Babuji's shop in Hindi Short Stories by Deepak sharma books and stories PDF | बाबूजी की दुकान

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बाबूजी की दुकान

                मेरा गणित का पर्चा अच्छा हुआ था. पर्चा देते ही मैं बाबूजी की दुकान पर आ गया.

                बाबूजी अपने ग्राहक की सहायता से गोल खर्रे में लिपटी मोटी तार के एक वज़नदार गट्ठर को अपने वज़नी तराज़ू में रखने जा रहे थे.

                “मैं तोल देता हूं,” मैं उदार हो आया, “आप बैठिए, बाबूजी.”

                “पेपर कैसा रहा?” हांफते हुए बाबूजी अपनी कुर्सी पर जा बैठे.

                 “बहुत आसान था,” पांच किलो का बटखरा दस किलो के बाट के ऊपर रखते हुए मैं ने कहा, “उम्मीद है, यह पेपर मुझे बहुतों से आगे ले जाएगा….”

                 मैं आए.ए.एस.की परीक्षा दे रहा था.

                 “अच्छा है,” बाबूजी मेरी भावतरंग से अछूते रहे.

                  “क्या बात है,” जब ग्राहक संतुष्ट हो कर चला गया, तो मैं बाबूजी के पास वाली दूसरी कुर्सी पर जा बैठा, “आज आप ठीक नहीं लग रहे?”

                 “कुसुम के बारे में एक मैसेज आया है,” बाबूजी ने अपना मोबाइल मेरी ओर ला बढ़ाया. 

                 मैसेज कुसुम के होस्टल की मेट्रन का था, “कुसुम अस्पताल में दाखिल है।उस की कलाई की हड्डी तड़क गई है.”

                “कुसुम के पास मेरा जाना बहुत ज़रूरी है,” बाबूजी ने कहा, “बेगाने शहर में बेचारी बिल्कुल अकेली है….”

                 “मैं आप को स्कूटर से लखनऊ ले चलता हूं,” मैं उठ खड़ा हुआ.

                 चाचा के साथ हम अपने पुश्तैनी मकान में इकट्ठे रहते हैं. उन के स्कूटर पर मैं पहले भी अपने दोस्तों के साथ लखनऊ जा चुका हूं.

                 “नहीं, तुम थक जाओगे,” बाबूजी ने सिर हिलाया, “बारह- चालीस पर एक बस लखनऊ जाती है। तुम मुझे उस पर चढ़ा देना….”

                  हमारे कस्बापुर और लखनऊ के बीच चलने वाली लगभग सभी बसों की बाबूजी को पूरी जानकारी थी.

                  जब से कुसुम लखनऊ के मेडिकल कालेज में अपनी एम.डी. करने गई रही, कुसुम से मिलने महीने के हर पहले अथवा दूसरे रविवार बाबूजी वहां जाते रहते थे.     अक्सर वह सुबह पांच- बीस की पहली बस यहां से पकड़ते और कुसुम के संग दो- तीन घंटे बिता लेने के बाद वहां से दोपहर की एक- दस वाली बस से उसी दिन संध्या होते- होते कस्बापुर घर लौट आते.

                 “कुसुम से मैं भी मिलूंगा,” मेरा गला रुंध आया.

                  इधर कुसुम अपनी दीवाली की छुट्टियों के बाद से घर न आयी थी और अपनी पढ़ाई की वजह से मैं भी लखनऊ न जा पाया था.

                 “नहीं, तुम रहने दो. मुझे बस से जाने दो,” बाबूजी उठ खड़े हुए.

                 “स्कूटर पर जाने से समय भी बचेगा और उधर लखनऊ में अगर भाग- दौड़ की कोई ज़रूरत पड़ी तो स्कूटर पास रहने से सुविधा रहेगी,” मैं ने आग्रह किया.

                 बाबूजी ने अपना आग्रह वापस ले लिया.

 

                  रास्ते में फ़रवरी की धूप व हवा कहीं भी हमारे आड़े नहीं आयी और साढ़े तीन घंटों ही में बाबूजी के साथ मैं कुसुम के अस्पताल पहुंचने में सफल रहा.

                 अस्पताल के पूछताछ विभाग से हमें कुसुम का कमरा ढूंढने में तनिक कठिनाई नहीं हुई. 

                “मेरे पिता और भाई,” ठसाठस भरे हुए कमरे के लड़के-लड़कियों को कुसुम ने हमारा परिचय दिया.

                 लगभग सभी ने हमारी दिशा में या हाथ जोड़ दिए या सिर हिला दिए.

                “क्या हुआ था?” बाबूजी ने पूछा.

                 “कौल्ज़ फ्रैक्चर,” कुसुम के बिस्तर के पास बैठी लड़की उठ खड़ी हुई,“कल   सीढ़ियां उतरते समय जब कुसुम अकस्मात आगे की ओर गिरी तो पूरे शरीर को टेक देते समय उस की दांयी बांह हचक ली और उस की कलाई की हड्डी तड़क गई.”

                 “चोट क्या बहुत संगीन है,” बाबूजी चिंतित हो आए.

                  “नहीं,” कुसुम ने हमारा हौसला बांधा, “उस समय दर्द ज़्यादा था सो हड्डी की सीध मिलाने के लिए मुझे बेहोशी की अवस्था में जाना पड़ा था। मगर अब पलस्तर बंध चुका है और घबराने की कोई बात नहीं….”

                   देखते- देखते ठसाठस भरा हुआ वह कमरा हमारी निहुराई- हेतु खाली हो गया.

                  “तकलीफ़ ज़्यादा तो नहीं हुई?” बाबूजी बिस्तर की बगल में रखी हुई एक कुर्सी पर बैठ गए.

                  “पर्चे कैसे हुए?” कुसुम ने मेरी ओर देखा.

                   “ठीक हुए हैं,” बाबूजी से खिन्न लग रही कुसुम की खिन्नता मुझे चुभी.

                   “ठीक नहीं? बहुत अच्छे हुए हैं,”  बाबूजी ने उत्साह दिखाया.

                   “अगला पर्चा कब है?” कुसुम ने बाबूजी के उत्साह को तनिक अभिस्वीकृति नहीं दी.

                   “अगले सोमवार को,” बाबूजी के प्रति कुसुम की उदासीनता अस्वाभाविक थी.

                   “परसों विनय के पिता मेरी दुकान पर आए थे,” बाबूजी ने स्वंंय को मुकाबले के लिए प्रस्तुत किया, “मुझे उन के रंग- ढंग तनिक पसंद नहीं आए….”

                   “मैं जानती हूं,” कुसुम के चेहरे का अवसाद गहराया.

                   “विनय कौन है?” उत्सुुक होकर मैं अपना स्टूल कुसुम के पास ले गया, “ विनय के बारे में अभी तक मुझे क्यों कुछ नहीं बताया गया?”

                   “विनय कुसुम का एक सहपाठी है,” बाबूजी मुस्कराए, “उस के पिता कुसुम के साथ उस की शादी का प्रस्ताव ले कर परसों मेरी दुकान पर मुझे मिलने आए थे….”

                   “प्रस्ताव बुरा नहीं था,” कुसुम ने अपनी नज़र मेरे चेहरे पर गड़ा ली, “अगर मां रही होतीं तो मैं उन्हें घर का पता दिए होती। आप का नहीं….”

                   यह हमारा दुर्भाग्य ही था जो चार साल पहले आए महामारी कोरोना ने हमारी मां को हम से छीन लिया था.

                  “वह होतीं तो वह भी वही कहतीं- सुनतीं जो मैं ने कहा- सुना,” बाबूजी का स्वर तीता हो लिया, “जिस रुखाई और अनिच्छा से उस के पिता ने बात चलायी वह भी उनका प्रस्ताव कभी न मानतीं….”

                   “विनय कहता है रुखाई और अनिच्छा पहले आप ने दिखाई थी,” कुसुम ने बाबूजी पर आरोप लगाया.

                   “मुझे जो सही लगा, मैं ने वही कहा। तुम्हें बहू बना कर वह तुम पर कोई उपकार नहीं कर रहे। विनय से किस बात में तुम उन्नीस हो? तुम्हारी पढ़ाई और योग्यता क्या विनय के बराबर नहीं?”

                   “विनय के पिता यहां के एक नामी वकील हैं और उन के बंगले और गाड़ी के सामने आपकी दुकान बहुत मामूली है….,” अपनी रुलाई से कुसुम ने अपने बाकी शब्द दबा लिए. 

                  यह सच था हमारे बाज़ार के साथ वाली दुकानों के सामने बाबूजी की दुकान एकदम फीकी और उपेक्षित लगती थी. सरकवें किवाड़ों वाली उन दुकानों के विशालकाय शीशों के पीछे प्रदर्शित व क्रियाशील टी.वी., वीडियो व म्युज़िक सिस्टमज़ की तुलना में बाबूजी की उघड़ी दुकान में बेतरतीब फैले बिजली की तारों के मुट्ठे किसी भी आगंतुक को खदेड़ने के लिए काफ़ी थे.

                 “उन लोग की ठसक देख कर तुम्हारे हाथों के तोते उड़ने लगते हों तो भले उड़ें,” बाबूजी ताव खा गए, “ मगर मुझे बेवक़ूफ़ बनाने पर तुम मुुझे मजबूर नहीं कर सकती। मैं जीती मक्खी नहीं निगल सकता। यह अच्छी ऐंठ है! वे लोग अपना सुभीता भी देखेंगे और अपना हाथ भी हम से ऊपर रखेंगे….”

                 “नहीं, बाबूजी,” कुसुम संभल गई, “ मेरे हाथों के तोते अभी मेरे ही हाथों में है। कहीं नहीं गए हैं….”

                 “क्या उन्हीं को पकड़ते समय तुम हाथ के बल गिरी थीं?” मैं ने कुसुम का मन रखना चाहा.

                 “हां,” कुसुम मुस्करायी, “ मैं ने उन्हें उड़ने से रोक लिया है.”

                 “मेरी दुकान की वजह से अगर विनय ने तुम से शादी का इरादा बदल लिया है तो तुम्हें मुझ से नाराज़ होने की बजाय खुश होना चाहिए,” बाबूजी भी मुस्करा दिए, “ मेरी दुकान ने उन के छल की पोल खोल कर रख दी….”

                 “आप ठीक कहते हैं, बाबूजी,”  कुसुम के खेदसूचक शब्द पूरी तरह से कृत्रिम व अविश्वसनीय रहे.

                  “यह पांच हज़ार रुपए तुम्हारे अस्पताल के इलाज के लिए लाया था,” बाबूजी ने व्याकुल होकर अपनी जेब से पर्स निकाला.

                 “मुझे इतना नहीं चाहिए,” कुसुम फिर रोने लगी.

                 “रख लो,” बाबूजी ने आगे बढ़ कर रुपए कुसुम के तकिए के नीचे धर दिए.

                 “ये ज़्यादा हैं,बाबूजी,” कुसुम ने बाबूजी का हाथ पकड़ लिया.

                 “मेरी दुकान की छोटाई और बेतरतीबी अपनी जगह है और तुम्हारी पढ़ाई और योग्यता अपनी जगह,” बाबूजी ने कुसुम से अपना हाथ छुड़ा लिया, “ इन्हें गड्डमड्ड कर कोई तुम्हारी कद्रदानी में फ़र्क लाएगा तो फिर उसे खरी- खरी सुनानी ही पड़ेगी….”

                “आप ठीक कहते हैं,” कुसुम ने अपने आंसू निगल लिए.

                “बिल्कुल,” बाबूजी आश्वस्त हुए, “मैं जानता हूं मेरी बेटी बहुत बहादुर और समझदार है.”

                “हड्डी जुड़ने में कितना समय लगेगा?” विषय बदलना मुझे बहुत ज़रूरी लगा.

               “लगभग तीन महीने,” कुसुम ने कहा.

               “ घबराना नहीं,” मैं ने कुसुम का कंधा थपथपाया, “मुझे पूरी उम्मीद है इस बार मैं ज़रूर सफल रहूंगा.”

               “मैं फिर जल्दी ही आऊंगा,”  बाबूजी का गला रुंध आया.

 

                शायद यह मेरा भ्रम हो, परंतु मुझे कई बार लगता है, कुसुम की वजह से ही पिछले साल की आए.ए.एस. के सफल प्रत्याशियों की सूची में मेरा नाम दस नामों के बाद आया। पहला या दूसरा न सही, पर यदि कुसुम उस साल अस्पताल में दाखिल न रही होती, मेरा नाम पांचवा अथवा छठा स्थान तो अवश्य ही पा लिया होता.

 

लेखिका : दीपक शर्मा dpksh691946@gmail.com