गांव कि वोह अधूरी राह !! in Hindi Travel stories by Anjali kumari Sharma books and stories PDF | गांव का सफर !!

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गांव का सफर !!

ये कहानी जो गाँव की यादें, अद्भुत एहसास से जुड़ी है। गाँव, वो गाँव जिस भूमि पर हमारे खानदान की यादें और हमारा बचपन गुजरा था। दादा, दादी की यादें नहीं हैं परंतु उनकी चर्चा गाँव के दूर-दूर तक फैली है। दरअसल दादा जी गाँव के मठ के पुजारी थे, वहाँ लोग दूर-दूर से इलाज के लिए आया करते। जब भी मैं गाँव में जाती हूँ अपने दादा जी से मिलने मठ पर जरूर जाती हूँ उनकी तस्वीर देखकर कहानी बताई गई अंदाज़ा लगा लेती हूँ। बहुत गर्व महसूस होता है।

गाँव में जाने से वो अपनापन महसूस होना, वो बच्चे जो बुआ-दीदी कहकर लाड  लगाते दिल गद-गद सी हो जाती है। माँ जिन्हें देख उनके पोता-पोती दिन भर आँचल में घुसे रहते थे। ये सब देखकर मानो शहर की यादें ही भूल गए हों, बहुत ज्यादा ही खूबसूरत पल थे।

मेरा भतीजा शिवम् जो मुझे साइकिल पे बिठाकर गाँव, खेत घुमाया करता, वहीं रास्ते में कई पुराने दोस्त सब भी मिल जाया करते थे। उन्हें देख बचपन की यादें आ गई थीं, वो बेंचपार्टनर जो सीट के लिये  थोड़ी लड़ाई-मस्ती हो जाती थी, वो दिन जो एक ही प्लेट में चार-चार बैठकर खाया करते थे। अपने भतीजा के साथ पार्क में जाकर कच्चा आम चुरा के खाना और तेज रफ़्तार में साइकिल चलाकर भागना, कुछ अलग ही मज़ा था।

मेरे घर से निकलने के बाद शिवम् के साथ ही कहीं आना जाना होता था। दरअसल ! हमारे गाँव में बुआ को दीदी ही कहा जाता है, परंतु मुझे बुआ कहें वही पसंद है, मैं केवल अठारह वर्ष की थी , परंतु मेरे गाँव में मेरे छब्बीस-सत्ताईस वर्ष का भतीजा भी है ! मुझे तो बड़ी हँसी आती थी।
जब गाँव में वो लाल-लाल लीची का स्वाद अद्भुत थी। गाँव की शादियों में जो देवपूजी होता और जो लड़के-लड़कियां, बच्चे भोजपुरी गाने में जो धमाका करते थे, जिन्हें देखने के लिए थाली पे बैठे हुए भी दौड़े-दौड़े आ जाया करते थे। ज्यादातर एक ही गाना बजता था "कैलेबा कमाल तोहार लाल घाघरा "!!

मेरी बड़ी माँ जो मुझे दादी की जैसी लगती हैं, बहुत ज्यादा अच्छी लगती हैं, जब खेत में से मकई काटकर लाती थी और सभी साथ में बैठकर दाने छुड़ाते थे और वहाँ जब बचपन की बातें आती, कुछ अलग सी मज़ा थी।

एक दिन हम चारों प्रिय मित्र घूमने जाने का प्लान करने लगे, परंतु निकिता किसी महत्वपूर्ण कार्य से नहीं जा पाई, दिव्या, पायल और मैं घूमने निकले अपने-अपने साइकिल से दरअसल मैनरोड में मैंने कभी साइकिल नहीं चलाई थी और ऊपर से धूप की वह ताप, लू मारता था। रास्ते में ही मुझे ओ.आर.एस. की जरूरत हो गई, बहुत जगह घूमे... मस्ती किए खाए-पिए मज़ा आ गया। वापस आते समय निक्की को बहुत मिस कर रहे थे रोड खाली थी वो तेज रफ़्तार में साइकिल चलाने का स्वैग ही कुछ अलग थी। हरी-भरी खेत ठंडी-ठंडी हवाएं वाह क्या बात थी। परंतु हम चारों एक साथ घूमने कहीं ना जा पाए पर यादें बहुत आती हैं उनकी, कुछ तो ख़ास है उनसब में पाँच साल बाद मिलने पर भी कुछ भी नहीं बदला था दोस्ती के बीच में।

रोज शाम को दोस्तों के साथ पार्क जाना और साइकिल रेस लगाना और आम को घूरते जाना वाह क्या बात थी। परंतु वह पहला दिन जिस दिन गाँव में प्रवेश हुई थी गर्मी से रो रहे थे हम शहर में उतनी गर्मी नहीं थी जितनी गाँव में धीरे-धीरे आदत हो गई थी। वहाँ का ताजा-ताजा सब्जी खाने का स्वाद अत्यंत स्वादिष्ट थी, पानी-पूरी तो दस रुपये की आठ मिलती थी मनभर के खाया था। द्वार पर कुछ बेचने आता तो बुआ-बुआ करके सुप्रिया बुलाने आती दोनों मिलकर पानीपूरी खाया करते थे।

कुछ तो स्पेशल है वहाँ, मन नहीं मानता था सिक्किम आने को। कुछ दिन अपने गाँव रहकर मौसी के यहाँ गई थी वहाँ दीदी के साथ भी बहुत मज़ा आया वो हँसी-खुशी, रात-रात भर बातें करना, भाई के साथ लड़ना, मौसी के साथ बातें करना और मौसा का दुलार पाना आँखें भर आती हैं। दीदी और भाई के साथ खेत में आम चुनने जाना और भांजी भी थी जो बहुत प्यारी खुशी थी। जब से मौसी के यहाँ गई मतलब जैसा मैं ड्रेसअप, हेयर स्टाइल करती बिल्कुल वैसा ही लुक कॉपी करती थी बहुत प्यारी लगती थी। मैं तो दीदी को छोड़कर आना ही नहीं चाहती थी जब घर आई तब फिर से दीदी के पास गई, मानो वहाँ मन ही लग गया।

उसके बाद बड़ी मौसी के यहाँ गई वहाँ भैया की बेटी अनसिका जो हद से ज्यादा प्यारी और समझदार थी बहुत मस्ती किया, अन्नू जो दीदी की बेटी हमेशा चिपकी रहती मौसी-मौसी करते रहती प्यारी सी बचपना थी उनसब में। मैं तो हर शाम भैया के दुकान पर जाती थी और भैया पानी-पूरी खिलाने ले जाया करते थे। मौसा शाम को लस्सी लेकर आया करते, और भाभी के साथ मिलके गप्पे लड़ाने में मज़ा आता था।
नानी के यहाँ जाने पर भी मज़ा आया था वहाँ भी मस्ती किए परंतु केवल एक दिन रुकने की वजह से ज्यादा मस्ती नहीं कर पाए। वापस अपने गाँव सिमरी आ गए करीब एक-दो महीना गाँव में बीता लिया था।

अब समय आ गया था वापस शहर आने का, शहर आने के एक दिन पहले मामा जी और दीदी आई थी दिनभर रहे और शाम को निकलने लगे, ज़िद करने पर भी ना रुके!! कल होकर शाम पाँच बजे की ट्रेन से निकलनी थी आँचल जो हमारे साथ पढ़ाई करती थी उसकी शादी का कार्ड सुबह ही आ गई थी, अब उससे मिलने सुबह घर गई, मिले सब कोई फिर अपने मित्र से भी मिले, दिव्या, निकिता घर तक साथ आए बहुत दुख हो रहा था छोड़कर आने में। पापा ने रिक्शा मंगवाया सामान रखकर बैठ गए सभी को प्रणाम कर रवाना हो गए, आँखों में पानी आ गई थी सभी की। पीछे से ऋषु और शिवम् स्टेशन तक पहुँचाने आए। ट्रेन पर चढ़कर बाय-बाय कहने का मन ही नहीं कर रहा था, मन कर रहा था जैसे ट्रेन कैंसल हो जाए परंतु अब ट्रेन तो आ ही गए थे। अब गाँव का सफर यहीं तक था समझ लिया। जितना पल जिए थे बहुत सुखदाय था !!


                                            —अंजली कुमारी शर्मा