कहानी : राजनारायण बोहरे
मुनक्का के बीज
वैद्य जी ने सिल्ली की नब्ज पर उँगली रखी। आँखें बंद करके चुप हो के बैठ गये, जैसे किसी गहरे गणित में डूब गए हों।
वैद्य जी उम्र से अधेड़ थे, माथे पर बड़ी-सी तिलक की एक लकीर, आँखों पर मोटा चश्मा और बगल में हमेशा जड़ी-बूटियों की थैलियाँ । उनके पास बैठते ही रोगी और परिजन को एक अलग-सी तसल्ली मिलती थी, मानो अब सब-कुछ ठीक हो जाएगा।
दुबे जी की बहन सिल्ली पिछले हफ़्ते से तेज बुखार में तप रही थी। गाँव के लोग कहते –“अरे, यह तो टाइफाइड जैसा लग रहा है, सीधा वैद्य जी को दिखाओ।”
गाँव में अभी भी बीमारी का इलाज वैद्य जी के बिना अधूरा माना जाता था। चाहे सरकारी अस्पताल में दवा मुफ्त ही क्यों न मिल जाए, या यूनानी पद्धति से इलाज करने वाला बगल के कस्बे का डुप्लीकेट अमिताभ बच्चन बहुत कम और कारगर दवाईयाँ क्यूँ न दे, लोग सबसे ज्यादा वैद्य जी की पोटली में बंधी जड़ी-बूटियों पर भरोसा करते थे।
उसी भरोसे के साथ दुबे जी भी अपनी बहन को लेकर पहुँचे थे ।
वैद्य जी थोड़ी देर तक मौन साधे रहे, फिर धीरे से बोले –“बुखार है, पित्त का दोष है। चिंता मत करो। मैं दवा देता हूँ।”
उन्होंने अपने थैले से डिब्बे और पुड़िया निकालकर लिखना शुरू किया –“सितोपलादि चूर्ण, संजीवनी वटी को मिला के शहद के साथ लेना। महा सुदर्शन चूर्ण की फंकी पानी के साथ लगा लेना , सब दिन मे तीन बार ! और हाँ, भूख कम लगेगी, इसलिए मुनक्का के बीज निकालकर खिलाना।”
दुबे जी और उनकी बहन को लगा कि अब इलाज पक्का मिल गया।
तीन दिन तक दवा चलती रही। बुखार तो उतर गया, लेकिन भूख अभी भी नहीं लग रही थी। और अब एक नई परेशानी – बहन का मुँह हर समय कड़वा रहता था।
सुबह का समय था जब दुबे जी अपनी बहन को लेकर वैद्य जी के घर पहुँचे। वहाँ पहले से ही चार-पाँच मरीज़ बैठे थे। धूप आँगन में तिरछी पड़ रही थी, और वैद्य जी खादी की धोती में लकड़ी की चौकी पर बैठे थे।
जैसे ही सिल्ली सामने आई, उसने शिकायत भरे लहजे में कहा –“वैद्य जी, अब बुखार भले नहीं है, लेकिन मेरा मुँह हमेशा कड़वा बना रहता है। और आपने जो कहा था मुनक्का बीज निकालकर खाना... उससे तो और ज़्यादा कड़वा लगता है।”
वैद्य जी चौंक पड़े, “अरे, मीठी मुनक्का कड़वाहट कैसे कर सकती है?”
उनके माथे पर बल पड़ गए। मन में संशय उठा – कहीं मरीज को शुगर (डायबिटीज) तो नहीं?
मर्ज़ को पक्का करने के लिए उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा –“अच्छा, बताओ, तुम कितनी मुनक्का खाती हो रोज़?”
सिल्ली ने पूरी मासूमियत से कहा –“संख्या तो नहीं मालूम, हाँ पर रोज़ बारह बीज खाती हूँ।”
वैद्य जी की आँखें चौड़ी हो गईं –“बारह बीज? मुनक्का तो गिनती से खाई जाती है, और तुम बीज गिनकर खाती हो?”
बहन ने सिर हिलाया –“हाँ, आपने ही तो कहा था – मुनक्का के बीज निकालकर खिलाओ। तो मेरे भैया मुनक्का के बीज निकालकर मुझे खिला देते हैं... और मुनक्का खुद खा जाते हैं।”
इतना सुनते ही वहाँ बैठे सभी लोग पहले तो कुछ पल चुप रहे। फिर ठहाका गूँज उठा। दुबे जी सकपका गए, लेकिन बहन को अचंभा था कि उसकी बात पर ऐसा मज़ाक क्यों बन रहा है।
वैद्य जी अपनी हँसी रोकते-रोकते बोले –“अरे भई! मेरा मतलब था कि मुनक्का के अंदर का बीज निकालकर फेंक दो और मीठा हिस्सा खाओ । तुम तो उल्टा कर रहीं , खुद बीज खा रही हो और भाई साहब गूदा हजम कर रहे हैं। इसलिए तो मुँह कड़वा है।”
दुबे जी की बहन शरमा गई। दुबे जी का सिर झुक गया, मानो कह रहे हों – अबकी बार तो बड़ी ग़लती हो गई!
वैद्य जी मुस्कुराते हुए बोले –“जाओ, आज से बीज नहीं, मुनक्का खाओ। फिर देखना, न भूख की कमी रहेगी, न मुँह की कड़वाहट।”
आँगन में बैठे लोग देर तक हँसते रहे और यह किस्सा पूरे गाँव में मशहूर हो गया कि “ कागज़ और पर्चों में मुनक्कों की असली हकदार रहते हुए भी दुबे जी की बहन सिल्ली के हिस्से में कैसे सिर्फ मुनक्का के बीज आये जबकि उसके भाई साहब मज़े से मुनक्का का सारा मीठा हिस्सा डकारते रहे ।”
लेकिन यह हास्य-प्रसंग उस दिन दहशत में बदल गया, जिस दिन इलाके की महिला विधायक के नाम से इलाके के सारे काम देखने और उनके नाम से खुद सारा लेंन देंन कर के डकार लेने वाले असली कर्ता –धर्ता उनके भाई की आम सभा में गाँव के सरपंच ने यह किस्सा खुले मंच से सुना दिया तो गाँव वालों के ठहाकों के बीच अचानक विधायक-भाई तैश में भर के उठ खड़े हो हुये और माइक छीन के बोले “सरपंच जी, आप लोगों ने आज जिस तरह से घुमा फिरा के एक झूठे किस्से को रच के मेरा मज़ाक उड़ाया है वह मैं आजन्म याद रखूंगा! आइन्दा आपका गाँव विकास के वास्ते एक – एक पैसे को तरस जाएगा ! आप लोगों की जो कुगत होगी उसकी तो आप कल्पना भी नहीं कर सकते !”
वे तो चले गये लेकिन गाँव वाले और खासकर सरपंच उस दिन से डर के साए में जीते हुए हर पल अब सिल्ली के भाई दुबे जी को गरिया रहे हैं!
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