रात का समय था…
रेगिस्तान अपनी गहरी खामोशी में डूबा हुआ था, लेकिन उस खामोशी के भीतर भी एक अजीब सी बेचैनी तैर रही थी। हवा आज कुछ ज़्यादा ही तेज़ चल रही थी
ऐसी कि रेत के कण उड़-उड़कर आसमान से बातें करने लगें। दूर-दूर तक फैली वीरानी में बस हवा की सनसनाहट थी, और बीच-बीच में किसी सूखे पेड़ की टहनी के टूटने की आवाज़
जैसे कोई अनकहा राज़ धीरे-धीरे टूट रहा हो। उस रात चाँद भी पूरा नहीं था आधा था… जैसे आसमान ने भी कुछ छुपा रखा हो।
उसी वीरान किनारे पर, जहाँ रेत खत्म होकर पानी की लहरों से मिलती थी, एक औरत खड़ी थी
उसकी साँसें तेज़ थीं, और हाथों में एक छोटी सी टोकरी कसकर पकड़ी हुई थी।
उस टोकरी के भीतर… एक नवजात बच्ची थी
इतनी नन्ही कि दुनिया की सख़्ती का उसे अभी कोई अंदाज़ा नहीं था। उसकी छोटी-छोटी उँगलियाँ हवा में जैसे किसी को पकड़ने की कोशिश कर रही थीं… शायद अपनी माँ को, शायद उस ज़िंदगी को, जिसे अभी शुरू भी नहीं होने दिया गया था।
औरत की आँखों में आँसू थे, लेकिन वो रो नहीं रही थी… क्योंकि कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जो आँसू बनने की इजाज़त भी नहीं देते।
उसके पीछे खड़ा आदमी बार-बार चारों तरफ देख रहा था डर, जल्दबाज़ी और समाज का बोझ उसके चेहरे पर साफ़ लिखा था। वो दोनों जानते थे… कि जो वो करने जा रहे हैं, वो पाप है… लेकिन उस दौर में कुछ पाप, समाज के डर से छोटे लगने लगते हैं।
हवा और तेज़ हो गई… टोकरी के ऊपर रखा कपड़ा थोड़ा हट गया, और बच्ची का चेहरा चाँदनी में साफ़ दिखने लगा। उसकी साँसें धीमी थीं… पर ज़िंदा थीं। और शायद यही उसकी सबसे बड़ी गलती थी
कि वो ज़िंदा थी।
औरत ने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए… पानी के और करीब। उसके पाँव रेत में धँस रहे थे, जैसे हर कदम उसे रोकना चाहता हो… जैसे ज़मीन खुद कह रही हो “मत कर…” लेकिन उसने सुना नहीं। उसने बस एक बार उस बच्ची को देखा… बहुत देर तक… ऐसे जैसे उस एक नज़र में पूरी माँ की ज़िंदगी भर देनी हो।
“काश…” उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
और अगले ही पल
उसने टोकरी को पानी में छोड़ दिया।
लहरों ने उसे तुरंत अपने साथ ले लिया बिना सवाल किए, बिना रुके। टोकरी धीरे-धीरे दूर जाने लगी पहले साफ़ दिख रही थी, फिर धुंधली… और फिर बस एक छोटा सा साया बनकर अंधेरे में खोने लगी।
औरत वहीं खड़ी रह गई… उसके हाथ अब खाली थे, लेकिन दिल पहले से कहीं ज़्यादा भारी। हवा अब भी चल रही थी… पर अब वो आवाज़ नहीं कर रही थी जैसे उसने भी वो सब देख लिया हो, और अब खामोश हो गई हो।
उस रात…
रेगिस्तान ने एक राज़ अपने भीतर दबा लिया।
और उसी रात
किस्मत ने एक कहानी लिखनी शुरू कर दी…
एक ऐसी कहानी, जिसमें इश्क़ होगा…
पर उससे ज़्यादा इंतज़ार, दर्द… और एक ऐसा सफर,
जो शायद कभी खत्म नहीं होगा।
नमस्ते दोस्तों,
मैं आपके लिए एक नई कहानी लेकर आई हूँ—और इस बार पूरी तरह हिंदी में। सच कहूँ तो मैं ज़्यादातर हिंदी में नहीं लिखती, लेकिन इस कहानी के लिए दिल ने कहा कि इसे उसी भाषा में कहा जाए, जिसमें इसकी भावना सबसे सच्ची लगे।
ये कहानी एक वास्तविक ऐतिहासिक लोककथा से प्रेरित है, जिसे मैंने अपने अंदाज़ में, अपनी समझ के साथ लिखने की कोशिश की है। हो सकता है इसमें कुछ कमियाँ रह जाएँ, कुछ बातें पूरी तरह सटीक न हों—क्योंकि मैं अभी सीख रही हूँ, समझ रही हूँ… और हर शब्द के साथ बेहतर बनने की कोशिश कर रही हूँ।
इसलिए आप सबसे एक छोटी सी गुज़ारिश है—
अगर आपको कहानी में कहीं भी कोई कमी लगे, कोई गलती दिखे, या कुछ ऐसा लगे जिसे और बेहतर किया जा सकता है… तो मुझे ज़रूर बताइएगा। आपका हर सुझाव मेरे लिए बहुत मायने रखता है।
और हाँ,
आपको कहानी कैसी लग रही है—ये भी बताइएगा।
आप कहाँ से ये कहानी पढ़ रहे हैं, ये जानकर भी सच में बहुत अच्छा लगता है… जैसे हम सब कहीं न कहीं जुड़ जाते हैं, एक ही कहानी के ज़रिए।
तो बस…
दिल से पढ़िए, महसूस कीजिए…
और अपने शब्दों से मुझे भी इस सफर का हिस्सा बनाइए।
मिलते हैं अगले अध्याय में… 👋🏻👋🏻👋🏻👋🏻👋🏻👋🏻👋🏻👋🏻