद भी शकीरा बहुत देर तक वहीं मिट्टी में पडी रही। उसका दाहिना हाथ अजीब तरह से मुडा हुआ था और सूजने लगा था।

लेकिन शारीरिक दर्द से कहीं बडा दर्द उसके सीने में हो रहा था। अगले ही पल वो धीरे धीरे उठी। उसके फटे हुए कपडे मिट्टी और खून से सन चुके थे। वो कांप रही थी, हर कदम के साथ उसकी सिसकियाँ उस वीरान गली में गूंज रही थी।

दो घंटे तक वो घिसटते गिरते पडते गाँव के बाहरी छोर पर मौजूद एक टूटी फूटी झोपडी तक आ पहुँची। उस झोपडी का दरवाजा तो था ही नहीं, वहां बस एक फटी हुई टाट लटक रही थी।

अंदर चरमराते टूटे हुए पलंग पर एक बेहद बूढी महिला लेटी थी, जिसका शरीर किसी सूखी लकडी की तरह सिकुड चुका था। सांसें इतनी भारी और उथली थी कि मानो हर सांस के साथ उसके शरीर से प्राण निकल रहे हो।

जब शकीरा अंदर आई तो वो अपनी दादी की लगातार बिगडती हालत देखकर अपनी बची खुची हिम्मत हार गई। वो दौडकर पलंग के पास घुटनों के बल गिर पडी और जोर जोर से रोने लगी।

बाद में, खुद को संभालते हुए उसने कहा, - "दादी! मुझे माफ कर दो, मैं आपके लिए कुछ भी नहीं कर पा रही हूँ।"

शकीरा अपने सही सलामत हाथ से उस बूढी महिला के ठंडे पडते हाथों को सहलाते हुए आगे बोली, - "दादी, मैं आपके लिए वो जडी बूटी नहीं ला पाई, गांव के मुखिया के उन कमीनों ने मुझसे उसे छीन लिया। अब पता नहीं क्या होगा?"

इतने में, झोपडी के बाहर से कुछ आवाज हुई। अगले ही पल टाट का परदा हटा और एक लडका अंदर आया।

उस लडके की उम्र कुछ बारह से तेरह साल रही होगी, लेकिन अच्छा खाना पीना ना मिलने के कारण उसका शरीर हड्डियों का ढांचा बन गया था।

उस लडके के शरीर पर कपडों के नाम पर बस कुछ चीथडे लिपटे हुए थे, जिनमें से उसकी पसलियां साफ दिख रही थी। उसका चेहरा उतरा हुआ और पीला था, अंदर आते ही उसने रोती हुई शकीरा और उसकी सूजी हुई कलाई को देखा।

जिसे देखते ही उसकी भौहें तन गई और उसने हडबडी में सवाल किया, - "क्या हुआ शकीरा? तू रो क्यों रही है? और वो जडी बूटी कहाँ है? तू तो पहाडी पर गई थी ना! फिर खाली हाथ क्यों आई?"

ये सुनकर शकीरा ने अपने आंसू पोंछने की नाकाम कोशिश की और सिसकते हुए बोली, - "सुवीर भाई, मैं उसे अपने साथ ले आई थी, लेकिन रास्ते में मुखिया के उन चार बिगडे लडकों ने मुझे घेर लिया था। उन्होंने मुझे बहुत पीटा, और वे मुझसे उस जडी बूटी को भी छीनकर ले गए।"

ये पता चलते ही सुवीर का पीला चेहरा अचानक गुस्से से तमतमा उठा। उसकी कमजोर मुट्ठियां कस गई। वो बिना कुछ पूछे तेजी से पीछे मुडा और झोपडी से बाहर जाने लगा।

ये देखकर शकीरा घबरा कर चिल्लाई, - "सुवीर भाई रुक जाओ, अब आप कहाँ जा रहें हो?"

शकीरा चिल्लाते हुए सुवीर के पीछे भागी। बाहर आते ही जब उसे कुछ समझ आया तो उसने चिल्लाकर कहा, - "रुक जाओ सुवीर भाई, वो बहुत ताकतवर है। आप उनसे मुकाबला नहीं कर सकते।"

लेकिन सुवीर नहीं रुका। उसके कदम तेज होते गए। वो नंगे पैर भागते हुए गाँव के गलियारों से गुजकर बहुत दूर चला गया।

मगर थोडी दूरी पर पहुंच कर उसके कदम एकदम से रुक गए और अनायास ही वो पीछे हटने लगा। उसके हाथ पैसे डर से कांपने लगे और आंखें हैरानी से फैल गई।

अपने सामने का दृश्य देखकर सुवीर के मुंह से सिर्फ तीन ही टूटे फूटे शब्द निकले, - "ये.. ये यहां कैसे?"