वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानी
कमरे में मोटे पर्दे पड़े थे। बाहर शाम कब उतर आई, इंद्राणी को पता ही नहीं चला। वह किताब खोले हुए थी, पर पढ़ कम रही थी- ज़्यादा अपने को भीतर से पढ़ रही है या फिर अपने भीतर कहीं जमा बीते हुए वर्षों को उलट-पलट कर देख रही है। किताब उसके वर्तमान में थी, पर उसका मन अतीत के गलियारों में भटक रहा था। वह डाइनिंग टेबल पर बैठी थी। जब खाने पीने का काम नहीं होता था उसका सामान फैला रहता और खाने का समय हो जाता तब वह अपनी किताबें कागज़ों और लैपटॉप को वही दीवार से टिकाकर रख देती और अपनी थाली वहीं जमा लेती। यह एक रूटीन हो गया था कि वह अपना सामान समेटे और खाना खाए। कई बार चंद्र प्रकाश ने टोका भी -"राइटिंग टेबल किस लिए रखी है? उस पर क्यों नहीं पढ़ने लिखने का काम करतीं?"
बेटे के जाने के बाद अब घर में वे दो ही तो थे। कोई हड़बड़ी नहीं, कोई शोर नहीं। जितिन को घर छोड़े हुए आठ साल हो चुके थे। उसका क़सूर बस इतना था कि वह अपने साथ काम करने वाली एक मुस्लिम लड़की से प्यार करने लगा था। मां के विरोध के बावजूद उसी से शादी कर ली और एक दिन अचानक उसे घर ले आया।
चौखट पर बहू जब पैर छूने को झुकी तो इंद्राणी एक कदम पीछे हटकर चिल्लाई- "नो एंट्री।"
जितिन कुछ भी नहीं बोला था बस वापस चला गया था।
उसके बाद रिश्तेदारों का आना-जाना लगभग बंद हो गया, इंद्राणी के मन में वह दृश्य हर दिन लौटता है- झुका हुआ बहू का सिर, बेटे की चुप्पी, और कठोर अपनी आंखें।
कभी-कभी फेसबुक पर अपनी दोनों नातिनो की तस्वीर दिख जाती- हंसती, खिलखिलाती। बड़ी-चंदन शायद सात साल की। छोटी- गुंजन चार की रही होगी।
उसने सोचा था-"अब बहुत देर हो चुकी है।"
जितिन शायद कहना चाहता था-"उसने अपनी उम्र में वही दुनिया रची थी, जो हर युवा रचता है।" लेकिन वह कह नहीं पाया- मां ने अपना नंबर ब्लॉक कर दिया था।
कभी-कभी इंद्राणी को यह सोचकर अजीब- सी हंसी आ जाती थी कि उम्र के साथ दीवारें कैसे बदल जाती हैं। जवानी में दीवारें आसमान छूने को उतावली रहती थी और अब दरवाज़े खिड़कियां कब दीवारों में बदलने लगती है। फिर एक दिन आदमी खुद को अपने ही घर में पाता है। अपने ही जीवन में जहां किसी की भी उपस्थित ख़लल लगने लगती है।
दरवाजे की घंटी बजी। चंद्र प्रकाश ने दरवाज़ा खोला। इंद्राणी के कान जैसे वही जा खड़े हुए। अभी वह पहचान पाती, उससे पहले चंद्र प्रकाश आए -"पड़ोसन आई हैं।"
इंद्राणी ने चंद्र प्रकाश को सवालों भरी नज़र से देखा - इस समय? अपने को संभालते हुए और सामाजिकता की फ्रेम में फिट करते हुए वह बाहर आई। सामने रहने वाली परवीन खड़ी थी। आदाब- नमस्ते का औपचारिक आदान-प्रदान हुआ। परवीन बाहर जाने को तैयार लग रही थी।
"आप लोग कहीं जा तो नहीं रहे?"
"नहीं, घर पर ही हैं।"
"तो... क्या मैं अपनी दोनों बच्चियों को तीन-चार घंटे के लिए छोड़ दूं? बहुत ज़रूरी काम से जाना पड़ रहा है।"
इंद्राणी ने कुछ परेशानी वाली नज़र से परवीन को देखा।
"मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है," कहते हुए परवीन भीतर गई और थोड़ी देर में दोनों बच्चियों को लेकर आ गई।
जाते-जाते उन्हें समझाती रही-"देखो दादी को परेशान मत करना, मैं अभी आती हूं।"
छोटी बोली-
"दादी नहीं... नानी।"
"अच्छा चलो...नानी ही सही।"
"बाय"।
"आई लव यू।"
"लव यू टू"
और दौड़ती हुई सीढ़ियां उतर गई। कार स्टार्ट होने की आवाज़ हुई और सन्नाटा पसर गया।
दोनो फ्लैटों के बीच वाले स्पेस में खड़ी थी इंद्राणी और बच्चियां। एक छड़ के लिए इंद्राणी को लगा जैसे उसे तीन घंटे के लिए किसी के घर रहना है। उसे मालूम था बच्चियां प्यार से लोगों का मन मोह लेती है। वह उनके घरों पर, और उनके दिलों पर बड़ी सरलता से कब्जा जमा लेती है इसलिए पराएपन से उसने बच्चियों को देखा। बच्चियां इंतज़ार कर रही थी कि कब अंदर चलेंगे इतने में चंद्र प्रकाश ने हंसकर कहा -"चलो भाई अंदर।"
तीनों एक ही साथ लपक कर भीतर जाने के लिए बढ़े। एक हंसी के साथ चंद्र प्रकाश ने बुदबुदाते हुए कहा -"लो अब संभालो बच्चियों को।"
लेकिन इंद्राणी इस अचानक हुई घटना से अभी उबर नहीं पाई थी । उसे सबसे पहले आपत्ति तो यही थी- सहसा कोई कैसे अपनी बच्चियों इस तरह आपके यहां छोड़कर चला जाए। चाहे घंटा दो घंटे के लिए ही क्यों ना हो। हम तो ऐसे दौर में और शहर में जी रहे हैं जहां बिना पूछे बताएं किसी के घर पर जाने का रिवाज अब गंवारपन और ख़लल माना जाता है। क्या इतना भर जान लेना काफी था कि वे घर पर हैं? अच्छा मान लो उन्हें ही कोई अचानक काम आ जाए तब? तब बच्चियों एक समस्या न बन जाएगी। फिर हम क्या करेंगे। और आपने तीन घंटा कहा है- तीन के पांच हो गए तो क्या हम हम बच्चियों को सड़क पर छोड़ देंगे। या आपके इंतज़ार में जागते रहेंगे। सोचते-सोचते इंद्राणी का चेहरा तमतमा उठा। चंद्र प्रकाश ने इंद्राणी की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा -"अरे आइसक्रीम तो खिलाओ।"
"बच्चियों, क्या विचार है?"
किस बच्चे ने भला आज तक आइसक्रीम के लिए मना किया होगा, तो वह करती। अभी तक चुपचाप बैठी बच्चियों में हलचल हुई। वे इंद्राणी के निर्विकार चेहरे से डरी हुई थी।इंद्राणी ने चंद्र प्रकाश से कहा-"मैं अभी नहीं खाऊंगी, तुम बच्चों को खिला दो।"
"अरे पर तुम उठो तो। मुझे क्या पता किस में परोसना है।"
इंद्राणी उठी।
डाइनिंग टेबल के पास क्राकरी की अलमारी थी। उसने एक पल ठहर कर सोचा कि कौन से कप निकाले। बच्चियां हैं टूट सकते हैं। उसे एहसास हुआ कि पीछे कोई खड़ा है। आंखें तिरछी कर पीछे देखा तो बड़ी की फ्राॅक की झालर दिखाई दे गई। उसके बढ़े हुए हाथ रुके। छोटी बहुत आहिस्ता से बिल्ली के पांव से आगे बढ़ रही थी। पता नहीं इंद्राणी को लगा कि गुलाबी डिज़ाइन वाले कप बच्चियों को लुभा रहे हैं। इंद्राणी को याद आया, जितिन भी इन्हीं गुलाबी कप में आइसक्रीम खाने की ज़िद करता था। उसके ठीक उनके सामने रखे सफेद कप रखे थे पर उसने गुलाबी कप की तरफ हाथ बढ़ाया। पीछे से धीमी सी आवाज़ आई, "दादी बहुत अच्छी है।" यह शब्द इंद्राणी के कानों में शहद की तरह घुल गया। उसे याद आया जितिन भी आइसक्रीम खाते समय उसे ऐसे ही मस्का लगाता था।
"बेटी तुम्हारा नाम?"
"चंदन।"
"और तुम्हारा?"
"गुंजन।"
नाम सुनकर वह हल्का सा चौकी- पर कुछ बोली नहीं।
थोड़ी देर बाद चंदन एक फोटो लेकर आई- "दादी, यह मेरे पापा हैं।"
इंद्राणी ने फोटो ली... उसकी सांस अटक गई।
"नाम क्या है?"
"जितिन प्रकाश।"
उसके हाथ कांप गए। कप गिरते- गिरते बचे।
"कहां है तुम्हारे पापा।"
"अस्पताल मे... बहुत बीमार है।"
उसके भीतर जैसे कोई दीवार भरभराकर गिर गई। वह लड़खड़ाती हुई चंद्रप्रकाश के पास गई-"ये हमारी पोतियां है।"
तभी दरवाज़ा खुला। परवीन वापस आ गई थी-और उसकी आंखें रो रही थी।
इंद्राणी ने उसे पहचान लिया। वही लड़की... जिससे आठ साल पहले "नो एंट्री" कहा था।
"जितिन कैसा है?"इंद्राणी की आवाज़ कांप रही थी।
परवीन फूट पड़ी-"डॉक्टर कह रहे हैं ब्रेन सर्जरी करनी होगी... दस लाख चाहिए... मेरे पास कुछ नहीं बचा..."
"मायके वालों ने भी रिश्ता तोड़ दिया...।
इंद्राणी का दिल जैसे चाक हो गया।-"तुमने हमें बताया क्यों नहीं?"
कई बार फोन किया...नंबर ब्लॉक था..." फिर उसने बताया, "एक्सीडेंट के बाद डॉक्टर ने दिल्ली रेफर कर दिया। प्राइवेट वार्ड के पैसे नहीं थे... जनरल वार्ड में भर्ती है। बच्चों के लिए अस्पताल के पास यह सस्ता कमरा ले लिया।"
यह सुनकर इंद्राणी की नज़र झुक गई। उसके अपने निर्णय आज उसके सामने खड़े थे- निर्दयी और नग्न।
"चलो... अभी चलते हैं।"
वे भागते हुए अस्पताल पहुंचे पर देर हो चुकी थी।
जितिन जा चुका था। उसका शरीर एक कोने में, लावारिसों के बीच रखा था-क्योंकि बिल नहीं चुकाया गया था।
इंद्राणी ने सफेद चादर हटाई-और उसकी दुनिया खुत्म हो गई।
"जितिन... बेटा..."
वह उसके सीने से लिपट गई-जैसे आठ साल की दूरी को एक पल में मिटा देना चाहती हो।
पर समय की दूरी कभी वापस नहीं आती।
अचानक उसकी नज़र जितिन के हाथ पर पड़ी। उसकी मुट्ठी में कुछ दबा था।
चंद्रप्रकाश ने धीरे से खोला-एक पुरानी, मुड़ी हुई तस्वीर थी।
उसमें छोटा सा जितिन... और उसके साथ खड़ी इंद्राणी। पीछे लिखा था-"मां, नो एंट्री हटा लो।"
इंद्राणी का कलेजा फट गया। उसकी चीख़ पूरे वार्ड में गूंज गई।
वह बुदबुदाई-"मैंने ही नो एंट्री लगाई थी।"
घर लौटते समय दोनों बच्चियों चुप थी। गुंजन ने धीरे से पूछा-"दादी... पापा कब घर आएंगे?"
इंद्राणी के पास कोई जवाब नहीं था। उसने बस दोनों को सीने से लगा लिया। पहली बार -पूरे अधिकार से।
रात गहरी हो चुकी थी। घर वही था... दीवारें वही... दरवाज़े वही... पर नो एंट्री अब सचमुच बनी रह गई थी- जिसके भीतर कोई नहीं था।
चंद्र प्रकाश खिड़की के पास खड़े थे। बहुत देर बाद उन्होंने धीमे से कहा-"नो एंट्री बनी रही...घर उजड़ गया...।"
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