Debki ka Arivad in Hindi Short Stories by Rajkumar Mahato books and stories PDF | देवकी का आशीर्वाद

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देवकी का आशीर्वाद


चिन्मयी देवी ने गहनों का डिब्बा बहुत धीरे-धीरे खोला। एक-एक करके उन्होंने गले का हार, कानों के झुमके, माथे का टीका और नाक की नथ निकाली। सबसे अंत में उन्होंने एक जोड़ी चूड़ियाँ निकालीं। उनकी आँखों में आँसू भर आए। कल प्रभा की शादी है। इन सब गहनों से उसे सजा दिया जाएगा, लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा चमकेंगी यही चूड़ियाँ।

अचानक कंधे पर किसी के हाथ का स्पर्श पाकर वह चौंक उठीं। पीछे मुड़कर देखा तो रजत बाबू चुपचाप उनके पीछे आकर खड़े थे। वह जल्दी से आँसू पोंछ ही रही थीं कि रजत बाबू बोले, “डर लग रहा है? रहने दो न। प्रभा को अगर न भी पता चले तो क्या फर्क पड़ता है! इतने सालों से तो वह तुम्हें ही…”

रजत बाबू अपनी बात पूरी नहीं कर पाए। उनकी बात के बीच में ही चिन्मयी देवी ने डिब्बा बंद किया और खड़ी हो गईं। उन्होंने एक नजर रजत बाबू की ओर देखा और शांत स्वर में बोलीं, “क्या मेरी बेटी सच जाने बिना ही चली जाएगी? अगर मैं यह इतना बड़ा सच छुपाकर मर जाऊँ, तो मुझे कभी शांति नहीं मिलेगी। मुझे उसे सब बताना ही होगा।”

रजत बाबू ने उन्हें गले से लगा लिया। सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, “तुम जो ठीक समझो वही करो। कल उसकी शादी है। थोड़ा एकांत में सोच लो, फिर आज ही हल्दी के रसम के बाद उसे अकेले बुलाकर सब बता देना।”

रजत बाबू के जाने के बाद चिन्मयी देवी ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। बिस्तर पर बैठकर वह फिर से उन चूड़ियों को देखने लगीं। धीरे-धीरे उनकी आँखें बंद हो गईं।

उनके सामने बचपन का वह गाँव उभर आया। छोटी-सी चिन्मयी और उसकी दीदी देवकी धान के खेतों के किनारे दौड़ रही हैं। दीदी के हाथ में गमछे में बंधा खाना है—भात, सब्जी और मछली की तरकारी। चिन्मयी के हाथ में पानी का घड़ा। दोपहर हो चुकी है, धूप तेज है, लेकिन हल्की हवा खेतों पर लहरें पैदा कर रही है।

उनके माँ-बाप बरगद के पेड़ के नीचे इंतजार कर रहे हैं—कब उनकी बेटियाँ खाना लेकर आएँ और सब मिलकर खाना खाएँ।

दरवाजे पर दस्तक से चिन्मयी देवी का ध्यान टूटा। उन्होंने आँसू पोंछे और दरवाजा खोला। सामने प्रभा खड़ी थी—उनकी इकलौती बेटी। बिल्कुल वैसी ही आँखें, वैसा ही चेहरा, वैसी ही मासूमियत।

चिन्मयी देवी मुस्कुरा उठीं। उन्हें लगा जैसे सामने उनकी दीदी देवकी खड़ी हो, दुल्हन के रूप में। लेकिन उस दिन देवकी की शादी से घर वाले खुश नहीं थे, क्योंकि उसने अपनी पसंद से शादी की थी।

एक साल बाद देवकी के यहाँ बेटी हुई, लेकिन उसके बाद उस पर अत्याचार शुरू हो गए। अंततः वह अपनी बेटी को लेकर मायके लौट आई। माता-पिता ने उसे अपना लिया, लेकिन किस्मत में और दुख लिखा था। वह धीरे-धीरे कैंसर की शिकार हो गई।

इधर चिन्मयी देवी की शादी रजत कुमार बसाक से हुई, लेकिन उन्हें पता चला कि वह कभी माँ नहीं बन सकतीं। घर में दूसरी शादी की बात होने लगी, लेकिन रजत बाबू ने सब छोड़कर उनके साथ नया जीवन शुरू किया।

प्रभा की आवाज से चिन्मयी देवी वर्तमान में लौटीं। उन्होंने उसे अपने कमरे में बुलाया।

कमरे में जाकर उन्होंने गहनों का डिब्बा खोला और चूड़ियाँ निकालकर प्रभा के हाथों में पहना दीं। उनकी आँखें भर आईं।

उन्हें वह दिन याद आया जब मरते समय देवकी ने अपनी छोटी-सी बेटी को उनकी गोद में दिया था और कहा था, “मेरी बेटी को अपनी बेटी की तरह प्यार करना… और उसकी शादी के दिन ये चूड़ियाँ उसे देना।”

प्रभा ने माँ का चेहरा ऊपर उठाया और मुस्कुराकर बोली, “इतना मत सोचो माँ। तुम ही मेरी माँ हो। जिसने जन्म दिया वह देवकी थी, लेकिन तुम मेरी यशोदा माँ हो। मुझे सब पता है। मुझे खुद बताने की जरूरत नहीं है।”

यह सुनकर चिन्मयी देवी फूट-फूटकर रो पड़ीं और अपनी बेटी को गले लगा लिया। प्रभा के चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन उसकी नजरें उन चूड़ियों पर टिकी थीं— उसकी देवकी माँ का आशीर्वाद। 

समाप्त