in good faith in Hindi Short Stories by Deepak sharma books and stories PDF | इन गुड फ़ेथ

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इन गुड फ़ेथ

                   सन उन्नीस सौ उनसठ के उस दिन किशोर अपने पैतृक गांव से लौटा था।जहां वह दसवीं की अपनी परीक्षा के बाद हुई लंबी छुट्टियों में कुछ दिन के लिए गया रहा था।

                   “वहां मुझे वह मिली थीं,” घर में घुसते ही उस ने मां को जा घेरा।

                    अपने दफ़्तर के लिए तैयार हो रहे प्रमिला के हाथ रुक लिए।

                    बिना पूछे ‘ कौन?’वह जान ली बेटा कांता की बात कर रहा था ।

                   “तुम से कुछ कहा उन्हों ने?”

                   “कहा, अपनी मां से कहना वह मेरी गुनाहगार है। मेरे साथ उस ने भली नहीं की।मेरे हक छीने बैठी है…..”

                   वह डर जो सन छप्पन में जगदीश के नाम आए सम्मन को देख कर प्रमिला के दिल को धड़का गया था,अब किसी भूकंप की भांति उसे कंपा- कंपा गया।

                  “उन्हों ने यह भी कहा,” किशोर आगे बोला, “कानूनी तौर पर पापा की पत्नी वह हैं, आप नहीं। वह चाहें तो नए कानून के हवाले से अब भी वह पापा के संग रहने का अपना हक मांग सकती हैं। उन्हें अपने बाबा  के सुपुर्द कर के पापा उन की ज़िम्मेदारी से बरी नहीं हो सकते ।”

                   “यह तुम अपने पापा  को बताना। मुझे दफ़्तर के लिए अभी निकलना होगा,” प्रमिला को मालूम था मामला गुत्थी पर गुत्थी लिए था। जिसे सुलझाना उस के वश के बाहर था।

                   उसी दोपहर जब जगदीश अपने कालेज से घर लौटा ,किशोर उस के पास पहुंच लिया, “वहां मुझे वह भी मिली थीं….”

                   “कौन?”सहज भाव से जगदीश ने पूछा।

                   “कांता चाची.….”

                   “वहां रहेगी तो तुम्हें मिलेगी ही। इस में क्या बड़ी बात है?”

                   “बड़ी बात है,” किशोर उद्दंड हो लिया, “बहुत बड़ी बात है। उन्हों ने कहा,उन के रहते आप का मां से शादी करना गलत था।गैर- कानूनी था।”

                   “प्रमिला से मैं ने गुड फ़ेथ में शादी की थी…..”

                   “गुड फ़ेथ?”

                   “हां। गुड फ़ेथ। उन दिनों मैं सार्त्र से बहुत प्रभावित था और उस की व्याख्या के अनुसार हमारे लिए अपने प्रति ईमानदार होना सब से ज़्यादा ज़रूूरी है।मैं ने प्रमिला के प्रति अपनी निष्ठा को सामाजिक रूप से स्वीकृति देने के लिए उस से शादी की थी…..”

                   “लेकिन कांता चाची के रहते ……”

                   “उस के रहते?”  जगदीश ताव खा गया, “जिसे मैं बीसियों साल से मिला तक नहीं था। मैं नौ साल का था और वह ग्यारह की जब बाबा ने हमें ब्याह दिया था।वह शादी बाबा ने अपने पिछड़ेपन के अधीन मुझ पर थोपी थी।मेरा उस शादी से कोई लेना- देना नहीं रहा था…..”

                  “लेेना- देना कैैसे नहीं था?” किशोर मुकाबले पर उतर आया, “बाबा के फ़ैसले को सम्मान देना आप का कर्तव्य नहीं बनता था क्या?”

                  “मेरा पहला कर्तव्य अपने हित के प्रति बनता था। बाबा का फ़ैसला मेरे हित में नहीं था। अहित में था। उसे मानने पर मेरा भविष्य चमक न पाता । मुुझे एक रसहीन ज़िंदगी की ओर धकेल देता।।वह मेरे मेल की नहीं थी।एक दम देहाती। अनगढ़ और गंवार। काला अक्षर भैंस बराबर। इधर मेेरे संपर्क में प्रमिला थी। पढ़ी- लिखी और नौकरीशुदा…..”

                  “आप के बालपन के विवाह का मां को पता नहीं रहा क्या?”

                  “पता था। बिल्कुल पता था। मगर वह जानती थी मैं ने उस औरत को कभी नहीं स्वीकारा था। ऐसे में मेरे संग ब्याह करने पर प्रमिला को क्या आपत्ति रहती?सन तिरपन के उन दिनों कई लोग अपने बेमेल विवाह को पिछेल कर दूसरी शादी कर रहे थे। हिंदू मैरिज एक्ट अभी आया नहीं था…..”

                  “अगर वह न भी आया होता, तब भी मानवीयता के चलते मां को आप से शादी नहीं करनी चाहिए थी।जब तक आप कांता चाची से तलाक नहीं लेते…..”

                 “उन दिनों तलाक का चलन नहीं था।और फिर प्रमिला को शादी के लिए मैं ने मनाया था। मैं जानता था वह मेरे लिए बेहतर रहेगी…..”

                 “तो आप अब तलाक ले लीजिए। मां से आप की शादी कानूनी बन जाएगी…..”

                “नहीं बनेगी।  नहीं बन सकती। इस समय अगर कांता से तलाक मांगता हूं तो प्रमिला से मेरी शादी कानूनी रूप से अमान्य हो जाएगी।’नल ऐंड वौअड’।ऐसे में उस की वैधता पर प्रश्नचिन्ह लग गया तो उस की सरकारी नौकरी जाती रहेगी…..”

                 “तो क्या तब मैं भी आप का वैध बेटा नहीं माना जाऊंगा?” किशोर रोंआसा हो चला।

                 “ऐसा कभी नहीं होगा,” जगदीश ने किशोर को अपने अंक में भर लिया, “बाबा हम दोनों से बहुत प्यार करते हैं। उन्हें हमारे अच्छे- बुरे का बहुत ध्यान रहता है। वह हमारी मुश्किल समझते हैं। जभी तो कांता के मायके वालों ने जब हिंदु मैरिज एक्ट के सन छप्पन में लागू होने पर मुझ पर केस बनाया था तो बाबा ने उन लोग को रुपए वगैरह दे दिला कर केस बंद करवा दिया था और कांता को उधर अपने पास गांव लिवा ले गए थे…..”

                 “कांता चाची अगर  फिर से आप को कचहरी ले गईं तो?” 

                 “बाबा उन्हें फिर संभाल लेंगे। तुम चिंता न करो।  तुम अपनी पढ़ाई के बारे में सोचो। अगले दो साल में जितनी मेहनत करोगे, आई.आई.टी.में तुुम्हारे दाखिला पाने की संभावना मज़बूत होगी…..”

 

 

                  प्रमिला उस दिन दफ़्तर से लौटी तो अवसर मिलते ही जगदीश के साथ संध्या- भ्रमण के लिए निकल ली।

                 ऐसा अक्सर होता। जब भी प्रमिला के सामने कोई समस्या खड़ी होती वह जगदीश के साथ अकेले ही में बात करना पसंद करती। किशोर के सामने नहीं।

                 “किशोर बहुत परेशान हो कर लौटा है,” प्रमिला ने बात शुरू की, “कांता ने उसे कानूनी- गैर- कानूनी और सही और गलत की ऐसी पट्टी पढ़ाई है कि उस के चक्कर में वह हम दोनों को कांता की नज़र से आंकने लगा है।हमें अपराधी मान बैठा है।”

                  “कांता को उस के साथ ऐसी बात नहीं बोलनी चाहिए थी…..”

                  “मुझे एक चिंता और भी है। कांता ने उसे यह भी कहा वह कभी भी एक पत्नी के अधिकार कानूनन मांग सकती है। कभी भी…..”

                  “बाबा उसे ऐसा कभी नहीं करने देंगे…..”

                  “ईश्वर न करे बाबा को कुछ हो मगर जीवन का क्या भरोसा? आज हैं। कल नहीं। और बाबा के न रहने पर बड़े भाई साहब  ही कांता को कचहरी दोबारा जाने के लिए तैयार कर दें तो?”

                 “वह ऐसा कभी नहीं करेंगे। हमारा रिश्ता राम और लक्ष्मण सरीखा है…..”

                 “फिर भी मेरी मानें तो अपना यह मकान और गांव वाली अपनी ज़मीन किशोर के नाम अभी करवां दें…..”

                 “तुम कहो तो वह सब तुम्हारे नाम कर दूं?” जगदीश ने प्रमिला की पीठ घेर ली।

                 “वह न मैं कभी चाहूंगी, न कभी कहूंगी। मेेरे पास अपना काफ़ी है। बैंक में मेेरे पिता के दिए एफ़.डी. हैं। मेरा अपना प्रोविडेंट फंड है…..”

                 “जानता हूं तुम्हारे पास धन की कमी नहीं….”

                “इतना कुछ ज़्यादा भी नहीं।फिर भी मैं सोचती हूं मुुझ अकेली के नाम जो भी मेरे पूंजीनिवेश मेरे बैंक में और मेरे दफ़्तर के कागज़ों में दर्ज हैं उन सब में अपने नॉमिनी के तौर पर मैं किशोर का नाम लिखवा दूं…..”

                “मेरे नाम को काट कर?” जगदीश आहत हुआ। 

                “हां। आप के नाम की सम्पत्ति में कांता कब किसी भी अदालती दस्तावेज़ द्वारा अपना साझा बांध ले,कोई भरोसा नहीं। इसीलिए तो मैं ने आप से कहा था आप किशोर के नाम…..”

                 “वह मेरा मामला है। मैं उसे सुलझा लूंगा,” जगदीश खीझ गया और उस ने अपने हाथ प्रमिला की पीठ से अलग कर लिए।

 

 

                  पति- पत्नी घर लौटे तो अन्य दिनों की भांति  उन के गेट खोलने पर किशोर बाहर न आया।

                  अपने माता-पिता को ले कर किशोर में पहले जैसी उमंग न रही थी।

                  प्रमिला भी पहले जैसी प्रमिला न रहने वाली थी।

                  उस का प्रमाण आगामी दिनों ने पुष्ट कर दिया। 

                   घर से बाहर जाते समय किशोर अब बताता नहीं कब लौटेगा। जब शाम गहराने लगती तो जगदीश को अपने साइकल पर उसे कभी उस के एक दोस्त के घर तो कभी किसी दूसरे दोस्त के घर खोजने निकलना पड़ता। कई बार जब वहां नहीं मिलता तो किसी तीसरे दोस्त के साथ कभी वह किसी सिनेमाहाल में मिलता तो कभी किसी लान के बैंच पर पसरा हुआ। 

                  पिता की फटकार पर, मां के रोष पर तनिक कान न धरता। 

                  कांता चाची के प्रति पिता की संवेदनहीनता यदि अक्षम्य थी तो मां की मूढ़ता दयनीय। 

                  उधर प्रमिला की चेतना में कांता आन बसी थी।परंपरा के उस अटल वज़न से जगदीश बेशक भाग निकला था किंतु भयावय एक अमूर्त शक्ति के रूप में अदृश्य कांंता की उपस्थिति घर के भीतर, घर के बाहर प्रमिला को डराए रखती।कानूनी अपने शस्त्र से कचहरी के किसी वकील की फ़ाइल द्वारा प्रमिला को निशस्त्र करती हुई। प्रमिला का घर- संसार और उस की नौकरी उस से छीनती हुई।

                 डर की अनसुलझी वह अराजकता अब दफ़्तर के उस के काम में बाधा डालती। ज़रूरी सरकारी परिपत्रों व नीतिगत अपडेटस के विवरणों को अनदेखा हो लेने देती।पदोन्नति के संभावित उस के अवसरों को हाथ से निकल लेने देती। ‘हेड डेस्क’ द्वारा जवाबदेही मांगने पर सफ़ाई देने के समय उस की बोलती छीन लेती।

                 घर में भी प्रमिला जो काम लेती, ढीले- ढाले ढंग से निपटाती। बेेमन।कपड़ों में साबुन रह जाता। इस्त्री में करीज़ छूट जाती।दही जमाना भूल जाती।  जिस पति को वह अब तक एक आदर्श प्रेमी के रूप में देखती रही थी, वह अब एक व्यावहारिक व्यक्ति प्रतीत होने लगा था। जिस ने उस के मूल अस्तित्व से अधिक उस की सजीव उपयोगिता का मोल लगाया था।

                उसे लगता उस का अपना मानुष- जन्म व्यर्थ रीत रहा था।

                 उस की बेध्यानी पर जगदीश यदि उसे ध्यान दिलाता तो वह उसी को किसी दूसरी बात पर  सवाल-जवाब में उलझा देती।

                  फिर वह चुप कर जाता और छूटा हुआ अपना उपन्यास हाथ में ले लेता। दार्शनिक भाव से। बिना किसी अपराध- बोध के। उसे विश्वास था जटिल से जटिल स्थिति भी देेर-सवेर अपना हल खोज लिया करती।

                  हल निकला भी तो प्रमिला के प्राण के मोल। 

                   दिन- ब- दिन बढ़ रहे भयातुर उस के इस आत्म- तोड़फोड़ ने शीघ्र ही उस के रक्तचाप पर धावा बोल दिया। अपनी उच्चतम सीमा को पार करते हुए।

                   जिस की जानकारी उस के सहयोगियों को स्थानीय अस्पताल के उस एमरजेंसी डाक्टर से मिली जहां वे उसे लिवा ले गए थे जब वह काम करते- करते वहां अकस्मात अचेत हो गई थी। उच्च रक्तचाप के लक्षण व संकट का उन दिनों साधारणजन की भांति प्रमिला को भी संज्ञान न रहा था। 

                 सैंकड़ों बार उस का सिर फटने -फटने को होता रहा था। सांस उखड़- उखड़ जाती रही थी। दिल की धड़कन उग्र से उग्रतर होती रही थी।  किंतु प्रमिला अपने दफ़्तर व घर के काम जैसे-तैसे निपटाती रही थी। उन सभी संकेतों को नज़रअंदाज़ करती हुई। उन्हें अपने मानसिक द्विभाजन से जोड़ती हुई।

                 खबर मिलने पर जब जगदीश व किशोर अस्पताल पहुंचे तो प्रमिला उन्हें अर्द्ध-चेतनावस्था में मिली।

                  किशोर उस की पहचान में पहले आया। हाथ उठा कर प्रमिला ने उसे अपने पास बुलाना चाहा मगर अपना हाथ उस से उठाए न बना।

                  “ममी,आप को क्या हुआ?” किशोर रोने लगा।

                  “हौसला रखना,”प्रमिला  फुसफुसाई।

                  “इन्हें ठीक होने में कितना समय लगेगा?” जगदीश ने अपनी उपस्थिति दर्ज की।

                 “ समय लगेगा अभी,” नर्स ने जगदीश को अर्थपूर्ण ढंग से देखा।

                   “प्रमिला,” जगदीश घबरा गया, “इधर देखो।”

                    उसे देख कर प्रमिला बड़बड़ाई, “ नाॅमिनी मेरा किशोर। आप भी उस के नाम…..”

                   मृत्यु ने उस का वाक्य पूरा न होने दिया।