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Chapter 3: फँसा हुआ
रात के 11:51।
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प्लेटफ़ॉर्म पर वही हल्की गूंज।
Announcements दूर से आ रही थीं…
पर साफ नहीं।
जैसे कोई आवाज़ पानी के अंदर से सुनाई दे।
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अंगद खड़ा था।
आज… वो भाग नहीं रहा था।
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उसके जूते प्लेटफ़ॉर्म की उसी लाइन पर थे—
जहाँ कल थे।
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उसने नीचे देखा।
फिर घड़ी।
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11:51 → 11:52
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“आज नहीं…”
उसने होंठ भींचे।
“आज कुछ नहीं होगा।”
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दूर से हेडलाइट उभरी।
धीरे-धीरे बड़ी होती हुई।
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ट्रेन आई।
रुकी।
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इस बार—
अंगद सबसे पहले अंदर गया
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डिब्बा वही।
सीट वही।
हवा भी जैसे वही।
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पर आज वो बैठा नहीं।
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वो दरवाज़े के पास खड़ा हो गया।
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हाथ ऊपर की rod पर।
पकड़ इतनी tight कि उंगलियाँ सफेद पड़ गईं।
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“देखते हैं…”
उसने बुदबुदाया।
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ट्रेन चल पड़ी।
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पहला झटका।
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उसका शरीर हल्का सा हिला…
पर नज़र नहीं हटी।
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दरवाज़ा।
बस दरवाज़ा।
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कुछ सेकंड।
कुछ नहीं हुआ।
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उसके चेहरे पर हल्की राहत आई।
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“हो गया…”
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“Excuse me… थोड़ा side देंगे?”
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आवाज़।
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पीछे से।
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जैसे किसी ने spine में बर्फ डाल दी हो।
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अंगद धीरे-धीरे मुड़ा।
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मीरा।
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वही चेहरा।
वही शांति।
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जैसे समय उसके लिए रुका ही नहीं।
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“नहीं…” अंगद के मुँह से निकल गया।
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मीरा ने हल्का सा सिर झुकाया।
“क्या?”
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“तुम… तुम नहीं आ सकती यहाँ…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
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पास खड़े दो लोग मुड़े।
एक ने भौंहें सिकोड़ लीं।
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मीरा ने कुछ सेकंड उसे देखा।
फिर धीरे से बोली—
“तुम ठीक हो?”
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अंगद ने खुद को रोका।
साँस अंदर खींची।
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“हाँ…” उसने ज़बरदस्ती कहा।
“बैठ जाओ।”
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वो बैठ गई।
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Silence।
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पर ये वो चुप्पी नहीं थी जो आराम देती है।
ये वो चुप्पी थी जो दबाव बनाती है।
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अंगद खड़ा रहा।
उसकी आँखें दरवाज़े से हट ही नहीं रही थीं।
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“तुम आज भागे नहीं,” मीरा की आवाज़ आई।
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अंगद ने जवाब नहीं दिया।
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“कल तुम दौड़कर आए थे…” वो बोली।
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अंगद की पकड़ और कस गई।
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“बस…” उसने कहा,
“चुप रहो।”
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मीरा चुप हो गई।
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ट्रेन speed पकड़ने लगी।
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धड़… धड़… धड़…
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हर झटका… अब पहले से ज़्यादा भारी लग रहा था।
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अंगद ने घड़ी देखी।
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11:53
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“यही time था…”
उसने धीरे से कहा।
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और तभी—
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वही झटका
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जैसे किसी ने पूरी ट्रेन को हिला दिया हो।
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दरवाज़े की तरफ—
एक आदमी लड़खड़ाया
उसका हाथ rod से छूटा
किसी का बैग नीचे गिरा
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ठक!
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“अभी!” अंगद चिल्लाया।
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इस बार—
वो पहले से ready था
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वो झटके से आगे बढ़ा।
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उसने उस आदमी का कॉलर पकड़ा।
पूरा जोर लगाकर उसे अंदर खींच लिया।
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“सावधान!” उसकी आवाज़ डिब्बे में गूंजी।
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लोग चौंक गए।
कुछ सेकंड के लिए सब freeze।
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फिर…
सब normal।
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आदमी संभल गया।
बैग उठाया।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
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जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
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अंगद की सांस भारी थी।
सीना ऊपर-नीचे हो रहा था।
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“हो गया…” उसने खुद से कहा।
“मैंने बदल दिया…”
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वो धीरे-धीरे मुड़ा।
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मीरा उसे देख रही थी।
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पर—
उसके चेहरे पर कोई राहत नहीं थी
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कोई खुशी नहीं।
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बस… वही ठंडी शांति।
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“क्या?” अंगद झुंझलाया।
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मीरा खड़ी हुई।
धीरे-धीरे।
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एक कदम उसकी तरफ।
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फिर दूसरा।
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अब वो बहुत पास थी।
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“तुम्हें लगता है…” उसने धीमे से कहा,
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“ये इतना आसान है?”
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अंगद की सांस अटक गई।
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“मैंने उसे बचा लिया…” उसने ज़ोर देकर कहा।
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“हाँ…” मीरा ने सिर हिलाया।
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pause…
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“उसे।”
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अंगद की आँखें सिकुड़ गईं।
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“मतलब?”
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मीरा ने कुछ नहीं कहा।
बस… दरवाज़े की तरफ देखा।
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अंगद ने भी देखा।
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दरवाज़ा आधा खुला था
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हवा अंदर घुस रही थी।
तेज़। ठंडी।
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और वहाँ—
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कोई खड़ा था
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एक लड़की।
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पीठ उसकी तरफ।
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बाल हवा में बिखरे हुए।
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कपड़े फड़फड़ा रहे थे।
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अंगद का दिल जैसे कानों में बजने लगा।
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धक… धक… धक…
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“Hey!” वो चिल्लाया।
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कोई response नहीं।
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“सुनो! हटो वहाँ से!”
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वो आगे बढ़ा।
एक कदम।
फिर दूसरा।
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हर कदम भारी।
जैसे पैरों में वजन बंधा हो।
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“मुड़ो!” उसने चिल्लाया।
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लड़की नहीं मुड़ी।
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बस खड़ी रही।
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और फिर—
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उसका पैर फिसला
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सब कुछ धीमा हो गया।
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हवा रुक गई।
आवाज़ें दब गईं।
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अंगद दौड़ा।
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हाथ आगे बढ़ाया।
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बस—
एक सेकंड
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उसकी उंगलियाँ लड़की की कलाई को छूने ही वाली थीं…
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पर नहीं छू पाईं
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खाली हवा।
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लड़की गिर गई।
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अंधेरे में।
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नीचे।
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गायब।
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Silence।
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ट्रेन चलती रही।
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अंगद वहीं खड़ा रह गया।
हाथ हवा में।
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धीरे-धीरे उसने हाथ नीचे किया।
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उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं।
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वो पीछे मुड़ा।
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मीरा वहीं खड़ी थी।
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बहुत पास।
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इतनी पास कि उसकी सांस महसूस हो रही थी।
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“देखा…” उसने फुसफुसाया।
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“तुम हमेशा…”
pause…
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“एक सेकंड late होते हो।”
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अंगद की आँखें फैल गईं।
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“वो… कौन थी…”
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मीरा ने उसकी आँखों में देखा।
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इस बार… पहली बार…
उसकी आँखों में दर्द था
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“अगली बार…” उसने धीरे से कहा,
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“ध्यान से देखना।”
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ट्यूब लाइट झपकी।
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पूरा अंधेरा।
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कुछ सेकंड।
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और फिर—
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रोशनी।
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मीरा गायब।
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अंगद ने कुछ नहीं कहा।
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बस पीछे हट गया।
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उसकी टाँगें जवाब दे रही थीं।
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वो धीरे से नीचे बैठ गया।
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हाथ सिर पर।
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साँस तेज़।
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“ये… loop है…”
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अब ये सवाल नहीं था।
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ये फैसला था
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ट्रेन अंधेरे में आगे बढ़ती रही।
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और इस बार—
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अंगद को पता था
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वो सिर्फ देख नहीं रहा…
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वो फँस चुका है
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(Chapter 3 End)
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