कहानी: कारखाना
“आप अगर मेरा साथ दोगे तो मैं अपने कारखाने को मिला इतना बड़ा ऑर्डर स्वीकार कर पाऊंगा… नहीं तो मैं मना कर देता हूँ।”
तरुण भल्ला की आवाज़ में एक अजीब-सी सधी हुई नरमी और आत्मीयता थी—जैसे हर शब्द पहले से तौलकर रखा गया हो। वह बोलते समय हल्का-हल्का मुस्कुरा भी रहा था, लेकिन उसकी आंखें सीधे मजदूरों के चेहरों को टटोल रही थीं—किसके मन में क्या चल रहा है, वह पढ़ लेना चाहता था।
कारखाने के बड़े सेड में उस वक्त करीब पचास मजदूर खड़े थे। मशीनों की आवाज़ बंद थी, लेकिन उनके कानों में उसकी आदत अभी भी गूंज रही थी—टक-टक, खट-खट, घिस-घिस…
भुजबल और निरपत सबसे आगे खड़े थे। दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। वह नजर किसी साधारण सवाल-जवाब की नहीं थी, बल्कि वर्षों की समझ, अनुभव और संघर्ष से उपजी एक खामोश बातचीत थी।—जैसे बिना बोले ही बहुत कुछ कह दिया हो। पीछे खड़े मजदूर अब उनकी ओर देख रहे थे, मानो निर्णय वहीं से निकलेगा—जैसे फैसला उनका नहीं, इन दोनों का होना है।
कारखाने में उस वक्त लोहे की हल्की-सी गंध तैर रही थी। मशीनें बंद थीं, लेकिन उनके गर्म लोहे से अभी भी भाप-सी उठ रही थी। मजदूरों के चेहरों पर दिनभर की मेहनत की कालिख और पसीने की चमक एक साथ दिखाई दे रही थी।
किसी ने कुछ नहीं कहा। बस खामोशी।
ऑफिस की तरफ से तेज़ कदमों की आवाज़ आई। चार-पांच लड़के बड़े-बड़े कार्टन उठाए अंदर आए। कार्टन खोलते ही जैसे पूरा माहौल बदल गया।
कागज के सैकड़ों डिब्बे एक-एक कर मजदूरों के हाथ में दिए जाने लगे।
खुशबू… ऐसी कि जैसे किसी ने सीधे पेट में भूख जगाने वाली आग जला दी हो। घी की गरमाहट, गुड़ की मिठास और मेवे की भारी सुगंध—तीनों मिलकर हवा में एक ऐसा जाल बुन रहे थे, जिससे निकल पाना आसान नहीं था।
कुछ मजदूरों ने अनायास ही गले में जमा लार निगल ली।
भल्ला खड़ा हुआ—हल्का-सा गला साफ किया—“ये नाश्ता किसी होटल से नहीं आया है…” उसने ठहर-ठहर कर कहा, “मेरे घर से आया है… मेरे छोटे बेटे की बहू ने बेटा जना है… घर में जापे के लड्डू बने हैं…”
वह एक पल रुका—फिर धीरे से बोला—“और आप सब भी तो हमारे परिवार का हिस्सा हो…तो वो कहावत है न -नाती का लड्डू, पहले खाये नन्नू, या खाये दद्दू ! ”
यह कहते समय उसकी आवाज़ थोड़ी और मुलायम हो गई थी,“पहले ये खा लो… काम की बात बाद में करेंगे…”
**
मजदूरों ने डिब्बे खोले।
हर डिब्बे में रखा मेवा , गुड़ और जड़ी बूटियो का क्रिकेट की गेंद के आकार का लड्डू, जैसे सिर्फ मिठाई नहीं था—एक भाव था, एक रिश्ता था, एक दबाव था।
इतना बड़ा लड्डू था कि अकेले खा लेना जैसे कोई अपराध लगे। एक बूढ़ा मजदूर बुदबुदाया—“अरे, ये तो घर ले जाके बहु – बेटियों के साथ मिल बाँट के खाने खिलाने ने की चीज़ है…”
दूसरे ने हामी भरी—“बच्चे देखेंगे तो खुश हो जाएंगे…”
पर हाथ अभी भी रुके हुए थे। भुजबल सब देख रहा था।
उसने गौर किया—ये सिर्फ भूख नहीं है, ये अच्छी चीजें परिजनो से ‘साझा करने’ की आदत है, जो मजदूर अपने घर से लाते हैं।
भल्ला सब सुन रहा था , वह मुस्काते हुये फिर बोला—“घर के लिए अलग पैकेट हैं… ये तो आप यहीं खाओ…”
उसकी आवाज़ में अब हल्का-सा आग्रह था—और एक अदृश्य आदेश भी।
बस, फिर जैसे कोई दीवार टूट गई। लड्डू टूटने लगे। छोटे-छोटे टुकड़े… धीरे-धीरे मुंह में जाते हुए।
“अहा…”
“ऐसा स्वाद तो कभी नहीं खाया…”
कुछ लोग आंखें बंद करके खा रहे थे—जैसे सचमुच किसी अपने के घर का स्वाद हो।
“अहा…!”
“क्या स्वाद है…”
“जैसे घर का हो…”
मलाई वाली चाय का इंतजार होने लगा।
तरुण भल्ला बाहर चला गया।
और उसी के साथ शुरू हुई—मजदूरों की असली बातचीत।
“भई… भल्ला सेठ तो दिल का बड़ा है…” एक ने कहा।
“हां, हमें भी परिवार समझता है…” दूसरा बोला।
भुजबल चुप था। उसने लड्डू का एक छोटा टुकड़ा तोड़ा, मुंह में रखा, फिर धीरे से बोला—
“जाल बड़ा मोहक है…”
निरपत ने उसकी बात पकड़ी—“और मछलियाँ भी भूखी हैं…”
दोनों की आंखें मिलीं।
“ये सिर्फ खाना नहीं है…” निरपत बोला, “ये सेंटीमेंट है… जापे का लड्डू… परिवार का हिस्सा… आदमी सीधे ना नहीं कर पाता ऐसे मौके पर…”
पीछे से आवाज आई—“अरे निरपत, इधर आओ जरा…”
दलपत बुला रहा था।
निरपत उधर चला गया।
भुजबल वहीं खड़ा रह गया।
उसकी आंखें सामने थीं… लेकिन मन कहीं और चला गया।
**
भुजबल की आंखों के सामने अचानक गांव की याद उभर आई।
उस दिन सांझ का समय था। सूरज ढल रहा था। खेतों से लौटते बैलों की घंटियां बज रही थीं। वह सुखजिंदर की छोटी-सी वेल्डिंग दुकान पर काम कर रहा था। हाथों में चिंगारियां पड़ती थीं, लेकिन उसे मज़ा आता था।
तभी कस्बे से गांव पहुँचे मेहरबान चाचा आए।“अरे भुजबल!” उन्होंने आवाज़ लगाई।
भुजबल ने मशीन बंद की—“आओ चाचा, बैठो…”
चाचा ने चारों तरफ देखा—फिर बोले—“यहां कब तक चिंगारी उड़ाता रहेगा? चल मेरे साथ शहर…”
भुजबल थोड़ा हंसा—“शहर में क्या रखा है चाचा? यहां अपना गांव है, लोग हैं…”
चाचा ने उसकी आंखों में देखा—“गांव पेट नहीं भरता बेटा… शहर काम देता है…”
“क्या काम?” भुजबल ने पूछा।
“कारखाना है… लोहे का काम… दरवाजे, चौखट, पलंग… सब बनता है… सेठ मुझ पर भरोसा करता है… तेरी नौकरी पक्की समझ…”
भुजबल चुप हो गया।
उसने दुकान के चारों ओर देखा—टूटी दीवारें, पुरानी मशीन… और रोज की वही कमाई।
“वहां मजदूरी कितनी मिलेगी?” उसने धीरे से पूछा।
चाचा मुस्कुराए—“इतनी कि तेरे घर में रात दिन चूल्हा बुझने की नौबत न आए…और अगली पीडी भी मज़े करे !”
यह सुनकर भुजबल के चेहरे पर हल्की-सी चिंता तैर गई। उसे अपनी मां का सूखा चेहरा याद आया…बहन की शादी की चिंता…
“चलूंगा…” उसने धीरे से कहा।
चाचा ने उसके कंधे पर हाथ रखा—“बस यही समझदारी है…”
**
अगले दिन वह चाचा के साथ कस्बे पहुंचा। भल्ला का कारखाना कारखाना पहली बार देखा तो उसकी आंखें फैल गईं। इतना बड़ा सेड…इतनी सारी मशीनें…इतने सारे लोग…हर तरफ आवाज़ें—टक-टक… खट-खट… घिस-घिस…
वहाँ चिंगारियां उड़ती थीं… लोहे की गंध हवा में घुली रहती थी… और मशीनें ऐसे चलती थीं जैसे उनमें भी जान हो।
उसे लगा—यहां आदमी नहीं, लोहे और आग का राज है।
चाचा ने उसे जब्बरी मल से मिलवाया। सेठ ने ऊपर से नीचे तक देखा—“काम आता है?”
भुजबल ने सिर झुका दिया—“सीख रहा हूँ…”
सेठ ने चाचा की तरफ देखा—“तुम्हारे कहने पर रख रहा हूँ…”
फिर भुजबल से बोला—“मेहनत करेगा तो आगे बढ़ेगा… वरना…”
वह “वरना” अधूरा छोड़कर आगे बढ़ गया।
भुजबल ने उस अधूरे शब्द को अपने भीतर पूरा कर लिया था।
उसका काम अच्छा था। जल्दी ही सेठ की नजर में आ गया।
और एक दिन वह बोला —“तू पच्चीस मजदूरों का मुखिया रहेगा अब…”
भुजबल गर्व से भर गया था।
**
जब्बरी मल सेठ बुरा आदमी नहीं था… लेकिन गुस्से का तेज था। हर मज़दूर उसका गुस्सा झेल चुका था !
एक दिन—
भुजबल से एक गलती हो गई। लोहे की चौखट में नाप गड़बड़ा गया। फेक्ट्री का नुकसान हुआ।
सेठ आया।पहले उसने जी भर के गालियां दीं।और फिर जैसे पीटने को हाथ उठाया!
बस उसी पल…
भुजबल की आंखें लाल हो गईं। मुट्ठियां भींच गईंउसने कुछ नहीं कहा… लेकिन उसका चेहरा सब कह गया।
सेठ रुक गया। पहली बार ऐसा हुआ ।
उस दिन के बाद सब कुछ बदल गया।
भुजबल के अंदर कुछ टूट गया था।
जिस आदमी को वह मालिक नहीं, देवता समझता था… वही अब उसे खून चूसने वाला लगने लगा।
**
धीरे-धीरे भुजबल ने मजदूरों की बात उठानी शुरू की। किसी की मजदूरी कटती—तो वह जाता।
कोई बीमार पड़ता—तो वह खड़ा होता।
फिर एक दिन—उसने और निरपत ने यूनियन बनाई।
लोग हंसते थे—“क्या होगा इससे?”
लेकिन…जब प्रोविडेंट फंड और मेडिकल की मांग पर उसने हड़ताल कराई—तो सेठ को झुकना पड़ा।
उस दिन के बाद—भुजबल सिर्फ मजदूर नहीं रहा।वह नेता बन गया।
**
“चाय आ गई…” आवाज ने भुजबल को वर्तमान में लौटा दिया।
तरुण भल्ला फिर सामने था, “ यहाँ हजारों मकान बनाने वली एक कंस्ट्रक्शन कम्पनी की तरफ से अपने कारखाने को एक बड़ा ठेका मिला है…” उसने कहा, “हजार घरों के दरवाजे, खिड़कियां… बीस दिन में काम पूरा करना है…, जीवन मे ऐसे मौके कम आते हैं ! भाग्य हमारा दरवाजा खटखटा रहा है ! ”
भुजबल ने सीधा सवाल किया—“मजदूरों को क्या मिलेगा?”
तरुण मुस्कुराया—“जो मुनाफा होगा… उसमें आप सबका हिस्सा होगा…”
बस इतना ही बोल वह ।लेकिन यही काफी था।
**
उस दिन के बाद— कारखाना बदल गया।
मजदूर दिन-रात काम करने लगे।
कोई अपनी बीमार पत्नी को छोड़कर आया था…
कोई बच्चे की फीस टालकर…
मशीनें भी जैसे उनकी मेहनत को समझ रही थीं।
रात में भी आवाजें गूंजती थीं—टक… टक… टक…
भुजबल हर जगह था। किसी को समझाता… किसी को हिम्मत देता…“ये अपना काम है…”
और सच में—पंद्रह दिन में काम पूरा हो गया।
**
काम खत्म हुआ। सबने सोचा—आज कुछ मिलेगा।
कल कुछ होगा।
पर…कुछ नहीं हुआ। न बोनस… न हिस्सा… न धन्यवाद… बस चुप्पी।
**
यूनियन दफ्तर में सब इकट्ठा हुए।
कोई गुस्से में था…कोई टूट चुका था…
“यही होता है हर जगह…” भुजबल ने धीरे से कहा—“मेहनत हमारी… मुनाफा उनका…”
“और इसी से पैदा होता है संघर्ष…” निरपत ने बात बढाई
कमरे में सन्नाटा था। फिर एक-एक करके सबने सिर हिलाया।
**
अब तैयारी शुरू हुई।
घर में राशन जमा करना…
खर्च कम करना…
डर भी था।
लेकिन इस बार— गुस्सा ज्यादा था।
कारखाने में मशीनें चल रही थीं… लेकिन धीरे-धीरे… एक-एक करके…वे रुकने लगीं।
जैसे उन्हें भी पता हो- अब वक्त आ गया है।
**
भुजबल बाहर खड़ा था। कारखाने की ओर देख रहा था।
जहां कभी शोर था…अब सन्नाटा था।
उसने गहरी सांस ली और धीरे से कहा—“अब असली काम शुरू हुआ है…”
लेकिन तरुण चतुर था , फोन पर मैंनेजर ने खबर की तो वह बारह बजे फेक्ट्री आया तो अटैची भर लाया था नोटों से ... सबको एक एक महीने की तंनख्वाह बराबर बोनस बाँटने की घोषणा कर दी गई ...
युद्ध जीता जा चुका था , सैना बैरक मे वापस चलि आयीं और मशीनें फिर जागने लगी ...
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कहानी: कारखाना
“आप अगर मेरा साथ दोगे तो मैं अपने कारखाने को मिला इतना बड़ा ऑर्डर स्वीकार कर पाऊंगा… नहीं तो मैं मना कर देता हूँ।”
तरुण भल्ला की आवाज़ में एक अजीब-सी सधी हुई नरमी और आत्मीयता थी—जैसे हर शब्द पहले से तौलकर रखा गया हो। वह बोलते समय हल्का-हल्का मुस्कुरा भी रहा था, लेकिन उसकी आंखें सीधे मजदूरों के चेहरों को टटोल रही थीं—किसके मन में क्या चल रहा है, वह पढ़ लेना चाहता था।
कारखाने के बड़े सेड में उस वक्त करीब पचास मजदूर खड़े थे। मशीनों की आवाज़ बंद थी, लेकिन उनके कानों में उसकी आदत अभी भी गूंज रही थी—टक-टक, खट-खट, घिस-घिस…
भुजबल और निरपत सबसे आगे खड़े थे। दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। वह नजर किसी साधारण सवाल-जवाब की नहीं थी, बल्कि वर्षों की समझ, अनुभव और संघर्ष से उपजी एक खामोश बातचीत थी।—जैसे बिना बोले ही बहुत कुछ कह दिया हो। पीछे खड़े मजदूर अब उनकी ओर देख रहे थे, मानो निर्णय वहीं से निकलेगा—जैसे फैसला उनका नहीं, इन दोनों का होना है।
कारखाने में उस वक्त लोहे की हल्की-सी गंध तैर रही थी। मशीनें बंद थीं, लेकिन उनके गर्म लोहे से अभी भी भाप-सी उठ रही थी। मजदूरों के चेहरों पर दिनभर की मेहनत की कालिख और पसीने की चमक एक साथ दिखाई दे रही थी।
किसी ने कुछ नहीं कहा। बस खामोशी।
ऑफिस की तरफ से तेज़ कदमों की आवाज़ आई। चार-पांच लड़के बड़े-बड़े कार्टन उठाए अंदर आए। कार्टन खोलते ही जैसे पूरा माहौल बदल गया।
कागज के सैकड़ों डिब्बे एक-एक कर मजदूरों के हाथ में दिए जाने लगे।
खुशबू… ऐसी कि जैसे किसी ने सीधे पेट में भूख जगाने वाली आग जला दी हो। घी की गरमाहट, गुड़ की मिठास और मेवे की भारी सुगंध—तीनों मिलकर हवा में एक ऐसा जाल बुन रहे थे, जिससे निकल पाना आसान नहीं था।
कुछ मजदूरों ने अनायास ही गले में जमा लार निगल ली।
भल्ला खड़ा हुआ—हल्का-सा गला साफ किया—“ये नाश्ता किसी होटल से नहीं आया है…” उसने ठहर-ठहर कर कहा, “मेरे घर से आया है… मेरे छोटे बेटे की बहू ने बेटा जना है… घर में जापे के लड्डू बने हैं…”
वह एक पल रुका—फिर धीरे से बोला—“और आप सब भी तो हमारे परिवार का हिस्सा हो…तो वो कहावत है न -नाती का लड्डू, पहले खाये नन्नू, या खाये दद्दू ! ”
यह कहते समय उसकी आवाज़ थोड़ी और मुलायम हो गई थी,“पहले ये खा लो… काम की बात बाद में करेंगे…”
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मजदूरों ने डिब्बे खोले।
हर डिब्बे में रखा मेवा , गुड़ और जड़ी बूटियो का क्रिकेट की गेंद के आकार का लड्डू, जैसे सिर्फ मिठाई नहीं था—एक भाव था, एक रिश्ता था, एक दबाव था।
इतना बड़ा लड्डू था कि अकेले खा लेना जैसे कोई अपराध लगे। एक बूढ़ा मजदूर बुदबुदाया—“अरे, ये तो घर ले जाके बहु – बेटियों के साथ मिल बाँट के खाने खिलाने ने की चीज़ है…”
दूसरे ने हामी भरी—“बच्चे देखेंगे तो खुश हो जाएंगे…”
पर हाथ अभी भी रुके हुए थे। भुजबल सब देख रहा था।
उसने गौर किया—ये सिर्फ भूख नहीं है, ये अच्छी चीजें परिजनो से ‘साझा करने’ की आदत है, जो मजदूर अपने घर से लाते हैं।
भल्ला सब सुन रहा था , वह मुस्काते हुये फिर बोला—“घर के लिए अलग पैकेट हैं… ये तो आप यहीं खाओ…”
उसकी आवाज़ में अब हल्का-सा आग्रह था—और एक अदृश्य आदेश भी।
बस, फिर जैसे कोई दीवार टूट गई। लड्डू टूटने लगे। छोटे-छोटे टुकड़े… धीरे-धीरे मुंह में जाते हुए।
“अहा…”
“ऐसा स्वाद तो कभी नहीं खाया…”
कुछ लोग आंखें बंद करके खा रहे थे—जैसे सचमुच किसी अपने के घर का स्वाद हो।
“अहा…!”
“क्या स्वाद है…”
“जैसे घर का हो…”
मलाई वाली चाय का इंतजार होने लगा।
तरुण भल्ला बाहर चला गया।
और उसी के साथ शुरू हुई—मजदूरों की असली बातचीत।
“भई… भल्ला सेठ तो दिल का बड़ा है…” एक ने कहा।
“हां, हमें भी परिवार समझता है…” दूसरा बोला।
भुजबल चुप था। उसने लड्डू का एक छोटा टुकड़ा तोड़ा, मुंह में रखा, फिर धीरे से बोला—
“जाल बड़ा मोहक है…”
निरपत ने उसकी बात पकड़ी—“और मछलियाँ भी भूखी हैं…”
दोनों की आंखें मिलीं।
“ये सिर्फ खाना नहीं है…” निरपत बोला, “ये सेंटीमेंट है… जापे का लड्डू… परिवार का हिस्सा… आदमी सीधे ना नहीं कर पाता ऐसे मौके पर…”
पीछे से आवाज आई—“अरे निरपत, इधर आओ जरा…”
दलपत बुला रहा था।
निरपत उधर चला गया।
भुजबल वहीं खड़ा रह गया।
उसकी आंखें सामने थीं… लेकिन मन कहीं और चला गया।
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भुजबल की आंखों के सामने अचानक गांव की याद उभर आई।
उस दिन सांझ का समय था। सूरज ढल रहा था। खेतों से लौटते बैलों की घंटियां बज रही थीं। वह सुखजिंदर की छोटी-सी वेल्डिंग दुकान पर काम कर रहा था। हाथों में चिंगारियां पड़ती थीं, लेकिन उसे मज़ा आता था।
तभी कस्बे से गांव पहुँचे मेहरबान चाचा आए।“अरे भुजबल!” उन्होंने आवाज़ लगाई।
भुजबल ने मशीन बंद की—“आओ चाचा, बैठो…”
चाचा ने चारों तरफ देखा—फिर बोले—“यहां कब तक चिंगारी उड़ाता रहेगा? चल मेरे साथ शहर…”
भुजबल थोड़ा हंसा—“शहर में क्या रखा है चाचा? यहां अपना गांव है, लोग हैं…”
चाचा ने उसकी आंखों में देखा—“गांव पेट नहीं भरता बेटा… शहर काम देता है…”
“क्या काम?” भुजबल ने पूछा।
“कारखाना है… लोहे का काम… दरवाजे, चौखट, पलंग… सब बनता है… सेठ मुझ पर भरोसा करता है… तेरी नौकरी पक्की समझ…”
भुजबल चुप हो गया।
उसने दुकान के चारों ओर देखा—टूटी दीवारें, पुरानी मशीन… और रोज की वही कमाई।
“वहां मजदूरी कितनी मिलेगी?” उसने धीरे से पूछा।
चाचा मुस्कुराए—“इतनी कि तेरे घर में रात दिन चूल्हा बुझने की नौबत न आए…और अगली पीडी भी मज़े करे !”
यह सुनकर भुजबल के चेहरे पर हल्की-सी चिंता तैर गई। उसे अपनी मां का सूखा चेहरा याद आया…बहन की शादी की चिंता…
“चलूंगा…” उसने धीरे से कहा।
चाचा ने उसके कंधे पर हाथ रखा—“बस यही समझदारी है…”
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अगले दिन वह चाचा के साथ कस्बे पहुंचा। भल्ला का कारखाना कारखाना पहली बार देखा तो उसकी आंखें फैल गईं। इतना बड़ा सेड…इतनी सारी मशीनें…इतने सारे लोग…हर तरफ आवाज़ें—टक-टक… खट-खट… घिस-घिस…
वहाँ चिंगारियां उड़ती थीं… लोहे की गंध हवा में घुली रहती थी… और मशीनें ऐसे चलती थीं जैसे उनमें भी जान हो।
उसे लगा—यहां आदमी नहीं, लोहे और आग का राज है।
चाचा ने उसे जब्बरी मल से मिलवाया। सेठ ने ऊपर से नीचे तक देखा—“काम आता है?”
भुजबल ने सिर झुका दिया—“सीख रहा हूँ…”
सेठ ने चाचा की तरफ देखा—“तुम्हारे कहने पर रख रहा हूँ…”
फिर भुजबल से बोला—“मेहनत करेगा तो आगे बढ़ेगा… वरना…”
वह “वरना” अधूरा छोड़कर आगे बढ़ गया।
भुजबल ने उस अधूरे शब्द को अपने भीतर पूरा कर लिया था।
उसका काम अच्छा था। जल्दी ही सेठ की नजर में आ गया।
और एक दिन वह बोला —“तू पच्चीस मजदूरों का मुखिया रहेगा अब…”
भुजबल गर्व से भर गया था।
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जब्बरी मल सेठ बुरा आदमी नहीं था… लेकिन गुस्से का तेज था। हर मज़दूर उसका गुस्सा झेल चुका था !
एक दिन—
भुजबल से एक गलती हो गई। लोहे की चौखट में नाप गड़बड़ा गया। फेक्ट्री का नुकसान हुआ।
सेठ आया।पहले उसने जी भर के गालियां दीं।और फिर जैसे पीटने को हाथ उठाया!
बस उसी पल…
भुजबल की आंखें लाल हो गईं। मुट्ठियां भींच गईंउसने कुछ नहीं कहा… लेकिन उसका चेहरा सब कह गया।
सेठ रुक गया। पहली बार ऐसा हुआ ।
उस दिन के बाद सब कुछ बदल गया।
भुजबल के अंदर कुछ टूट गया था।
जिस आदमी को वह मालिक नहीं, देवता समझता था… वही अब उसे खून चूसने वाला लगने लगा।
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धीरे-धीरे भुजबल ने मजदूरों की बात उठानी शुरू की। किसी की मजदूरी कटती—तो वह जाता।
कोई बीमार पड़ता—तो वह खड़ा होता।
फिर एक दिन—उसने और निरपत ने यूनियन बनाई।
लोग हंसते थे—“क्या होगा इससे?”
लेकिन…जब प्रोविडेंट फंड और मेडिकल की मांग पर उसने हड़ताल कराई—तो सेठ को झुकना पड़ा।
उस दिन के बाद—भुजबल सिर्फ मजदूर नहीं रहा।वह नेता बन गया।
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“चाय आ गई…” आवाज ने भुजबल को वर्तमान में लौटा दिया।
तरुण भल्ला फिर सामने था, “ यहाँ हजारों मकान बनाने वली एक कंस्ट्रक्शन कम्पनी की तरफ से अपने कारखाने को एक बड़ा ठेका मिला है…” उसने कहा, “हजार घरों के दरवाजे, खिड़कियां… बीस दिन में काम पूरा करना है…, जीवन मे ऐसे मौके कम आते हैं ! भाग्य हमारा दरवाजा खटखटा रहा है ! ”
भुजबल ने सीधा सवाल किया—“मजदूरों को क्या मिलेगा?”
तरुण मुस्कुराया—“जो मुनाफा होगा… उसमें आप सबका हिस्सा होगा…”
बस इतना ही बोल वह ।लेकिन यही काफी था।
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उस दिन के बाद— कारखाना बदल गया।
मजदूर दिन-रात काम करने लगे।
कोई अपनी बीमार पत्नी को छोड़कर आया था…
कोई बच्चे की फीस टालकर…
मशीनें भी जैसे उनकी मेहनत को समझ रही थीं।
रात में भी आवाजें गूंजती थीं—टक… टक… टक…
भुजबल हर जगह था। किसी को समझाता… किसी को हिम्मत देता…“ये अपना काम है…”
और सच में—पंद्रह दिन में काम पूरा हो गया।
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काम खत्म हुआ। सबने सोचा—आज कुछ मिलेगा।
कल कुछ होगा।
पर…कुछ नहीं हुआ। न बोनस… न हिस्सा… न धन्यवाद… बस चुप्पी।
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यूनियन दफ्तर में सब इकट्ठा हुए।
कोई गुस्से में था…कोई टूट चुका था…
“यही होता है हर जगह…” भुजबल ने धीरे से कहा—“मेहनत हमारी… मुनाफा उनका…”
“और इसी से पैदा होता है संघर्ष…” निरपत ने बात बढाई
कमरे में सन्नाटा था। फिर एक-एक करके सबने सिर हिलाया।
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अब तैयारी शुरू हुई।
घर में राशन जमा करना…
खर्च कम करना…
डर भी था।
लेकिन इस बार— गुस्सा ज्यादा था।
कारखाने में मशीनें चल रही थीं… लेकिन धीरे-धीरे… एक-एक करके…वे रुकने लगीं।
जैसे उन्हें भी पता हो- अब वक्त आ गया है।
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भुजबल बाहर खड़ा था। कारखाने की ओर देख रहा था।
जहां कभी शोर था…अब सन्नाटा था।
उसने गहरी सांस ली और धीरे से कहा—“अब असली काम शुरू हुआ है…”
लेकिन तरुण चतुर था , फोन पर मैंनेजर ने खबर की तो वह बारह बजे फेक्ट्री आया तो अटैची भर लाया था नोटों से ... सबको एक एक महीने की तंनख्वाह बराबर बोनस बाँटने की घोषणा कर दी गई ...
युद्ध जीता जा चुका था , सैना बैरक मे वापस चलि आयीं और मशीनें फिर जागने लगी ...
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