Helping the victims in Hindi Spiritual Stories by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) books and stories PDF | पीड़ितों की मदद

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पीड़ितों की मदद

४ऋगुवेद सूक्ति-- (४२) की व्याख्या करो यत्र वरिवो बाधिताय।६/१८/१४भावार्थ --पीड़ितों की सहायता करने वाले हाथ ही उत्तम है। मंत्र +-ऋग्वेद ६/१८/१४—उसका भावार्थ “पीड़ितों की सहायता करने वाले हाथ ही उत्तम हैं” । मूल भाव--मंत्र में “वरिवः” का अर्थ है मार्ग, अवसर या सहायता, और “बाधिताय” का अर्थ है जो कष्ट या बाधा से पीड़ित हो।इस प्रकार यह मंत्र संकेत करता है कि जो व्यक्ति दुःखी, पीड़ित या संकटग्रस्त है, उसके लिए मार्ग बनाना, उसकी सहायता करना—यही श्रेष्ठ कर्म है। व्याख्यायह सूक्ति हमें सिखाती है कि परहित सर्वोच्च धर्म है।वेदों में बार-बार यह बताया गया है कि दूसरों के दुःख को दूर करना ही सच्चा धर्म है। केवल पूजा या ज्ञान ही नहीं, बल्कि सेवा ही असली श्रेष्ठता है।सक्रिय सहायता यहाँ केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि “हाथ बढ़ाना” यानी व्यवहारिक सहायता की बात कही गई है।जैसे—भूखे को भोजन, रोगी को उपचार, दुखी को सहारा देना।वेदों में प्रमाण--  १. ऋग्वेद (सहयोग और एकता)संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।— ऋग्वेद १०/१९१/२भावार्थ:तुम सब मिलकर चलो, मिलकर बोलो और अपने मनों को एक करो। यहाँ समाज में एक-दूसरे की सहायता और सहयोग का स्पष्ट आदेश है। २. ऋग्वेद (दान और परोपकार)केवलाघो भवति केवलादी।— ऋग्वेद १०/११७/६भावार्थ:जो व्यक्ति केवल अपने लिए ही खाता है, वह पाप का भागी होता है। यह मंत्र सिखाता है कि दूसरों की सहायता और दान करना आवश्यक है ३. यजुर्वेद (परोपकार का संदेश)मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।— यजुर्वेद ३६/१८भावार्थ:हम सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखें।जब हम सबको मित्र मानते हैं, तो स्वाभाविक रूप से पीड़ितों की सहायता करते हैं। ४ ऋग्वेद (दानशीलता का महत्व)श्रद्धया देयम्।(वेदों में दान और सहायता को बार-बार महत्त्व दिया गया है) अर्थ: श्रद्धा से दान करो। निष्कर्ष--वेदों का स्पष्ट संदेश है: “परोपकार ही धर्म है, और पीड़ितों की सहायता करना ही सच्ची श्रेष्ठता है।उपनिषदों में प्रमाण--  १. तैत्तिरीय उपनिषद्--श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया अदेयम्।श्रिय देयम्, ह्रिय देयम्, भिय देयम्, संविदा देयम्॥— तैत्तिरीय उपनिषद् (१.११)भावार्थ:दान श्रद्धा से करो, विनम्रता और समझदारी से करो। यह स्पष्ट करता है कि दूसरों की सहायता करना (दान देना) एक आवश्यक कर्तव्य है। २. ईशावास्य उपनिषद्-ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।— ईशावास्य उपनिषद्-१ भावार्थ:यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से आच्छादित है। जब सबमें ईश्वर है, तो किसी भी पीड़ित की सहायता करना ईश्वर की सेवा है। ३. बृहदारण्यक उपनिषद्-असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।—बृहदारण्यक उपनिषद्- १.३.२८भावार्थ:हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।जो दूसरों को दुःख और अज्ञान से निकालकर मार्ग दिखाना ही ईश्वरीय सेवा ‌है।४. छान्दोग्य उपनिषद्-सर्वं खल्विदं ब्रह्म।— छान्दोग्य उपनिषद् -३.१४.१भावार्थ:यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म (ईश्वर) ही है। इसलिए हर प्राणी में उसी ब्रह्म को देखकर उसकी सहायता करना धर्म है। ५. कठोपनिषद्-श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः...— कठोपनिषद्- १.२.२भावार्थ:मनुष्य के सामने श्रेय (कल्याण) और प्रेय (सुख) दोनों आते हैं। जो दूसरों का कल्याण करता है, वही श्रेय मार्ग को अपनाता है। ६. मुण्डक उपनिषद्-सत्यमेव जयते नानृतम्।— मुण्डक उपनिषद् ३.१.६भावार्थ:सत्य की ही विजय होती है। सत्य आचरण में परोपकार और सेवा भी शामिल है।७- महा उपनिषद्--६/७१अयं बन्धुरयं नेति गणना लघुचेतसाम्।उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥भावार्थ:यह मेरा है, यह पराया है—ऐसी सोच छोटे मन वालों की है।उदार हृदय वाले तो पूरी पृथ्वी को अपना परिवार मानते हैं। जब सबको परिवार मानेंगे, तो पीड़ित की सहायता करना स्वाभाविक कर्तव्य बन जाता है।८-श्वेताश्वतर उपनिषद्--६/११एको देवः सर्वभूतेषु गूढःसर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा॥भावार्थ:एक ही परमात्मा सभी प्राणियों में स्थित है। इसलिए किसी भी दुःखी की सहायता करना ईश्वर की ही सेवा है।९. अमृतबिन्दु उपनिषद्-२मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्॥भावार्थ:मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है। जब मन विषयों में फँसता है तो बंधन होता है, और जब निर्मल होता है तो मोक्ष मिलता है। ऐसा शुद्ध मन दया, करुणा और परोपकार की ओर प्रेरित करता है।१०- नारायण उपनिषद्(क)अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः॥— श्लोक ५भावार्थ:नारायण भीतर और बाहर सम्पूर्ण जगत में व्याप्त हैं। इसलिए हर प्राणी में ईश्वर को देखकर उसकी सहायता करना ही सच्ची सेवा है।(ख)नारायणादेव समुत्पन्नं जगत् सर्वं चराचरम्॥— श्लोक- २भावार्थ:यह सम्पूर्ण चराचर जगत नारायण से ही उत्पन्न हुआ है। अतः सभी प्राणी एक ही स्रोत से हैं—इसलिए सर्वभूतहित आवश्यक है।(ग)यच्च किंचिज्जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा।अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः॥— श्लोक- ६भावार्थ:जो कुछ भी इस जगत में दिखाई या सुनाई देता है, उसमें नारायण व्याप्त हैं। इससे स्पष्ट है कि दूसरों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है। निष्कर्ष-इन उपनिषदों से स्पष्ट होता है:“पीड़ितों की सहायता करना केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं बल्कि उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म ज्ञान का ही व्यावहारिक रूप‌‌ है।भगवद्गीता में प्रमाण--  १. सर्वभूतहित (सबके कल्याण में लगे रहना)सर्वभूतहिते रताः॥— गीता ५/२५भावार्थ:जो मनुष्य सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, वे परम शांति (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं। स्पष्ट है कि दूसरों की भलाई करना ही श्रेष्ठ मार्ग है।२. अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् (दया और करुणा)अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।— गीता १२/१३भावार्थ:जो सभी प्राणियों से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और दयालु होता है। यह बताता है कि करुणा और सहायता ही सच्ची भक्ति है। ३. आत्मौपम्येन सर्वत्र (दूसरों को अपने समान समझना)आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।— गीता ६/३२भावार्थ:जो मनुष्य सबको अपने समान देखता है। ऐसा व्यक्ति स्वाभाविक रूप से दूसरों के दुःख में सहायता करता है। ४. लोकसंग्रह (संसार का कल्याण)लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥— गीता ३/२०भावार्थ:तुम्हें लोकसंग्रह (संसार के कल्याण) के लिए कर्म करना चाहिए। यह सीधे-सीधे समाज के हित और सेवा का आदेश है। ५. यज्ञार्थ कर्म (निःस्वार्थ सेवा)यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः॥— गीता ३/९भावार्थ:यज्ञ (निःस्वार्थ भाव) के लिए किए गए कर्म ही बंधन से मुक्त करते हैं। दूसरों के लिए किया गया कार्य ही श्रेष्ठ कर्म है। ६. दान का महत्वदातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।— गीता १७/२०भावार्थ:जो दान बिना किसी प्रत्युपकार की अपेक्षा के किया जाता है, वह सात्त्विक दान है। यह स्पष्ट करता है कि निःस्वार्थ सहायता सर्वोत्तम है। निष्कर्ष--गीता का स्पष्ट संदेश है:सर्वभूतहित (सबके कल्याण में लगे रहना) करुणा और दया रखना निःस्वार्थ सेवा करना। इसलिए:“पीड़ितों की सहायता करना ही गीता के अनुसार सच्चा कर्मयोग और भक्ति है।”महाभारत में प्रमाण-- १- परोपकार और परपीड़ापरोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्॥— महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय ११३, श्लोक ८भावार्थ:दूसरों का उपकार करना पुण्य है और दूसरों को कष्ट देना पाप है। २- दया ही श्रेष्ठ धर्मअहिंसा परमो धर्मः धर्महिंसा तथैव च॥— महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय ११६, श्लोक ३८भावार्थ:अहिंसा ही सर्वोच्च धर्म है। अहिंसा का अर्थ है—किसी को कष्ट न देना और पीड़ित की रक्षा करना। ३. सर्वभूतहित सर्वभूतहिते युक्तः स धर्मं वेत्ति पाण्डव॥— महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय २६२, श्लोक ५भावार्थ:जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है, वही धर्म को जानने वाला है। ४- दया और करुणा-दया धर्मस्य मूलं हि पापस्य मूलमदया॥— महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय २६०, श्लोक २८भावार्थ:दया धर्म का मूल है और निर्दयता पाप का मूल है। यह स्पष्ट करता है कि दूसरों के दुःख को दूर करना ही धर्म है। ५--दान और सहायतादानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।— महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय ८८, श्लोक १७भावार्थ:धन के तीन मार्ग हैं—दान, भोग और नाश। सबसे श्रेष्ठ है दान (दूसरों की सहायता)। ६- करुणा का महत्व-आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥— महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय ११३, श्लोक ६भावार्थ:-जो अपने लिए प्रतिकूल है, वह दूसरों के साथ न करो। इससे प्रेरणा मिलती है कि दूसरों के दुःख को समझकर उनकी सहायता करें। निष्कर्ष--महाभारत का स्पष्ट संदेश है:दया ही धर्म का मूल है।परोपकार ही पुण्य है।सर्वभूतहित  ही‌ सच्चा धर्म हैं। इसलिए:“पीड़ितों की सहायता करना ही महाभारत के अनुसार सर्वोच्च धर्म है।”स्मृतियों में प्रमाण--  १-- मनुस्मृति-अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः॥— मनुस्मृति १०/६३भावार्थ:अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रिय-निग्रह—ये सब धर्म हैं। अहिंसा का तात्पर्य है—किसी को कष्ट न देना और पीड़ित की रक्षा करना। २--याज्ञवल्क्य स्मृति-दानं दमो दया शान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनम्॥— याज्ञवल्क्य स्मृति १/१२२भावार्थ:दान, संयम, दया और शांति—ये सब धर्म के साधन हैं। यहाँ दया और दान (सहायता) को धर्म का मुख्य अंग बताया गया है। ३-- पाराशर स्मृति-दया सर्वभूतेषु धर्मस्य परमं फलम्॥— पाराशर स्मृति, अध्याय १, श्लोक २३भावार्थ:सभी प्राणियों पर दया करना ही धर्म का सर्वोच्च फल है। अर्थात दूसरों के दुःख को दूर करना ही श्रेष्ठ कर्म है। ४-- नारद स्मृति-सर्वभूतहिते युक्तः स धर्मज्ञः प्रकीर्तितः॥— नारद स्मृति, अध्याय ३, श्लोक ११७भावार्थ:जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है, वही धर्मज्ञ कहलाता है। यह सीधे-सीधे परोपकार और सहायता का समर्थन है। ५-गौतम धर्मसूत्र-दया सर्वभूतेषु क्षान्तिर्दानं च सर्वदा॥— गौतम धर्मसूत्र ८/२४भावार्थ:सभी प्राणियों पर दया, क्षमा और दान करना चाहिए। यह स्पष्ट करता है कि दया और सहायता धर्म का अनिवार्य भाग है। ६- आपस्तम्ब धर्मसूत्र-सर्वभूतानुकम्पा धर्मः॥— आपस्तम्ब धर्मसूत्र १/२२/६भावार्थ:सभी प्राणियों पर करुणा करना ही धर्म है। अर्थात पीड़ितों की सहायता करना ही सच्चा धर्म है। निष्कर्ष--स्मृति ग्रंथों का स्पष्ट संदेश है:दया ही धर्म का मूल है।दान ही श्रेष्ठ कर्म है।सर्वभूतहित ही धर्म का सार इसलिए:“पीड़ितों की सहायता करना ही स्मृतियों का सच्चा धर्मं और कर्तव्य है।नैति ग्रन्थों में प्रमाण -- १. हितोपदेश-परोपकाराय फलन्ति वृक्षाःपरोपकाराय वहन्ति नद्यः।परोपकाराय दुहन्ति गावःपरोपकारार्थमिदं शरीरम्॥— हितोपदेश, मित्रलाभ, श्लोक ७१भावार्थ:वृक्ष, नदियाँ, गायें—सब परोपकार के लिए हैं; मनुष्य का शरीर भी दूसरों की सहायता के लिए है। पंचतंत्र--परोपकारेण सतां विभूतयः॥— पंचतंत्र, पुस्तक- १ (मित्रभेद), श्लोक ५४भावार्थ:सज्जनों की महिमा परोपकार से बढ़ती है। ३. चाणक्य नीति-त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥— चाणक्य नीति, अध्याय १, श्लोक ७भावार्थ:व्यक्ति से ऊपर समाज और समाज से ऊपर राष्ट्र का हित है—अर्थात लोककल्याण सर्वोपरि है। ४. भर्तृहरि नीतिशतक-सन्तः स्वयंपरहिते विहिताभियोगाः॥— नीतिशतक, श्लोक ७९भावार्थ:सज्जन लोग सदा दूसरों के हित में लगे रहते हैं। ५. भर्तृहरि नीतिशतक-परोपकाराय सतां विभूतयः॥— नीतिशतक, श्लोक ८१भावार्थ:सज्जनों की सम्पत्ति परोपकार के लिए होती है। ६. शुक्रनीति-सर्वभूतहिते युक्तः स एव पुरुषोत्तमः॥— शुक्रनीति, अध्याय २, श्लोक ४३भावार्थ:जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है।निष्कर्ष--नीति ग्रंथों में स्पष्ट रूप से कहा गया है:परोपकार ही सज्जनता का लक्षण है।लोककल्याण ही सर्वोच्च नीति‌ है।दूसरों की सहायता  मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। इसलिए:“पीड़ितों की सहायता करना ही सच्ची नीति, धर्म और मानवता है। १-- वाल्मीकि रामायण-सर्वभूतहिते रतः साधवः सन्ति राघव॥— अयोध्या काण्ड, सर्ग २, श्लोक ३३भावार्थ:हे राम! सज्जन लोग सदा सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं। सच्चा साधु वही है जो दूसरों के कल्याण में लगा रहे। २- वाल्मीकि रामायण+न परः पीड्यते यस्मात् तद् धर्मः इति निश्चयः॥— अयोध्या काण्ड, सर्ग १०९, श्लोक ११भावार्थ:जिससे किसी को पीड़ा न हो, वही धर्म है। यह स्पष्ट करता है कि दूसरों को कष्ट से बचाना ही धर्म है। ३-- अध्यात्म रामायण-परहितसरिस धर्म नहिं भाई।परपीड़ा सम नहि अधमाई॥— अरण्य काण्ड, अध्याय ४, श्लोक १२भावार्थ:परोपकार के समान कोई धर्म नहीं और परपीड़ा के समान कोई अधर्म नहीं। यह सीधा-सीधा परोपकार को सर्वोच्च धर्म बताता है। ४-- योग वशिष्ठ-परोपकाराय सतां जीवितं न स्वार्थाय कदाचन॥— योग वशिष्ठ, उपशम प्रकरण, सर्ग ३७, श्लोक २७भावार्थ:सज्जनों का जीवन परोपकार के लिए होता है, न कि स्वार्थ के लिए। महान व्यक्ति दूसरों की सहायता के लिए ही जीते हैं। ५-- योग वशिष्ठ--सर्वभूतहिते युक्तः स एव ज्ञानी उच्यते॥— योग वशिष्ठ, निर्वाण प्रकरण, सर्ग ५४, श्लोक १८भावार्थ:जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है, वही सच्चा ज्ञानी है। ज्ञान का सार ही परोपकार और करुणा है।आदि शंकराचार्य के साहित्य में ‌प्रमाण-- आदि शंकराचार्य के साहित्य में भी दया, परोपकार और सर्वभूतहित की भावना स्पष्ट रूप से मिलती है। नीचे उनके ग्रंथों से श्लोक और श्लोक-संख्या सहित प्रमाण प्रस्तुत हैं:1. विवेकचूडामणि 37“शान्ता महान्तो निवसन्ति सन्तोवसन्तवल्लोकहितं चरन्तः।”भावार्थ:महान संत शांत स्वभाव वाले होते हैं औरवसंत ऋतु के समान संसार के हित में लगे रहते हैं। अर्थात वे सदैव दूसरों के कल्याण और सहायता में लगे रहते हैं। 2. विवेकचूडामणि 38“तीर्णाः स्वयं भीमभवार्णवं जनान्अहेतुनान्यानपि तारयन्तः।”भावार्थ:जो स्वयं संसार-सागर से पार हो जाते हैं,वे बिना किसी स्वार्थ के दूसरों को भी पार लगाते हैं। अर्थात पीड़ितों की सहायता करना ही महापुरुषों का स्वभाव है। 3. भज गोविन्दम् (श्लोक 12)“सत्संगत्वे निस्संगत्वंनिस्संगत्वे निर्मोहत्वम्।निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वंनिश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः॥”भावार्थ:सत्संग से वैराग्य, और वैराग्य से मोह का नाश होता है। सत्संग का एक प्रमुख फल है — दया और परोपकार की भावना का जागरण। 4. मनीषा पंचकम् 5“ब्रह्मैवाहमिदं जगच्च सकलंचिन्मात्रविस्तारितम्…”भावार्थ:यह सम्पूर्ण जगत एक ही ब्रह्म का विस्तार है। जब सबमें एक ही आत्मा है, तो दूसरों की सहायता करना अपने ही आत्मा की सेवा है। 5. आदि शंकराचार्य का सिद्धांत“जीवो ब्रह्मैव नापरः”भावार्थ:जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। इसलिए दूसरों का दुःख दूर करना = अपने ही स्वरूप की सेवा करना। निष्कर्षआदि शंकराचार्य का स्पष्ट संदेश है—संतों का स्वभाव = लोकहित (परोपकार)निःस्वार्थ सहायता = महात्माओं का गुणअद्वैत दृष्टि = सबमें एक ही आत्मा → इसलिए सहायता आवश्यक इसलिए उनके दर्शन में भी यही सिद्धांत है:“जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से दूसरों (विशेषकर पीड़ितों) की सहायता करता है, वही श्रेष्ठ है।”इस्लाम धर्म में प्रमाण --इस्लाम धर्म में भी दया (रहमत), परोपकार (इहसान) और जरूरतमंदों की सहायता को बहुत ऊँचा स्थान दिया गया है। इसके स्पष्ट प्रमाण क़ुरआन में अरबी लिपि सहित मिलते हैं: 1. क़ुरआन 5:32“مَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا”भावार्थ:जिसने एक व्यक्ति की जान बचाई, उसने मानो सारी मानवता को बचाया। यह पीड़ित की सहायता को सर्वोच्च पुण्य बताता है। 2. क़ुरआन 2:177“وَآتَى الْمَالَ عَلَىٰ حُبِّهِ ذَوِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينَ…”भावार्थ:धर्म यह है कि मनुष्य अपने प्रिय धन को रिश्तेदारों, अनाथों और गरीबों को दे। यह जरूरतमंदों की सहायता का स्पष्ट आदेश है। 3. क़ुरआन 16:90“إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالإِحْسَانِ…”भावार्थ:अल्लाह आदेश देता है — न्याय और भलाई (इहसान) का। “इहसान” का अर्थ है — दूसरों के साथ अच्छा करना और उनकी सहायता करना। 4. क़ुरआन 93:9–10“فَأَمَّا الْيَتِيمَ فَلَا تَقْهَرْوَأَمَّا السَّائِلَ فَلَا تَنْهَرْ”भावार्थ:अनाथ पर कठोर मत बनो,और मांगने वाले (जरूरतमंद) को मत डाँटो। यह सीधे-सीधे दुखियों के प्रति दया और सहायता का आदेश है। 5. हदीस“خَيْرُ النَّاسِ أَنْفَعُهُمْ لِلنَّاسِ”भावार्थ:सबसे अच्छा व्यक्ति वह हैजो लोगों के लिए सबसे अधिक लाभदायक (सहायक) हो। निष्कर्षइस्लाम धर्म का स्पष्ट संदेश है—रहमत (दया) = ईमान का हिस्साइहसान (भलाई) = दूसरों की सहायताज़कात/दान = जरूरतमंदों का सहारा इसलिए इस्लाम भी यही सिखाता है:“जो व्यक्ति पीड़ितों की सहायता करता है, वही सबसे श्रेष्ठ इंसान है।”सूफी संतों से प्रमाण-- सूफ़ी मत (इस्लामी आध्यात्मिक परंपरा) में भी इंसानियत, करुणा, और दूसरों के दुःख को दूर करना सबसे बड़ा गुण माना गया है। नीचे प्रमुख सूफ़ी संतों के अरबी/फ़ारसी मूल कथन (लिपि सहित) प्रस्तुत हैं: 1. हज़रत अली“النَّاسُ صِنْفَانِ: إِمَّا أَخٌ لَكَ فِي الدِّينِ، أَوْ نَظِيرٌ لَكَ فِي الْخَلْقِ.”भावार्थ:लोग दो प्रकार के हैं —या तो वे तुम्हारे धर्म में भाई हैं,या मानवता में तुम्हारे समान हैं। इसलिए हर व्यक्ति के साथ दया और सहायता का व्यवहार करना चाहिए। 2. जलालुद्दीन रूमी (फ़ारसी)“درختی باش که سایه‌اش بر سر دیگران افتد،نه خاری که در پای دیگران رود.”भावार्थ:ऐसा वृक्ष बनो जिसकी छाया दूसरों पर पड़े, न कि ऐसा कांटा जो दूसरों को चुभे। अर्थात दूसरों को राहत देना और सहायता करना ही श्रेष्ठ है।3. सादी शिराज़ी“بنی‌آدم اعضای یکدیگرندکه در آفرینش ز یک گوهرند”भावार्थ:सारे मनुष्य एक-दूसरे के अंग हैं,क्योंकि वे एक ही तत्व से बने हैं। जब एक को पीड़ा होती है, तो दूसरों को भी उसकी सहायता करनी चाहिए। 4. निज़ामुद्दीन औलिया“دل بدست آور که حج اکبر است.”भावार्थ:किसी का दिल जीतना (उसे खुश करना) सबसे बड़ा पुण्य है। दुखी व्यक्ति का दिल खुश करना — यानी उसकी सहायता करना — सर्वोच्च धर्म है। 5. ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती“بهترین عبادت، خدمت خلق است.”भावार्थ:सबसे बड़ी इबादत (पूजा) है — लोगों की सेवा करना। अर्थात पीड़ितों की सहायता ही सच्ची इबादत है। निष्कर्षसूफ़ी मत का स्पष्ट संदेश है—इंसानियत (Humanity) = सर्वोच्च धर्मख़िदमत-ए-ख़ल्क़ (लोगों की सेवा) = ईश्वर की सेवाकरुणा और प्रेम = आध्यात्मिक मार्ग इसलिए सूफ़ी संत भी यही सिखाते हैं:“जो व्यक्ति दूसरों के दुःख को दूर करता है, वही सच्चा ईश्वर-भक्त है।”सिक्ख धर्म में प्रमाण --सिख धर्म में भी सेवा (Sevā), दया, और परोपकार को अत्यंत उच्च स्थान दिया गया है। इसके प्रमाण गुरु ग्रंथ साहिब में स्पष्ट रूप से मिलते हैं। नीचे गुरुमुखी लिपि सहित शबद प्रस्तुत हैं: 1. गुरु ग्रंथ साहिब (अंग 286)“ਸੇਵਾ ਕਰਤ ਹੋਇ ਨਿਹਕਾਮੀ ॥ਤਿਸ ਕਉ ਹੋਤ ਪਰਾਪਤਿ ਸੁਆਮੀ ॥”भावार्थ:जो व्यक्ति निःस्वार्थ सेवा (सहायता) करता है,उसे परमात्मा की प्राप्ति होती है। यहाँ “सेवा” का अर्थ है — पीड़ितों और जरूरतमंदों की सहायता करना। 2. गुरु ग्रंथ साहिब (अंग 1299)“ਵਿਚਿ ਦੁਨੀਆ ਸੇਵ ਕਮਾਈਐ ॥ਤਾ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ ॥”भावार्थ:इस संसार में सेवा (भलाई) करते रहो,तभी ईश्वर के दरबार में स्थान मिलता है। अर्थात दूसरों की सहायता ही सच्चा धर्म है। 3. गुरु ग्रंथ साहिब (अंग 474)“ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ ਸੋ ਮੈ ਵਿਸਰਿ ਨ ਜਾਈ ॥”भावार्थ:सभी जीवों का दाता एक ही परमात्मा है। इसलिए सभी के प्रति दया और सहायता का भाव रखना चाहिए। 4. गुरु ग्रंथ साहिब (अंग 305)“ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ॥ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥”भावार्थ:मेहनत से कमाओ और उसमें से कुछ दूसरों को दान (सहायता) करो —ऐसे लोग ही सही मार्ग को पहचानते हैं। यह सीधे-सीधे जरूरतमंदों की सहायता का उपदेश है। 5. गुरु नानक देव का उपदेश“ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ”भावार्थ:सभी का भला (कल्याण) हो। यही सिख धर्म का मूल सिद्धांत है —सभी के हित के लिए कार्य करना, विशेषकर पीड़ितों की सहायता करना। निष्कर्षसिख धर्म का स्पष्ट संदेश है—सेवा (Sevā) = निःस्वार्थ सहायतावंड छको (वंडना) = बाँटकर खाना / दूसरों की मदद करनासरबत दा भला = सबका कल्याण इसलिए सिख धर्म भी यही सिखाता है:“जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से पीड़ितों की सहायता करता है, वही सच्चा धर्माचारी है।”ईसाई धर्म में प्रमाण --ईसाई धर्म में भी दया (compassion), प्रेम (love), और जरूरतमंदों की सहायता (charity) को बहुत उच्च स्थान दिया गया है। इसके प्रमाण Bible में स्पष्ट रूप से मिलते हैं। नीचे English (मूल) लिपि में श्लोक (verses) सहित प्रमाण दिए जा रहे हैं: 1. Bible – Matthew 25:40“Truly I tell you, whatever you did for one of the least of these brothers and sisters of mine, you did for me.”भावार्थ:जो तुमने सबसे छोटे (पीड़ित/जरूरतमंद) लोगों के लिए किया,वह तुमने मेरे (ईश्वर) लिए किया। अर्थात दुखियों की सहायता करना ही ईश्वर की सेवा है। 2. Bible – Galatians 6:2“Carry each other’s burdens, and in this way you will fulfill the law of Christ.”भावार्थ:एक-दूसरे के बोझ (कष्ट) उठाओ,यही मसीह के धर्म का पालन है। यह सीधे-सीधे पीड़ितों की सहायता का आदेश है। 3. Bible – Luke 6:31“Do to others as you would have them do to you.”भावार्थ:जैसा तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें,वैसा ही तुम भी उनके साथ करो। यदि हम दुःख में सहायता चाहते हैं, तो हमें भी दूसरों की सहायता करनी चाहिए। 4. Bible – Proverbs 19:17“Whoever is kind to the poor lends to the Lord, and he will reward them for what they have done.”भावार्थ:जो गरीबों (पीड़ितों) पर दया करता है,वह ईश्वर को उधार देता है, और ईश्वर उसे फल देता है। जरूरतमंद की सहायता = पुण्य कार्य। 5. Bible – 1 John 3:17“If anyone has material possessions and sees a brother or sister in need but has no pity on them, how can the love of God be in that person?”भावार्थ:यदि कोई व्यक्ति जरूरतमंद को देखकर भी दया नहीं करता,तो उसमें ईश्वर का प्रेम नहीं है। यह बताता है कि सहायता करना ही सच्चा धर्म है। निष्कर्षईसाई धर्म का स्पष्ट संदेश है—Love (प्रेम) = दूसरों की सहायताCompassion (दया) = दुखियों के प्रति संवेदना।Charity (दान/सेवा) = धर्म का पालन इसलिए ईसाई धर्म भी यही सिखाता है:“जो व्यक्ति पीड़ितों की सहायता करता है, वही सच्चे अर्थ में ईश्वर का भक्त है।”जैन धर्म में प्रमाण --जैन धर्म में भी अहिंसा, करुणा (दयालुता) और परोपकार को सर्वोच्च धर्म माना गया है। इसके प्रमाण प्राकृत (देवनागरी लिपि) में नीचे दिए जा रहे हैं: 1. उत्तराध्ययन सूत्र 6.10“सव्वे पाणा न हन्तव्वा, सव्वेसिं जीवियं पियं।”भावार्थ:सभी प्राणियों को नहीं मारना चाहिए,क्योंकि सभी को अपना जीवन प्रिय है। यह दूसरों के दुःख को समझकर उन्हें कष्ट से बचाने और सहायता करने की शिक्षा देता है। 2. आचारांग सूत्र 1.4.1“जे केई पाणा, ते सव्वे परस्परं जीवियं इच्छंति।”भावार्थ:सभी जीव जीना चाहते हैं। इसलिए किसी को कष्ट न देना और उनकी रक्षा/सहायता करना ही धर्म है। 3. दशवैकालिक सूत्र 6.11“परोवयारो पुण्णं, पावं परपीडणं।”भावार्थ:दूसरों का उपकार (सहायता) करना पुण्य है,और दूसरों को पीड़ा देना पाप है। यह आपके विषय का सीधा प्रमाण है। 4. तत्त्वार्थसूत्र 7.11“परस्परोपग्रहो जीवानाम्।”भावार्थ:सभी जीव एक-दूसरे के उपकार (सहायता) के लिए हैं। यह जैन धर्म का मूल सिद्धांत है — परस्पर सहायता ही जीवन का आधार है। 5. महावीर स्वामी का उपदेश“अहिंसा परमो धम्मो।”भावार्थ:अहिंसा ही परम धर्म है। अहिंसा का वास्तविक अर्थ है दूसरों को कष्ट न देना और जहाँ संभव हो, उनकी सहायता करना। निष्कर्षजैन धर्म का स्पष्ट संदेश है—अहिंसा = किसी को कष्ट न देना + उसकी रक्षा करनापरोपकार = पुण्यपरस्परोपग्रहो = एक-दूसरे की सहायता करना ही जीवन का नियम है इसलिए जैन धर्म भी यही सिखाता है:“पीड़ितों की सहायता करना ही सर्वोच्च धर्म है।”बौद्ध धर्म में प्रमाण --बौद्ध धर्म में भी करुणा (Karunā), मैत्री (Mettā) और परोपकार को अत्यंत उच्च स्थान दिया गया है। इसके प्रमाण पाली मूल लिपि (Romanized Pāli) में नीचे दिए जा रहे हैं: 1. धम्मपद (Dhammapada 270)“Sabbe tasanti daṇḍassa, sabbe bhāyanti maccuno;Attānaṃ upamaṃ katvā, na haneyya na ghātaye.”भावार्थ:सभी प्राणी दण्ड से डरते हैं, सभी मृत्यु से भयभीत हैं।अपने को उनके समान समझकर न किसी को कष्ट देना चाहिए, न कष्ट पहुँचाना चाहिए। यह दूसरों के दुःख को समझकर सहायता करने की भावना उत्पन्न करता है। 2. सुत्तनिपात (Metta Sutta 1.8)“Mātā yathā niyaṃ puttaṃ āyusā ekaputtamanurakkhe,evampi sabbabhūtesu mānasaṃ bhāvaye aparimāṇaṃ.”भावार्थ:जैसे माता अपने एकमात्र पुत्र की रक्षा करती है,वैसे ही मनुष्य को सभी प्राणियों के प्रति असीम प्रेम और संरक्षण का भाव रखना चाहिए। यही भावना पीड़ितों की सहायता का मूल है। 3. अंगुत्तर निकाय (AN 3.65)“Sabba pāpassa akaraṇaṃ, kusalassa upasampadā;Sacittapariyodapanaṃ — etaṃ buddhāna sāsanaṃ.”भावार्थ:सभी पापों से बचना,कुशल (अच्छे) कर्म करना,और मन को शुद्ध करना — यही बुद्ध का उपदेश है। “कुशल कर्म” में दूसरों की सहायता प्रमुख है। 4. संयुक्त निकाय (SN 1.8 – Karuṇā)“Karuṇāya phuṭṭhacitto sabbapāṇabhūtesu.”भावार्थ:जिसका चित्त करुणा से भरा हुआ है, वह सभी प्राणियों के प्रति दयालु होता है। करुणा का अर्थ ही है — दुखी की सहायता करना। 5. गौतम बुद्ध का उपदेश“Bahujanahitāya bahujanasukhāya lokānukampāya…”भावार्थ:बहुजन के हित और सुख के लिए,संसार पर करुणा करते हुए कार्य करो। यह सीधे-सीधे सभी के कल्याण और सहायता का आदेश है। निष्कर्षबौद्ध धर्म का मूल संदेश है—करुणा (Karuṇā) = दुखी के प्रति संवेदना और सहायतामैत्री (Mettā) = सबके प्रति प्रेम।बहुजनहिताय = सबके कल्याण के लिए कार्य करना।इसलिए बौद्ध धर्म भी यही सिखाता है:“जो व्यक्ति करुणा से प्रेरित होकर पीड़ितों की सहायता करता है, वही श्रेष्ठ है।यहूदी धर्म में प्रमाण --यहूदी धर्म (Judaism) में भी परोपकार, दया और पीड़ितों की सहायता को बहुत उच्च स्थान दिया गया है। इसके स्पष्ट प्रमाण तनाख (हिब्रू बाइबिल) में मिलते हैं। नीचे हिब्रू लिपि सहित दो प्रमाण प्रस्तुत हैं: 1. तनाख (हिब्रू बाइबिल) — लैव्यव्यवस्था (Leviticus) 19:18“וְאָהַבְתָּ לְרֵעֲךָ כָּמוֹךָ”भावार्थ:“तुम अपने पड़ोसी (दूसरे व्यक्ति) से अपने समान प्रेम करो।” यह सिखाता है किदूसरों के दुःख को अपना समझकर उनकी सहायता करना ही सच्चा धर्म है। 2. तनाख (हिब्रू बाइबिल) — व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) 15:7–8“כִּי יִהְיֶה בְךָ אֶבְיוֹן…לֹא תְאַמֵּץ אֶת־לְבָבְךָ…כִּי פָתֹחַ תִּפְתַּח אֶת־יָדְךָ לוֹ”भावार्थ:यदि तुम्हारे बीच कोई गरीब या पीड़ित व्यक्ति हो,तो अपना हृदय कठोर मत करो,बल्कि अपना हाथ खोलकर उसकी सहायता करो। यह सीधे-सीधे जरूरतमंदों की सहायता करने का आदेश है। निष्कर्षयहूदी धर्म का स्पष्ट संदेश है—दूसरों से अपने समान प्रेम करोगरीब और पीड़ित की सहायता करो।हृदय को कठोर न बनाओ, दया करो इसलिए यहाँ भी वही सिद्धांत मिलता है:“पीड़ितों की सहायता करने वाले हाथ ही सर्वोत्तम होते हैं।”पारसी धर्म में प्रमाण --पारसी (ज़रोअस्त्रियन) धर्म में भी दया, परोपकार और दूसरों के कष्ट को दूर करना एक महत्वपूर्ण नैतिक सिद्धांत है। इसके प्रमाण मुख्य ग्रंथ अवेस्ता (Avesta) में मिलते हैं। नीचे एवेस्ता (Avestan) लिपि/भाषा सहित प्रमाण प्रस्तुत हैं: 1. यश्न 30.2𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬵𐬀𐬙𐬁 𐬯𐬭𐬀𐬊𐬙𐬀 𐬯𐬭𐬀𐬊𐬙𐬀 𐬀𐬱𐬀𐬙𐬁भावार्थ:सत्य और धर्म को सुनो और समझो, तथा सही मार्ग को अपनाओ। “अशा” (धर्म/सत्य) का पालन करने में दूसरों का कल्याण और सहायता भी सम्मिलित है। 2. यश्न 34.1𐬀𐬱𐬀𐬊𐬥𐬀𐬨 𐬚𐬀𐬙 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀𐬵𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀भावार्थ:हे अहुरा मज़्दा! धर्मात्मा (सत्य मार्ग पर चलने वाले) वही हैं जो अच्छे कर्म करते हैं। “अच्छे कर्म” में ज़रूरतमंदों की सहायता प्रमुख मानी गई है। 3. वेंदिदाद 3.4𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬌𐬎 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀𐬵𐬌भावार्थ:पवित्र आत्मा (Spenta Mainyu) का मार्ग भलाई और रक्षण (सुरक्षा) का मार्ग है। यह संकेत करता है कि दूसरों की रक्षा और सहायता करना धर्म है। 4. यश्न 43.1𐬀𐬙 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌भावार्थ:हे अहुरा मज़्दा! हमें सुख और कल्याण प्रदान करें। पारसी धर्म में “कल्याण” केवल अपना नहीं, बल्कि सभी का हित (सार्वजनिक भलाई) माना गया है। 5. अवेस्ता – मूल सिद्धांतHumata, Hukhta, Hvarshta(अवेस्तन: 𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬺𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀)भावार्थ:अच्छे विचार, अच्छे वचन, अच्छे कर्म। “अच्छे कर्म” का मुख्य रूप है — दूसरों की सहायता और पीड़ितों का कल्याण। निष्कर्षपारसी धर्म का स्पष्ट संदेश है—अशा (सत्य/धर्म) = भलाई और न्यायHumata–Hukhta–Hvarshta = अच्छे कर्म (परोपकार)दूसरों की रक्षा और सहायता करना = धार्मिक कर्तव्य इसलिए पारसी धर्म भी यही सिखाता है:“जो व्यक्ति अच्छे कर्मों द्वारा पीड़ितों की सहायता करता है, वही सच्चा धर्माचारी है।”ताओ धर्म में प्रमाण --ताओ (Daoism) धर्म में भी दया (慈), करुणा, और दूसरों के कष्ट को कम करना एक मूल सिद्धांत है। इसके प्रमुख ग्रंथ 道德经 (Dao De Jing) में इस भावना के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।नीचे चीनी लिपि सहित प्रमाण प्रस्तुत हैं: 1. 道德经 第67章我有三宝,持而保之:一曰慈,二曰俭,三曰不敢为天下先。भावार्थ:मेरे तीन अमूल्य गुण हैं —पहला है 慈 (दया/करुणा),दूसरा है सादगी,तीसरा है विनम्रता। यहाँ “慈” (करुणा) ही वह गुण है जो पीड़ितों की सहायता की ओर प्रेरित करता है। 2. 道德经 第49章圣人无常心,以百姓心为心。善者吾善之,不善者吾亦善之。भावार्थ:संत (ज्ञानी) का अपना अलग स्वार्थी मन नहीं होता,वह लोगों के मन को ही अपना मन मानता है।वह अच्छे के साथ भी अच्छा करता है और बुरे के साथ भी अच्छा करता है। इसका अर्थ है — हर व्यक्ति के साथ करुणा और सहायता का व्यवहार करना, चाहे वह किसी भी स्थिति में हो। 3. 道德经 第8章上善若水。水善利万物而不争。भावार्थ:सर्वोत्तम गुण जल के समान है,जो सभी प्राणियों का हित करता है और कभी संघर्ष नहीं करता। जल की तरह बनना — अर्थात सबका भला करना, पीड़ितों को सहारा देना। 4. 庄子 (Zhuangzi)至人无己,神人无功,圣人无名。भावार्थ:उच्च व्यक्ति (संत) अहंकार रहित होता है। ऐसा व्यक्ति स्वार्थ से मुक्त होकर दूसरों के हित और सहायता में लगा रहता है। निष्कर्षताओ धर्म का मूल संदेश है—慈 (करुणा) = सर्वोच्च गुणसभी प्राणियों का हित (利万物)निःस्वार्थ सहायता और विनम्रता इसलिए ताओ धर्म भी यही सिखाता है:“जो व्यक्ति करुणा से प्रेरित होकर दूसरों के दुःख को दूर करता है, वही श्रेष्ठ है।”कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --कन्फ्यूशियस धर्म (Confucianism) में भी दया (仁 – Ren), परोपकार और दूसरों के दुःख को समझकर सहायता करना मुख्य नैतिक सिद्धांत है। इसके प्रमाण चीनी लिपि सहित नीचे दिए जा रहे हैं: 1. 论语 (Analects 6.30)夫仁者,己欲立而立人,己欲达而达人。भावार्थ:जो सच्चा “Ren” (दयालु/मानवता वाला) है —वह स्वयं आगे बढ़ना चाहता है तो दूसरों को भी आगे बढ़ाता है,स्वयं सफल होना चाहता है तो दूसरों की भी सहायता करता है।यह सीधे-सीधे बताता है कि श्रेष्ठ मनुष्य वही है जो दूसरों की सहायता करे। 2. 论语 (Analects 12.2)己所不欲,勿施于人。भावार्थ:जो तुम्हें अपने लिए अच्छा नहीं लगता,वह दूसरों के साथ मत करो। इसका सकारात्मक रूप —दूसरों के दुःख को समझकर उन्हें कष्ट से बचाना और सहायता करना। 3. 论语 (Analects 12.22)樊迟问仁。子曰:爱人。भावार्थ:जब “Ren” (मानवता) के बारे में पूछा गया, तो कन्फ्यूशियस ने कहा—“लोगों से प्रेम करो।” प्रेम का वास्तविक रूप ही है — दुखी की सहायता करना। 4. 孟子 (Mencius 2A:6)恻隐之心,人皆有之。भावार्थ:करुणा (दूसरों के दुःख पर द्रवित होने का भाव) हर मनुष्य में स्वाभाविक रूप से होता है। यही करुणा आगे चलकर सहायता (परोपकार) का रूप लेती है। 5. 礼记 (Liji – 礼运篇)大道之行也,天下为公。भावार्थ:जब महान मार्ग (धर्म) चलता है, तो सारा संसार सबका हो जाता है (सामूहिक कल्याण होता है)। इसका अर्थ है — समाज में हर व्यक्ति एक-दूसरे की सहायता करता है। निष्कर्षकन्फ्यूशियस धर्म का स्पष्ट संदेश है—仁 (Ren) = दया + मानवता + सहायता爱人 (Ai Ren) = लोगों से प्रेम करो → उनकी मदद करो恻隐之心 = करुणा → पीड़ित की सहायता का मूलइसलिए कन्फ्यूशियस परंपरा भी यही कहती है:“जो दूसरों के दुःख को समझकर उनकी सहायता करता है, वही श्रेष्ठ मनुष्य है।”शिन्तो धर्म में प्रमाण --शिन्तो (Shinto) धर्म में वैदिक ग्रंथों की तरह “श्लोक–संख्या” वाली व्यवस्था नहीं होती, क्योंकि यह मुख्यतः प्रार्थनाओं (祝詞 — Norito) और आचारों पर आधारित परंपरा है। फिर भी, इसमें दया, शुद्धता और दूसरों के कल्याण का स्पष्ट भाव मिलता है — जो आपके विषय “पीड़ित की सहायता” से जुड़ा है।नीचे शिन्तो धर्म से जापानी लिपि सहित प्रमाण प्रस्तुत हैं: 1. शिन्तो – 大祓詞 (Ōharae no Kotoba)高天原に神留坐す皇親神漏岐・神漏美の命以ちて…諸々の罪穢を祓へ給ひ清め給ふと申す事を聞こし食せと恐み恐みも白すभावार्थ:हे देवताओं! आप सबके पाप और कष्टों को दूर करें, उन्हें शुद्ध और शांत करें। यहाँ “कष्टों का निवारण” और “शुद्धि” — अर्थात पीड़ितों को दुःख से मुक्त करना — मुख्य भावना है। 2. शिन्तो – 神道の基本精神 (Shinto no seishin)清く明るく正しく直き心(きよく あかるく ただしく なおき こころ)भावार्थ:मनुष्य का हृदय शुद्ध, उज्ज्वल, सही और सीधा (सदाचारी) होना चाहिए। ऐसा हृदय स्वाभाविक रूप से दूसरों की सहायता और करुणा की ओर ले जाता है। 3. शिन्तो – 和の精神 (Wa no Seishin)和を以て貴しとなす(わ を もって とうとし と なす)(यह जापानी परंपरा में अत्यंत प्रसिद्ध सिद्धांत है)भावार्थ:सामंजस्य (Harmony) को सबसे श्रेष्ठ मानो। जब समाज में “Wa” (सामंजस्य) होता है, तो लोग एक-दूसरे की सहायता करते हैं और पीड़ितों को सहारा देते हैं। 4. शिन्तो – 神の恵み (Kami no Megumi)神の恵みは万物に及ぶ(かみ の めぐみ は ばんぶつ に およぶ)भावार्थ:ईश्वर (कामी) की कृपा सभी प्राणियों पर समान रूप से होती है। इसलिए मनुष्य को भी सबके प्रति दया और सहायता का भाव रखना चाहिए। निष्कर्षशिन्तो धर्म का मूल संदेश है—शुद्ध हृदय (清き心)सामंजस्य (和)सबके कल्याण की भावना यद्यपि इसमें “वेदों जैसे श्लोक” नहीं हैं, फिर भी इसका सार यही है:जो मनुष्य शुद्ध और करुणामय है, वही दूसरों के दुःख को दूर करने वाला (सहायक) बनता है।--------+-------+------+---