Book circulation in Hindi Book Reviews by Dr Sandip Awasthi books and stories PDF | पुस्तक परिक्रमा

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पुस्तक परिक्रमा

जीवन में ऊर्जा, विचार और उत्साह भरती पुस्तकें

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जिस तरह शरीर को गतिशील बनाए रखने के लिए विटामिन,कार्बोहाइड्रेट्स,मिनरल्स जरूरी होते हैं वैसे ही बुद्धि,दिमाग,दिल की खुराक के लिए क्या? मनुष्य जीवन में परिवार,साथी,दोस्तों मिलता ,जुड़ता है।यह सफर में सहयात्री हैं,जो बिछड़ भी जाते हैं। पर अच्छी पुस्तकें और विचार ऐसे साथी हैं जो हमेशा आपका साथ निभाते हैं। एक अच्छी किताब अंदर उजास कर देती है जो चेहरे पर भी दिखाई देता है। यह बहुत जरूरी प्रक्रिया है जिसमें बहुत कम लोग परिचित होते हैं।किताबें ,बेहतरीन साहित्यिक पत्रिकाएं यही कार्य करती हैं। वह हमें स्वस्थ रखती हैं,अवसाद से बचाती हैं और सबसे महत्वपूर्ण जिंदगी को खूबसूरत रंगों से भर देती हैं। इसलिए यह अच्छी पुस्तकें,पत्रिकाएं पढ़ें और यदि  अब तक नहीं पढ़ सकें हैं तो इनसे शुरुआत कीजिए। आप यकीन जाने इन किताबों के जादुई,अद्भुत अहसास से आप मंत्रमुग्ध हो जाएंगे। और लेखकों को बधाई भी दें ,नंबर इसीलिए दिए हैं।

 

 

1.एक यात्रा,अपनी संस्कृति,जड़ों से आधुनिक समय तक 

 

जलतरंग : उपन्यास,संतोष चौबे ,भारतीय ज्ञानपीठ,दिल्ली

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साहित्य ,तथ्यों और गूढ़ ज्ञान को भी रोचकता,शिल्प और कथा के साथ हमारे दिल और दिमाग पर असर डाल सकता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं ,"कथा के साथ साथ लेखक पाठकों को भी बहा ले जाता है।यदि उसके पास स्थापित तथ्यों को कहने का हुनर है तो।"

यह हुनर ही तो है जो एक लेखक को बड़ा लेखक बनाता है। यह आता है ईमानदारी,निष्ठा अनुभव और कड़े परिश्रम से।  ऊपर के दृश्य तो एक बानगी भर हैं। उपन्यास अपनी पठनीयता,शैली के साथ ऐतिहासिक तथ्यों,संगीत के राग,रागिनियां और आधुनिक समय की विसंगतियों पर कड़ा प्रहार करता है।

 

कथा और उसके क्षेत्र

---------------------------- लेखक संतोष चौबे,बड़े ही शांत प्रकृति और इत्मीनान के साथ जिंदगी के हर रंग, उतार चढ़ाव को देखते हुए उसके साथ साक्षी भाव रखते हैं। कथा प्रारंभ होती है एक मध्यम शहर में स्थित संगीतकार दंपत्ति देवाशीष और स्मृति के जीवन और संगीत साधना के साथ। बड़ी बारीकी से लेखक संगीत के राग,तोड़ी और उनके इतिहास को रोचक ढंग से बताते चलते हैं।

    फिर आगे युवा दंपत्ति के माध्यम से अलग अलग शहरों गुजरात के सोमनाथ, मध्यप्रदेश,महाराष्ट्र के अनेक स्थलों का प्रमाणिक वर्णन तथ्यों के साथ करते चलते हैं। (पुस्तक के अंत में करीब पचास से अधिक प्रमाणिक संदर्भ हैं) 

कुछ दृष्टव्य हैं,"सन हजार के करीब महमूद गजनवी ने मथुरा पर आक्रमण किया। वहां गुप्तकाल में चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा  निर्मित भव्य भगवान वासुदेव का मंदिर था।जिसमें अपार सोना ,चांदी और हीरे जवाहरात की टनों भारी प्रतिमाएं थी,सभी को लूटकर वह ले गया,मंदिर तोड़ गया।" (पृष्ठ34)

सन दस सौ छब्बीस में सोमनाथ पर गजनवी ने फिर आक्रमण किया और इस बार भीमदेव की सेना पराजित हो गई। गजनवी ने गदा से शिवलिंग पर प्रहार किया।सौ से अधिक पुजारी सोमनाथ के चमत्कार की प्रतीक्षा में रहे,पर ऐसा नहीं हुआ। गजनवी ने उनका कत्लेआम करा दिया।

ऐसे उद्धरण बताते हैं कि हमें कितनी बार विदेशी आक्रांताओं ने लूटा,कत्लेआम किया।

ऐसे ही मल्ल विद्या से लेकर वल्लभाचार्य,पुष्टिमार्ग सभी का अच्छे से उल्लेख मिलता है।

  आगे अष्टछाप,ध्रुपद,धमार और संगीत के सुरो की गहराई में रोचकता के साथ लेखक ले जाते हैं। पर उपन्यास में अभी और रोचक मोड़ आते हैं।बढ़ते शोर और किस तरह कॉलेज,धार्मिक स्थलों के शोरगुल से आम व्यक्ति परेशान होता है,का सजीव और ऐसा दिलचस्प चित्रण करते हैं मानो खुद ने वह कष्ट और पीढ़ा भोगी है। उनके शब्दों का जादू है कि पाठक भी उनके साथ साथ इन सभी जगहों और हालातों से दो चार होता है। एक मीठी सी प्रेम कहानी भी उपन्यास में चलती है  देवाशीष और स्मृति की जिसमें तमाम उतार चढ़ाव के बाद भी गहरा प्रेम रहता है। शायद इसलिए की दोनों संगीत से प्रणय करते हैं।

  अपने शिल्प,कथ्य और भाषाई लय के लिए भी यह उपन्यास पढ़ा जाना चाहिए।

            यह कहने में संकोच नहीं कि भारतीय साहित्य के श्रेष्ठ पचास उपन्यासों में इसे शामिल किया जाएगा।

 

2.बदतमीज हो गया है मौसम

 :_काव्य संग्रह, स्वर्गीय प्रकाश जैन, संपादन कल्पना भंडारी,9460588332

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  "तुमने सूरज का सातवां घोड़ा/ देखा हो तो देखा हो/ मैंने तो नहीं देखा उत्फुल्लित नहीं कर पाई /आज तक सूरज की एक भी किरण 

______  मैं तो सिर्फ/  सूरज के ताप और / चांद की उदासी के बीच/अपने मेहनतकश हाथों को/ तोलता रहा खोलता रहा/  सिर्फ भूख प्यास याद है/  सुबह-सुबह भारी लगती है /अपनी ही सांस"

यह श्रम,मेहनतकश हाथों के माध्यम से कितनी गहरी बात कवि ने कह दी है। उन हजारों मज़दूरों,लाखों किसानों,आदिवासियों की तरफ से। उनके हिस्से का सूरज वैसा नहीं होता जैसा  हम सुबह सुबह देखकर आनंद और उल्लसित हो उठते हैं। उनके लिए सूरज एक और कठिन दिन का आगाज होता है।

 

 हिंदी जगत में "लहर" पत्रिका ने बहुत धूम मचाई और नाम भी कमाया। उसी लहर के संपादक,प्रकाशक रहे श्रीयुत प्रकाश जैन एक बेहतरीन कवि और चिंतक थे।  लहर (जुलाई उन्नीस सौ सत्तावन से उन्नीस सौ अस्सी) में कई नामचीन लेखको की पहली रचना प्रकाशित हुई ।  आलमशाह खान, ममता कालिया,मन्नू भंडारी,रमेश उपाध्याय, स्वयं प्रकाश, मणि मधुकर,हेतु भारद्वाज आदि अनेक लोगों को मंच दिया प्रकाश जैन ने। उस जमाने में  कल्पना,कहानी,नई कहानी के साथ बराबरी से खड़ी थी लहर साहित्यिकी। प्रकाश जैन एक जुनून,एक संकल्प की तरह साहित्य साधना में रत थे।भरे पूरे परिवार की जिम्मेदारी के साथ बिना विज्ञापन की साहित्य पत्रिका का नियमित प्रकाशन... एक प्रतिबद्धता रही, हिंदी साहित्य और उसके नए कलमकारों को मंच देने के लिए।

उनके दो काव्य संग्रह आए,दोनों अपने बेहतरीन विभिन्न विषयों और शब्द चयन से सराहे गए।

क्योंकि संपादन कार्य बहुत कठिन,जटिल और पूर्णकालिक है। यह आपकी रचनाधर्मिता को प्रभावित करता है। राजेंद्र यादव,प्रभाकर शोत्रिय, रविंदर कालिया भी इसका उद्धरण हैं।फिर उन्नीस सौ अठ्ठासी में उनकी मृत्यु हुई।

  " हमें फिर से /तलाश के द्वारा खोलना है.../तलाश किसी सपने की नहीं/इतिहास न ही स्वार्थी पुरुष की/ स्वयं की तलाश करनी है / अपने अस्तित्व को सुरक्षा के लिए/ फिर एक नए सिरे से "  (पृष्ट 21)।

         

        उनकी चुनी हुई ,अप्रकाशित कविताओं का यह संग्रह उनकी जन्म शताब्दी वर्ष में आया है। सुधि पाठक उपर दिए नंबर से मात्र डेढ़ सौ रूपये में यह महत्वपूर्ण संग्रह मंगवा सकते हैं।

 "अब जान गया हूं कि/ शहर क्यों और कैसे/ अंधा और सुनसान हो जाता है..../ कुछ शब्द/ जो मेरी ही भाषा ने दिए थे/पराए ही नहीं/मेरे दुश्मन हो गए (पृष्ट 27)।

एक संपादक के रूप में उन्होंने धर्मवीर भारती की कविताओं को भी अस्वीकृत कर वापस कर दिया था। आज के फेसबुक समय में जिस तरह ऑनलाइन लिखने का फैशन हो गया है जबकि ऐसे संपादक की निगाह से रचनाओं को गुजरना जरूरी होता है। एक अच्छा संपादक ही बताता है आपके लेखन की कमियों और मजबूती को। वही है जो आपको निखारता है।प्रकाश जैन ऐसे ही विलक्षण संपादक,लेखक रहे, मानवीय कमजोरियों के बाद भी उन्होंने हिंदी जगत को अनेक महत्वपूर्ण रचनाएं और रचनाकार दिए। हिंदी जगत आज भी उन्हें याद करता है। नामवर सिंह जी से मेरी मुलाकात में (वर्ष 2013, हिंदी भवन,आईटीओ के पास दिल्ली,में हिन्द युग्म के प्रथम कार्यक्रम में ) उन्होंने प्रकाश जैन की संपादकीय दृष्टि और लहर पत्रिका के महत्व को खास याद किया था।

हिंदी जगत इस महत्वपूर्ण संग्रह का स्वागत करेगा ऐसा मुझे विश्वास है।

                

3.आवाजों के छायादार चेहरे :_उपन्यास,रासबिहारी गौड़, 9680073007

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" आवाजें आती हैं और जाती हैं मेरे अंदर से। मैं, मैं नहीं रहता हूं, वही हो जाता हूं।"  जिन राहों से हम गुजर चुके होते हैं उसे पीछे मुड़कर देखते हैं तो हमें अपनी ही जिंदगी एक परिकल्पना सी लगती है। बाज समझदार लोग इसीलिए कहते हैं dont see back, और कुछ मानते भी हैं। लेकिन अपने अतीत से मुक्त होना ऐसा ही है जैसे जड़ों से कटना। वह हम में हमारे अंदर ही रहता है। हम में ही रहते हैं हमारे पुरखे,हमारे घर आंगन,धूप छाया,बरसात हर मौसम। इन्हीं सब को लेकर चलता है कवि रासबिहारी गौड़ का यह प्रथम उपन्यास।  किसी भी उपन्यास की जरूरी शर्त होती है पठनीयता,भाषा और शिल्प विन्यास के साथ कथा प्रवाह। उपन्यास पठनीय है इसमें कोई संदेह नहीं। भाषा मुझे चौंकाती है।क्योंकि इतनी परिष्कृत, होले होले,शीतल लहरों सी प्रवाहित होती शब्दों की धारा सी लेखक ने बहाई है कि तीन सौ पृष्ठों की यह कृति आप पढ़ते चले जाते हैं।शिल्प थोड़ा कमजोर है उस पर काम करना होगा।

  अब कथा पर आते हैं ।अनिरुद्ध चतुर्वेदी ,अन्नू अपनी कथा कहते हुए अपने बचपन,अपने माता पिता, दोस्तों,स्कूल के दिनों,रिश्तों की गलियों से गुजरते हुए आपको भी उनसे मिलवाते चलते हैं।  आत्मकथात्मक लगती यह कृति भरोसा दिलाती है कि हर रचनात्मक व्यक्ति अपनी जड़ों ,अपने कर्तव्यों और अपनी अनुभूतियों को सदैव अपने में जीवित रखता है। 

रासबिहारी के लेखन की खास  खूबी है ईमानदारी,अपने आपको  थोड़ा थोड़ा उघाड़ते चलते हैं।यह बात उनके दो प्रसंगों ,एक ताऊजी से पिताजी की बोलचाल बंद और फिर घर के मध्य के दरवाजे में ताला बंद कर देना।इस पीड़ा को बड़े तो सहन कर लेते हैं पर एक दूसरे के साथ खेलते बच्चे कैसे दीवारों के कैदी हो जाएं? यह पीड़ा और उभरती है जब बस में मिला चचेरा भाई  अनिरुद्ध को गुस्से में देखता है। और  जब आखिर में पिता को कैंसर हो जाता है तो महीनों बाद,एक ही शहर में रहते  उनके बड़े और छोटे भाई खबर नहीं लेते। बेटे,अनिरुद्ध के बताने पर वह आते हैं अपने भाई को देखने।

अन्नू के प्रेम प्रसंग का उल्लेख है जहां बिन्नी,पंजाबी मकान मालिक की विवाहित बेटी, से अकेले ,पराए शहर में रहते अविवाहित युवक का आकर्षण,पहले बातों से फिर दैहिक होता है। उसमें बिन्नी का किरदार उभरकर सामने आता है,जब अन्नू के अचानक दूर जाने के फैसले को मानती है और उसे ग्लानि से मुक्त करती है यह कहकर कि,",तुम्हारे साथ मुझे तुम्हारी बातें, तुम्हारी कविताएं,मौसम का पता चला। मैं भूल गई कि मैं एक जहन्नुम को छोड़कर आई हूं।तुम्हारे साथ मुझे ढेर सारे सुखद पल जीने का मौका मिला।तुम्हे गिल्ट से मुक्त कर रही हूं। मैं कल अपनी ससुराल जा रही हूं।शायद अब हम कभी ना मिले।" 

उधर पुरुष वही इसे कैसे अपना सकता हूं? शादी कैसे सब मानेंगे? इन प्रश्नों के साथ प्यार को पुरुष कभी जी ही नहीं पाता है। जबकि स्त्री जब आपसे प्यार करती है तो बस वह सिर्फ प्यार करती है और कुछ नहीं बस आपको सोचती है। 

तुलसीराम अपनी आत्मकथा के दूसरे भाग मणिकर्णिका के आखिरी भाग में अपने जीवन में आई लड़की का ईमानदारी से जिक्र करते हैं। वहां वह ,पुरुष, अपनी दलित जाति के कारण 

ट्यूशन पढ़ने वाली सवर्ण लड़की के प्यार को जबरदस्ती अनदेखा करते हैं। यह अंतर दरअसल जीवन की सामाजिक बनावट का है जो साहित्य में  भी आता है।

  मूलतः कवि रासबिहारी इस  प्रथम उपन्यास में बेहद खूबसूरत  भाषा,वन लाइनर और देशज शब्दों के उपयोग से बेहतरीन कोलाज रचते हैं। थोड़ा  कार्य कथावस्तु पर भी करना चाहिए।  अनिरुद्ध की स्मृति यात्राओं के सहारे कथा कुछ जगह अधूरी सी लगती है।  फिर भी उपन्यास पठनीय है।

              

4.एक अरसे बाद, काव्य संग्रह,अनामिका चक्रवर्ती, 8965033540 ,भावना प्रकाशन,दिल्ली

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यह युवा कवयित्री अनामिका का प्रथम काव्य संग्रह जरूर है पर कविताएं वह पिछले डेढ़ दशक से लिख रहीं हैं। यह  कविताएं विद्रोह करती भी हैं तो  समझौता भी, इनमें स्त्री गुस्सा होती है तो क्षमा भी करती है,रूठती है तो मन भी जाती है।

"औरतें ,अजीब सवाल हो

जी का जंजाल हो

तुम किसी भी आग में जलकर

कभी लोहा तो कभी सोना

क्यों बन जाती हो?"

     इसी सवाल से जुड़ी हैं यह पंक्तियां,"एक बार खुद को फिर सुलगाना चाहती हैं /अपनी बुझती जिंदगी में आग लाने के लिए।"

     उनकी प्रेम की अभिव्यक्ति दरअसल जिंदा रहने की अनिवार्य शर्त है,जिसे अफसोस ,बहुत कम पुरुष समझ पाए, "न कविताएं पूरी होती हैं/न जिंदगी मुकम्मल होती है/ प्रेम भटकता रहता है/उदासी के घने जंगलों में।"

औरत का एक और दिलचस्प चित्र जो आपने अपने घरों में कभी गौर से देखा नहीं होगा।

 "उसके हाथ कभी आटे से सने सफेद/ तो कभी हल्दी से पीले/ नए आलू के मौसम में अक्सर मटमेले/ धूप में मिर्ची कूटती तो /हाथ लाल दहकते / मेहंदी बहुत कम दिखती/

उसके हाथों में।"

   यह बेचैनी,छटपटाहट,साथी के साथ ,उससे अलग भी की ऐसी उत्कंठ कविताएं हैं जो जादू सा कर देती हैं।

हालांकि कुछ कविताओं पर और काम होना चाहिए था,विशेषकर भाषा और बिंब और बेहतर हो सकते थे।

"प्रेम भटकता रहता है/उदासी के घने जंगलों में/जहां आस की धूप को चोर/ यादों के जुगुनू को/ लुटेरा कहते हैं।"

   प्रेम में तैरने की जगह गहराई में डूबना चुना,तो क्या हुआ उनका? 

कुंवारी लड़कियां प्रेमी के संग/ बंधना चाहती हैं परिणय सूत्र में/जबकि/ विवाहित स्त्रियां प्रेमी को नहीं चाहती खोना/ बंधना चाहती हैं विश्वास के अटूट बंधन में ।

कई अछूते बिंब,कथ्य और अगढ़ता इन कविताओं को चमक प्रदान करते हैं। एक पढ़े जाने योग्य संग्रह ।

         इन कविताओं की तासीर ऐसी है जो असंख्य स्त्रियों की आवाज बन जाती है ," तुम्हे ऐसी स्त्री से कभी/ प्रेम नहीं करना चाहिए/जो मन से बहुत टूटी हुई हो/ क्योंकि...अगर / उसने भी तुमसे प्रेम कर लिया / तो तुम्हे अपना सर्वस्व मान लेगी।"

यह चुनौती देती स्त्री है जो बताती है कि वह स्त्री बनाम पुरुष, स्त्री बनाम स्त्री के नाटक को समझ चुकी है। वह अपनी स्वतंत्रता भी जानती है और दूसरों को स्पेस देना भी। वह क्यों दुखी हो यदि  थोड़ा बहुत अच्छा नहीं भी है तो? कौन है जो सर्वगुण सम्पन्न है? फिर कुछ पुरुषों के बहकावे में आ अकेली चलती स्त्री का आज क्या हाल है यह छुपा हुआ नहीं।

संग्रह की कुछ कविताएं कमजोर है जिन पर और काम होना चाहिए। कुछ विषय संग्रह से इतर भी हैं,उन कविताओं को हटाया जा सकता था। प्रथम संग्रह के हिसाब से कविताएं बहुत मजबूत,विचारवान और विमर्श देती हैं। स्वागत ।

 

5.जीवन की कुछ चुभती,झिलमिलाती यादें,संस्मरण,संपादन नीलम कुलश्रेष्ट, वनिका प्रकाशन,दिल्ली।

---------------------------------------------- एक स्त्री जीवन में किन किन चुनौतियों से दो चार होती है,उन्हें किस तरह अपने राह देखती है और फिर चुप बैठने की जगह वह उन मुश्किलों, समस्याओं से घर बाहर सामना करती है। हर जगह विजय ही नहीं मिलती कुछ जगह हार भी होती है लेकिन स्त्री उस हार से भी सबक लेकर आगे बढ़ती है और अपनी सुदृढ़ और मजबूत पहचान बनाती है।कुछ रोचक ढंग से लिखे यात्रा संस्मरण पुस्तक को गरिमा प्रदान करते हैं। 

 नीलम कुलश्रेष्ठ के संपादन में यह स्त्रियां जो जीवन,परिवार की आपाधापी और अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए उम्र की मध्य वय पर हैं।

 इनमें कैंसर से जूझती और उसके पहलुओं को दर्शाती स्त्री(नीना पठानिया) हैं तो वहीं एक माफिया डॉन संतोकबेन जड़ेजा से रूबरू होती पुलिस अधिकारी स्त्री (डॉ मीरा रामनिवास)हैं।वहीं अमरीका यात्रा पर कुछ संस्मरण हैं जिनमें  अंजना संधीर, जिन्होंने फिल्मी गीतों के द्वारा हिंदी भाषा सिखाई,निशा चंद्रा और उल्लेखनीय है निकुंज शरद का लिखा जिसमें वह अमेरिका की चमक को ही नहीं देखती बल्कि होमलेस और अन्य कमियों पर भी उंगली रखती हैं।

उत्तरी आयरलैंड ,ग्रेट ब्रिटेन प्रभा मजमुदार तो थाईलैंड पर नीलम कुलश्रेष्ठ बहुत ही भावपूर्ण ढंग से पाठकों को यात्रा करवाती हैं।

लेकिन जिस लेखन शैली ने मेरा सर्वाधिक ध्यान खींचा वह नियति सप्रे द्वारा लिखित मिडिल ईस्ट पैराडाइज, ईराक के शहरों बगदाद,किरकुक आदि की उस दौर की यादें जब सद्दाम हुसैन का शासन था। वह सलीके से उस वक्त की खुशहाली, जीवंत इराकी,आजाद नारी, स्वेच्छा से एक पत्नी रख रहे युवकों और वहां के विभिन्न संस्कृति और लोगों से मिलाती चलती हैं। साथ ही हर दृश्य के बाद वह पाठकों को वर्तमान में ले आती हैं जब अमरीकी बमबारी और आतंक से ईराक पूरी तरह तबाह हो चुका है।

यह दृश्यों का बुनना और भाषाई जटिलता के बिना उन्हें पाठकों के सामने रखना बहुत रोमांच उत्पन्न करता है। हम जितने अधिक विज्ञान और आधुनिकता के नजदीक हुए ,उतने ही हम विनाशी क्यों होते गए? क्या ताकत का अर्थ किसी देश की संस्कृति,सौहाद्र और हजारों निर्दोष लोगों का कत्लेआम है?

       कुछ संस्मरण सामान्य है जो उतना असर नहीं छोड़ते। पर पुस्तक इसलिए उल्लेखनीय है कि अलग अलग क्षेत्र की स्त्रियों की परिवेश,समकालीन घटनाक्रम और यात्राओं को लेकर उनके दृष्टिकोण को सामने लाती है।नीलम कुलश्रेष्ठ का परिश्रम दिखता है। थाईलैंड यात्रा में वह पाठक उन्हीं के साथ साथ चलता है।

कमियां यह हैं कि कुछ संस्मरणों पर और मेहनत करवाई जाती तो दो चार जो कमजोर हैं वह भी बेहतर हो जाते।खासकर जिनका लेखन क्षेत्र नहीं है। परन्तु जो आवाज,हिम्मत और सुदृढ़ नारी उभरकर  सामने आती है वह आज के भारत की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करती हैं।

 

6समता संवाद,आलोचना,हिम्मत सेठ,9460693560,महावीर समता संदेश,उदयपुर

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  गांधी,प्रेमचंद,लोहिया,भगतसिंह,जयप्रकाश नारायण से लेकर विदेशी पूंजी,स्मार्ट सिटी, वैकल्पिक मीडिया,कृषि, शिक्षा,समाजवाद,विदेश नीति आदि विविध विषयों पर इस पाक्षिक पत्र द्वारा आयोजित गोष्ठियों के विचारों का संकलन है। चूंकि यह पूर्व निर्धारित अथवा योजना के तहत नहीं बल्कि विभिन्न वक्ताओं द्वारा कहे विचारों का संग्रह है तो इसमें कई  दिलचस्प बातें भी हैं और कुछ भूलें अथवा गलतियां भी।  एक बाएं झुकाव की वजह से एकरस्ता है तो वहीं कुछ वक्ताओं यथा, नरेश भार्गव,सुधा चौधरी, प्रोफेसर हेमेंद्र चंडालिया, वी बी सिंह,तराना परवीन आदि ने संतुलन साधा है।  हिम्मत सेठ ,जो प्रकाशक संपादक हैं,का यह वर्षों से चला आ रहा पत्र हिंदी वैचारिकी में एक सराहनीय कदम है। यदि गोष्ठियों के आयोजन की तिथि भी दी जाती तो यह अधिक उपयोगी होता। साहित्य और संस्कृति पर थोड़ी और जानकारी होनी चाहिए थी।

 

7.पुस्तक :_ सरकारी नौकरी, उपन्यास,+971566181641 निशा गिरी,शारजाह ,  शब्दांकुर प्रकाशन,नई दिल्ली

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"और ओहु में उसकी दो गो बेटी है, कहां से लाएगी पैसा,कईसे करेगी बिटिया का ब्याह? कहां से आएगा ओतना दहेज ?"

      विषय अच्छा उठाया है युवा लेखिका निशा ने। किस तरह पढ़ी लिखी,उच्च शिक्षित लड़कियों के मां पिता दहेज को लेकर परेशान रहते हैं। लड़का चाहे सरकारी नौकरी में अदना सा चपरासी ही हो,उनकी दहेज की मांग बीस लाख तक तो मामूली है।  आज हालात थोड़े खुले हैं पर पूरी तरह नहीं। कहानी पुष्पा,दुबे जी और उनकी डाक्टर बेटी मधुमति के सपनों,अरमानों और कर्तव्यों के निर्वहन में आ रही विविध कठिनाइयों की हैं। कानपुर शहर में स्थित यह परिवार भोजपुरी  ,पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार,झारखंड तक में लोकप्रिय भाषा बोलता है।किस तरह डॉक्टर नायिका,जो संस्कारी और आजकल की हवा से अलग कोई रोमांस आदि नहीं करती,के माध्यम से एक गंभीर प्रश्न हमारे,पूरे देश के सम्मुख रखती है। वह यह कि पूर्णतः भारतीय संस्कृति,जीवन मूल्य के साथ,ईमानदारी से जीवन यापन कर रहे हैं,वह क्या करें? जब दहेज या अन्य नौकरियों में उनसे आज की रीति और खुली भूमंडलीकरण की हवा में कसकर दहेज और रिश्वत मांगी जाती है तो वह कहां जाएं? किसे कहें अपनी पीड़ा? क्योंकि मार्केट,आधुनिक समय के अनुसार दहेज तो देना ही है और अच्छी नौकरी लेनी है तो भी मोटा लाखों में रूपया देना ही होगा। नहीं देंगे तो औसत से नीचे के रिश्ते और निजी क्षेत्र की खून चूसने वाली नौकरी आपका इंतजार कर रही।

तब कोई भी जीवन मूल्य,भारतीय संस्कृति ,पुत्री की मेधा,लड़का लड़की सब बराबर हैं , कि बात ही नहीं करता।

इस दोगले यथार्थ पर उंगली रखने का कार्य बहुत थोड़े लेखकों ने किया है। अनगढ़,बेलौस निशा उनमें से एक हैं।

  लड़की और उसके घरवाले अनेक बार किस तरह लड़के वालों और रिश्ते मिलाने वालों की आवभगत और चिरौरी करते हैं,यह पढ़कर आपको अपने घर और आसपास की घटनाएं याद आ जाएंगी। क्या "बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ" को हम कभी असलियत में भी महसूस करेंगे?

उपन्यास अधिक बड़ा नहीं है लेकिन बहुत अच्छे ढंग से दृश्यों को,कुछ जगह व्यंग्य के साथ लेखिका रखती हैं।

मधु को जब मां सरकारी नौकरी के लाभ गिनाती हैं और प्राइवेट जॉब के खतरे , "सरकारी नौकरी में तो ठोक बजाकर पता हो जाता है कि क्या,कितना कमाता है? लेकिन प्राइवेट में कुछ पक्का नहीं। लड़का ब्याह से छ महीने पहले दूर शहर में प्राइवेट नौकरी पकड़ता है। मां बाप यहां उसकी हवा बनाते हैं ,लड़की वालों से मोटा दहेज और सुंदर लड़की से विवाह के बाद वह लड़का वहां जॉब छोड़कर,जो वह करता भी था या नहीं,वापस और फिर घर जमाई बन जाते हैं।  आगे बेहतरीन व्यंग्य देखें, "लड़का विदेश में काम करता है। अब क्या काम करता है? झाड़ू लगाता है,वह लेटरिंग साफ करता है,के देखबे जा रहा?" यह कटु सत्य पंजाब से प्रारंभ होकर आज देश के अनेक शहरों,राज्यों में है। 

  लड़की को साहस और अपनी बात कहने का होंसला अपने पांव पर खड़ी होने वाली शिक्षा देती है।तभी नायिका का पिता जब उसे भावनात्मक कमजोर करता कहते हैं, "बिटिया हम जीते जी तेरी शादी कर दें तो हम तर जाएंगे. नहीं तो मर के भी चैन नहीं आएगा। हमारी खुशी के लिए मान जा बिटिया।"

क्या करते आप?वही जो लाखों लड़कियां करती आईं।पर यह नायिका, संस्कारी भी है तो अपना भला बुरा भी समझती, कहती है, "आपकी खुशी के लिए! वाह पापा, अपनी खुशी के लिए अपनी बेटी की खुशियों की कुर्बानी मांग रहे हैं आप!! आपका दिया जीवन ही हमसे मांग लेते तो हम आपको खुशी खुशी दे देते।"(पृष्ठ106)

 यह  कथा कई दिलचस्प मोड़ से गुजरती हुई पाठकों को भारतीय समाज की महत्वपूर्ण रीति की यात्रा करवा आती है। 

       हर आयु के पाठकों को रोचक,रोमांचक शैली का  यह उपन्यास जरूर पढ़ना चाहिए और सोचना चाहिए कि हम कब सुशिक्षित,समझदार और जागरूक बनेंगे? 

प्रथम उपन्यास है तो कुछ दृश्य बहुत छोटे होने से प्रभाव नहीं छोड़ते।कुछ दृश्यों में तृतीय पुरुष (सम्बोधन में)की गलती है। कुछ जगह भावनाओं को और चित्रित करवा चाहिए था। हिंदी, भोजपुरी भाषा उपन्यास में पात्रों के अनुकूल है। पढ़ते हुए आप नायिका मधुमति के विचारों और सोच से सहमत भी होते हैं तो कुछ जगह बरबस ही मुस्कराते भी हैं।लेखिका हिंदी जगत में उम्मीद जगाती हैं एक ताजगी भरी सोच के साथ।

 

8.पुस्तक :_उजड़ी हुई औरतें,उपन्यास ललिता विम्मी,9813173848, देवप्रभा प्रकाशन,गाजियाबाद

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कौनसी औरत है जो उजड़ी नहीं? कौनसी है जो बचपन में जहां पली बड़ी और फिर चल दी अपनी नई ,अनजानी दुनिया में।दुनिया जिसका अच्छा और बुरा होना सब दूसरों के हाथ। वह भी एक नहीं कई हाथ जो उस दुनिया को खराब कर देते।पर फिर भी सारी औरतें हिम्मत से इस दुनिया में कदम रखती और अपनी मेहनत,निष्ठा, समर्पण से उस अनजानी दुनिया को फूलों सा महका देती। आसमान के इंद्रधनुष सा रंगीन बन जाता जीवन।

  लेकिन क्या यह हर एक के साथ होता? 

ललिता विम्मी अपने इस पहले उपन्यास में विभाजन के समय से स्त्रियों की स्थिति,दुर्गति और उनके टूटते,बिखरते सपनों की बात बड़े ही सशक्त ढंग से उठाती हैं। कहानी है अंजना नाम की किशोरी की जिसके माता पिता , मौसी सभी को विभाजन के समय दंगाइयों ने मार डाला। किशोरी के साथ बदसलूकी करके मरा समझकर छोड़ गए। एक मुस्लिम युवक और उसकी मां उसे अपने खेत की कोठरी में छुपाते हैं और आगे बचाव दल को सौंपते हैं। वहां से रिफ्यूजी कैम्प और  आश्रम पहुंची अंजना की कहानी आगे बहुत कुछ कहती है। आश्रम से एक बड़े चौधरी परिवार की स्त्री उसे बहु बनाकर अपने साथ ले आती है। यह दबी,कुचली लड़की कुछ भी नहीं बोलती,न बोलने की स्थिति में होती है। वहां से चौधराइन अपने बेटे के लिए इसे बहू रूप में चुन ले जाती है।

यह किरदार बहुत जबरदस्त है एक ममतामई मां तो बहू को बेटी की तरह सहेजने वाली सास।  जो दंगा पीड़ित लड़की की स्थिति जानते हुए भी उसे अपनाती ही नहीं बल्कि घर का अधिकार भी देती हैं।अधिकतर  तो वंचित,दुखी, पीड़ित स्त्रियों को जीवन भर गुलामों की तरह रखते हैं।

फिर आगे किस ढंग से रहस्य खुलता है कि दबंग चौधरी,उनके बेटे ने पहली पत्नी का खून कर दिया था।दो साल का लड़का भी है। प्यार करने वाले पर खूनी पति के साथ रहने के डर,मजबूरी और आशंका को बखूबी कथानक में उभारा गया है।  

    ललिता विम्मी पहले उपन्यास में रोचकता के साथ कथानक आगे बढ़ाती हैं।परंतु बहुत सी जगह वाक्यों और व्याकरण चिह्न सही नहीं होने से दो वाक्य,अलग अलग पात्रों के एक हो जाते हैं।वह कथा प्रवाह में बाधा हैं। दूसरे अलग अलग घटनाक्रम के लिए अध्याय अंतर्बोधक चिह्न होने से कथा प्रवाह बढ़िया होता है।

 लेकिन इन सबके बाद भी उपन्यास का शिल्प और भाषा दोनों अच्छे हैं। पढ़ते हुए आप पात्रों के साथ साथ घटनाक्रम के भी साक्षी बनते हैं। एक मोड़ आगे आता है जब आगे नायिका,बंटवारे की आग से पीड़ित,अंजना को पता लगता है दबंग चौधरी की एक रखैल भी है।जिसे अलग घर में शहर में दिया हुआ है। खामोश रहने वाली लड़की शिकायत करती है,उसकी सास भी अपने बेटे को फटकारती है। फिर चौधरी खुद ही बाहर वाली को पत्नी की जगह देने को तैयार नहीं होते।वह खामोशी से चौधरी के डर से चली जाती है। 

कथानक विम्मी जल्दी जल्दी आगे बढ़ाती हैं। अंत में उनके बेटों,बेटी की शादी के साथ खत्म होता है यह पठनीय उपन्यास।

   कुछ जगह और ठहराव  की जरूरत लगती है। कथानक लेखक के जहन में पूरा चलता है फिर वह पन्नों पर सामने आता है। उसमें दो तीन बार, सुनते हैं शिवपूजन सहाय,शिव प्रसाद सिंह, नीला चांद वाले,तो कम से कम चार बार अपने उपन्यास के ड्राफ्ट को सुधारते हैं। 

 लेकिन उपन्यास अपने कथ्य और भाषा से बांधकर रखता है।

 

 

9.हां, मैं हूं,उपन्यास,महेंद्र भीष्म (7607333001)

अद्विक प्रकाशन,(9560397075),दिल्ली

 

समलैंगिक रिश्ते पर लिखा एक अच्छा उपन्यास

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क्या जीवन में हर संतुष्टि,हर बार और लंबे वक्त तक मिलना जरूरी है? क्या प्यार,यौन इच्छाओं का दमन नहीं होना चाहिए? क्या जो जिस राह चले,भले ही अजीब हो,उसे उस पर चलने की आजादी होनी चाहिए? क्या गेय और लेस्बियन सामान्य बातें हैं? इन सभी प्रश्नों पर आमतौर पर हम सभी बचना चाहते हैं। बात ही नहीं होती। और तो और नब्बे फीसदी लेखक भी इन पर  नहीं लिखते। डरते हैं अपनी छवि बिगड़ने से।जबकि सच्चा लेखक वह है जो हर पीड़ा को स्वर दे। उनके दर्द को समझे और पूरी ईमानदारी से सामने लाए।

 प्रस्तुत उपन्यास इसी क्रम में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। महेंद्र भीष्म ने बारीकी से उन हालातों और परिस्थितियों की पड़ताल की है जिस वजह से यह संबंध विकसित होते हैं। लेखक की पारखी नजर बचपन से किशोर अवस्था के हालातों को आपके सामने रखते चलती है।स्वत ही समझ आ जाता है कि अकेलापन,बच्चों को नौकरों या अन्य संबंधियों के हवाले करने से यह प्रवृत्ति जबरन विकसित की जाती है। अकेले अवसर विकृत मानसिकता के लोगों को मिलते हैं तो वह आपके भोले भाले बच्चों में आदिम प्रवृत्ति को जबरन डाल देते हैं।

 

कोई भी जन्म से गे नहीं होता

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 उपन्यास बड़े मजबूत ढंग से यह बात उठाता है कि जन्म से कोई भी असामान्य नहीं होता। माता पिता की व्यस्तता और दूसरों के हवाले बच्चों को छोड़ने की मजबूरी उनके बच्चों की जिंदगी तबाह कर देती है।

  उपन्यास के गम्भीर कथानक को सहज बनाने के लिए लेखक ने रोमांस और एक नव युगल की बैकग्राउंड में  रोमांचक कथा बुनी है।

शुभम् और मीरा प्यार,भरोसे के साथ अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत करते हैं। शुभम् होटल में हनीमून के दौरान ही अपने पुरुष मित्र के बुलावे पर उससे भी संबंध बनाता है।

 उधर होटल स्टाफ सागरिका,जो एक सांस्कृतिक,कला और लेखन कर रहे दंपत्ति,की पुत्री है ,वह मीरा की खूबसूरती और भोलापन देख उसे पसंद करती है। पर यह पसंद करना सामान्य है या कुछ अलग?

कुशलता से उपन्यास इससे आगे बढ़ता है। होटल मैनेजर कर्मजीत का पात्र दिखाता है कि किस तरह ऐसे संबंधों के मध्य दूसरे लोग फायदा उठाते है,शोषण करते हैं।

      सागरिका,अपने घर की प्रथम मंजिल के कमरों में रह रही एक लड़की भाषा को लेस्बियन महसूस करती है। यहां फिर एक मनोवैज्ञानिक कारण  लेखक प्रस्तुत करता है जो समाज में आम होता है। 

आगे तेज रफ्तार घटनाक्रम चलता है और किस तरह मीरा जो सामान्य स्त्री है उसे भी नताशा,सागरिका अपनी दुनिया में खींचने की कोशिश करती हैं।

पर एक दो बार उन्हें बर्दाश्त,यह अनजाने में उसे छू रही, के बाद वह उन्हें साफ साफ मना कर देती है।

 उसी में गोआ का घटनाक्रम भी आता है जहां चार अलग अलग आयु की स्त्रियों का समूह मिलता है। चारों का चरित्र चित्रण बहुत सहज परन्तु तेजी से भीष्म देते हैं। किस तरह दो दो के समूह होते हैं फिर वह आपस में लिंक होते है ।उनके मध्य के सामूहिक प्यार को रोचकता से दिखाया गया है।

 बहुत तीव्रता से यह बात पाठक के मन में उतरती है कि ऐसे संबंध आम हो चुके हैं,हर जगह लोग ऐसे होते हैं।

  यहां कृष्णा सोबती,मेहरुन्निसा परवेज की कहानियां याद आती हैं।यह कहानियां करीब आधी सदी पहले लिखी गईं जिसमें स्त्री स्त्री का प्यार दिखाया गया। आज के भौतिकवादी युग में जब हर जगह तीव्र परिवर्तन हो रहे हैं तो शारीरिक सुख,यौन संतुष्टि का क्षेत्र कैसे अधूरा रह सकता है? वहां परिवर्तन और तीव्र हुए,ऊपर से कोर्ट ने भी एलजीबीटी समुदाय को स्वीकृति दे दी। 

मैं जानना चाहूंगा कि यह किस कानून की धारा है? अंग्रेजों के समय की है तो जिस तरह सरकार अभी पुरानी,बेकार हो चुकीं धाराएं रद्द कर रही है, इसे भी करे। या नई है और लागू की जा चुकी है तो फिर भारतीय संस्कृति और उसके आदर्शों का बखान बंद नहीं तो कम ही कर दे?

उपन्यास में कुछ समस्याओं का चित्रण है किस तरह ऐसे जोड़ों को ब्लैकमेल किया जाता है।पुलिच वालों की मिली भगत से बदनामी का डर दिखाकर लूटा जाता है। कुछ घटनाएं जो हम पढ़ते हैं अखबार आदि में की अच्छे भले नौकरी करते स्त्री या पुरुष ने आत्महत्या कर ली,उसके पीछे भी संभवतःयही कारण होता है।

 

यौन चित्रण की भरमार 

------------------------------लेखक कथानक को तेज रफ्तार और सहज सुलभ शब्दों और कई जगह अंतरंग पलों को प्रकृति के बिंबों द्वारा दर्शाकर पाठकों को बांधे रखता है। विषय की मांग और कहानी को विभिन्न कोणों से दिखाने के लिए उपन्यास में करीब दर्जन भर यौन दृश्य हैं। लेखन ने संयम से काम लिया जरूर है पर कुछ जगह बच सकते थे। एक कमी यह भी रही कि जब मीरा के प्रेग्नेंट होने की खबर और बेटा कुछ माह का होता है,इस पूरे को मात्र एक पृष्ठ में निबटा दिया गया है।

    दूसरे कुछ जगह एडिटिंग की भी गुंजाइश है। 

पर फिर भी अपने कहन और भाषा की संपन्नता से उपन्यास इस गंभीर विषय के साथ न्याय करता है। वह यह भी दिखाता है कि अपनी जिंसी जरूरतों से मजबूर ऐसे लोग नफरत, तिरस्कार के नहीं बल्कि सही मार्गदर्शन, बचपन में उचित देखभाल और हमदर्दी के काबिल होते हैं।  मीरा के माध्यम से यह भी जाहिर किया है कि स्ट्रेट व्यक्ति को भी गे या लेस्बियन मिलते हैं और अपने साथ मिलाने का प्रयत्न करते हैं।इससे बचने और सावधान रहने की जरूरत है। कुछ स्थान अनुकूल कविताओं का प्रयोग उनके लेखकों के नाम सहित किया है,लेकिन यह कथा प्रवाह में विघ्न डालता है।

अद्विक प्रकाशन दिल्ली ने बेहतरीन ढंग से पुस्तक प्रकाशित की है।

  कह सकता हूं कि हिंदी जगत को समलैंगिकता,प्यार, आकर्षण,जिस्मानी जरूरत और बौद्धिक प्यार जैसे विषयों पर अच्छी रचनाओं का इंतजार है। हां, मैं हूं,उपन्यास इस जरूरत को पूरा करने में योगदान देता है। इसे अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। इसका अगला भाग भी आना चाहिए। 

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____ डॉ.संदीप अवस्थी, आलोचक,फिल्म लेखक

देश विदेश से पुरस्कृत

(नया व्यंग्य संग्रह " जालिम स्त्रियों के बीच पुरुष" अभी खूब चर्चा में है।

9810066431,इंडिया नेटबुक्स,दिल्ली से आज ही मंगवाएं)

मो 7737407061, 8279272900