सोनू एक गरीब परिवार का लड़का था। उसके पिता रिक्शा चलाते थे और माँ लोगों के घरों में काम करती थीं। घर की हालत बहुत खराब थी, लेकिन सोनू पढ़ाई में बहुत होशियार था। उसका सपना था कि वह बड़ा होकर अफसर बने और अपने माता-पिता की गरीबी दूर करे।
हर दिन वह फटी हुई यूनिफॉर्म और टूटी चप्पल पहनकर स्कूल जाता था। स्कूल के कुछ बच्चे उसका मजाक उड़ाते थे।
“देखो, फिर वही टूटी चप्पल वाला आ गया!”
सब हँसते और सोनू चुपचाप अपनी सीट पर बैठ जाता।
एक दिन स्कूल में घोषणा हुई कि अगले हफ्ते शहर में होने वाली प्रतियोगिता में स्कूल से सिर्फ एक छात्र जाएगा। जो भी जीतेगा, उसे छात्रवृत्ति मिलेगी। सोनू ने पूरी मेहनत से तैयारी शुरू कर दी।
रात में घर पर बिजली नहीं थी, इसलिए वह सड़क के लैंप के नीचे बैठकर पढ़ता था। कई बार भूखा सो जाता, लेकिन उसने हार नहीं मानी।
प्रतियोगिता वाले दिन सुबह तेज बारिश हो रही थी। सोनू जल्दी-जल्दी स्कूल जाने लगा। रास्ते में उसकी एक चप्पल टूट गई। वह रुक गया। उसके पास नई चप्पल खरीदने के पैसे नहीं थे।
उसने टूटी चप्पल हाथ में उठाई और नंगे पैर दौड़ पड़ा। बारिश में उसके पैर कीचड़ और पत्थरों से घायल हो गए, लेकिन वह रुका नहीं।
जब वह प्रतियोगिता स्थल पहुँचा, तब तक उसके कपड़े भीग चुके थे और पैरों से खून निकल रहा था। वहाँ मौजूद लोग उसे देखकर हैरान थे।
एक शिक्षक ने पूछा,
“बेटा, इतनी हालत में भी तुम यहाँ क्यों आए?”
सोनू ने धीरे से कहा,
“सर, अगर आज रुक गया तो शायद जिंदगी भर रुक जाऊँगा।”
उसकी बात सुनकर सबकी आँखें नम हो गईं।
प्रतियोगिता शुरू हुई। सोनू ने पूरे आत्मविश्वास से सभी सवालों के जवाब दिए। कुछ घंटों बाद परिणाम घोषित हुआ।
पहला स्थान — सोनू।
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। स्कूल के वही बच्चे, जो उसका मजाक उड़ाते थे, अब गर्व से उसे देख रहे थे।
पुरस्कार लेते समय सोनू की आँखों में आँसू थे। उसने मंच से नीचे उतरकर सबसे पहले अपने पिता की टूटी चप्पल के पास वह ट्रॉफी रख दी और बोला,
“पापा, आपकी मेहनत हार नहीं सकती।”
उसके पिता उसे गले लगाकर रो पड़े।
उस दिन लोगों ने समझा कि इंसान की पहचान उसके कपड़ों या पैसों से नहीं, बल्कि उसके हौसले और मेहनत से होती है।
सोनू की जीत के बाद पूरे गाँव में उसकी चर्चा होने लगी। स्कूल के शिक्षक भी उस पर गर्व महसूस कर रहे थे। छात्रवृत्ति मिलने से अब उसकी पढ़ाई का खर्चा उठाना थोड़ा आसान हो गया था।
लेकिन सोनू बदला नहीं। वह आज भी उतनी ही मेहनत करता था और अपने माता-पिता का सम्मान पहले की तरह करता था।
एक दिन स्कूल से लौटते समय उसने रास्ते में एक छोटे बच्चे को देखा। वह सड़क किनारे बैठा रो रहा था। उसके पैरों में चप्पल नहीं थी और धूप से उसके पैर जल रहे थे।
सोनू उसके पास गया और पूछा,
“क्या हुआ?”
बच्चे ने रोते हुए कहा,
“मेरे पास चप्पल नहीं है… लोग मेरा मजाक उड़ाते हैं।”
सोनू कुछ पल चुप रहा। उसे अपना पुराना समय याद आ गया। उसने अपने बैग से वही टूटी हुई पुरानी चप्पल निकाली, जिसे उसने आज तक संभालकर रखा था।
उसने मुस्कुराकर कहा,
“जानते हो, यही चप्पल पहनकर मैंने जिंदगी की सबसे बड़ी जीत हासिल की थी।”
बच्चा हैरानी से उसे देखने लगा।
सोनू ने अपनी नई चप्पल उतारी और बच्चे को दे दी।
“इंसान की ताकत उसके पैरों में नहीं, उसके हौसले में होती है।”
बच्चे की आँखों में चमक आ गई।
धीरे-धीरे सोनू ने पढ़ाई पूरी की और एक बड़ा अधिकारी बन गया। शहर में उसकी अच्छी नौकरी लग गई। लेकिन उसने अपने गाँव को कभी नहीं भुलाया।
उसने गाँव में गरीब बच्चों के लिए एक छोटा स्कूल खुलवाया। स्कूल के दरवाजे पर एक काँच के बॉक्स में उसकी वही टूटी हुई चप्पल रखी थी।
नीचे लिखा था—
“अगर मेहनत सच्ची हो,
तो टूटी चप्पल भी मंजिल तक पहुँचा सकती है।”
जो भी बच्चा उस चप्पल को देखता, उसके अंदर कुछ कर दिखाने की नई उम्मीद जाग उठती।